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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 470 में से

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पृष्ठ 322

३१२ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय १४
कवित्त ॥ सघन वृष घन छांह । जानि बहल नभ वासिय ॥
देषत पथ्य गिरंत । वेलि अवलम्बि विलासिय ॥
खोर खोर कोकिलन । (रौर)* चीह पप्पीह पुकारत ॥
सुमन सुगन्ध सबूछ । अंध मधुकर मधु आरत ॥
बहु कुची बाज सिंचान बच । खंगूर लाग लेयन फिरैं ॥
देषन्त जनावर अष ची । जनु प्रकास तारा गिरैं ॥
छं० ॥ ८६ ॥ रु० ॥ ३१ ॥
कवित्त ॥ तहँ खेलत पृथिराज । संग सामंत जङ्ग जुरि ॥
घट सुडोरि सँग स्वान । लेत ते जीव सबन जुरि ॥
बगुर घेरि विष्षंन । अप्प झुंजन में मंडिय ॥
तक्क तके इक रचिय । चक्कि घेदा षिक्ष कंडिय ॥
भंचराइ भग्गि पसु उठि चले । आवै आवै होइ रंचि ॥
परसपर खोर वे करत सुनि । यों सिकार चन्दह सुवचि ॥
छं० ॥ ८७ ॥ रु० ॥ ३२ ॥
पृथ्वीराज के शिकार की प्रशंसा ॥
कवित्त ॥ तिक्क भाल ससि षण्ड । गण्ड मद भमर बिलुड्डिय ॥
सुरभि तेज सिंदूर । सुमन संपति मन सुद्धिय ॥
सुद्ध दुद्ध जिम दसन । विसद बानी जिम निम्मल ॥
परस मुसल असि चर्म । हत्थ पंचम मोदक कल ॥
पुज्जिय सुचंद सुरइन्दजग । गवरिनंद दूषन दुरय ॥
कंपच्चि सिकार गज तुंड डर । सब विघंन गनपति घरय ॥
छं० ॥ ८८ ॥ रु० ॥ ३३ ॥
३१ पाठान्तर-वृष्य । जांनि । बदल पद्म । पथ । * अधिक पाठ है । पपीह । सीचान । लंगुरुं । फिरें । देषत । जिनावर । भक्षक ही भक्षक हैं। जनुं । आकास । गिरें ॥
३२ पाठान्तरः-तहां । सुं डोरि । संग । स्वांन । बंगुर । घेरोय । वियन । पूंडिय । हकि । भयराय । भगि । हुइ । रहिय । लहिय ॥
३३ पाठान्तरः-गंड चम्भर मदलुट्ठिय । सुब्भि । संपत्ति । दुद्ध । दूध मुद्ध । वांनी । ज़िमल । चर्म । हथ । पुजिय ॥