पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपांचवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो । २८७
कवित्त ॥ भई कूह परताप । पन्यौ दिष्यौ अरसी वर ।
उथ्यौ कह्नि तरवारि । दई भुज कन्ह बाम कर ॥
इक्क सीच वर ओर । गरै पप्पर गचि डारी ।
एक अगनिता मद्दि । आनि कूंषी घृत धारी ॥
चहुआन कन्ह अग्गै सुवर । ता पच्छै लोचनदग्यौ ।
जाजुलित सत्त वर वीर मंत । वीर वीर रस सौं छग्यौ ॥
छं० ॥ ४३ ॥ रु० ॥ १६ ॥
पृथ्वीराज का महल में जाना और अरिसिंहादि की
लड़ाई का होना ॥
दूहा ॥ उठि कुंवर प्रथिराज लषि, गयौ मचल्ल निज मद्दि ।
दै किवाट मिलि थाट जुध, मच्यौ कलच सभ मद्दि ॥ छं०४४॥रु०॥२० ॥
गाहा ॥ कढ्ढी असि अरसिंघं । नरसिंघस्य झारयं सीसं ।
दई गुरज गुर अंडुं । वड गुज्जरं रंभ कंदाइं ॥ छं० ॥ ४५ ॥ रु० ॥ २१ ॥
चालि ॥ दिषि चावंडं ॥ षिजि चावंडं ॥ लोच चावंडं ॥ मन चावंडं ॥ चावंडं ॥
छं० ॥ ४६ ॥ रु० ॥ २२ ॥
कवित्त ॥ वढिय जंग उत्तंग । दंग जनु दाव जुजग्गिय ॥
परिय रौर राव रन । जुरिय जुध कन्ह अभिग्गिय ॥
मारि ढारि अरिसीच । चक्यो गोयंद मेच गृत्ति ॥
कढ्ढि छद्ध्य जम दद्व । दई चहुआन कूप घत ॥
करि रोस कन्ह कर चंपि सिर । दो छद्ध्यन भेजी उठिय ॥
निकसीय प्रांन गोविंद उर । जोति भेदि जोतिह मिलिय ॥
छं० ॥ ४७ ॥ रु० ॥ २३ ॥
१६ पाठान्तर-वांम । एक । और । ढारीय । आंनि । चहुआन । अगें । पक्कै । मत्त । सो ।
२० पाठान्तर-उठि । लिपि । मधि । सम । संधि ॥
२१ पाठान्तर-गाथा । वरसिंघं । शीसं । बडगुजरं । कंदाई ॥
२२ पाठान्तर-वचनीका । छंद । चामुंडं । पिंजे चांमुडं । चामुंडं ॥
२३ पाठान्तर-उतंग । यु । लगिय । परीय । रौरि । अभिगिय । अचागीय । हृद्य । दढ ।
कुषि । घति । हद्यन । निहस्सि ॥
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