पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठा समय १७ ] पृथ्वीराजरासो ३१३
कवित्त ॥ दुजपति चंकह हिरन । इक्कनिभय सुभाव अति ॥
गजनंतह टाग्ग । विघ्न विय दिट्ट गनपति ॥
षट आनन वर जोर । दतिय उप्पीय निसंक उर ॥
भगवति वाहन सिंघ । बेदग जीय सुमेर थरि ॥
वरदाइ चंद सुपच्चारि पग । पंचम वछ सुपछ रचहि ॥
आतंक अवर आरन्य पसु । डर घरहरि कंपत रचहि ॥
छं० ॥ ९९ ॥ रू० ॥ ३४ ॥
कवित्त ॥ छहरि हिरन हारियव । हेरि कातर रव रहिय ॥
अप्प घास भय मोछ । विरछ लग्गी चटपहिय ॥
हिय धरक्क धुधरह । वदन लोइन जल निझझर ॥
तंकित चकित संकीन । समग संकरिय दुप्भर ॥
सैरत्त चमकन्त पत्त रव । पिनक चित्त जिम उप्परै ॥
पिल्लंत सिकार पिथ कुँअर डर । पसु पींपर दल थरथरै ॥
छं० ॥ १०० ॥ रू० ॥ ३५ ॥
कवित्त ॥ पोमिन वन नहिं चरहि । नहिन संचरहि कुमुद वन ॥
ईप षेत परहरहि । जीर परहु अविग्त मन ॥
मंथर गति लखि मुंघ । कास कानन नह चप्पहि ॥
नह पिप्पै नियनारि । नहिन चष कंदनि रप्पहि ॥
गिरि मद्धि गह्वर गुहअह वसहि । नीर समीप न संचरहि ॥
खोमेस सुतन आखेट उर । इमड ढाल उस सह चसहि ॥
छं० ॥ १०१ ॥ रू० ॥ ३६ ॥
कवित्त ॥ गिर कंदर सर वरह । सरित कच्छह घन गुच्छह ॥
निझ्झर कूल न द्रष्टन । बेतनल्ल तिन सर पुंजह ॥
३४ पाठान्तर:-इक सुभिय निसंक अति । गजघटन तह । गजनंतह । दिट्ठिय । गनपति ।
छतीय । उपीय । निसंक। गज्जीय । गर्जिय । थिर । रहिय । आतंक । आरंन्य । रहिय ॥
३५ पाठान्तर:-हहकि । हीरन । हारीयव । रच । अय । लगिय । धरक । धुंधर ।
निझर । संकित । समग्ग । संकरीय । दुप । भयपन्न । चमकत । पन्न । ऊपरैं । पिलत । कुँअर ।
पिंयद ॥
३६ पाठान्तर:-नहि । चरहिं । दृप । परहरत । परभय । मथर । मुध । चपहि । पिपैं ।
नाहि । रपहि । मधि । गुज्जह । इमद । सहि ॥