सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 327

। छठाँ समय १६] पृथ्वीराजरासो : ३१०
सक्कै न बोलि कोउ हय अरूढ । हगहरौ पग वनि कवन झूट ॥
अगि जझ मझ्झ मांनै न संक। होइ रछै सूत सुनि बज्जि डंक ॥ ११८ ॥
सुनि विरद कांन चल्लंत मग्ग । तिहि चंद छद्म दिय कनक वग्ग ॥
छं० ॥ १२० ॥ रू० ॥ ४३ ॥
दूहा ॥ पाग धरी कवि चंद सिर, हरष भयौ वहु अंग ।
तूं विक्रम अक्रम चरन, करन दरिद्रह भंग ॥
छं० ॥ १२१ ॥ रू० ॥ ४४ ॥
एक एक सामंत हय, कीनिय चंद हजूर ।
वढि चल्लिय हल्लिय अगैं, सरित तुरंगन पूर ॥
छं० ॥ १२२ ॥ रू० ॥ ४५ ॥
कवि चन्द का पृथ्वीराज की स्तुति करना ॥
कवित्त ॥ करिय नवनि कविचंद । छंद अनेक पढि कर ॥
तूं सुरपति सम कुंचर । देव सामंत समो वर ॥
अगिन कन्हं जल चंद । पवन गोइंद प्रवल वल ॥
घरा चंद वल धीर । तेज चामंड जलन पल ॥
रवि तेज कछर कूरंभ सव । चंद अमृत आवू धनी ॥
दृगपाल सवल सामंत सव । रहै दग्वि धरती धनी ॥
छं० ॥ १२३ ॥ रू० ॥ ४६ ॥
४३ पाठान्तरः-फिरि । पृथीराज । येह ॥ १०८ ॥ मंगाय । मंगि । होइ ॥ १०६ ॥ मिलिं ।
वरदाय । आय । कहिय । वृत्त । पल्लित् सुनाय । जाय । एकांत ॥ ११० ॥ मध्य । सुप । पृथी-
राज । पाय । भोजन । करन फुनि । बैठि । आय । लीन ॥ १११ ॥ जथार्चि । सुभ कंठहार ।
मेल्हि । चहुवांन ॥ ११२ ॥ इक । एक सो । उड़त पंपि ॥ ११३ ॥ उतंग । पपर । लपे ॥ ११४ ॥
धक । जिहिं । गठ । रथ ॥ ११५ ॥ हय । लिन । आंदून ॥ ११६ ॥
तब लहत । सुझै । काय। पाय। लेय । गज । मुहप । मझ । पारंत ॥ ११७ ॥ उप । दिपिये ।
मैं । चलो । कांन ॥ ११८ ॥ सकै । कोइ । पग । जल । मझ । मांनै । होय । वनि ॥ ११८ ॥
चालंत । सथ ।
४४ पाठान्तर-तु । तूं ॥
४५ पाठान्तर-कोनीय । चलिय । हलिय । आगे । तुंगन ॥
४६ पाठान्तर-पढि । कुमर । कुंअर । समवर । अगनि । चावंड । आबू । सकल । रहे ।
दबि ॥