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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 326

३१६ पृथ्वीराजरासो । [ छटां समय १८
पृथ्वीराज का भोजन करना और फिर आगे बढ़ना ॥
सुष मद्धि सुष्ष प्रथिराज पाइ । भोजन करंन नृप बैठे आइ ॥
छ्ह रस निवास आहारि अंन । करि कुरल पांन करपूर लिंन ॥१११॥
म्रगमद जवाद सब चरचि अंग । कसमोर अगर सुर रचिय संग ॥
सुभ कुसुमघार संब कंठमेलि । इम चलिय बलिय चहुआन षेलि ॥११२॥
छ्ह अग्गा इक्क सौ तुरिय तेज । उड़ंत पंषि बिन पंषिकेज ॥
बगसीस सकल सामंत जोग । दिषि वाच वाच सब कहत लोग ॥ ११३ ॥
सुष चाल फाल जे छिरन लेत । उत्तंग गात पष्पर समेत ॥
गज घालि बांच घूघर सलोल । ल्षैं न राह करते कलोल ॥ ११४ ॥
घा कहंत उड़त हां कहत ठट्ठ । गिर परत धंक जिन कोट गट्ठ ॥
पित मात असलि अस्रारु देस ।
सब सरदारों को एक एक घोड़ा बांट दिया उसी पर
सब चढ़ कर चले ।
सोभंत बानि रवि रय्य भेस ॥ ११५ ॥
दै एक एक सब बंटि दीन ।
चढ़ि सूर सकल सामंत लीन* ॥
कविचन्द को एक हाथी देना जो महा बलवान था ।
दिय हस्ति एक कबि चंद बोलि ।
अंदून ताहि को सकै षोलि ॥ ११६ ॥
तल बघत पाट सुझै न अंषि ।
अति पाइ काइ गछि लेइ पंषि ॥
अनि गज्ज मुष्ष को सकै झेलि ।
खल दलन मभक्त पारत्त भेलि ॥ ११७ ॥
सुर नाथ वाह सम अंग ओप ।
दिषियै खिज्यौ जनु काल कोप ॥
बिन रोस सहज में अजा जांनि ।
घर कोइ बंधिचै चल्यौ कानि ॥ ११८ ॥

  • यह तुक एशियाटिक सोसाइटी के पुस्तक में नहीं है ॥