पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ पृथ्वीराजरासो । [ पांचवां समय २
पृथ्वीराज के कुंअरपन का तपतेज वर्णन ॥
कबित्त ॥ कुँअरप्पन प्रथिराज । तपै तेजह सु मछावर ॥
सुकल बीजु दिन द्युतें । कला दिन चढ़त कलाधर ॥
मकर आदि संक्रमन । किरन बाढै किरनाकर ॥
त्यौं सोमेस कुँआर । जोति छिन छिन अति आगर ॥
च्य उत्थिय देत संकै न मन । पख पंडन गढ़ गिरन बर ॥
चिँहु जोर जोर दसहूँ दिसा । कीरति विस्तार सचिय पर ॥ छं० ॥ २ ॥ रु०२ ॥
गुजरात के राजा भोरा भीम का तपतेज वर्णन ॥
कबित्त ॥ भोरा भीम भुजंग । तपैग़ुज्जर घर आगर ॥
है गै दल पायक़* । पग्गबल तेजह सागर ॥
काका सारँगदेव । देख जिम तास बड़ाइय ।
तासु पुत्र परताप । सिंघ सम रूप सु भाइय ॥
परतापसीह अरसीह बर । गोकुलदास गोविंद रज ।
सूरसिंघ स्याम भगवान भर। कुल अरेह सुभ नीर सज ॥ छं० ३ ॥ रु० ॥ ३ ॥
उसके काका और चचेरे भाईयों की वीरता का वर्णन ॥
दूहा ॥ जोरावर जुरि जंगमति, भरे बध्य नभ गाज ।
हुकम स्वामि छुटत सु इम, मनौं तितर पर बाजं ॥ छं० ॥ ४ रु० ॥ ४ ॥
तिन पर तुट्टै बीज जौं, जिन पर राज अरुट्ट ।
राजकाज संमुख भिरन, दई न कबहूँ पुट्ठ ॥ छं ॥ ५ ॥ रुं० ॥ ५ ॥
‡ यहां शुक और शुकी से कवि का अभिप्राय चंद और उसकी स्त्री से है । क्योकि यह सब
महाकाव्य उनके ही संवाद में रचा गया है और आगे भी कई एक समयों में यही प्रयोग
आवेगा । चंद प्रायः कवि को कीर की उपमा देता है- "आस असन कवि कीर" ॥
२ पाठान्तर-कुचरपन । कुंअरप्पन । पृथीराज । * ज्यों ज्यौ अधिक पाठ है । जिम ।
बढै । कुवार । कुंमार । छिन ही छिन । हथि । गिनर । चिंहु । चिहुं । दिशा विसतरि ॥
३ पाठान्तर-गुज़र । हय । गय । पाइक । * प्रचंड अधिक पाठ । पायक । सु । सारंग-
देव । बडाई । तास । भाई । सिंह । सिंघ । श्याम । भगवान । सजि ॥
४ पाठान्तर-जग । बध । गाजि । स्वांमि । छुटतं । मनो । तीतर ॥
५ पाठान्तर-ज्यों । असंठं । पिट्ठं ॥