रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र ४२१
"करेजवा उठे रे मोरे पीर"
इस कड़ी को सुनकर महफ़िल की महफ़िल झूमने लगती है।
सच पूछिए तो वह विषधर सर्प की विष भरी लहर देती है। जिस
पर उसका असर हो जाता है उसके तन-मन-धन सभी का नाश
हो जाता है; किन्तु कुल-वधु जब पति के सम्मुख सर्वशृङ्गार सम्पन्न
होकर गायेगी तो उसका कितना सुन्दर आदर्श होगा—
पति बिना सूना सकल संसार।
वह मधुर रस-भरी सुधावर्षी मन और धन का बढ़ाने वाला
होगा। स्वर कितना सुन्दर और मनोहर होगा जिसमें पति के प्रेम
में रसभरी तान होगी। परन्तु आजकल तो पति के सम्मुख गाना
बड़ी निन्दा की बात समझी जाती है। बड़ी-बूढ़ी तो क्या युवतियाँ
तक भी कहती हैं—"यह कैसी निर्लज्ज है पति के सामने गा रही है
इसको जरा भी बड़ों की शरम लिहाज नहीं।" किन्तु यह उनकी
भूल है। वेष-भूषा के अतिरिक्त यह भी एक कारण है जो मनुष्य
को तवायफ़ों की ओर खींच ले जाता है। यदि घर में अपनी ही
स्त्री सुन्दर शिक्षाप्रद गायन से काम लेकर अपना और पति का
मन बहला दे तो पुरुष को कहीं जाने का बहाना ही न मिले। रही
निर्लज्जता की बात, वह केवल ढकोसला मात्र है। क्योंकि विवाह
आदि संस्कारों पर जिन निर्लज्जतापूर्ण गीतों को अपने श्वसुर आदि
सम्बन्धियों तथा बारातियों के सम्मुख बड़ी-बूढ़ी और कुल-वधुएँ
गाती हैं, वह किसी से छिपी नहीं। वे गाने इतने गन्दे और निर्ल-