रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
४०८ असली कोकशास्त्र
हाथ बदलता जाय जिससे हाथ गरम न होने पाये और तेल रमता
जाय हाथों की तली गरम होने से दोनों को नुकसान है अर्थात्
मस्तक में गरमी पहुंचने से बुद्धि की हानि और बालों के संघर्ष से
एक प्रकार की विद्युत पैदा होती है जो हाथ की हथेलियों के मार्ग
से मर्दनकर्त्ता के मस्तक में हानि पहुँचाती है। कनपुटियों को अँगू-
लियों के अग्रभाग से मर्दन करे। तत्पश्चात् गर्दन और बाँहों को
पहले धीरे-धीरे जब गरम हो जाय तब बलपूर्वक मर्दन करे। इसी
प्रकार सब अंगों में सब तेल रमा दे। डेढ़-दो घण्टे के बाद जब
अच्छी प्रकार ठण्डा हो जाय तब साबुन से स्नान करे। इस प्रकार
मर्दन किया हुआ तैल अपूर्व फल देता है।
—०—
मञ्जन
दाँतों में कीड़ा नहीं लगेगा, मुँह से बदबू नहीं आयेगी। पाचन-
शक्ति बढ़ जायगी, पेट का कोई रोग नहीं होगा। कारण यह कि
प्रतिक्षण मुँह में थूक आता रहता है और दाँतों की जड़ों में से
होकर ओठों से टकरा भीतर लौट जाता है। फिर वह कण्ठ से नीचे
उदर में पहुँच जाता है तथा भोजन के हजम होने में बड़ी सहायता
करता है। साफ कहना चाहिए कि वही लार मुख में दाँतों की रगड़
के संसर्ग से अमृत बन जाती है और अमृत-कूप जहाँ उस लार के
ठहरने का स्थान है वहाँ पहुँच जाती है। यथार्थतः जो कण्ठ में
असली कोकशास्त्र ४१६
जिस स्त्री का पति वेश्या के पास जाय, उस स्त्री को सोचना
चाहिए कि मुझमें क्या कमी हुई जिसके कारण पति का मन दूसरी
पर गया । सत्कार में तो कोई त्रुटि नहीं हुई, कोई अनुचित वचन
तो नहीं कहा गया, शृङ्गार-भूषा में तो कमी न हुई इत्यादि बातों का
विचार कर अपने दोषों को खोजे । जब कोई दोष समझ में आ
जाय तो उसे दूर कर दे । यह निश्चित बात है जो स्त्री प्रति दिन
इन बातों पर ध्यान रखती है उसका पति कभी कुराह पर नहीं
जाता और चला गया होगा तो अवश्य लौट आवेगा ।
घर में प्रायः वृद्धा स्त्रियाँ पुत्र वधुओं को जब शृङ्गार से सजते
देखती हैं तो उन पर वाग्बाण छोड़ती हुई कहती हैं—इसे शृङ्गार
से ही फुरसत नहीं, आज ही रिझायेगी, मानो अप्सरा ही बनेगी
इत्यादि अनेक कुवाच्य कह डालेंगी । एक तो पहले ही संकोचवश
उन्होंने कुछ शृङ्गार किया । उस पर ताना-कशी हो गयी । फिर
क्या था उनका उत्साह सदा के लिए नष्ट हो गया । अगर शृङ्गार
किया भी तो किसी के घर विवाह आदि संस्कार अवसर पर दूसरों
को दिखाने के लिए । जो शृङ्गार केवल पति के लिए किया गया
उस पर तो आवाज कसी गयी और जो दूसरों के लिए शृंगार
किया गया उसमें सहयोग दिया जाय इसका परिणाम क्या होगा,
विचारशील पाठक स्वयं विचार सकते हैं । वे भी जब सास बनती
हैं तो वह अपनी पुत्र-वधुओं से वैसा ही बर्ताव करती हैं । इसी
लिए आज मनुष्य घर की सुन्दर नारियों को छोड़कर वेश्याओं के
४२० असली कोकशास्त्र
जाल में जा फंसते हैं। अतएव घर की अनुभवी सास आदि को
चाहिए कि वे उनके उत्साह में विघ्न न डालें प्रत्युत् सहायता करें
और उनकी त्रुटियों को सुधार दें ।
बाजार के खाद्य पदार्थ और कटे-सिले कपड़े महँगे होने पर
भी क्यों अच्छे प्रतीत होते हैं और घर के नहीं ? इसका कारण
केवल इतना ही है कि वे ग्राहक को देखने में अच्छे लगें और दाम
वसूल हो जाये इस वजह से सुसज्जित करके रखे रहते हैं किन्तु
घर में इसका विचार नहीं किया जाता । और यदि यह कहा जाय
तो जवाब मिलता है कि क्या हमें बेचना है ।
इसका परिणाम यह होता है कि कोई पदार्थ अच्छा नहीं
बनता और न ही बनाना आता है। इस समय गृहस्थों में चार
अंगुल फटी चीज भी सी नहीं सकते, नये का तो कहना क्या ?
और खाने-पीने की वस्तुओं की भी यही हालत है । कभी दाल
पतली तो कभी गाढ़ी कभी मिली, कभी अनमिली अधिक क्या
सभी पदार्थों की यही दशा है ।
इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि वस्तु का संस्कार ही मनुष्य की
चित्त-वृत्ति को अपनी ओर खींचता है। संस्कार समान होने पर भी
मनुष्य को चाहिए कि वह उसमें अपनी हानि-लाभ को भी सोचे ।
जैसे एक उदाहरण आगे रखा जाता है ।
वस्त्र आभूषणों से सजी हुई एक तवायफ भरी सभा में गा
कर क्या आदर्श पेश करती है ।
असली कोकशास्त्र ४२१
"करेजवा उठे रे मोरे पीर"
इस कड़ी को सुनकर महफ़िल की महफ़िल झूमने लगती है।
सच पूछिए तो वह विषधर सर्प की विष भरी लहर देती है। जिस
पर उसका असर हो जाता है उसके तन-मन-धन सभी का नाश
हो जाता है; किन्तु कुल-वधु जब पति के सम्मुख सर्वशृङ्गार सम्पन्न
होकर गायेगी तो उसका कितना सुन्दर आदर्श होगा—
पति बिना सूना सकल संसार।
वह मधुर रस-भरी सुधावर्षी मन और धन का बढ़ाने वाला
होगा। स्वर कितना सुन्दर और मनोहर होगा जिसमें पति के प्रेम
में रसभरी तान होगी। परन्तु आजकल तो पति के सम्मुख गाना
बड़ी निन्दा की बात समझी जाती है। बड़ी-बूढ़ी तो क्या युवतियाँ
तक भी कहती हैं—"यह कैसी निर्लज्ज है पति के सामने गा रही है
इसको जरा भी बड़ों की शरम लिहाज नहीं।" किन्तु यह उनकी
भूल है। वेष-भूषा के अतिरिक्त यह भी एक कारण है जो मनुष्य
को तवायफ़ों की ओर खींच ले जाता है। यदि घर में अपनी ही
स्त्री सुन्दर शिक्षाप्रद गायन से काम लेकर अपना और पति का
मन बहला दे तो पुरुष को कहीं जाने का बहाना ही न मिले। रही
निर्लज्जता की बात, वह केवल ढकोसला मात्र है। क्योंकि विवाह
आदि संस्कारों पर जिन निर्लज्जतापूर्ण गीतों को अपने श्वसुर आदि
सम्बन्धियों तथा बारातियों के सम्मुख बड़ी-बूढ़ी और कुल-वधुएँ
गाती हैं, वह किसी से छिपी नहीं। वे गाने इतने गन्दे और निर्ल-
४२२ असली कोकशास्त्र
ज्ञता से भरे हुए होते हैं कि जो सभ्य स्त्री-पुरुष के मुँह से निकल
ही नहीं सकते। उन पर तो विचार नहीं, और जो पवित्र शिक्षापूर्ण
गाने पति के सामने गाये जायँ तो वह निर्लज्ज व्यवहार समझा
जाय। भला इससे बढ़कर भी कोई वज्र मूर्खता हो सकती है। इसी
अविवेक के कारण ही गृहस्थों की हालत बिगड़ी हुई है। गृहस्थों
को कभी गन्दे गीत स्वयं गाने वा सुनने नहीं चाहिएँ। इससे अपने
तन मन धन वा कुल परिवार सभी का विनाश होता है। अतः
सबको सुन्दर शिक्षाओं से भरे हुए ही गाने सुनने वा गाने चाहिए।
जिससे अपना और दूसरे सुनने वालों का उपकार हो।
स्त्री के सभी प्रकार के श्रृङ्गार तथा उपरोक्त कलाओं के प्रयोग
पति को प्रसन्न करने के लिए ही होते हैं। पतिव्रता स्त्रियें पति के
घर पर रहने पर उपरोक्त उपायों से काम लेती हैं। जब पति पर-
देश चला जाता है तब साधारण रूप से रहती हैं, जिसमें विनोद
का कोई चिन्ह दिखायी नहीं देता।
मनुष्य जब बाहर से घर आता है तब वह काम-काज से थका
हुआ विक्षुब्ध-मन आराम चाहने वाला होता है घर आने पर जब
उसे आराम नहीं मिलता प्रत्युत कलह, गहने आदि के तकादे और
रूक्ष वचन सुनने को मिलते हैं तो वह इनसे छुटकारा पाने के लिए
घर से बाहर निकल जाता है और दिल बहलाने के लिए मित्र-
मण्डली में जा पहुँचता है। मित्र-मण्डली के लोग भी वैसे ही जले
दिल होते हैं वे भी कोई मनोविनोद की वस्तु चाहते हैं। जब
असली कोकशास्त्र ४२३
परस्पर विनोद से मन नहीं भरा तब किसी मित्र की प्रेरणा से
तवायफ का गाना सुनने चले गये । वहाँ तवायफ का व्यवहार
“बहेलिये” की तरह विचित्र फँसाने वाला होता है । मण्डली के
पहुँचते ही बड़े आवभगत के साथ बैठाना, बड़ी रसभरी मीठी
रसीली लच्छेदार बातों में फँसाकर गाना सुनाना और उन आँख
के अन्धे तथा गाँठ के पूरों का धन हरकर उल्लू बनाना उनका रोज
का कर्म है । इतना होने पर भी वे इतने नशे में चूर हो जाते हैं
कि घर की सुध-बुध छोड़कर अपना तन-मन-धन सब लुटा
बैठते हैं ।
इस लिए पत्नी को चाहिए कि जब पति सायंकाल घर आवे
तो उनका ऐसा मधुर शब्दों से स्वागत करे कि वे सब चिन्ताओं
को भूल जायें और जलपान आदि के पश्चात् गाने बजाने आदि के
विनोदात्मक कार्य करे । इस भाँति जब पति प्रसन्न रहेंगे तब वे
पत्नी को भी प्रसन्न करने में किसी प्रकार की त्रुटि नहीं रक्खेंगे
और कोई दुर्व्यसन भी उनमें नहीं आने पावेगा ।
—०—
४२४ असली कोकशास्त्र
सौन्दर्य बर्द्धक योग
१—बच, धनियाँ, लोध, गोरोचन, समान भाग में पीसकर
मुख पर लगाने से यौवन की निकली हुई फुन्सियाँ नष्ट हो जाती हैं ।
२—मँगरैला, जीरा, पीली सरसों, काला तिल, सब बराबर
मात्रा में मिलाकर बकरो के दूध में पीसकर शरीर पर मलने से
उसकी सुन्दरता बढ़ती है, और मुँह की झाँयीं तथा मुहासे भी दूर
होते हैं ।
३—सफेद् सरसों, बिना भूसी के जौ का आटा, लोध की
छाल और मुलहठी इन सबको पीसकर मुख पर लगाने से मुख की
खूबसूरती बढ़ती है और खाल मुलायम होती है ।
४—अनार, शिरीष, अमलतास, नीम, हलदी और लोध की
छाल, मिलाकर उबटन करने से स्त्रियों की मुखश्री बढ़ती है ।
५—मुलहठी, कचनार, सहदेवी, पके बढ़ के पत्ते, कमल,
सफेद चन्दन, लोध की छाल, लाही और कुङ्कुम इन सबको समान
भाग में लेकर जल के साथ पीस डाले । इस उबटन को लगाने से
स्त्रियों की मुखश्री शरद् चन्द्र के समान उज्ज्वल और प्रदीप्त हो
जाती है ।
६—कूट, सरसों, तिल, दारुहलदी और हलदी, इनका उबटन
लगाने से शरीर की स्वर्ण के समान कान्ति बढ़ जाती है ।
असली कोकशास्त्र ४२५
७—तालीशपत्र, कूठ और तगर, इनका उबटन लगाने से
शरीर की अपूर्व शोभा बढ़ जाती है ।
८—नागकेशर का चूर्ण, कमलपत्र, शहद, इनको शुद्ध घी में
मिलाकर खाने से कै और दस्त होकर शरीर की कान्ति बढ़ती है।
९—तमालपत्र, नागकेसर, तगर, कमलपत्र और तालीसपत्र,
इन सबको पीसकर शरीर पर मलने से शरीर का सौन्दर्य
बढ़ता है ।
१०—प्रियंगू क फूल, लोध, मँजीठ, कूठ, बढ़ के अंकुर,
लालचन्दन तथा मसूर इन सबका उबटन बनाकर शरीर पर
मलने से कान्ति और तेज बढ़ता है और शरीर गोरा होता है ।
११—जायफल को चन्दन की तरह दूध में घिसकर यदि मुँह
पर लगाया जाय तो मुँह के मुहासे नाश होकर चेहरे पर चमक
आती है ।
१२—सुगन्धबाला, केसर, लोध, अगर, खस, चन्दन, इनका
उबटन बनाकर बदन पर मलने से रूप-राशि खिल उठती है ।
—:०:—
४२६ असली कोकशास्त्र
दुर्गन्धि नाशक योग
१—शंखचूर्ण, करौंदा के बीज, अनार की छाल, इमली, आम
की छाल, इन सब औषधियों को पीसकर उबटन करने से सब
प्रकार की शारीरिक दुर्गन्ध दूर हो जाती है ।
२—लोध की छाल, सफेद् चन्दन, नेत्रवाला, कुमकुम और
तगर इनको समान भाग में पीसकर सब शरीर पर लेपन करने से
शरीर की दुर्गन्धि दूर होती है ।
३—खस, कमलपत्र, लोध की छाल, सिरीश, इनका उबटन
लगाने से शारीरिक पसीने की बू दूर हो जाती है ।
४—कुमकुम, जायफल, कूठ, तुलसी, और जावित्री, इन सबको
पीसकर मुँह में रखकर चूसने से मुख की दुर्गन्धि नष्ट होती है ।
५—यदि केवल मातुङ्ग की छाल ही मुख में रखकर चूसी
जाय तो वह मुख की दुर्गन्ध दूर करती हुई अधोवायु की भी
दुर्गन्ध को दूर करती है ।
६—भटकटैया सफेद् फल वाली, सफेद् दूब, श्वेतापराजिता
का पुष्प, इन सबको पान में रखकर खाने से मुख की दुर्गन्धि दूर
होती है ।
—०—
असली कोकशास्त्र ४२६
गन्धक आठ-आठ माशे तथा आठ तोले अफीम मिलाकर इन
सबको एक साथ खरल कर ले । तत्पश्चात् तीन-तीन रत्ती की
गोली बनाकर जो मनुष्य प्रति दिन सोने के समय दूध के साथ
सेवन करता है, उसकी स्तम्भन शक्ति बढ़ जाती है ।
१०—अभ्रक भस्म, स्वर्ण भस्म, लोह भस्म, चाँदी भस्म,
सोनामक्खी की भस्म, शुद्ध पारा, वंशलोचन, तथा भाँग के बीज
का चूर्ण इन सबको आठ-आठ तोले भाँग के काढ़ा के साथ खरल
कर एक-एक माशे की गोली बना ले । प्रति दिन एक गोली दूध
के साथ खाने से स्तम्भन और मैथुन शक्ति बढ़ती है ।
११—मुरा, चिचड़ा का बीज, जावित्री, मरोड़फली, जायफल
काकोली, खरेंटी, क्षीर काकोली, सफेद पान, कंकोल, मुलहठी,
बच, और खस इन सबको बराबर-बराबर लेकर चूर्ण बना ले ।
और नित्य दूध के साथ खाये । इससे वीर्य स्तम्भन होता है ।
१२—पीपल, मिर्च, धतूरा, इन तीनों को पीसकर शहद में
मिला ले । कुछ दिन इनका लेप इन्द्रिय पर करने से वशीकरण
हो जाता है ।
१३—सफेद कमल, नील कमल, इन दोनों का केसर शहद
और मिश्री में मिलाकर इन्द्रिय पर लेप करे तो इन्द्रिय स्तम्भन
होता है । वह मनुष्य प्रचण्ड रतिवाला हो जाता है ।
१४—सुहागा, कूठ, मैनसिल, नोनिया की पत्ती का रस, और