पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
छठां समय ३] पृथ्वीराजरासो । ३०१
पृथ्वीराज का आखेट के लिये निकलना ।
कवित्त ॥ कर पद मत्त धनुष्ष । ढाल आनन सुचक्क रथ ॥
पटह छींस घन सह । विपुछ बद्धीय समग पथ ॥
इक बंधिय इक बधिय । एक भंभिय भ्रम भीर ॥
इक्क सु मृग विफुरीय । इक्क चिकरीय दीन सुर ॥
कवि चंद सोर चिहुँ ओर घन । दिग्घ सह दिग अंत भौ ॥
संकिय सयल्ल जिम रंक उर । द्रुम अरन्य आतंक भौ ॥
छं० ॥ १२ ॥ रु० ॥ ५ ॥
अकेले कवि चंद का वन में भूल जाना ।
कवित्त ॥ जंगल धर सुकुमार । करत आखेट सपत्तौ ॥
संग सूर सामंत । गहन गिरि बोह सुरत्तौ ॥
एक सहस सँग स्वान । एक सत चीते संगह ॥
उभै सत्त सँग हिरन । करत मन पवन सुभंगह ॥
सम विषम विचर वन सघन घन । तहां सव्य जित तित्त धुन्न ॥
भूल्यौ सुसंग कवियन वनह । और नचीं जन संग दुन्न ॥
छं० ॥ १३ ॥ रु० ॥ ६ ॥
एक आम के पेड़ के नीचे एक ऋषि से उसकी भेंट होना ।
दूहा ॥ विपन विचर जपल अकल, सकल जीव जड जाल ॥
परसंपर बेली विटप, अवलंबि तरु तमाल ॥ छं० ॥ १४ ॥
सघन छांह रवि करन चष, पग तर पसु भजि जात ॥
सरित सोह सम पवन धुनि, सुनत श्रवन झचनात ॥ छं० ॥ १५ ॥
गिरि तट इक सरिता सजल, झिरत झिरन चिहुँ पास ॥
सुतरु छांह फल अमिय सम, बेली विसद विलास ॥ छं० ॥ १६ ॥
५ पाठान्तर-घत्त । धनुंक । धनुंक । धनुप । आंनन । चक । चध । सद। बदिय । दृक ।
म्रगा । बिफुरिय । चिहु । उर । दिघ । भ्रंस । सकल । सयलं ॥
६ पाठान्तर-करन । आखेटक । संपतौ । हृद । बोहर । संग । साथ । त्तिंत । भूल्यो ।
कबियन ॥
३०२ | पृथ्वीराजरासो । | [छठां समय ४]
तहां सु अँबतर॒ रिषि इक, अस तन अंग सरंग।
दव दह्यौ जनु द्रुम कोइ, कै कोइ भूत भुअंग ॥ कूं० ॥ १७ ॥ रू० ॥ ७ ॥
गाहा ॥ जप माला म्रिग छालो । गेटा विभूतं जोग पहार्यं ॥
कुविजा खप्पर धय्यं । रिद्धं सिद्धाय बचनयं मभं ॥
कूं० ॥ १८ ॥ रू० ॥ ८ ॥*
कविचन्द का ऋषि के पास जाकर पूछना कि आप कौन हैं ?
दूहा ॥ चंद पिषि चर्यौ सुमन, इक कोइ रूप अलेष ।
पग परसैं दरसैं दरस, उत्तिम भूत अशेष ॥ कूं० ॥ १९ ॥
करि बंदन कविचंद कहि, को तुम आदि अनादि ।
तुम दरसन बिन दिन गए, ते सब बीते वादि ॥ कूं० ॥ २० ॥
तुं † धाता करतार तुं ,भरता चरता देव।
तुं दत्ता गोरस तुची, प्रसन होउ प्रभु मेव ॥ कूं० ॥ २१ ॥ रू० ॥ ९ ॥
ऋषि का पूछना कि तुम कौन हो इस बीहड़ बन में कैसे आए ।
दूहा ॥ कहै जंगम तुं कौन नर, क्यों आगम ह्वां कीन ।
जीव जंत घन विघन बन, जीव जीव बल छीन ॥
कूं० ॥ २२ ॥ रू० ॥ १० ॥
चन्द का अपना परिचय देना ।
गाहा ॥ दरसन देव मुनिंदं । चंदं विरहं च दुप्पदं दायं ॥
अव मुक्का कम्म सुफलियं । दिष्पे सुफल रूप तपसीयं ॥ कूं० ॥ २३ ॥
देवान वरं सिद्धाण दरणं । गुरं नरिंद सनमानं ॥
गय भुम्मि दब्ब नट्ठा । पां मिज्जे पुण्य रेहायं ॥ कूं० ॥ २४ ॥ रू० ॥ ११ ॥
७ पाठान्तर—उपरल । परस्पर । अवलंबि ॥ १४ ॥ झूहनांत । झहनाट ॥ १५ ॥ गिर ।
भरत । भरन ॥ १६ ॥ अंतर । तह । जती । अंग न रंग । द्रुम ॥ १७ ॥
८ पाठान्तर—विभूत । पटार्य । मभं । मंमं ॥
- यह रूपक सं० १६४७ वाली पुस्तक में नहीं है ।
९ पाठान्तर—पिषि । को । परसों । दरसों ॥ १९ ॥ तूं । भर्ता । तूं । दंता । तुहीं ।
होहि ॥ २१ ॥ † यह संस्कृत त्वम् का पहिला हिन्दी रूप है ।
.१० पाठान्तर—जती । तूं । कौंन ॥
११ पाठान्तर— गाथां । दंसनं । चंदं न विरहं इदेहं दंदायं । चंदम । दंदाई । कर्म । दिषे ।
सकल ॥ २३ ॥ सिद्धान । दसनं । भूमि । भूमि । पा । मिजै । पुन्य । रेहा इं ॥ २४ ॥
छठां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । ३०३
दूहा ॥ भद्द जानि कवियन नृपति, नाथ नाम सो चंद ।
आनस में गंगा बही, अव्व गए सब दंद ॥ छं० ॥ २५ ॥ रु० ॥ १२ ॥
जती का प्रसन्न होकर एक मंत्र बतलाना जिसके
वश में बावन बीर हैं ।
कवित्त ॥ प्रसन्न चंद सम जतिय । दिन्न इक मंच दृष्ट जिय ॥
इष्ट आराधत भद्द । प्रगट पचास बीर विय ॥
करि साधन इष्ट साध । व्याधि नासत फल धारिय ॥
गुरु उपदेसद्द पाइ । सकल आधीन अकारिय ॥
धरि कान मंच लीनौ कविय । परसि पाइ अग्गै चलिय ॥
करवे सुपरिप्पा मंच की । रचि आसन अग्गैं बलिय ॥
छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ १३ ॥
चन्द का मंत्र की परीक्षा करना और बीरों का प्रगट होना ।
दूहा ॥ भली बुरी निर्मित कछू, मेटि न सक्कै कोइ ।
याही सों भवतव्यता, कहत संयाने लोइ ॥ छं० ॥ २७ ॥
पसु आखेटक करन कौं, संग नृपति वरदाइ ।
ऐसे में इष्ट भावई, अकसमात हुअ आइ ॥ छं० ॥ २८ ॥
मंच परिख्या करन कौं, बन मझ बैठ्यौ चंद ।
रचि रचना सुचि स्नान करि, धूप दीप पढ़ि छंद ॥ छं० ॥ २९ ॥
रचि आसन्न गनेस मँछ, सिद्धि बुद्धि लखि लाभ ।
पुनि मंचह भैरव जपत, उक्कु गरजिय अभ ॥ छं० ॥ ३० ॥
गैन गद्दर गंभीर धुनि, सुनि ससंक भय गात ।
आनन अग गच्च गंज हुअ, जानि उलक्का पात ॥ छं० ॥ ३१ ॥
सुप दाता माता पिता, सेवक सरन सधार ।
उपवन बैठे चंद जहँ, द्वै पचास पधार ॥ छं० ॥ ३२ ॥
मंच जंच धारंत मन, आकर्षे जब चंद ।
प्रगट दरस दीने सबन, कवि उर बध्यौ अनंद ॥ छं० ॥ ३३ ॥
१२ पाठान्तर-नृपति । नांम । आल समैं । आल समय । अब ॥
१३ पाठान्तर-दीन । भट । प्रंचास । ए । नासन । धारीय । अकारीय । पाय । अगों । आगै । करनें । करनैं । परंख्या । अगों ॥
३०४ पृथ्वीराजरासो । [छठां समय ६
महा पुरुष पिष्षै जबै, तब सुअ हरष सरीर।
दंडव्रत अंजुलि करिय, मन आनंद सधीर ॥ कूं० ॥ ३४ ॥ दू० ॥ १४ ॥
बीरों के रूप आदि का वर्णन ॥
कंद पद्धरी ॥ आनंद चंद दरसंत इंद। सोभा सुभंत वज्रंग दंड ॥
तन तेज तरनि ज्यौं घनह श्रोप। प्रगटी कि किरनि धरि अगिन कोप ॥३५॥
चंदन सुलेप कस्तूर चिच । नभ कमल प्रगटि जनु किरन मिच ॥
जनु अगनित नग छवि तन विसाल। रसना कि बैठि जनु भ्रमर व्याल॥३६॥
मृग मद अयूष जनु पिउष पान। प्रभु मुदित मगन नासा रसान ॥
मईन कपूर छवि अंग हंति । सिर रची जानि विभूत पंति ॥ ३७ ॥
कज्जल सुरेश रचि नेन पंति । सुत उरग कमल जनु कोर पंति ॥
चंदन सुचिच रुचि भाल रेश । रजगुन प्रकासतें अरुन भेष ॥ ३८ ॥
रोचन लिलाट सुभ मुदित मोद । रवि बैठि अरुन जनु आनि गोद ॥
घूंघर घसंकि पाइन विसाल । नृत्तंत जननि जनु अग्ग बाल ॥ ३८ ॥
धूसरस भूर बनि वार सीस । छवि बनी मुकट जनु जटा ईस ॥
बनि विसद कंठ इक्क बेलि माल । आभाति उडग्गन निसापाल ॥ ४० ॥
चंपकनि पुहुप बनि कंठ कांति । रस रमत अमर जनु पीत पंति ॥
नृत्तंत एक संगीत अंत। नारद रिझि कर धरत तंति ॥ ४१ ॥
इक्क परत बध्य इक्क खरंत छय्य । गज नहनि केलि जनु सरित सध्य ॥
इक्क प्रगट होत इक्क दुरै जात । परसंत परस्पर सुमन दात ॥ ४२ ॥
क्कित एक होत गिर गरुअ देह । गरजंत एक जनु घटा मेह ॥
इक्क उघटि सब्द संगीत ताल । इक्क पढत भाष नागह विसाल ॥ ४३ ॥
इक्क ब्रह्म पोष सम करत घोष । पौरांनं प्रगट इक्क वचत मोष ॥
दाढाय इक्क चवैत फुनिंद । इक्क धरत ध्यान जानिक मुनिंद ॥ ४४ ॥
इक्क गरनि मुंड मुष रुंड एक । कुंजर सधार गिर तरन तेक ॥
इक्क मुष्य अगिग ज्वाला उठंत । इक्क परह देह बरिषा उठंत ॥ ४५ ॥
१४ पाठान्तर-निमित । भवितव्यता । सयानं ॥ २७ ॥ को । नृपति । असैं । आय ॥ २८ ॥
परिष्या । को। बैठौ । स्रान । परि । चंद ॥ २९ ॥ गनर्डस । तहां । बुधि । उक । गरजिय ॥ ३० ॥
गगन । आंनन । अंगं । गय गंज । औ । जानिक । उलका ॥ ३१ ॥ जहां । तहां द्वै ॥ ३२ ॥
धारता । आकर्षे । बढयौ ॥ ३३ ॥ पुरुष । पिषे । जबैं । हर्ष । शरीर ॥ ३४
एका करत गाज चिक्कार एक । इक सहत सुद्रुत गिरि उड़त केक ॥
इक करत रूप गिरि सिषर कोइ । एका रूप बहुत इक एक होइ ॥ ४६ ॥
धसकंत धरनि इक खात घात । इक स्वास उड़त उपवनह पात ॥
पिपीय चरित ए चंद भट । हर्षित हुल्लास मन में अघट ॥ ४७ ॥
रोमंच अंग उब्भार देह । भैभीति भंति तहँ दिषि एह ॥ छं० ॥ ४८ ॥ रू० ॥ १५ ॥
कवित्त ॥ जिन देवन दरसंत । देव दानव चिय संकचि ॥
किंनर जप गंध्रब्ब । सर्व सनमुख जिन कंपचि ॥
सिध साधक जिन दरसि । तरसि संकट थिय विखम ॥
महाबीर वलवंत । कचन सचि सकै तिनं क्रम ॥
अद्भुत चरित चंदह चरचि । सुर विचित्त चिय हथ्थ क्रिय ॥
आराधि संच मन ताप सह । सावधान सम्भारि जिय ॥ छं०॥४९॥रू०॥१६॥
दूहा ॥ फुनि सुदिष्ट दूरी करन, अकल भयानक भीर ।
विना मंत्र को वसि करै, महाकाय वे वीर ॥ छं० ॥ ५० ॥
अनरिति फल काहू करन, किहिकर अनरित फूल ।
दिव्य वस्त्र काहू करन, नाना वरन अचूल ॥ छं० ॥ ५१ ॥
सत्त मंत को दिष्यित, रज मय के दीसंत ।
तामस के पिष्ये प्रबल, क्रोध कलह किरतंत ॥ छं० ॥ ५२ ॥
को इक कुंजर मद वहत, कोइक सिंघ सरूप ।
को इक पन्नग विष गरल, को इक दिष्यित भूप ॥ छं० ॥ ५३ ॥
ब्रह्मरूप को इक बढ़त, को इक तापस भेष ।
जूप रूप तसकर सुको, छिन में भेष अलेष ॥ छं० ॥ ५४ ॥
अग्निज्वाल किन तन उठत, किन तन बरसै मेह ।
चक्र पवन डंडूर को, केतन कंकर षेह ॥ छं० ॥ ५५ ॥
१५ पाठान्तर-ज्यों । उप । आन ॥ ३५ ॥ अग्नित । अमर ॥ ३६ ॥ सिगमद । पियूप ।
पानि । अंगहुंति । विभूति ॥ ३७ ॥ नैन । प्रकाश ॥ ३८ ॥ आंनि । घुघर । घर्मकि । पांयन । रसाल ।
नृत्यंत । अग ॥ ३९ ॥ वेलि । आभाकि । उड़गन । निशापाल ॥ ४० ॥ नृत्यंत । नारद । रीझ ॥
४१ ॥ हथ । तरुन । स्वस्थ्य । दुरे ॥ ४२ ॥ शब्द ॥ ४३ ॥ ब्रह्म पोपं । पोरान । एक । ध्वांन जांनि
कै । जान कि । मुष । अग्नि । बुठंत ॥ ४५ ॥ चिकार । उठंत ॥ ४६ ॥ घमकंति । स्वांस । पिपिय ।
पिष्यिय । चरित्रं । भट । मैं । अघट्टि । ॥ ४७ ॥ उभार । भय । तहां । दिषि ॥ ४८ ॥
१६ पाठान्तर-जप्प । गंधर्व । सिद्ध । महावीर । अदभुत । चरितं । हथ । सावधानं ॥
३०६ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय ८
सुमन दृष्टि कोइक करत, के फल अन्न रसंस ।
रुधिर मंस तन चमकते, आप परस्पर संस ॥ छं० ॥५६॥ रू० ॥ १७॥
चन्द का बीरों को देख कर प्रसन्न होना ॥
दूहा ॥ दिषि चंद आनंद मन, धनि मुझ गुर उपदेस ।
महा पुरुष पिषे प्रसन, ओ मन मिटि अंदेस ॥ छं० ॥ ५७॥ रू० ॥ १८ ॥
चन्द का बीरों की पूजा करना ॥
कवित्त ॥ सनमुख अंजुलि जाई, करी दंडौत सबन कहुँ ॥
कुसुमंजलि सिर मंडि । धूप नैवेद समुच्च सहुँ ॥
आरति सबनि उतारि । नयन नैनह सब मिलिय ॥
रहे पिषि सब बीर । जांनि पंनग वच षिल्लिय ॥
किंनो सुभ गति भव भवना । चित चंचल सुस्थिर करिय ॥
भय चंद चंद तन मन प्रसन । अस अछूत पुज्जिय रखिय ॥ छं०॥५८॥ रू० १८ ॥
चन्द का पृथ्वीराज के लिये शत्रुशासन मंत्र ग्रहण करना ॥
कवित्त ॥ जिन बीरन बसि करन । जोग जोगी हठ मंडहि ॥
जिन बीरन बसि करन । दुंद आराधन तंडहि ॥
जिन बीरन वसि करन । चरन सत गुर अभ्यासहि ॥
जिन बीरन बसि करन । प्रेत भूतन विसवासहि ॥
सो बीर पंच हुअ सहज सें । जती एक परसाद किय ॥
प्रथिराज भाग बरदाहु बर । सचु समन् इह मंच दिय ॥
छं० ॥ ५८॥ रू० ॥ २० ॥
क्षेत्रपालों (बीरों) का पूछना कि हम लोगों को
क्यों बुलाया है ॥
१७ पाठान्तर—करण । भयानक । बे ॥ ५० ॥ काहूं कद्दण । बर्षे ॥ ५१ ॥ सत । मत ।
दिषियत । में । पिषे । कृत्यंतं ॥ ५२ ॥ पंन्नग । दिषित ॥ ५३ ॥ कोई । भेस । अभेस ॥ ५४ ॥ बरसं ।
मंदूर ॥ ५५ ॥ केइ । करतह । रसस । मंतं । आपस पद परसंस ॥ ५६ ॥
१८ पाठान्तर—दिषि । पिषे । प्रसंन । अंदेश ॥
१९ पाठान्तर—जाई । दंडोत । कहौं । कहुं । नैवद । सहौं । सहुं । सबन । नैन । नैनन ।
मिलिय । पिषि । जांनि । खिलिय । किनी । भवना । सुथिर । प्रसंन । पूजित ॥
२० पाठान्तर-अधंम आतम भ्रम मंडहि । वाशिकरन । विसवासहि । सोइ । पृथ्वीराज । शत्रु ॥
छठां समय ६] पृथ्वीराजरासो । ३०७
दूहा ॥ बेतणउ तव चंद सौं । किन्न हुकम तुंफेव ॥
जंच संच आराध हुत । क्यौं आकर्षे सेव ॥ छं० ॥ ६० ॥ रू० ॥ २१ ॥
चन्द का यह उत्तर देना कि हमने पृथ्वीराज की सहायता
के लिये आप लोगों को बुलाया है ॥
साटक ॥ आकर्षय च देव सेव सवयं, पिथ्यं हितं कारनं ।
विपमं वंक सहाय आय.भहं, घहं भया भैकरं ॥
इच्छेयं मन पेमयं च वरयं, दंडं दत्तं दारुनं ।
श्रीवीराधि सुरिंद चंद नमयं, चर्नस्य सर्नागतं ॥ छं० ॥ ६१ ॥ रू० ॥ २२ ॥
चन्द का प्रार्थना करना कि जैसे आप राम-रावण आदि की
लड़ाई में रक्षा करते आए ऐसे ही पृथ्वीराज की भी करना ॥
कवित्त ॥ मद्दनि मच्चि जब सुरनि । जुद्ध असुरां सुर जब्बह ॥
अमरन अमिय अभीय । मोहि असुरन तव तब्बद्द ॥
काली सुर मच्छिास । त्रिपुर जित्तिय महिषासुर ॥
जालंधर भसमास । राम दसकंध अभंगुर ॥
जहँ जहँ सुदेव वंकम परिय । करिय अभय तुम देव तव ॥
देवाधि देव दानव दलन । चरन सरन हम रप्पि अब ॥
छं० ॥ ६२ ॥ रु० ॥ २३ ॥
बीरों का प्रसन्न होकर कहना कि जब गाढ़
पड़े तब स्मरण करना ॥
कवित्त ॥ षिनक मैंण'रचि देव । बचन चंदह उच्चारिय ॥
हम प्रसंन तुझ सेंव, सुनहु भटं सुभ कारिय ॥
समर संग तुअ राज, जब सु संकट षल जानिय ।
तहाँ सुमरंत सु चंद, दंड हंनिहैं सुन मानिय ॥
२१ पाठान्तर-सों हुकंम । सु ॥
२२ पाठान्तर-पिथं । वंक । सुभटं । घंटं । इच्छेयं । सुरीदं । चरनस्य । सरनागतं ॥
२३ पाठान्तर-मह्न । प्रचि । असुरांन । जबह । अमिय । अमीय । मोह । तबह । रांम ।
दसमथ । जहां २ । संकट । रषि ॥
सिर धारि चंद बाचा लइय, सदा प्रसन सेवक रहै ।
करि क्रिपा नाथ भहं सरिस, विवरि नाम बीरन कहै ॥
छं० ॥ ६३ ॥ रु० ॥ २४ ॥
भैरव का एक बीर को आज्ञा देना कि सब बीरों का नाम
बतला कर चन्द को पहिचनवा दो ॥
दूहा ॥ तब भैरव इक गन सरिस, किंन हुकम घर नंद ।
विवरि नाम वीरन सबन, कहि पिछनावहु चंद ॥
छं० ॥ ६४ ॥ रु० ॥ २५ ॥
सब बीरों का नाम गुण कथन ॥
दूहा ॥ वज्रपाट ता नाम गन । घन तन घोर भयंक्क ॥
पृथुक नाम बरनत सबन । सुनत मिटै तन संक्क ॥
छं० ॥ ६५ ॥ रु० ॥ २६ ॥
छंद पद्धरी ॥ गुन ईस चरन गुन गहर गाइ । फल सिद्धि बुद्धि जा नाम पाइ ॥
बानिय प्रसंन जो प्रथम होइ । करौं प्रसन बीर पचास दोइ ॥ ६६ ॥
आहूक्क बीर यह प्रथम खेव ॥ तिचि प्रसन प्रसन सब जानि देव ॥
वपुलाडू बीर हंनत बिनोद ॥ जिचि प्रसन सदा आनंद सोद ॥ ६७ ॥
बुँदिआइ बीर बन्दौ सनेह ॥ जल मय सुथलनि करि करसि सेह ॥
आनल्लप्रचारिय प्रबल बीर ॥ जिचि जुरत दनुज अरधरै भोर ॥ ६८ ॥
नारीय क्रीडनह दोड कोडू ॥ ब्रह्मा उपास करै टूक दोडू ॥
सूचीय अंज अनगंज बीर ॥ बज्रह सुभंजि दोइ करै चीर ॥ ६९ ॥
समसान लोटना बीर बंक ॥ तिचि पीर भीत अन संक भंक ॥
गढ उपडनाडू तो बीर नाम ॥ क्रोधंत कूट नह लखै ठाम ॥ ७० ॥
सामुद्र तिरन हूह बीर बाव ॥ सप्तम समुद्र मनु वहत बाव ॥
सामुद्र सोष अनभंग बीर ॥ दनु देव समुद्रन घरत नीर ॥ ७१ ॥
२४ पांठान्तर-मोंन । वचन । उच्चारिय । उच्चारीय । प्रसन । हुव । हुअ । भटं । कारीय ।
जानीय । तहां । दंड हमें सनमानीय । सनमांनिय । सदां । प्रसंन । करिं । भट्ठह । बिचारि ।
नांम । कहैं ॥
२५ पाठान्तर-दोहरा । नांम ॥
२६ पाठान्तर-नांम । पृथक । प्रयुक्त । बरनन । मिटे ॥
छठां समय ११] पृथ्वीराजरासो । ३०६
दूच लोच भंजनिय वीर दीन्न ॥ लारन पच्चार भंजे सरीस ॥
संताना चोट दूच नाम धारि । भंजे जँजीर जनु सूत तार ॥ ७२ ॥
विस पाय राय सो वीर जांनि । पचवंत जह्र जनु दूध पानि ॥
रुँडमाल नाम लोहू है देष । पिप्पिय भयंक्र दृक कालसेष ॥ ७३ ॥
अगिग्या वीर कुप्पंत वार । प्रब्बतप्रजारि सो करत खार ॥
विषपिया वीर वीराधि वीर । तिचि क्रोध दनुज संघरै भीर ॥ ७४ ॥
जमघंठ नाम औघह जोर । जिन सहज गाज घन घोर खोर ॥
कान्नाइ नाम दूच वीर लेषि । सब तजै भीर से भीत देषि ॥ ७५ ॥
कुरखाइ नाम दूच चालन जाइ । सुर असुर नाग तातकै पाइ ॥
अगिक्रान्त वीर जब होत कोच । तब जरत तेज गिरसिषर षोच ॥ ७६ ॥
विपकांत वीर अत्यंत वंक । जिन पिष्पि कंक अन संक संक ॥
रगतिया वीर पग रक्त रंग । अरि रक्त वाह सो करत भंग ॥ ७७ ॥
कोइलाइ नाम जो सेव पाइ । तिन कष्ट होत भग्गै सदाइ ॥
कालका नाम करौ वीर सेव । तिचि प्रसन काम दुग्धं कि देव ॥ ७८ ॥
कालवेताइ नाम विन वीर कौन । गम अगम थान जनु वहत पौन
काल घटाइ बज्रंग वान । कोपंत दनुज दच्च चरन पान ॥ ७९ ॥
इंद्र वीराइ वल इंद्र जोर । चौगुन विलास तन धरत रोर ॥
जम वीराइ वीर क्रत्यन्त कोच । सत्तउ समुद्र जल करत गोच ॥ ८० ॥
देवग्नि नाम करौं सेव पाइ । सुभ धने कर्ने दाता सदाइ ॥
उँकार वीर नमि करौं ध्यान । जिहि प्रसन सदा आनन्द ग्यान ॥ ८१ ॥
२७ पाठान्तर-गाय । नांम । पाय । बांनी । प्रसन । होय । करौं। दोय ॥ ६६ ॥ आइझ ।
तिहिं । लाय । जिहिं ॥ ६७ ॥ बुंदि । स एह । थलन । अनल । प्रहारीय । जिहिं ॥ ६८ ॥ छोड़-
नहू । करैं । दोय । अनभंग । दो ॥ ६९ ॥ शमशान । तिहि संक बंक अनभीत वीर । नाय नांम । हल-
हलै ठांम ॥ ७० ॥ सामंद । जनु । बहतु । बायु । सासमुद्र । शोषा सोपै समुद्र सब पिवै नीर ॥
७१ ॥ और । जंजीर ॥ ७२ ॥ बिसप्रापरा । पांनि । मांनि । रुंडमाल । पिषिय । मय ॥ ७३ ॥
अगिया । कोपंत । पब्बत । प्रजार । करै । विषपियाइ । तिहिं ॥ ७४ ॥ यमघंट घाट । चौघट ।
औघट । कालाय । वीर । लेष । तजैं । देष ॥ ७५ ॥ कुरलाय । नांम । तिहिं । जाई। पाय । क्रोध । पोध ।
तब जरत सिपरं गिर तेज पोध ॥ ७६ ॥ वीर । बंक । पिपि । बाह ॥ ७७ ॥ कोयला ।
नांम । भग्गै । कालकाइ । कालका । नांम । करो । तिहिं ॥ ७८ ॥ बिन । किन । कौंन । बहि ।
३१० पृथ्वीराजरासो । [छठां समय १२
झापटा बीर जब जुखत जुद्ध । नहिं सहत जोर दनुदेव सुद्ध ॥
मांनिक्क भद्र है मेर मान । ठेलन अठिल्ल गढ द्रुग्ग पान ॥ ८२ ॥
कपडिया बीर कछा करौंकिन्ति । मन वित्त राग जै मुक्ति जित्ति ॥
केदाइ राइ नव जुद्ध आप । दिषन्त नैन जिन जात पाप ॥ ८३ ॥
नरसिंघ बीर नरसिंघ रूप । चौगुन विलास आतम अनूप ॥
गोरिया बीर गुन सकल जानि । नव रसन रास नाना विनांन ॥ ८४ ॥
घट घंट बीर जनमे सुजान । सोषत समुद्र अरि समुद्र पानि ॥
कंटंभ्य बीर सुनि समर बाज । दनु दलन कटक में परै गाज ॥ ८५ ॥
बग नाम बीर जब समर कच्छ । बग लेत ढुंढ जनु नीर मच्छ ॥
माच्छवगाव वल्लंग अंग । अदभूत अंग रुपह सुरंग ॥ ८६ ॥
संतो साइ सत मतह सुधीर । पर मध्य अच्य भव नाव कीर ॥
मच्चा संतोस सत संग धार । सेवक समुद्र भव नाव पार ॥ ८७ ॥
भ्रमराइकाइ बल्ल वाय वेथ । भ्रम परे समर छल परैं लेथ ॥
मच्चाभमराइ काइक्क अजीत । भ्रम होइ ताहि जाकूर चीत ॥ ८८ ॥
सहसाष अष्यि कर सहस जान । जानु द्रुपद मध्य रहै रच्छ दान ॥
सह स्त्रांग अंग नित रूप चिच । भय भीत अभय भै करन मिच ॥ ८६॥
बेच पाल चिति पल करै प्याल । नाना चरित गोपाल बाल ॥
भूतषनडू बीर बलबन्त कूर । तटवन्त षिभिरू तनं करत चूर ॥ ६० ॥
साक्किनीमार अदभूत जोर । समरन्त भक्त तन हरत रोर ॥
बेदरी रीति भङ्गम बलाय । कलपंत करन जे तके तपाइ ॥ ६१ ॥
सालि बाहनह ससि सूर रूप । सेवकं निवाजि बुर करत भूप ॥
ए नाम बीर सुनि चंद लेइ । पहिचांनि प्रसन करि विदा देइ ॥
कुं० ॥ ९२ ॥ ६० ॥ २७ ॥
समीर । वांन । दनुंनि । पांनि । पांन ॥ ७६ ॥ बीर । त्रिगुन । क्रभंत । जल हरन ॥ ८० ॥ नांम ।
करूं । करौं । पाय । सहाय । करौ । ध्यानं । जिहिं । ग्यांन । घ्यांनं ॥ ८१ ॥ झापरा । युद्ध । नह ।
माणिकं भद्र । मांन । पांनि ॥ ८२ ॥ कापडिया । कहां । करौं । वीत । जिति । केदाइराय ।
दिषंत । नैन ॥ ८३ ॥ त्रिगुन । गोठिला । जांन । जांनि । विनांन ॥ ८४ ॥ घटघंटे । दुजान ।
मैं । सुं जांन । समुंद । यांनि । कुनटेभ्य । सनि । मैं । परै ॥ ८५ ॥ बग । नांम कछि । कच्छ ।
लैतं । ढुंठि । मछ । माहवगाव ॥ ८६ ॥ सत्त । मत्तह । परमध्य । अथ । नामकीर । बीर सत्यंग ॥
८७ ॥ भ्रमराय काय । परें । परै । महाभ्रमराय । कायक । होत ॥ ८८ ॥ सहसाष्य अषि । जांनि
द्रुपद । रखि । दांन ।'सहश्रांग ॥ ८६ ॥ चित्रपाल । बाल । पाल । 'भूतषनाय । भूतपनारू ।
पिंभि ॥ ९० ॥ सांकिमीमार । बलाय । पाय ॥ ६१ ॥ सालिवाहन । नांम । लेई पहिचान ॥ ६२ ॥
छठा समय १२] • पृथ्वीराजरासो । ३११
चंद का बावनो वीर को पहिचान कर प्रणाम करके विदा
करना और आप पृथ्वीराज से मिलने के लिये आगे बढ़ना ।
कवित्त ॥ पहिचानिय कविचंद । बीर बावंन सूर बर ॥
सहाकाय सडमत्त । अंत जनु अच्छिन दनुज खर ॥
तेज साजि चष साजि । तास धीरज्ज धीर धर ॥
भीत मयंक भयांन । जानि ग्रीषंम अगनि झर ॥
करि नवनि चंद पहिचांन सब । वज्रपात अग्या कन्तिय ॥
बहुराइ देव कवियन प्रवल । मिलन पिव्य आगैं चलिय ॥ छं० ॥ ६३ ॥ रु० ॥ २८ ॥
चन्द का उस जङ्गल का वर्णन करना जहां पृथ्वीराज
आखेट खेलता है ॥
कवित्त ॥ अग्य गयौ गिरि निकट । बिकट उद्यान भयंकर ॥
जैहन पवरि दिसि विदिमि । बहुत जहूँ जीव पयंकर ॥
सिंच कोल गज रीछ । बहुत सामर बलवंते ॥
चीतल चीत चिरंन । पाइ परखें भजि जन्ते ॥
सेही सियाल खंगुर बहु । कुड कदंम भरि तर रहिय ॥
पिप्पे सु जीव कवि चंद नैं । तुच्छ नाम चौपद कहिय ॥
छं० ॥ ६४ ॥ रु० ॥ २९ ॥
कवित्त ॥ ठाम ठाम जल थान । मद्धि जनु जीव निवासिय ॥
ढेंक कुरंस कुरंच । हंस साग्सं सुभ भासिय ॥
वगले बतक विहंग । मगर मक्र कक्र द्रह पूरिय ॥
देखि दनुज पंनग निवास । सिद्ध साधक रुचि हरिय ॥
पर परषि वरन घन पिप्पियै । रोम हर्ष देखत नरन ॥
तुझ बुद्धि भट देखत भुल्यौ । कवि सुभन्ति कहै का वरन ॥
छं० ॥ ६५ ॥ रु० ॥ ३० ॥
२८ पाठान्तरः-पहिचांनिय । मदमंत । चप भासि । धीरज । जानि । ग्रीषम अगनिर ।
पहिचांनि । बहुदाय । पिय । आगैं ॥
२९ पाठान्तरः-अग्र । जहां । तह । बहुत । जहां । सीह । रोछ । सांमर । सांबर ।
चित्रक । हिरन । पाय । परकै । लंगुर । पिये । तुक । नांम । चोपद ॥
३० पाठान्तरः-ठांम २। यांन मधि । निवासीय कबह द्रह । पूरीय । पिपियै । बुधि भट ॥
८
३१२ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय १४
कवित्त ॥ सघन वृष घन छांह । जानि बहल नभ वासिय ॥
देषत पथ्य गिरंत । वेलि अवलम्बि विलासिय ॥
खोर खोर कोकिलन । (रौर)* चीह पप्पीह पुकारत ॥
सुमन सुगन्ध सबूछ । अंध मधुकर मधु आरत ॥
बहु कुची बाज सिंचान बच । खंगूर लाग लेयन फिरैं ॥
देषन्त जनावर अष ची । जनु प्रकास तारा गिरैं ॥
छं० ॥ ८६ ॥ रु० ॥ ३१ ॥
कवित्त ॥ तहँ खेलत पृथिराज । संग सामंत जङ्ग जुरि ॥
घट सुडोरि सँग स्वान । लेत ते जीव सबन जुरि ॥
बगुर घेरि विष्षंन । अप्प झुंजन में मंडिय ॥
तक्क तके इक रचिय । चक्कि घेदा षिक्ष कंडिय ॥
भंचराइ भग्गि पसु उठि चले । आवै आवै होइ रंचि ॥
परसपर खोर वे करत सुनि । यों सिकार चन्दह सुवचि ॥
छं० ॥ ८७ ॥ रु० ॥ ३२ ॥
पृथ्वीराज के शिकार की प्रशंसा ॥
कवित्त ॥ तिक्क भाल ससि षण्ड । गण्ड मद भमर बिलुड्डिय ॥
सुरभि तेज सिंदूर । सुमन संपति मन सुद्धिय ॥
सुद्ध दुद्ध जिम दसन । विसद बानी जिम निम्मल ॥
परस मुसल असि चर्म । हत्थ पंचम मोदक कल ॥
पुज्जिय सुचंद सुरइन्दजग । गवरिनंद दूषन दुरय ॥
कंपच्चि सिकार गज तुंड डर । सब विघंन गनपति घरय ॥
छं० ॥ ८८ ॥ रु० ॥ ३३ ॥
३१ पाठान्तर-वृष्य । जांनि । बदल पद्म । पथ । * अधिक पाठ है । पपीह । सीचान । लंगुरुं । फिरें । देषत । जिनावर । भक्षक ही भक्षक हैं। जनुं । आकास । गिरें ॥
३२ पाठान्तरः-तहां । सुं डोरि । संग । स्वांन । बंगुर । घेरोय । वियन । पूंडिय । हकि । भयराय । भगि । हुइ । रहिय । लहिय ॥
३३ पाठान्तरः-गंड चम्भर मदलुट्ठिय । सुब्भि । संपत्ति । दुद्ध । दूध मुद्ध । वांनी । ज़िमल । चर्म । हथ । पुजिय ॥
छठा समय १७ ] पृथ्वीराजरासो ३१३
कवित्त ॥ दुजपति चंकह हिरन । इक्कनिभय सुभाव अति ॥
गजनंतह टाग्ग । विघ्न विय दिट्ट गनपति ॥
षट आनन वर जोर । दतिय उप्पीय निसंक उर ॥
भगवति वाहन सिंघ । बेदग जीय सुमेर थरि ॥
वरदाइ चंद सुपच्चारि पग । पंचम वछ सुपछ रचहि ॥
आतंक अवर आरन्य पसु । डर घरहरि कंपत रचहि ॥
छं० ॥ ९९ ॥ रू० ॥ ३४ ॥
कवित्त ॥ छहरि हिरन हारियव । हेरि कातर रव रहिय ॥
अप्प घास भय मोछ । विरछ लग्गी चटपहिय ॥
हिय धरक्क धुधरह । वदन लोइन जल निझझर ॥
तंकित चकित संकीन । समग संकरिय दुप्भर ॥
सैरत्त चमकन्त पत्त रव । पिनक चित्त जिम उप्परै ॥
पिल्लंत सिकार पिथ कुँअर डर । पसु पींपर दल थरथरै ॥
छं० ॥ १०० ॥ रू० ॥ ३५ ॥
कवित्त ॥ पोमिन वन नहिं चरहि । नहिन संचरहि कुमुद वन ॥
ईप षेत परहरहि । जीर परहु अविग्त मन ॥
मंथर गति लखि मुंघ । कास कानन नह चप्पहि ॥
नह पिप्पै नियनारि । नहिन चष कंदनि रप्पहि ॥
गिरि मद्धि गह्वर गुहअह वसहि । नीर समीप न संचरहि ॥
खोमेस सुतन आखेट उर । इमड ढाल उस सह चसहि ॥
छं० ॥ १०१ ॥ रू० ॥ ३६ ॥
कवित्त ॥ गिर कंदर सर वरह । सरित कच्छह घन गुच्छह ॥
निझ्झर कूल न द्रष्टन । बेतनल्ल तिन सर पुंजह ॥
३४ पाठान्तर:-इक सुभिय निसंक अति । गजघटन तह । गजनंतह । दिट्ठिय । गनपति ।
छतीय । उपीय । निसंक। गज्जीय । गर्जिय । थिर । रहिय । आतंक । आरंन्य । रहिय ॥
३५ पाठान्तर:-हहकि । हीरन । हारीयव । रच । अय । लगिय । धरक । धुंधर ।
निझर । संकित । समग्ग । संकरीय । दुप । भयपन्न । चमकत । पन्न । ऊपरैं । पिलत । कुँअर ।
पिंयद ॥
३६ पाठान्तर:-नहि । चरहिं । दृप । परहरत । परभय । मथर । मुध । चपहि । पिपैं ।
नाहि । रपहि । मधि । गुज्जह । इमद । सहि ॥
३१४ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय १६
ऊजर अरि पुरं घरह । सैल तट उड्डन अद्दह ॥
हथ्य जोरि सब सुब्भि । उब्भ दिप्पहि कित लद्दह ॥
फल फूल इष्प भु प्रकास थन । बन उपवन घन संचरहि ॥
ढुंढत उढाल उढाल चिय । भुक्कारन बहु झुक्क्रहि ॥
छं० ॥ १०२ ॥ रु ॥ ३७ ॥
कवित्त ॥ नहिं गब्बत करि गब्ब । नहिन गज्जत घन गज्जत ॥
षेलत नहिय नयंन सिंघ कढि बोलत लज्जत ॥
भुञ्जन मड्डि संचरत । नहिन संचरत दुरद बन ॥
चरन लेष लुप्पतसु । पुंछ शृज मुत्तिय मग गन ॥
धक धकहि धुकहि तकहि चकहि । दिग्ध उसासन उल्हसहि ॥
प्रथिराज कुंवर कोबंड डर । गिर कंदर केसर बसहि ॥
छं० ॥ १०३ ॥ रु० ॥ ३८ ॥
कवित्त ॥ बग्गुर अगिनत परत । क्तिकि फंदन पगविड़न ॥
कितेक ष्खलन मरत । कित्तिक स्वानन मद्द सिद्धत ॥
घंटनरागन कितक । कितक चीते तकि दब्बत ॥
बाज सिंचान कुहीन । झपटि चंचनु फल चब्बत ॥
घन कूच सिकारन है रची । अजि न जीव कहुं जै सकै ॥
बल्लवंत बाघ हथ्थिय अजर । पक्कि हंकि लीजै धकै ॥
छं० ॥ १०४ ॥ रु० ॥ ३९ ॥
कवित्त ॥ गाडी किए कितेक । कितक उंटन पर डारे ।
पत राषे घर कितक । कितक हथ्थी पर धारे ॥
काचर कंधन कितक । कितक स्वानन मुष तुह्त ॥
बिंकी सर्प विषंग । मंच वादी मिल लुह्त ॥
३७ पाठान्तरः-गिरि । कक्रह । गुक्रह । निझर । कुलान । कूलह । सेल । अधह । हथ ।
सुभि । उभ । दिषहि । दृष । भू । भूपूकारनिबहुसुकरहि ॥
३८. पाठान्तरः-नहिं । गबनु गब । गजत । नंन । लाजत । भुञ्जयन । रेष । लुंपतसु ।
पुछ । मग मुति । हिंचकहि । दिघ । उल्हसै । पृथीराज । कुंअर । केहरि । बसै ॥
३९ पाठान्तरः-बगुरि । कितेक । स्वांनन । दबत । चंचनु । पल । चूब्बत । चूवत । क॑हु ।
कहुं । अथिय । हथीय । हथिय । हक्ति ॥
छटां समय. १७ ] पृथ्वीराजरासो । ३१५
वज्जत निसान सहनाइ सुर । तवल उक्का वज्जत बलिय ॥
सिक्कार खेल्लि घन रस रच्यो । सब पधार पग बलदलिय ॥
कृं० ॥ १०५ ॥ रू० ॥ ४० ॥
कन्ह चौहान आदि सब सरदारों का आकर पृथ्वीराज से
मिलना और कहना कि आज यहीं शिकार हो ॥
कवित्त ॥ आइ कन्ह चहुआन । नवनि पृथिराजसु किन्विय ॥
आइ राइ गोयंद । पृथुक आदर आदन्विय ॥
आइ चंद पुंडीर । धीर सव्यह हंसि मिल्खिय ॥
वलिभद्रह कूरंभ । कछर किन्ने रस षिल्खिय ॥
प्रबुच्चा राहू-पावार मिल्खि । वरुन बंध सिर कर धरिय ॥
मिल्खि कछी सिंह पाछार दूच । आज केलि अदभुत करिय ॥
कृं० ॥ १०६ ॥ रू० ॥ ४१ ॥
दूहा ॥ मिल्खिय सकल सामंत तहँ, गनि न कद्दै पृथु नाम ॥
छयन चौंस परबत गजिय,सघन सुविद्रुम झाम॥ कृं० ॥ १०७ ॥ रू०॥ ४२ ॥
पृथ्वीराज का शिकार से घर की ओर लौटना ॥
छंद पद्धरी ॥ फिर चले कुँअर पृथिराज गेह । मिनि सकल सूर सामंत नेह ॥
परछास परसपर करत केलि । नारीन नक्कि नृप-खेत खोलि ॥ १०८ ॥
मंगाइ नीर कर मुख पखारि । सब करन मंडि कर्पूर धारि ॥
गोठ (भोजन) के स्थान पर ठहरना ॥
जहां हुई गोठि भोजन नरिंद । तहां हुते सकल सामंत वृंद ॥ १०९ ॥
चन्द बरदाई का आकर पृथ्वीराज से मिलना और
पिछला सब वृत्तान्त एकान्त में ले जाकर कहना ॥
फुनि मिले चंद बरदाइ आइ । ककु कही बात पिछ्ली सुनाइ ॥
नृप भद्द जाइ बैठे इकंत । फिरि कही बत्त जो आदि अंत ॥११०॥
४० पाठान्तरः-लीए। कितक्क। कितेक। पंति। हुंथी। स्वांनन। सर्व्व। बजत। निसांन।
सहनाय । डंक । घजत । सिकार ॥
४१ पाठान्तर-आय । चहुआनं। पृथ्वीराज । किन्नियः । आय । राय । गोइंद। पृथुक ।
आय । सव्यह । हसि । मिलिय । बिलिय । कहिय ॥
४२ पाठान्तरः-तहां । नाम ॥
३१६ पृथ्वीराजरासो । [ छटां समय १८
पृथ्वीराज का भोजन करना और फिर आगे बढ़ना ॥
सुष मद्धि सुष्ष प्रथिराज पाइ । भोजन करंन नृप बैठे आइ ॥
छ्ह रस निवास आहारि अंन । करि कुरल पांन करपूर लिंन ॥१११॥
म्रगमद जवाद सब चरचि अंग । कसमोर अगर सुर रचिय संग ॥
सुभ कुसुमघार संब कंठमेलि । इम चलिय बलिय चहुआन षेलि ॥११२॥
छ्ह अग्गा इक्क सौ तुरिय तेज । उड़ंत पंषि बिन पंषिकेज ॥
बगसीस सकल सामंत जोग । दिषि वाच वाच सब कहत लोग ॥ ११३ ॥
सुष चाल फाल जे छिरन लेत । उत्तंग गात पष्पर समेत ॥
गज घालि बांच घूघर सलोल । ल्षैं न राह करते कलोल ॥ ११४ ॥
घा कहंत उड़त हां कहत ठट्ठ । गिर परत धंक जिन कोट गट्ठ ॥
पित मात असलि अस्रारु देस ।
सब सरदारों को एक एक घोड़ा बांट दिया उसी पर
सब चढ़ कर चले ।
सोभंत बानि रवि रय्य भेस ॥ ११५ ॥
दै एक एक सब बंटि दीन ।
चढ़ि सूर सकल सामंत लीन* ॥
कविचन्द को एक हाथी देना जो महा बलवान था ।
दिय हस्ति एक कबि चंद बोलि ।
अंदून ताहि को सकै षोलि ॥ ११६ ॥
तल बघत पाट सुझै न अंषि ।
अति पाइ काइ गछि लेइ पंषि ॥
अनि गज्ज मुष्ष को सकै झेलि ।
खल दलन मभक्त पारत्त भेलि ॥ ११७ ॥
सुर नाथ वाह सम अंग ओप ।
दिषियै खिज्यौ जनु काल कोप ॥
बिन रोस सहज में अजा जांनि ।
घर कोइ बंधिचै चल्यौ कानि ॥ ११८ ॥
- यह तुक एशियाटिक सोसाइटी के पुस्तक में नहीं है ॥
। छठाँ समय १६] पृथ्वीराजरासो : ३१०
सक्कै न बोलि कोउ हय अरूढ । हगहरौ पग वनि कवन झूट ॥
अगि जझ मझ्झ मांनै न संक। होइ रछै सूत सुनि बज्जि डंक ॥ ११८ ॥
सुनि विरद कांन चल्लंत मग्ग । तिहि चंद छद्म दिय कनक वग्ग ॥
छं० ॥ १२० ॥ रू० ॥ ४३ ॥
दूहा ॥ पाग धरी कवि चंद सिर, हरष भयौ वहु अंग ।
तूं विक्रम अक्रम चरन, करन दरिद्रह भंग ॥
छं० ॥ १२१ ॥ रू० ॥ ४४ ॥
एक एक सामंत हय, कीनिय चंद हजूर ।
वढि चल्लिय हल्लिय अगैं, सरित तुरंगन पूर ॥
छं० ॥ १२२ ॥ रू० ॥ ४५ ॥
कवि चन्द का पृथ्वीराज की स्तुति करना ॥
कवित्त ॥ करिय नवनि कविचंद । छंद अनेक पढि कर ॥
तूं सुरपति सम कुंचर । देव सामंत समो वर ॥
अगिन कन्हं जल चंद । पवन गोइंद प्रवल वल ॥
घरा चंद वल धीर । तेज चामंड जलन पल ॥
रवि तेज कछर कूरंभ सव । चंद अमृत आवू धनी ॥
दृगपाल सवल सामंत सव । रहै दग्वि धरती धनी ॥
छं० ॥ १२३ ॥ रू० ॥ ४६ ॥
४३ पाठान्तरः-फिरि । पृथीराज । येह ॥ १०८ ॥ मंगाय । मंगि । होइ ॥ १०६ ॥ मिलिं ।
वरदाय । आय । कहिय । वृत्त । पल्लित् सुनाय । जाय । एकांत ॥ ११० ॥ मध्य । सुप । पृथी-
राज । पाय । भोजन । करन फुनि । बैठि । आय । लीन ॥ १११ ॥ जथार्चि । सुभ कंठहार ।
मेल्हि । चहुवांन ॥ ११२ ॥ इक । एक सो । उड़त पंपि ॥ ११३ ॥ उतंग । पपर । लपे ॥ ११४ ॥
धक । जिहिं । गठ । रथ ॥ ११५ ॥ हय । लिन । आंदून ॥ ११६ ॥
तब लहत । सुझै । काय। पाय। लेय । गज । मुहप । मझ । पारंत ॥ ११७ ॥ उप । दिपिये ।
मैं । चलो । कांन ॥ ११८ ॥ सकै । कोइ । पग । जल । मझ । मांनै । होय । वनि ॥ ११८ ॥
चालंत । सथ ।
४४ पाठान्तर-तु । तूं ॥
४५ पाठान्तर-कोनीय । चलिय । हलिय । आगे । तुंगन ॥
४६ पाठान्तर-पढि । कुमर । कुंअर । समवर । अगनि । चावंड । आबू । सकल । रहे ।
दबि ॥
३१८ पृथ्वीराजरासो। [छठां समय २०
दूहा ॥ जीभ एक कविचंद कै, कित्ति कही क्यौं जाइ ।
जीव बुद्धि पिथ्थह निमित, रह सो मत्ति सुभाइ ॥
छं० ॥ १२४ ॥ रु० ॥ ४७ ॥
सब लोगों को अपने अपने घर विदा करना ॥
रच्यौ रंग बहुुरे अ्रचन, करिय विदा सनमान ।
निसा सुष मंडै सुषन, जागे उगत भान ॥
छं० ॥ १२५ ॥ रु० ४८ ॥
वीरों के मिलने के समाचार से पृथ्वीराज का प्रसन्न होना ॥
प्रथीराज आनंद मन, सुनि वीरन बर वत्त ।
फूखत तन तरु नीर लभि, इम आतम उलसत्त ॥
छं० ॥ १२६ ॥ रु० ॥ ४९ ॥
श्लोक ॥ शुभं दिवसे शुभं वार्त्ता । अशुभेच्च अशुभानि च ॥
शुभाशुभं यथा युक्तं । भवंति दिवसानि च ॥
छं० ॥ १२७ ॥ रु० ॥ ५० ॥
पृथ्वीराज की प्रशंसा ॥
कवित्त ॥ प्रथियराज चहुआन । बान पारथ बलिबंडह ॥
प्रथीराज चहुआन । दंड दंडैति अदंडह ॥
प्रथीराज चहुवान । सरिस जुध कोउ न मंडै ॥
प्रथीराज चहुवान । सचु चिनु रह गच्चि खंडै ॥
प्रथीराज चहुवान पछु । कली करन अवतारकच्चि ॥
सोमेस सूर पूरडू सुभग । उद्धर पिथ्थ अवतार उच्चि ॥
छं० ॥ १२८ ॥ रु० ॥ ५१ ॥
४७ पाठांतर:-जाय । बुध्दि । पिंथह । मति ॥
४८ पाठान्तर:-सन्मान । सुष । मंहे । उगत । भांन ॥
४९ पाठान्तर:-बत्त । लहि । इम नृप आतम उलसत ॥
५० पाठान्तर-शुभं । सुभं । वार्त्ता । अशुभे । अशुभानि । सुभाशुभं । यथायुक्तं ॥
५१ पाठान्तर-पृथीराज । चहुआन। चहुवान । बान। चंडह । पृथ्वीराज । अडंडह । जुद्ध ।
जिनु । कलि । पिथ ॥
छठां समय २१] पृथ्थीराजरासो । ३१६
दूसरे दिन सबेरे पृथ्वीराज का उठना और नित्य कृत्य करना ॥
दूहा ॥ प्रात राज जग्गे प्रथम, गो दुज दरसन कीन ।
देहकत्ति पुनि होइ सुचि, पावन पानि सुडीन ॥
छं० ॥ १२९ ॥ रू० ॥ ५२ ॥
करि पावन पवित्र वर, मोचन सुरभि सुतेल ।
मर्दनीक मर्दन करै, बढै धात तन बेल ॥
छं० ॥ १३० ॥ रू० ॥ ५३ ॥
नहाकर दस गोदान, दस तोला सोना और बहुत सा
अन्न दान देना ॥
करि सनान गंगोदकछ, दिय सुगाइ दस दान ।
दस तोला तुलि हेम दिय, अंन दान अमान ॥
छं० ॥ १३१ ॥ रू० ॥ ५४ ॥
महल में पृथ्वीराज का बिराजना और सरदारों का आना ॥
इन्द् पद्धरी ॥ करि स्नान दान सुचि रूचि कुंचार। होइ देवरूप साक्षात चार ॥
कीनौ सु मङ्गल बज्जै निसान । आनन्द सकल सामन्त मान ॥ १३२ ॥
आये सुमचल सामंत सूर । पूरंन तेज वीरत्त पूर ॥
अनभङ्ग अङ्ग अनभूल बांन। जिन दिट्ठ अरिय पावै न जान ॥ १३३ ॥
कैमास आइ कीनौ जुहार । विद्या सु चतुर्दस मत्ति सार ॥
गोयन्दराज गहिलौत आइ । बैठो सुकुंचर कमलं नवाइ ॥ १३४ ॥
चहुवान कान्ह आयौ अभङ्ग । भारत्य कथ्य भीषम प्रसङ्ग ॥
अनि अनी सुभर बैठे सुआइ । अन मित्त मत्ति बल अप्रमाइ ॥१३५॥
५२ पाठान्तर—गो । देह कंतिं । पुन: । शुचि । पांन । पांनि ॥
५३ पाठान्तर—पावन । सुरंभ । सुरभ । मर्द्दनीक । मर्द्दन ॥
५४ पाठान्तर—सुस्नान । गंगोदकहि । दांन । अन । दांन । अप्रमांन ।
६
३२० पृथ्वीराजरासो । [छठां समय २२
राजन कुँआर मधि सूर साज। देवतन मद्धि जनु देवराज ॥
गिरिराज मद्धि सब गिरन रज्जं। देखन्त सभा सुभ इन्द्र लज्ज ॥
कं० ॥ १३६ ॥ रू० ॥ ५५ ॥
बीरों के वश होने की बात से पृथ्वीराज का पेट
फूलता है पर किसी से कह नहीं सकता ॥
दूहा ॥ बैठि सभा पृथिराज रचि, आय सुरति निज चित्त ॥
वत्त बीर बरदान की, अति उमंग उलसित्त ॥
कं० ॥ १३७ ॥ रू० ५६ ॥
रचै न आनँद कुँअर हिय, उगमत कण्ठ प्रमान ।
कहै न कासों बत्त बर, मानों दुद्ध उफान ॥ कं० ॥ १३८ ॥ रु० ॥ ५७ ॥
कैमास का हाथ जोड़कर पूछना कि आपके मुख पर कुछ उत्साह
दिखाई देता है पर आप खुलकर कहते क्यों नहीं ?
अरिल्ल ॥ पानि जोरि कयमास । बदै तब राज प्रति ॥
उर अवलोकित उलसत । सामन्त राज अति ॥
को कारन मुख चारु । न कथ्यिहि बत्त संति ॥
सुभर सूर सामन्त जु । विनवत्त राज प्रति ॥ कं० ॥ १४० ॥ रु० ॥ ५८ ॥
पृथ्वीराज का चन्द के वीरों को वश करने का
समाचार कहना ॥
५५ पाठान्तर-क्षांन । दान् । कुआंर । कुआर । होय । वजे । निसांन । मांन ॥ १३२ ॥
पूरन । तैज । वीरत । अभूल । बांन । दिट्ठि । जांन ॥ १३३ ॥ आय । चतुर्हूस । मंति । गोइंद ।
आय । आई । कुमर । कमल । नवाय ॥ १३४ ॥ चहुआन । भारथ । कथ । अंनि अंनी । आय ।
आई । मित । अप्रमाय ॥ १३५ ॥ कुंगार । कुआर । देवतनु । मधि । मधि । रज । शुभ ।
लज ॥ १३६ ॥
५६ पाठान्तर-पृथीराज । वरदांन । अल्हसित्त ॥
५७ पाठान्तर-आनंद । कुंगर । कुंमर । प्रमांन । मनों । दूध । । उफांन ॥
५८ पाठान्तर-चंद्नायना । पांनि । उल्हसत । सांमंत ॥ १३६ ॥ चारु । कथि । बत ।
विनवत ॥ १४० ॥