पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
५. राजा जयचन्द से संघर्ष एवं संयोगिता हरण
अथ लोहाना आजान बाहु समय लिख्यते।
(चौथा समय)
पृथ्वीराज का अपने सामन्तों को बत्तीस हाथ
ऊंची गोष से कूदने की उत्तेजना देना ॥
कवित्त ॥ इक्क समय प्रिथिराज । राज ठट्ठा सामंतह ।
हथ बतीस इक गौष । चित्रसारो कहवत्तह ॥
घटिय शेष दिन रह्यौ । सब्रै अर और गह्मसह ।
नग्रनाथ नागौर । पहराजंत इन्द्र पह ॥
उच्चरिय बत्त इमि मत्ति करि । खोइ जोधा पब्बद्द जिसै ।
भै भित्त चित्त मैं भित भिरै । इह सुथान कुद्है इसै ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥
लोहाना का कूदना ॥
कवित्त ॥ दुचित्त चित्त सामंत । चाचि लग्गिय टगटग्गिय ।
चित्र जानि पुत्तरिय । नयन जुव्वैं पग मग्गिय ॥
रज्जि मत्ति नादान । कंद उच्चरिय बत्त इह ।
चामुंडा जैतंसि । रोस आक्रस्सं कियौ वह ॥
ठट्ठौ सु इक्क लोहान भर । कहर कवूत्तर कुह्यौ ।
जो नेक चूकिएक्खो गियौ। साष अंब हू छह्यौ॥ छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥
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यह समय हमारे पास की संवत् १६४७ की लिखित पुस्तक में नहीं है किन्तु उसके
इधर की लिखी सब पुस्तकों में मिलता है। तथा इस कथा का संदर्भ तीसरे समय के रूपक २६
"षोडश गज कूपटु"- से लगाकर अभिप्राय समझने से ध्यान में आवेगा कि एक दिन राजा
पृथ्वीराज सायंकाल के समय सोलह गज वा बत्तीस हाथ ऊंची चित्रसाली की गोख में सामन्तों
सहित खड़े थे और एक चित्रकार ने एक पत्र अर्थात् चित्र पेश किया उसको संभरी नाथ देख रहे
थे कि देखते देखते वह हाथ में से छूट पड़ा। उसको लोहाना आजान बाहु ने कूद कर अधबीच
में ही झड़प लिया इत्यादि ।
१ पाठान्तर-अजान बाहं । पृथीराज । ठट्ठा । ठट्ठा । वट्टा । सामतह । बत्तीस । कहैं ।
वर गहंम्मह । वत । मति । ज्जोधा । न्जिसो । भित । चित । कुहैं ॥
२ पाठान्तर-मति । षत । चामडां । नैतंसी । आक्रस । चट्ठौ । नेकि । चेक । असौ ॥
२७६ | पृथ्वीराजरासो । | [ चौथा समय २
लोहाने के कूदने की प्रशंसा ॥
कवित्त ॥ इक्क कहै धर जीव । काज पंषिनी रूपप्पिय ।
इक्क कहै सो ब्रज्र । इन्द्र को पुरषेव नंषिय ॥
इक्क कहै आकास । तास है उडियन तुहै ।
इक्क कहै सुरलोक । तास कोई नर जुहै ॥
कविचंद कित्ति उप्यम कहै । लोहाना तोवर सुभर ।
जाजुल्लि राइ सुत किह चित । नत्थि हुवै दुज्जै सुभर ॥
॥ छं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥
पृथ्वीराज का दौड़ कर लोहाना के पास आना
और उसे हिये लगाना ॥
अरिल्ल ॥ दौरि राज पृथ्वीराज सु आयो । षमाषमा अषै उचायो ।
और सूर सामंतह अग्गी । चियरा सन्निऋए परि लग्गी ॥
छं० ॥ ४ ॥ रू० ॥ ४ ॥
उसे आप उठाकर अपने घर ले जाना और इलाज करना ॥
अरिल्ल ॥ अप्प उचाइ अप्प गृह आने । सब तबीब बहुत सनमाने ।
मौज मना मंझ होइ सुमंगौ । च्यारि पचर दिवसह मन्झि चंगौ ॥
छं० ॥ ५ ॥ रू० ॥ ५ ॥
हकीमों का लोहाना को दवा के लिये ले जाना और नवें
दिन उसका अच्छा हो कर पृथ्वीराज के पास आना ॥
दूहा ॥ तब तबीब तसलीम करि, लै घरि आइ लुहान ।
नव दीचे सिर झझयो, ढंढोलन गय ठान ॥ छं० ॥ ६ ॥ छं० ॥ ६ ॥
३ पाठान्तर-कहँ । कां । कहै । इंडियन । कोइ । कहँ । तांवर । किट्ट । दुजै ॥
४ पाठान्तर-राजा । प्रथीराज । उचायौ । मन्निए ॥
५ पाठान्तर- आनैं । बहुसत । सनै मानै । सुमग्गा ॥
६ पाठान्तर-झलयो ॥
[ चोथा समय ३ ] पृथ्वीराजरासो । २०७
चंद् पंचमी अति सुअल्ल, दिय विप्र बहु दानं ।
तिथि तेरस रविवार दिन, पथ लग्गो चौहान ॥ छं० ॥ ७ ॥ रू० ॥ ७ ॥
पृथ्वीराज का प्रसन्न हो कर लोहाना को ग्वालियर, रणथम्भौर,
उड़छा आदि पांच हज़ार गांव देना ॥
कवित्त ॥ पय लग्गत चहुवान । मौज ग्वालेर सुदिन्नौ ।
रिनथंभह जड़द्दो । कछर सूरब्बर किन्नौ ॥
लोहाना आजान (वाह) * नाम थप्यै बहु छप्पै ।
सहस पंच दिय ग्राम । जैत कविचंद सुजप्पै ॥
तिधि धरिय मल्हित्त यह अप्पियै । लै पहा सीसह धरिय ।
रक्खी सुवत्त दिन तीन संच । पग्ग मग्ग अप्पी परिय ॥
छं० ॥ ८ ॥ रू० ॥ ८ ॥
आजानुबाहु का आना और पृथीराज का हाथी घोड़े आदि देना ॥
दूहा ॥ पूनम तिथि मंगल दिनह, गृह तेरिय आजान ।
आसन खंडि सु अप्प दिय, बहु आदर सनमान ॥
॥ छं० ॥ ९ ॥ रू० ९ ॥
छंद पड़ड़ी ॥ नव दून अप्पि मदझर गयंद । कज्जल सकोट उज्ज्वल अनंद ॥
सै पंच दिन्न वानी पवंग । गो अप्प सैक (वान) * ग्रहता कुरंग ॥
॥ छं० ॥ १० ॥
सै पंच दिन्न अति उंट अच्छ । कत्तार भार फज्कार कच्छ ॥
दोइ सै दिन्न दासी सुचंग । झलझंत तास द्रप्पन सुअंग ॥ छं ॥ ११ ॥
७ पाठान्तर-पंचमौ । दिये । तेरसि । लगै । चहुवान ॥
८ पाठान्तर-लगात । चहुवान । दिनौ । रिनथिंभह । उंडछा । सूरबर । किंनो । * अधिक
पाठ है । थपे । अप्पे । जंपै । लैं । रखी सरवत दिन तीन पर ॥
९ पाठान्तर-पूनिम ॥
१० पाठान्तर-अनंद्ध । सैं । * अधिक पाठ है । द्विन । अच्छ । कछ । सै नये ।
सरस । गर्नै । अस । मुपि । चालंडराय । सुक्कि । सब्ब । सुंभीर । नौंहर । सुरत्त । शहि । डोरे ॥
- पाठ उपस्थित पुस्तको में नहीं है ॥
सिरपाउ भाउ नषे सरस । को गनै द्रव्य भंडार अस ॥
सामंत सूर मुख नूर नत्थ । * * * कं० ॥ १२ ॥
अब्बूसराइ जामानि जह । चामंडराइ मन मुक्ति मह ॥
गोयंद राइ पीची प्रसंग । उर लग्गि अग्गिनह सुप्प अंग ॥ कं० ॥ १३॥
अप्पंत सूर सामंत और । खरगोस लहै पै कीस दौर ॥
ऐ सरस सब्ब सामंत सूर । तिन चढै नाम आजान नूर ॥ कं० ॥ १४ ॥
जुग्गिन पुरेस कजि अप्पि जीव । एती सबत्त छथ्यं सुदीव ॥
सिर पटा छाप लोहान होइ । लग्गे सुसरह सब पाइ लोइ ॥ कं० ॥ १५ ॥
कप्पूर चीर सागर सुनीर । सह धन्न धान जौहर सुचीर ॥
फुलेल अरगजा बहु सुगंध । कोठार आर उग्गह सुवंध ॥ कं० ॥ १६॥
कामंसु अप्पि ऐले सुक्रित्त । परधान मान करि मानमत्त ॥
रत्तौ सुस्वामि अम्मह सुसब्ब । गछि चलै स्वामि डारैं सुतब्ब ॥
कं० ॥ १७ ॥ १० ॥
लोहाना के वीरत्व का वर्णन ॥
गाथा ॥ लोहाना आजानं । वानं पर्थ भीम जुद्धानं ॥
आ अरूप सरूपं । बंकं अरं पहरं करनं ॥ कं० ॥ १८ ॥ रू० ॥ ११ ॥
दूहा ॥ लोहाना तैंवर अभंग, मुहर सब्ब सामंत ।
सांई काज सुधारना, ढंढोलन गय दंत ॥ कं० ॥ १८ ॥ रू० ॥ १२ ॥
लोहाना का पांच हज़ार सेना लेकर ओड़का के राजा
जसवान्त पर चढ़ाई करना ॥
कबित्त ॥ उंडच्छा अरि थान, कच्छ ईहां घर रत्तौ ।
नाम तास जसवंत, भग्ग राजन घर धुत्तौ ॥
लोहाना अनबोह, लीय बारत्त समर्थै ।
सज्जि सेन सामंत, कत्तह रषन जस कथ्यै ॥
११ पाठान्तर-पथु । बंकं ॥
१२ पाठान्तर-सब । ठंठोल गनय दंत ॥
चौथा समय ४ ] पृथ्वीराजरासो। २७६
हजार पंच सेना सन्नथ, करि जुहार अर चह्वयो।
लबहल्हि गसंत सायरत दिन, ढाक सेर गिर छह्वयो ॥
छं० ॥ २० ॥. छ० ॥ १३ ॥
ओड़छा पर चढ़ाई की शोभा का वर्णन ॥
छंद गीता मालती ॥ सजि चल्यो तामं जुद्ध धालं केन कामं पूरयं ।
घन घोर घटा समुद फहा दूम उलहा सूरयं ॥ २१ ॥
धुंधरिग सानं फुरेसानं देस जानं चल्लयं ।
दानवज्ज थानं परि भगानं सूरतानं सल्लयं ॥ २२ ॥
आजानुबाहं पहे थाहं गज्ज गाहं घुम्मरे ।
चह चहे महं गज्ज सहं घटा भहं उप्परे ॥ २३ ॥
नारद वदक्कं सूर ढक्कं लेयन्न श्छंकं जुद्धरे ।
जड़क्का उप्परि कंठला करि शराभष्फुरि अष्फुरे ॥
छं० ॥ २४ ॥ छ० ॥ १४ ॥
ओड़छा के राजा जसंवन्त का सामना करने
के लिये प्रस्तुत होना ॥
दूहा ॥ सुनी धाइ जसंवंत नृप, आयो सेन सुसज्जि ।
ढलकि ढाल बहल मिलिय, पुब्ब झाडाउ अवज्जि ॥
छं० ॥ २५ ॥ रू० ॥ १५ ॥
लड़ाई होना और लोहाना का जीतना ॥
छंद विराज ॥ बजे सिंधु नहं । करी सुन्कि महं ॥
हकं सूर बज्जे । मनो मेघ गज्जे ॥ २६ ॥
फुटे अग्ग बाजी । असे सार आजी ॥
मचे गोम थोमं । मनो राहु सोमं ॥ २७ ॥
भिड़े चत्थ बत्थं । मनो जुद्ध पत्थं ॥
घरे धीर धारी । बकै मार मारी ॥ २८ ॥
१३ पाठान्तर-उंडछा । थांन । कछ । इहां पंगा । सजि गसत ॥
१४ पाठान्तर-पुरेलानं । सलयं पुम्मरे । छू । लेयन । उंडंछा । कंवला ॥
१५ पाठान्तर-नृप । पुब' । झझाउ ॥
२८० पृथ्वीराजरासो । [ चौथा समय ४
ग्रहे सीस ईसं । करा रंत दीसं ॥
जुत्तं मरहं । मचे एम कहं ॥ २९ ॥
खरै यों लुहानं । अभंगं जुवानं ॥
जसक्वंत जोरं । चहक्कंकेति घोरं ॥ ३० ॥
गसेते गसानं । गए अग्ग थानं ॥ छं० ॥ ३१ रू० ॥ १६ ॥
दूहा ॥ खेचर भूचर जलचरह, सूर गए सुर थान ।
जुद्ध जुरे जसवंतसी, रन जित्यो लोहान ॥ छं० ॥ ३२ ॥ रू० ॥ १७ ॥
लोहाना का गढ़ पर अधिकार कर लेना ॥
कवित्त ॥ सहस उभय लोहान, सुभट परि खेतह मज्जे ।
खार धार परछार, उभय गजराज विभज्जे ॥*
सय सत्तह हय खेत, नेत बद्धे रिन जित्यौ ।
षट सहस (अर)† पवंग, कवी चंदह कवि कित्यौ ॥
परि लुब्ध कोस सुर दून प्रति, धर लिन्मी गढ़ संजियौ ।
करि जेव बयठो गढ़ परि, इक्क यानि मन रंजियौ ॥
छं० ॥ ३३ ॥ रू० ॥ १८ ॥
इति श्री कविचंद विरचिते प्रथ्रिराजरासके लोहाना आज्ञा-
नबाहु समय नाम चतुर्थ प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ ४ ॥
· १६ पाठान्तर-भनां । अगि । मनां । हयं । मनो । राम । मचैं । लरैं । यौं ॥
१७ पाठान्तर-थलचरह । सुर । जसवंतसा ॥
१८ पाठान्तर-लुहान मजे । * यह पाद संवत् १८४९ की लिखित पुस्तक में नहीं है ॥
† यह अधिक पाठ है । कित्तौ । लिंची । भंजियो । बयठो । रंजियो । लोहान ॥
अथ कन्हपट्टी* समय लिख्यते ॥
( पांचवां समय )
पृथ्वीराज को सोरा भीमंग से बैर होने का कारण ॥
दूहा† ॥ सुती कहै सुक संभरी, कहै कथा प्रति प्रान ।‡
पृथु सोरा भीमंग पहु, किम छुत्र बैर विनान ॥ छं० १ ॥ रू० ॥ १ ॥
१ पाठान्तर-शुकी । शुक । कहैं । संभरी । कह्यो । पांन । पान । प्रभु प्रियु । बीर ॥
* कन्ह पृथ्वीराजजी का चाचा अर्थात् काका था । वह सदा आँखों के पट्टी क्यों बांधे रहता,
वा इसका वर्णन इसमें होने से इसका "कन्हपट्टी समय" नाम हुआ है ।
इस समय में गुजरात के दूसरे चालुक्य राजा भोला भीम का नाम और उससे पृथ्वीराज के
बैर होने की कथा प्रथम ही आई है । और इसमें कहीं भी यह नहीं कहा हुआ है कि सोमेश्वरजी
को भीम ने मार डाला था और उसका बैर लेने को पृथ्वीराजजी ने उस पर चढ़ाई करके उसे मार
डाला था । जिन लोगों के हृदय में यह रासो कांटा सा खलता है उनके ही मानने के अनुसार
भीम देव दूसरा सं० १२३५, ई० ११७८ में गद्दी पर बैठा था और ६३ वर्ष राज्य करके सं० १२९८,
ई० १२४१ में परलोक को सिधारा । और पृथ्वीराजजी का जन्म सं० १२०६ में होकर वे ४३ वर्ष
की वय में सं० १२४९ में मरे । इस से सिद्ध है कि सं० १२४९ तक तो दोनों राजा निर्विवाद सम-
कालीन रहे । अब रहा उनके मारे जाने का हाल सो यहां है नहीं। जहां वह आवेगा वहां हम उसके
विषय में भी ऐसी ही सत्यविवेचना करेंगे । अतएव यह समय तो क्षेपक सिद्ध नहीं होता ॥
† एक पाठक की शंका है "क्या दूहा और दोहा की मात्रा में कुछ भेद है"? उत्तर-
कुछ भेद नहीं है। दूहा पुराना और दोहा नया प्रयोग है। उनमें से दूहा "दु + ऊह" से बना
है अर्थात् जिसमें दो ऊह हों उसे दूहा कहते हैं। और हिन्दी दोहा शब्द संस्कृत द्वोहा से इस
प्रकार बना हुआ जान लेना चाहिए-द् + अ + उ = द् + अ + व् = द्व । दु + ऊहा = दु +
अ + ऊहा = दु + ओ + हा = द्वोहा = हिंदी दोहा । पट्टभाषा के प्रचार के समय में इसको
द्वोहड़िका वा दोहड़िका भी कहते थे । उसका संस्कृत में लक्षण और उदाहरण यह है-
मात्रा त्रयोदशकं यदि पूर्वं लघुक विराम । पश्चाद्द्वादशकंतु दोहड़िका द्विगुणेन ॥
तथा उसका प्राकृत उदाहरण यह है :-
माई दोहडिपठण सुण हसिओ काय गोवाल । वृन्दाबणघणकुंज चलिओ कमल रसाल ॥
अस्यार्थः-
हे मात:! दोहड़िकापाठं श्रुत्वा कृष्ण गोपालो हसित्वा कमपि रसालं चलितः कुत्र वृन्दावन-
घनकुंजे वृन्दाबनस्य निविड़निकुंजे । राई दूति क्वचित् पाठः तन्मतेन राधिकाया दोहड़िका पाठं
श्रुत्वा । गुरुंलघु व्यत्ययेन् बहुधा भवति ॥
यह २४ मात्रां का छंद है । उसमें यति १३ । ११, १३ । ११ पर हैं । और उसमें ६ ताल
होते हैं-४ ४' २ १२", ४ ४'-, ऐसा दोहा गाने में ठीक दीपता है ॥
२८२ पृथ्वीराजरासो । [ पांचवां समय २
पृथ्वीराज के कुंअरपन का तपतेज वर्णन ॥
कबित्त ॥ कुँअरप्पन प्रथिराज । तपै तेजह सु मछावर ॥
सुकल बीजु दिन द्युतें । कला दिन चढ़त कलाधर ॥
मकर आदि संक्रमन । किरन बाढै किरनाकर ॥
त्यौं सोमेस कुँआर । जोति छिन छिन अति आगर ॥
च्य उत्थिय देत संकै न मन । पख पंडन गढ़ गिरन बर ॥
चिँहु जोर जोर दसहूँ दिसा । कीरति विस्तार सचिय पर ॥ छं० ॥ २ ॥ रु०२ ॥
गुजरात के राजा भोरा भीम का तपतेज वर्णन ॥
कबित्त ॥ भोरा भीम भुजंग । तपैग़ुज्जर घर आगर ॥
है गै दल पायक़* । पग्गबल तेजह सागर ॥
काका सारँगदेव । देख जिम तास बड़ाइय ।
तासु पुत्र परताप । सिंघ सम रूप सु भाइय ॥
परतापसीह अरसीह बर । गोकुलदास गोविंद रज ।
सूरसिंघ स्याम भगवान भर। कुल अरेह सुभ नीर सज ॥ छं० ३ ॥ रु० ॥ ३ ॥
उसके काका और चचेरे भाईयों की वीरता का वर्णन ॥
दूहा ॥ जोरावर जुरि जंगमति, भरे बध्य नभ गाज ।
हुकम स्वामि छुटत सु इम, मनौं तितर पर बाजं ॥ छं० ॥ ४ रु० ॥ ४ ॥
तिन पर तुट्टै बीज जौं, जिन पर राज अरुट्ट ।
राजकाज संमुख भिरन, दई न कबहूँ पुट्ठ ॥ छं ॥ ५ ॥ रुं० ॥ ५ ॥
‡ यहां शुक और शुकी से कवि का अभिप्राय चंद और उसकी स्त्री से है । क्योकि यह सब
महाकाव्य उनके ही संवाद में रचा गया है और आगे भी कई एक समयों में यही प्रयोग
आवेगा । चंद प्रायः कवि को कीर की उपमा देता है- "आस असन कवि कीर" ॥
२ पाठान्तर-कुचरपन । कुंअरप्पन । पृथीराज । * ज्यों ज्यौ अधिक पाठ है । जिम ।
बढै । कुवार । कुंमार । छिन ही छिन । हथि । गिनर । चिंहु । चिहुं । दिशा विसतरि ॥
३ पाठान्तर-गुज़र । हय । गय । पाइक । * प्रचंड अधिक पाठ । पायक । सु । सारंग-
देव । बडाई । तास । भाई । सिंह । सिंघ । श्याम । भगवान । सजि ॥
४ पाठान्तर-जग । बध । गाजि । स्वांमि । छुटतं । मनो । तीतर ॥
५ पाठान्तर-ज्यों । असंठं । पिट्ठं ॥
पांचवां समय ३] पृथ्वीराजरासो । २८३
गाथा ॥ मारे रान सुरानं । खानानुबले भयं भान्जानं ॥
जिन संजे जैमालं । वज्ज्यौ आतरासि पंचं ॥ छं० ॥ ६ ॥ रु० ॥ ६ ॥
पाट बैठने पर प्रतापसी को गर्व होना ॥
दूहा ॥ सारँग दे सुरलोक गत, भौ प्रतापसी पाट ।
सात सात सेवा करैं, तपौ तेज थिर घाट ॥ छं० ॥ ७ ॥ रू० ॥ ७ ॥
घडउअल दन्तवल अनैंत, बहुत अव्व वर अप्प ।
सत्तरि सहस घर गुज्जरनि, मधि ओपत जिम कप्प ॥ छं० ॥ ८ ॥ रु० ॥ ८ ॥
स्वामि अक्स रत्ते सुसन, जे ठेलैं गजठद्द ।
ढरै परब्बत सिपर डर, करैं सचु दछवह ॥ छं० ॥ ९ ॥ रु० ॥ ९ ॥
प्रतापसी दो देश उजाड़ने की पुकार भीजंग के पास होना ॥
दूहा ॥ भोरा भीम भुवाल के, कोई एक नैवास ।
तिन उज्जारत देस दौं, परि पुकार नृप पास ॥ छं० ॥ १० ॥ रू० ॥ १० ॥
गाथा ॥ प्रात समै पूकारं, आई नरिंद भीम दरबारं ।
धारि नीसान सुघावं, चढि राजं साजि आतुरयं ॥ छं० ॥ ११ ॥ रु० ॥ ११ ॥
दूहा ॥ चालुकह गुज्जर धरा, ईस नेति किय भीम ।
जो उथ्यै तिहुं पुर सुबरं, को चंपै अरि सीम ॥ छं० ॥ १२ ॥ रु० ॥ १२ ॥
भोरा भीम की उनसे लड़ाई ॥
छंद पद्धती ॥ चढि चलन राज आवाज कीन । नीसान नह वज्जे बजीन ॥
चिहु ओर अरनि छूटे तुरंग । सजि सिलह भाँति नाना अभंग ॥ छं० ॥ १३ ॥
६ पाठान्तर-रांन । भंजे ॥०
७ पाठान्तर-सारंगदे । भय । करै ॥
८ पाठान्तर- यव्व । अप । सत्तरि । गुजरति । उपति ॥
९ पाठान्तर-स्वांमि । रते । धुंम्म । ठट । ढरत । परबत । शियर । करता । शत्रु । वट ॥
१० पाठान्तर-भुवाल । सं० १६४७ की में "कोई एक" के स्थान में "घर जादव" पाठ है ।
उजारत । देशकौं ॥
११ पाठान्तर-पुकारं । आई । निसानं । निसानं । धांघ । साजि ॥
१२ पाठान्तर-किये ॥ यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक नहीं है किन्तु उसकी इतर की
लिखित पुस्तकों में है ॥
१३ पाठान्तर-नीसांन । बजे । चिहुं । चिंहु । डर । छुट्टेति तुंग । तितुंग । भांति ॥ १३ ॥
२८४ पृथ्वीराजरासो । [ पांचवां समय ३
धम धसकि धरनि थाने सुभंग । गंञ्जिय अकास कै गचर गंग ॥
भय हूह चाक आतंक जोर । सद्द सुरन फेरि भेरीन घोर ॥ कूं० ॥ १४ ॥
उडि रेन खेन मुंदिग अकास । परि रोर खोर जहां तहां मैवास ॥
धरि रोस मुच्छ मुररंत भीम । रस बीर वक्र संक्रोध धीम ॥ कूं० ॥ १५ ॥
चंपी सु सीम अरियन सुजाम । डेरा सुदीन नृप सरित ताम ॥
जुररा सिकार तीतर बटेर । खेलंत सरित तट भइ अबेर ॥ छं० ॥ १६ ॥ *
दूचि समय ताम परतापसीह । बहु बंधु साथ अरसी अबीह ॥
ए छुते सकल बाहुर ते बेर । नय मक्कू आए खेलत अबेर ॥ छं० ॥ १७ ॥
गजराज नाम 'साछन सिंगार । सरितान मक्कू वच्छ पियै वार ॥
सुनि खोर दांन कुद्दे हँकार । जनु भूत भंति भय भीत भार ॥ कूं० ॥ १८ ॥
जमुना कि जग्गि काळी करार । सिर धुंनि मछावत दियौ डार ॥
गज एक वारि पीवंत दूरि । तिन पर सु तुहि जनुं सिंघ चूरि ॥ कूं० ॥ १८ ॥
धरि पंष पब्ब जनु धप्पि धाय । भुज पख्यौ नभ्र वद्दर समाय ॥
दिषि दुरद उनचि आवंत आन । धुनि करि सु डारि उन पीलवान ॥ छं० ॥ २० ॥
धायौ ति समुह साछन सिंगार । जनु बंध जंम उप्पर अपार ॥
कखपंत पाडू जनु पवन आडू । छल छले पब्ब जित तित बिठाइ ॥ कूं० ॥ २१ ॥
जम रूप दूझ जनु जंम दार । हथ आत बीच घेरे असार ॥
इक ओर वारि द्रह गद्दर गूझ । इक जोर जोर वर उंच कूझ ॥ कूं० ॥ २२ ॥
परताप सनंमुष पख्यौ जाइ । डारंत चाश्व असि कियौ घाइ ॥
बछि सीस परन दो हथ करार । षरबूज जांनि बिकस्यौ विफार ॥ कूं० ॥ २३ ॥
जगनाथ हंडि जनु बंटि दोइ । इह भंति कुंभ-कुंभी न होइ ॥
गज पर्यो धरनि साछन सिंगार । किन्नो अकाम परताप पार ॥ कूं० ॥ २४ ॥
थाने। गज्जिय। गग ॥ १४ ॥ रैन । संन । भिवास । मूंछ । कर्क ॥ १५ ॥ सुजांम । तांम ॥ १६ ॥ *
इस छंद की चारो तुकें सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं हैं। तांम । परतापसिंह । बाहुरत ।
मश् । अबेरि ॥ १७ ॥ नांम । सिरतांन । द्वि । पीवंत । वारि । दांन । फुटे । छंकार । भै ॥ १८ ॥
जँगि । डारि । चूर ॥ १८ ॥ पंषय । जनुं । धपि । नभ । बद्दर । किमाय । आंनि । पीलवांन ॥ २० ॥
साहुंन । शृंगार । पाय । पब्य । बठाइ ॥ २१ ॥ जंमरूप । जंम्म । ओर । जोर ॥ २२ ॥ जाय । घाय ।
बिकस्यो ॥ २३॥ बंटिय कि दोय । कुभिय । होय । शृंगार । सिंगार । कीनौ ॥ २४ ॥ अरसिंह ।
पुंठ । देखि । सनंमुष । एहौ । शिर । पद्य । चीरि । हथ ।
पांचवां समय ४ ] पृथ्वीराजरासो । २८५
अरसीह पुट्ठ जग धत्थौ देष । सनमुष्य क्रम्यौ सम सीह भेष ॥
गज गही दौरि सिर पग्घ सुंड । दिय गुरज चीर दय हत्थि मुंड ॥ छं० ॥ २५ ॥
फय्यौति सीस भइ पंच फारि । गज ढल्यौ जानि गिरवर विसार ॥
सुनि बत्त राज भोग सु भीम । पायौ अनंत दुप आप होम ॥ छं० ॥ २६ ॥
कह वाव कियौ नृप अप्प साम । तुम सो न हमहि चाकरह काम ॥ छं० २७॥रु०॥१३॥
उन सातों भाइयों का चलचित्त होना ॥
दूहा ॥ भा उभय अहंकार करि, हन्यौ सुवर गजराज ।
दोस हमहि लग्यौ नहीं, आप हि कीन अकाज ॥ छं० ॥ २८ ॥ रु० ॥ १४ ॥
पृथ्वीराज का उन चलचित्त सातों भाइयों को जागीर
और सिरोपाव देना ॥
दूहा ॥ सात भ्रात निज वात सुनि, भए अप्प चलचित्त ।
प्रथीराज सुनि कुँअर नें, आप बुलाये चित्त ॥ छं० ॥ २९ ॥
दिये हत्थ लिखि गाम पट, रहे बांस थिर आनि ।
चालुक चतुर वीर वरं, जिन उंपत सुष पानि ॥ छं० ॥ ३० ॥
बाजी सत दीने वगसि, संबोघे सत भ्रात ।
एक एक सिर पाव दिय, बहु आदर किय वात ॥ छं० ॥ ३१ ॥
गुरु लज्जा गुरु मत्ति गुरु, पन गुरु साष नरेस ।
गुरु डर सत गुरु सूरतन, गुरु गति मति गुरु भेस ॥ छं० ॥ ३२ ॥ रु० ॥ १५ ॥
पृथ्वीराज का दर्बार करके बैठना-उसमें प्रतापसी का
आना और उसे मूंछ मरोड़ने पर कन्ह का मारना ॥
सोरठी दूहा ॥ सम इक सोम कुमार, सम सामंतन सूर सम ।
सोम सीस भुअ भार, सो बैठे सुभ सभा रचि ॥ छं० ॥ ३३ ॥ रु० ॥ १६ ॥
२५ ॥ सुसीस । भय । फ़ार । गै । जांनि । बिसाल । बत । हाँम ॥ २६ ॥ कहवाय ।
कीयौ । अय । शाम । साम । सौं । सौं । न काँम ॥ २७ ॥
१४ पाठान्तर-भ्रात । अहंकारी ॥ यह सं० १६४० की पुस्तक में नहीं है । और भा शब्द
भ्रातं का वाचक है ॥
१५ पाठान्तर-निजि । भये । अय । अचल । चित्त । कुंअर । बुलाएं । हित ॥ २९ ॥ हथ ।
गांव । श्रोयत ॥ ३० ॥ बाज । संपत्त । दिने । शिरपाव ॥ ३१ ॥ गुर । नरेश । गुर ॥ ३२ ॥
१६ पाठान्तर-सोरठा । समै । समै । एक । कुंआर । सामंतरह । शीश । भू । बैठें ॥
२८६ पृथ्वीराजरासो । [ पांचवां समय ५
छंद मोतीदाम ॥ रची सुभ खांम सभा पृथिराज । विराजित मेर जिसे सर साज ॥
भुजा लम कन्ह रजे चहुवान । तिनै मुछ राजत है मुच पान ॥ छं० ॥ ३४ ॥
जिनै चष चाचि कंपै अर सांन । कंपै जनु जोरन अप्प सिवांम ॥
रहै चष वारि सुरातन एम । जवा अन प्रात किये सब जेम ॥ छं० ॥ ३५ ॥
तहां वर चांवँड राउ रजंत । जुधं मधि चांवँड रूप सजंत ॥
नृसिंह विराजत सिंघ जिसैय । विभीषन भा कयमास जिसैय ॥ छं० ३६ ॥
सबै अर जोर उतथ्य सुखंत । तिनं मधि पीथ कुँआर रजंत ॥
मनौ सुकलं पष बीज कौ चंद । निया रख राजत तारन वृंद ॥ छं० ॥ ३७ ॥
प्रतापसि सातउ भ्रात सरीस । पृथी पति आइ नमाइय सीस ।
ति षोचत मानुस तं सत सेर । किधौं सत सिंधु सुहंत उजेर ॥ छं० ॥ ३८ ॥
सनंमुष कन्ह प्रतापसि आइ । ठई तिन बैठन साच सुभाइ ॥
कहै अर सारथ वत्त स वांन । धल्यौ परतापसि सुच्छन पांन ॥ छं० ॥ ३९ ॥
लषी चहु आंन सु कान्ह अपंन । काढी असि तब्ब असंख अपंन ॥
दई असि दौरि जनेउ उतारि । दूछी धर अङ्क उपंस विचारि ॥ छं० ॥ ४० ॥
मनो सब नागर सावु कटंत । दूछी जनु गंठि बिचें विच तंत ॥
पर्यौ परताप पृथी पर आप । भई अर मध्य सुजोर अमाप ॥
छं० ॥ ४१ ॥ छ० ॥ १७ ॥
भाई के मारे जाने पर अरिसिंह का क्रोध करना और कन्ह
चौहान पर वार करना ॥
दूहा ॥ भई दूह मक्करूच मचल, पर्यौ भुंमि परताप ।
ढाल बीर बब्जे विषम, अरसी कुप्यो आप ॥ छं० ॥ ४२ ॥ दू० ॥ १८ ॥
१७ पाठान्तर—पृथीराज । मेर । कन्हं । रचे । चहुवानं । तिनं । मुछ पांन ॥ ३४ ॥ जिनं ।
कंपै । चंपै । अप्पन मोर । रहे । कि उसकन्नेम ॥ ३५ ॥ चामुंड । चाबंड । राय । चामुंड । नरसिंघ ।
विराजित । जिसो । सिसु । भीषन । जिसी ॥ ३६ ॥ सबै । घोरं । ऊतथ । पिय । कुमार । कुंआर ।
मंनों ॥ ३७ ॥ पृथीपति ।
नमाईय । शीका । सोहति । मानौं । मांनुस । किधों ॥ ३८ ॥ प्रतापसी । आय । कहैं ॥
बस । मुझन । मुंछन ॥ ३९ ॥ चहुवांन । अपान । तारि । बही ॥ ४० ॥ मनौं । नागर । बिचे । पृथी ॥४१॥
१८ पाठान्तर—दोहा । भइ । भुमि । यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
पांचवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो । २८७
कवित्त ॥ भई कूह परताप । पन्यौ दिष्यौ अरसी वर ।
उथ्यौ कह्नि तरवारि । दई भुज कन्ह बाम कर ॥
इक्क सीच वर ओर । गरै पप्पर गचि डारी ।
एक अगनिता मद्दि । आनि कूंषी घृत धारी ॥
चहुआन कन्ह अग्गै सुवर । ता पच्छै लोचनदग्यौ ।
जाजुलित सत्त वर वीर मंत । वीर वीर रस सौं छग्यौ ॥
छं० ॥ ४३ ॥ रु० ॥ १६ ॥
पृथ्वीराज का महल में जाना और अरिसिंहादि की
लड़ाई का होना ॥
दूहा ॥ उठि कुंवर प्रथिराज लषि, गयौ मचल्ल निज मद्दि ।
दै किवाट मिलि थाट जुध, मच्यौ कलच सभ मद्दि ॥ छं०४४॥रु०॥२० ॥
गाहा ॥ कढ्ढी असि अरसिंघं । नरसिंघस्य झारयं सीसं ।
दई गुरज गुर अंडुं । वड गुज्जरं रंभ कंदाइं ॥ छं० ॥ ४५ ॥ रु० ॥ २१ ॥
चालि ॥ दिषि चावंडं ॥ षिजि चावंडं ॥ लोच चावंडं ॥ मन चावंडं ॥ चावंडं ॥
छं० ॥ ४६ ॥ रु० ॥ २२ ॥
कवित्त ॥ वढिय जंग उत्तंग । दंग जनु दाव जुजग्गिय ॥
परिय रौर राव रन । जुरिय जुध कन्ह अभिग्गिय ॥
मारि ढारि अरिसीच । चक्यो गोयंद मेच गृत्ति ॥
कढ्ढि छद्ध्य जम दद्व । दई चहुआन कूप घत ॥
करि रोस कन्ह कर चंपि सिर । दो छद्ध्यन भेजी उठिय ॥
निकसीय प्रांन गोविंद उर । जोति भेदि जोतिह मिलिय ॥
छं० ॥ ४७ ॥ रु० ॥ २३ ॥
१६ पाठान्तर-वांम । एक । और । ढारीय । आंनि । चहुआन । अगें । पक्कै । मत्त । सो ।
२० पाठान्तर-उठि । लिपि । मधि । सम । संधि ॥
२१ पाठान्तर-गाथा । वरसिंघं । शीसं । बडगुजरं । कंदाई ॥
२२ पाठान्तर-वचनीका । छंद । चामुंडं । पिंजे चांमुडं । चामुंडं ॥
२३ पाठान्तर-उतंग । यु । लगिय । परीय । रौरि । अभिगिय । अचागीय । हृद्य । दढ ।
कुषि । घति । हद्यन । निहस्सि ॥
५
२८८ . पृथ्वीराजरासो । [ पांचवां समयं ८
हरसिंह का युद्ध ॥
कवित्त ॥ हकि कह्वर हरसिंह । बध्य नरसिंह विज्झिगय ॥
लथ्य बध्य लोहांन । उपरं तरं तर परि दग्गिगय ॥
नंधि अद्ध नरसिंह । भयौ हरसिंह उद्ध वरं ॥
दौरि राव चामंड । दई तरवारि पिठ्ठ पर ॥
कर फौरि मुक्कि डर अद्धधर । भयौ विबंधव बंटि घर ॥
हरिसिंह बस्यौ हरिसिंघ पुर । रवि मंडल बज भेदि करि ॥
कं० ॥ ४८ ॥ रु० ॥ २४ ॥
दूहा ॥ भेद्यौ रवि मंडल सु पहु । करि प्राक्रमम प्रमान ॥
धनि चालुक पित मात धनि । निकासि न षोयौ मान ॥
कं० ॥ ४९ ॥ रु० ॥ २५ ॥
नरसिंह का युद्ध ॥
कवित्त ॥ करि उप्परि तें दूरि । तरच्च नरसिंघ सु उट्टिय ॥
तवै भरकि अगवान । आइ सिर सार सु बुट्टिय ॥
जब नरसिंघ नरंन । करन कट्ठी कहारिय ॥
धखि धथ्य गत्त बध्य । तेन उदरं विच फारिय ॥
पर भूमि सूर भगवान भिरि । चल्यौ प्रांन जरद्ध अय ॥
है है सु सबद मृत लोक भय । जै जै सुर सुर लोकजय ॥
कं० ॥ ५० ॥ रु० ॥ २६ ॥
कैमास का युद्ध ॥
मोकंच गढि गोकंच सुजान । मद मोकन कुंदिय ॥
तुहिय वीज अकास । सीस कैमास अछुहिय ॥
२४ पाठान्तर-बथ । लथ । बथ । लोहांन । उप्पर । धर लग्गिय । चामुंड । फौरि ।
मुकि । अध । बिबंधव ॥
२५ पाठान्तर-प्रमांन । मांन ॥
२६ पाठान्तर-उठिय । तब । भगवांन । कंटारिय । हथ । बथ । विचि । फारी ।
भगवांन । सुसद । म्रत ॥
पाँचवां समय ६ ] पृथ्वीराजरासो । २८६
तुरस फहि कटि गुरज । सुकुट करि रेष रिपेसर ॥
असि कट्टत वर रोस । उदर वर बचिय सु ओझर ॥
विन पत्त मत्त जनु डंड डक । रंभ पंभ कर कटीयध्वज ॥
तिच्चि काज साज साकत्त सुरर । सु गुरुर पठाइय गुहरध्वज ॥
छं० ॥ ५१ ॥ रू० ॥ २७ ॥
माधव खवास का युद्ध ॥
कवित्त ॥ काम धाम रिम राच । स्याम जिम धाम पिथ्यपति ॥
पत्त लत्त दिय रोस । फद्दि किप्पाट थाट भजि ॥
धसिय मध्य माधव षवास । आय पत्तौ तहां आरौ ॥
लगिग वथ्थ विन नत्थ । संड मल्ल मच्चि अपारौ ॥
जम दट्ट कट्ठि चालुक चँपि । दिच्छ पाँनि पावार उर ॥
मंडलु दिनेस में भेद करि । सुपाट परट्टिय ब्रह्म पुर ॥
॰ छं० ॥ ५२ ॥ रू० २८ ॥
कन्ह का युद्ध ॥
कवित्त ॥ परि भूमि पावार । उररि भंजन किवार दुव ॥
तव लगि कन्ह तमंकि । आइ पहुंच्यौ अंतकलुच्च ॥
मुक्कि रोस असि तमसि । घाइ सिर जाइ रह्यौ उत ॥
मनहुं सत्ति वल्ल दैन । अंग जनु हन्यौ अजा सुत ॥
तिन हनत सिंभु धुन हनिय सिर । राज गेह मधि समर हुच्च ॥
हल चलकि मच्चि कोलाहलह । हाय हाय दरबार हुच्च ॥
छं० ॥ ५३ ॥ रू० ॥ २९ ॥
२७ पाठान्तर—सुजानि ! वीन । आकास । शीस । रिषीसर । औझर । उझर । कटीय ।
स्वन । तिहिं । तक्के सुरर ॥
२८ पाठान्तर—कांम । धांम । स्यांम । घांम । प्रथ्यपति । पत । लत । पट्टि । क्लिपाट ।
मधि । लगि । बथ । नथ । मच्चि । जमदठ । चालुक । चंपि । दिठ । गै । परठिय ॥
२९ पाठान्तर—तमकि । हुअ्र । मुकि । शिर । मनहुं । शक्ति । देन । हलहलिकि । मचि ।
हाइहाइ ॥
२६० पृथ्वीराजरासो । [पांचवां समय १०
चालुकों के मारे जाने से दरबार में कोलाहल होना ॥
दूहा ॥ कोलाहल दरबार भौ । सुनि चालुक मत सध्य ॥
धसिय पौरि गज मत्त सम । पुच्छत पुच्छत कथ्य ॥ छंदं० ॥ ५४ ॥ रु० ॥ ३० ॥
झिंक रुधिर उठ्ठत गिरिय । परिय सच परिधारि ॥
दिषि चालुक भत तेह टग । कुलच्च बाजि जनु डारि ॥ छं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३१ ॥
कवित्त ॥ संकर सिंघ कि कुट्टि । कुट्टि इन्द्रच्च कि गरुअ गज ॥
कि महिष कुट्टि मय मत्त । भरिय दीयौ कि दुट्ठ कजि ॥
भौ कि हांस रस रोस । मद्धि रावन्त विरच्चिय ॥
कोलाहल बल कूक । मज्झ रावर छल मचिय ॥
चालुक्क षवास ताकथ्य कथि । कोलाहल इन जानि घर ॥
कुंडिय सयल बोच्चिय नृपति । हनिग कन्ह सारंगधर ॥
छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३२ ॥
दूहा ॥ अर प्रताप दरबार के । ढार घरे मय मत्त ॥
सुनत बत्त इह कन्हि परे । मनु निस तुहि नछत्त ॥ छं० ॥ ५७ ॥ रु० ॥ ३३ ॥
कवित्त ॥ निसि षह तुहि नछिच । रोस महिषा कुटि वातन ॥
परि कि दीप पातंग । सिंघ जनु कुट्टि क्षुधा तन ॥
यों तुहैं भर भरन । अररि भैभीर सुभग्गिय ॥
मनहुँ परा पति चुनत । परिय सिंचान अचिंतिय ॥
परि रौर पौरि दीनी दरकि । धरकि कूच कन्ह पौरि बिचि ॥
झेलत सब संत कलहंत जनु । पारथ सम भारत्थ मचि ॥
छं० ॥ ५८ ॥ रु० ॥ ३४ ॥
दूहा ॥ माया मोह विरत्त मन । तन तिनुका सम डारि ॥
३० पाठान्तर-सथ । मत । पुछत । कथ ॥
३१ पाठान्तर-बाजं । यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
३२ पाठान्तर-भरीय । दीपि । मधि । रावत । विराचिय । मन्न । मचिय । कथ । जांन ॥
३३ पाठान्तर-मत । बत । मनौं । नछिच ॥
३४ पाठान्तर-नक्छित्र । परियं । संघ । मनौं । मनहुं । अचितीय । दीनीय । बच । पेलंत । स । भारंथ ॥
३५ पाठान्तर-विरतं । पिय ॥ यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
२६२ पृथ्वीराजरासो । [ पांचवां समय १२ ,
दूहा ॥ पच भरैं जुग्गिनि रुधिर । ग्रिधियं मंस डकारि ॥
नचौ ईस उमया सहित । रुंड माल गल धारि ॥ कूं० ॥ ६६ ॥ रु० ॥ ३९ ॥
कंद पद्धरी ॥ दरवार ताल रुधि भरित वारि । द्रुक हथ्थ·रत चढ़ी किनारि ॥
तिन मधि मग्न तरु जिम मजंत । धर धारि मारि जे धुकत मंत ॥
॥ कूं० ॥ ६७ ॥ रु० ॥ ४० ॥
दूहा ॥ * खेल मच्यौ दरबार सन्नि । मत्त गवार बसंत ॥
सिर भ्रुक बिनु धावइ करै । सुभट सुअंगध कंत ॥
॥ कूं० ॥ ६८ ॥ रु० ॥ ४१ ॥
कंद लघुनाराच ॥ धुंकंत धार धार सैं । बकंत मार मार सैं ॥
झुकंत झार झार सैं । तकंत सार तार सैं ॥ ६९ ॥
डकंत भूत डाक सैं । कसंत बीर बाक सैं ॥
परंत छीन पाइट्टै । झरंत हथ्य घाइट्टै ॥ ७० ॥
खरंत संत मंत सैं । घुरंत घाइ घंत सैं ॥
सुभग्ग अंगुली थिरैं । फबी सुकैर विध्युरैं ॥ ७१ ॥
नचंत घाइ नारदं । ठरै सुधाइ ठारदं ॥
अभक्कि रुद्धि अम्भसे । बबक्कि रह बह से ॥ ७२ ॥
चबक्कि ढाक चक्कए । चवक्कि कुंभ चक्कए ॥
म्रोरित्त मुच्छ मुच्छए । चढ़ी सु आनि चच्छए ॥ ७३ ॥
चलंत हाथ चंचलं । परंत बांन पंचलं ॥
भिदंत भांन मंडलं । भयौ सु नष्ट कुंडलैं ॥ ७४ ॥
बहंत मोष बहए । छराकि लग्गि छहए ॥
कटंत सीस कहए । रिनंक षत्त फहए ॥ ७५ ॥
फटंत फंफ फेफरं । गटंत पेषि केफरं ॥
बजंत घाव घुंमरे । मनौं परेव घुंमरे ॥ ७६ ॥
३९ पाठान्तर-ग्रिधय । ग्रिधिय ॥
४० पाठान्तर-हथ्थ । रत । चढ़ी । मधि । ते ॥
४१ पाठान्तर-मत्त । गवांर । बन्नु । धावहं ॥
* यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
पांचवां समय १३] पृथ्वीराजरासो । २६३
कुट्टैं सिरं करायरं । कपास ज्यौँ पिंजारयं ॥
फुटंत घौ सुषोपरी । कि जोग पच टोपरी ॥ ७७ ॥:
कटंत जंघ कुंभए । मनौ सुरंभ गिंभए ॥
- परीय संझ सामयं । चलुक्क रक्ख नामयं ॥ छं० ॥ ७८ ॥ रू० ॥ ४२ ॥
सांझ हो गई परन्तु लड़ाई न रुकी ।
कवित्त ॥ परिय संझ जग मंझ । टरिय कंकन रंकन धन ॥
भरिय पच जुगिनीय । करिय सिव माल सीस घन ॥
मुरिय न श्रित चालुक्क । धरिय रसरोस कन्ह हिय ॥
पैरि चलिय दरबार । सोच गज घटि उपटिय ॥
मय मत्त मार मनौ उररि । झररि झर्रि भगिय अनिय ॥
द्वै घरिय लोह बुट्ठौ लचरि । पेख कयौ किगवारनिय ॥
॥ छं० ॥ ७६ ॥ रु० ॥ ४३ ॥
दूहा ॥ कान्ह जाइ संमुह परत । कला एक मचि रारि ॥
सत सारघ दूनौ कटै । भजै अबर तजि ढार ॥ छं० ॥ ८० ॥ रु० ॥ ४४ ॥
कान्ह चौहान का युद्ध जीतना ।
करपा ॥ झरै (सार) सिर मार विकरार रक्तन भरत ।
परत धरनीथ द्वैरै जरकि जूपी ॥
चक्क चहुवांन चालुक्क भृत उपर चर ।
कोपियं कन्द मनौं काल रूपी ॥ छं० ॥ ८१ ॥
रुंड भकरुंड किय तुंड मुंडन रुइत ।
वाचि सिर सार मनौँ मेच बुट्ठै ॥
४२ पाठान्तर-धकंत । सौं । हकंत । हूँ । हथ । घाय । पिरें । पीरें । विस्तरै । घाय ।
भभकि । रुंधि । भट्ट । भट्ठ । वर्षकि । रद । बद । हवकि । हक्कए । चवकि । चक्कए । मोरित्त ।
म्रोरिर । मुंक्क । मुरु । मुक्कए । श्रॉनि । चक्रए । नट । रिनेंकि । पत । मनौ । कुटं । शिरं । ज्यौं ।
यों । मनौँ । * यह पाद सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
४३ पाठान्तर-शिव । चालुक । पैट । चलीय । घट । उपटिय । भाठीय ॥
४४ पाठान्तर-जाय । समुह । दूनौं । कटे । भजि ॥
४५ पाठान्तर- अधिक पाठ है । धरनि । मनौ । जम । दारि । नृघात । † यह रूपक
सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
२६४ पृथ्वीराजरासो। [ पांचवां समय १४
कूछ करि जूछ संम्रुच्छ को कोक धर ।
रोस रिम राच जेम जीव कुद्है ॥ कुं० ॥ ८२ ॥
पांनि करि पांनि अरि पांनि करंनीय छक ।
सीस अरी पारि सब षेत सींच्यौ ॥
भ्रात सोमेस नृपघात भंजन भरम ।
षेत भयकार षय काल षीज्यौ ॥ कुं० ॥ ८३ ॥ रु० ॥ ४५ ॥
श्लोक ॥ हनिनं निनायकं सेना, कथितं न च पूर्वयम् ।
अयुद्धं चक्रतं एषां, विना स्वामि रणे युधम् ॥ कुं० ॥ ८४ ॥ रु० ॥ ४६ ॥
प्रतापसिंह आदि के मारे जाने का समाचार
सुनकर पृथ्वीराज का अप्रसन्न होना ॥
दूहा ॥ नीठ बिसासत अप्प भर, गह्यौ कन्ह चहुआन ।
गए ग्रेह लै सकल मिलि, प्रथीराज अकुलान ॥ कुं०॥ ८५ ॥ रु० ॥ ४७॥
पारि श्रित्त चालुक्क भर, मध अजमेर प्रमान ।
सात भ्रात भीमच्च छते, रन जीत्यौ भर कांन ॥ कुं० ॥ ८६ ॥ *रु० ॥ ४८ ॥
पृथ्वीराज की अप्रसन्नता सुनकर कान्ह चौहान का घर बैठ
रहना, तीन दिन तक अजमेर में हरताल पड़ना ॥
बत्त सुनी तब कन्ह नें, षिज्यौ कुँअर प्रथिराज ।
बैठि रहें तब निज सुघर, अंदरवार समाज ॥ कुं० ॥ ८७ ॥ †रु० ॥ ४८ ॥
तीन दिवस अजमेर में । परी इंद हटनार ॥
हूछ कोछ बज्यौ विषम । लग्यौ सु भूत भुआर ॥ कुं० ॥ ८८ ॥ रु० ५० ॥
मधि बजार चलि रुधिर नदि । रुस्त तुंड घन मुंड ॥
बर्कि कान्ह चहुआन करि । तिल तिल सम तन तुंड ॥
॥ कुं० ॥ ८९ ॥ रु० ॥ ५१ ॥
४६ पाठान्तर-हननं । यं । असुहुं । स्वामी । रिने । जुधं ॥
४७ पाठान्तर-अप । चहुंआन । अकुलांन ॥
४८ पाठान्तर-मध्य । प्रमान । * यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥
४६ पाठान्तर-बत । षिजयं । कुंअरं । प्रथीराज । रहै । † यह रूपक कौलफील्ड वाली पुस्तक में नहीं है ॥
५० पाठान्तर-हट । हटतार । भुक्तार ॥ ५१ पाठान्तर-चहुवांन । तिन ॥
पांचवां समय १५ ] . पृथ्वीराजरासो : २६५
सात दिन तक कान्हके न आने पर पृथ्वीराज का उनके घर
मनाने को जाना और कहना कि संसार में यह बुराई
हुई कि घर बुलाकर चालुक्यों को मार डाला ॥
कवित्त ॥ सात दिवस जब गए । कन्ह दरबार न आए ॥
तब प्रथिराज कुँआर । अप्प मनए गृह जाण ॥
तुम ऐसी क्यौं करौ । अप्प सिर चढिय सुकाई ॥
कहिहैं सब चहुआन । छने चालुक्क सुराई ॥
आणि विषैं अप्पन सुघर । सो रावर ऐसी करिय ॥
इक दोस अप्प लग्ग्यौ खरौ । बत्त वित्तरीय जग बुरिय ॥
॥ छं० ॥ ८० ॥ रु० ॥ ५२ ॥
कान्ह का कहना कि मेरे सामने दूसरा कौन सभा में बैठकर
मोछ पर ताव रख सकता है ॥
दूहा ॥ कही कन्ह चहुआन तब । सो बैठें कोइ आनि ॥
सभा मद्धि संभरि अवर । मुच्छ धरै क्यौं पानि ॥ छं० ॥ ८१ ॥ रु० ॥ ५३ ॥
पृथ्वीराज का कहना कि तो आप आंख में पट्टी
बांधे रहा कीजिए ॥
करी अरज प्रथिराज वर । जो मानौ इक कन्ह ॥
सभा बुराई जौ मिटै । चष बँधि पह रतन ॥ छं० ॥ ८२ ॥ रु० ॥ ५४ ॥*
पृथ्वीराज का जड़ाऊ पट्टी बनवाकर अपने हाथ से कान्ह
के आंख में बांध देना ।
तब प्रथिराज विचार करि । चष आछौ हो पह ॥
बहुरि कोइ भर भोरछी । धरत परै इक बह ॥ छं० ॥ ८३ ॥ रु० ५५ ॥
५२ पाठान्तर-कुंआर । अप । शिर । काइय । कहिहैं । चालुक । राइय । विषै । करौय । लग्यौ । विस्तारिय ॥
५३ पाठान्तर-कोई । आंनि । मधि । संभरी । मुछ । पांनि ॥
५४ पाठान्तर-पृथ्वीराज । जौँ । माँनौँ । जौँ । बधि । * संवत् १६४० की प्रति में यह नहीं है ॥
५५ पाठान्तर-पृथ्वीराज । घंट । बट ॥
६ !