पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 321, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा समय १२] • पृथ्वीराजरासो । ३११
चंद का बावनो वीर को पहिचान कर प्रणाम करके विदा
करना और आप पृथ्वीराज से मिलने के लिये आगे बढ़ना ।
कवित्त ॥ पहिचानिय कविचंद । बीर बावंन सूर बर ॥
सहाकाय सडमत्त । अंत जनु अच्छिन दनुज खर ॥
तेज साजि चष साजि । तास धीरज्ज धीर धर ॥
भीत मयंक भयांन । जानि ग्रीषंम अगनि झर ॥
करि नवनि चंद पहिचांन सब । वज्रपात अग्या कन्तिय ॥
बहुराइ देव कवियन प्रवल । मिलन पिव्य आगैं चलिय ॥ छं० ॥ ६३ ॥ रु० ॥ २८ ॥
चन्द का उस जङ्गल का वर्णन करना जहां पृथ्वीराज
आखेट खेलता है ॥
कवित्त ॥ अग्य गयौ गिरि निकट । बिकट उद्यान भयंकर ॥
जैहन पवरि दिसि विदिमि । बहुत जहूँ जीव पयंकर ॥
सिंच कोल गज रीछ । बहुत सामर बलवंते ॥
चीतल चीत चिरंन । पाइ परखें भजि जन्ते ॥
सेही सियाल खंगुर बहु । कुड कदंम भरि तर रहिय ॥
पिप्पे सु जीव कवि चंद नैं । तुच्छ नाम चौपद कहिय ॥
छं० ॥ ६४ ॥ रु० ॥ २९ ॥
कवित्त ॥ ठाम ठाम जल थान । मद्धि जनु जीव निवासिय ॥
ढेंक कुरंस कुरंच । हंस साग्सं सुभ भासिय ॥
वगले बतक विहंग । मगर मक्र कक्र द्रह पूरिय ॥
देखि दनुज पंनग निवास । सिद्ध साधक रुचि हरिय ॥
पर परषि वरन घन पिप्पियै । रोम हर्ष देखत नरन ॥
तुझ बुद्धि भट देखत भुल्यौ । कवि सुभन्ति कहै का वरन ॥
छं० ॥ ६५ ॥ रु० ॥ ३० ॥
२८ पाठान्तरः-पहिचांनिय । मदमंत । चप भासि । धीरज । जानि । ग्रीषम अगनिर ।
पहिचांनि । बहुदाय । पिय । आगैं ॥
२९ पाठान्तरः-अग्र । जहां । तह । बहुत । जहां । सीह । रोछ । सांमर । सांबर ।
चित्रक । हिरन । पाय । परकै । लंगुर । पिये । तुक । नांम । चोपद ॥
३० पाठान्तरः-ठांम २। यांन मधि । निवासीय कबह द्रह । पूरीय । पिपियै । बुधि भट ॥
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