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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 470 में से

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पृष्ठ 291

२८० पृथ्वीराजरासो । [ चौथा समय ४
ग्रहे सीस ईसं । करा रंत दीसं ॥
जुत्तं मरहं । मचे एम कहं ॥ २९ ॥
खरै यों लुहानं । अभंगं जुवानं ॥
जसक्वंत जोरं । चहक्कंकेति घोरं ॥ ३० ॥
गसेते गसानं । गए अग्ग थानं ॥ छं० ॥ ३१ रू० ॥ १६ ॥
दूहा ॥ खेचर भूचर जलचरह, सूर गए सुर थान ।
जुद्ध जुरे जसवंतसी, रन जित्यो लोहान ॥ छं० ॥ ३२ ॥ रू० ॥ १७ ॥
लोहाना का गढ़ पर अधिकार कर लेना ॥
कवित्त ॥ सहस उभय लोहान, सुभट परि खेतह मज्जे ।
खार धार परछार, उभय गजराज विभज्जे ॥*
सय सत्तह हय खेत, नेत बद्धे रिन जित्यौ ।
षट सहस (अर)† पवंग, कवी चंदह कवि कित्यौ ॥
परि लुब्ध कोस सुर दून प्रति, धर लिन्मी गढ़ संजियौ ।
करि जेव बयठो गढ़ परि, इक्क यानि मन रंजियौ ॥
छं० ॥ ३३ ॥ रू० ॥ १८ ॥
इति श्री कविचंद विरचिते प्रथ्रिराजरासके लोहाना आज्ञा-
नबाहु समय नाम चतुर्थ प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ ४ ॥

· १६ पाठान्तर-भनां । अगि । मनां । हयं । मनो । राम । मचैं । लरैं । यौं ॥
१७ पाठान्तर-थलचरह । सुर । जसवंतसा ॥
१८ पाठान्तर-लुहान मजे । * यह पाद संवत् १८४९ की लिखित पुस्तक में नहीं है ॥
† यह अधिक पाठ है । कित्तौ । लिंची । भंजियो । बयठो । रंजियो । लोहान ॥