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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 294

पांचवां समय ३] पृथ्वीराजरासो । २८३
गाथा ॥ मारे रान सुरानं । खानानुबले भयं भान्जानं ॥
जिन संजे जैमालं । वज्ज्यौ आतरासि पंचं ॥ छं० ॥ ६ ॥ रु० ॥ ६ ॥
पाट बैठने पर प्रतापसी को गर्व होना ॥
दूहा ॥ सारँग दे सुरलोक गत, भौ प्रतापसी पाट ।
सात सात सेवा करैं, तपौ तेज थिर घाट ॥ छं० ॥ ७ ॥ रू० ॥ ७ ॥
घडउअल दन्तवल अनैंत, बहुत अव्व वर अप्प ।
सत्तरि सहस घर गुज्जरनि, मधि ओपत जिम कप्प ॥ छं० ॥ ८ ॥ रु० ॥ ८ ॥
स्वामि अक्स रत्ते सुसन, जे ठेलैं गजठद्द ।
ढरै परब्बत सिपर डर, करैं सचु दछवह ॥ छं० ॥ ९ ॥ रु० ॥ ९ ॥
प्रतापसी दो देश उजाड़ने की पुकार भीजंग के पास होना ॥
दूहा ॥ भोरा भीम भुवाल के, कोई एक नैवास ।
तिन उज्जारत देस दौं, परि पुकार नृप पास ॥ छं० ॥ १० ॥ रू० ॥ १० ॥
गाथा ॥ प्रात समै पूकारं, आई नरिंद भीम दरबारं ।
धारि नीसान सुघावं, चढि राजं साजि आतुरयं ॥ छं० ॥ ११ ॥ रु० ॥ ११ ॥
दूहा ॥ चालुकह गुज्जर धरा, ईस नेति किय भीम ।
जो उथ्यै तिहुं पुर सुबरं, को चंपै अरि सीम ॥ छं० ॥ १२ ॥ रु० ॥ १२ ॥
भोरा भीम की उनसे लड़ाई ॥
छंद पद्धती ॥ चढि चलन राज आवाज कीन । नीसान नह वज्जे बजीन ॥
चिहु ओर अरनि छूटे तुरंग । सजि सिलह भाँति नाना अभंग ॥ छं० ॥ १३ ॥
६ पाठान्तर-रांन । भंजे ॥०
७ पाठान्तर-सारंगदे । भय । करै ॥
८ पाठान्तर- यव्व । अप । सत्तरि । गुजरति । उपति ॥
९ पाठान्तर-स्वांमि । रते । धुंम्म । ठट । ढरत । परबत । शियर । करता । शत्रु । वट ॥
१० पाठान्तर-भुवाल । सं० १६४७ की में "कोई एक" के स्थान में "घर जादव" पाठ है ।
उजारत । देशकौं ॥
११ पाठान्तर-पुकारं । आई । निसानं । निसानं । धांघ । साजि ॥
१२ पाठान्तर-किये ॥ यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक नहीं है किन्तु उसकी इतर की
लिखित पुस्तकों में है ॥
१३ पाठान्तर-नीसांन । बजे । चिहुं । चिंहु । डर । छुट्टेति तुंग । तितुंग । भांति ॥ १३ ॥