रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२० असली कोकशास्त्र
जाल में जा फंसते हैं। अतएव घर की अनुभवी सास आदि को
चाहिए कि वे उनके उत्साह में विघ्न न डालें प्रत्युत् सहायता करें
और उनकी त्रुटियों को सुधार दें ।
बाजार के खाद्य पदार्थ और कटे-सिले कपड़े महँगे होने पर
भी क्यों अच्छे प्रतीत होते हैं और घर के नहीं ? इसका कारण
केवल इतना ही है कि वे ग्राहक को देखने में अच्छे लगें और दाम
वसूल हो जाये इस वजह से सुसज्जित करके रखे रहते हैं किन्तु
घर में इसका विचार नहीं किया जाता । और यदि यह कहा जाय
तो जवाब मिलता है कि क्या हमें बेचना है ।
इसका परिणाम यह होता है कि कोई पदार्थ अच्छा नहीं
बनता और न ही बनाना आता है। इस समय गृहस्थों में चार
अंगुल फटी चीज भी सी नहीं सकते, नये का तो कहना क्या ?
और खाने-पीने की वस्तुओं की भी यही हालत है । कभी दाल
पतली तो कभी गाढ़ी कभी मिली, कभी अनमिली अधिक क्या
सभी पदार्थों की यही दशा है ।
इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि वस्तु का संस्कार ही मनुष्य की
चित्त-वृत्ति को अपनी ओर खींचता है। संस्कार समान होने पर भी
मनुष्य को चाहिए कि वह उसमें अपनी हानि-लाभ को भी सोचे ।
जैसे एक उदाहरण आगे रखा जाता है ।
वस्त्र आभूषणों से सजी हुई एक तवायफ भरी सभा में गा
कर क्या आदर्श पेश करती है ।