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सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 325

छटां समय. १७ ] पृथ्वीराजरासो । ३१५
वज्जत निसान सहनाइ सुर । तवल उक्का वज्जत बलिय ॥
सिक्कार खेल्लि घन रस रच्यो । सब पधार पग बलदलिय ॥
कृं० ॥ १०५ ॥ रू० ॥ ४० ॥
कन्ह चौहान आदि सब सरदारों का आकर पृथ्वीराज से
मिलना और कहना कि आज यहीं शिकार हो ॥
कवित्त ॥ आइ कन्ह चहुआन । नवनि पृथिराजसु किन्विय ॥
आइ राइ गोयंद । पृथुक आदर आदन्विय ॥
आइ चंद पुंडीर । धीर सव्यह हंसि मिल्खिय ॥
वलिभद्रह कूरंभ । कछर किन्ने रस षिल्खिय ॥
प्रबुच्चा राहू-पावार मिल्खि । वरुन बंध सिर कर धरिय ॥
मिल्खि कछी सिंह पाछार दूच । आज केलि अदभुत करिय ॥
कृं० ॥ १०६ ॥ रू० ॥ ४१ ॥
दूहा ॥ मिल्खिय सकल सामंत तहँ, गनि न कद्दै पृथु नाम ॥
छयन चौंस परबत गजिय,सघन सुविद्रुम झाम॥ कृं० ॥ १०७ ॥ रू०॥ ४२ ॥
पृथ्वीराज का शिकार से घर की ओर लौटना ॥
छंद पद्धरी ॥ फिर चले कुँअर पृथिराज गेह । मिनि सकल सूर सामंत नेह ॥
परछास परसपर करत केलि । नारीन नक्कि नृप-खेत खोलि ॥ १०८ ॥
मंगाइ नीर कर मुख पखारि । सब करन मंडि कर्पूर धारि ॥
गोठ (भोजन) के स्थान पर ठहरना ॥
जहां हुई गोठि भोजन नरिंद । तहां हुते सकल सामंत वृंद ॥ १०९ ॥
चन्द बरदाई का आकर पृथ्वीराज से मिलना और
पिछला सब वृत्तान्त एकान्त में ले जाकर कहना ॥
फुनि मिले चंद बरदाइ आइ । ककु कही बात पिछ्ली सुनाइ ॥
नृप भद्द जाइ बैठे इकंत । फिरि कही बत्त जो आदि अंत ॥११०॥
४० पाठान्तरः-लीए। कितक्क। कितेक। पंति। हुंथी। स्वांनन। सर्व्व। बजत। निसांन।
सहनाय । डंक । घजत । सिकार ॥
४१ पाठान्तर-आय । चहुआनं। पृथ्वीराज । किन्नियः । आय । राय । गोइंद। पृथुक ।
आय । सव्यह । हसि । मिलिय । बिलिय । कहिय ॥
४२ पाठान्तरः-तहां । नाम ॥