प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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स्थित थे। रावण अकेली सीता का अपहरण कर लेता है। सीता की करुण
पुकार सुन कर गिद्धराज जटायु वहां उपस्थित होता है।
छठा अंक-रावण और जटायु के मध्य भयंकर युद्ध होता है। अन्त
मे जटायु को समाप्त कर रावण सीता को लंका ले जाने मे सफल होता है।
जनस्थान के दो तपस्वी इसकी सूचना राम को देते हैं। राम से मिलने सुमन्त्र
वहा आते है, किन्तु उन्हे वहा न पाकर भरत को सीताहरण के विषय मे
बताते है और कहते है कि वे आजकल किष्किन्धा में सुग्रीव के समीप है।
भरत जब कैकेयी को क्रुद्ध होकर यह समाचार देता है, तो कैकेयी राजा
दशरथ को अन्ध मुनि पुत्र को मारने से दिए गए शाप के बारे मे परिचित
कराती है। इसे सुनकर भरत अपनी जननी कैकेयी को निर्दोष मानता है
और अपनी सेना लेकर लंका के राजा रावण के विरुद्ध अभियान की घोषणा
करता है।
सातवां अंक--रावण को मार कर राम आदि जनस्थान पहुंचते
है। यहा राम और सीता इस स्थान की अपनी पूर्व की अनुभूतियों को कहते
है। इसी बीच वहा भरत अपने समुदाय के साथ आ जाते हैं और राम को
अयोध्या का राज्य संभला दिया जाता है। कैकेयी भी इस अवसर पर अत्यन्त
प्रसन्न है, जो यह कामना करती है कि ऐसा ही अभिषेक अयोध्या मे भी
सम्पन्न होना चाहिए। राम इसकी अनुमति प्रदान करते है। विभीषण, सुग्रीव,
हनुमान आदि भी राम को बधाई देते है। अन्त मे ये सभी लोग पुष्पक
विमान मे बैठ कर अयोध्या प्रस्थान करते है। इस प्रकार इस आनन्दपूर्ण
समारोह के बीच नाटक की समाप्ति होती है।
भास का कथावस्तु में परिवर्तन
नाटककार भास ने रामायण से ली गई इस कथावस्तु को नाटकीय
बनाने के लिए अपने प्रतिमा नाटक मे पर्याप्त परिवर्तन किया है, जो इस
प्रकार है-
(1) इस नाटक के प्रथम अंक मे प्राप्त होने वाली "वल्कल घटना"
का रामायण मे कही संकेत नहीं है। भास ने इससे राम और सीता के
मधुर पारिवारिक जीवन का एक दृश्य उपस्थित किया है।
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(2) रामायण के अनुसार जब राजा दशरथ ने राम का राज्याभिषेक
करना चाहा, उस समय भरत और शत्रुघ्न दोनो अयोध्या से अनुपस्थित
थे। किन्तु भास के प्रतिमा नाटक के अनुसार उस समय शत्रुघ्न अयोध्या मे
ही थे। ननिहाल में केवल भरत को ही बताया गया है।
(3) दूसरे अंक में मृत्यु शय्या पर पड़े राजा दशरथ के सामने उनके
स्वर्ग से आए पूर्वजो का जो दृश्य बताया गया है, वह भी भास की अपनी
मौलिक कल्पना है। रामायण मे ऐसा वर्णन नही मिलता है।
(4) तीसरे अंक की "प्रतिमा गृह" की कल्पना का भी रामायण में
अभाव है। भास की इसी नाटकीय कल्पना के आधार पर 'प्रतिमा' नाटक
का नामकरण किया गया है। इसमे नाटककार ने कुशलतापूर्वक भरत को
उसकी अनुपस्थिति मे होने वाली घटनाओं से अवगत कराया है।
(5) सीताहरण की घटना भी अत्यन्त कौतूहल पूर्ण है। दशरथ के
श्राद्ध के लिए राम का चिन्तित होना, रावण का परिव्राजक के रूप मे राम
के सामने उपस्थित होना तथा काञ्चनपार्श्व मृग आदि की कल्पनाएँ भास
की निजी है।
(6) इस अवसर पर लक्ष्मण का किसी कुलपति के स्वागत के लिए
बाहर जाने का जो उल्लेख प्राप्त होता है, वह भी रामायण में नहीं है।
(7) छठे अंक में सुमन्त्र का राम के दर्शन हेतु जनस्थान मे जाना
और उनके माध्यम से भरत को सीताहरण की सूचना मिलना भी भास की
सृष्टि है। रामायण मे ऐसा नही मिलता।
(8) कैकेयी की निर्दोषिता प्रकट करने के लिए श्रवण वध एवं उसके
पिता द्वारा दिए गए शाप का उपयोग जिस रूप मे किया गया है, वह भास
की अपनी विशेषता है।
(9) रामायण मे इस बात का संकेत नही है कि कैकेयी राम को
केवल 14 दिन के लिए ही वन मे भेजना चाहती थी और घबराहट के
कारण उसके मुख से "चौदह वर्ष" का कथन निकल गया।
(10) छठे अंक के अन्त में रावण विजय के लिए भरत द्वारा
अपनी सेना को तैयार करने का जो वर्णन किया गया है, यह भी भास की
अपनी ही कल्पना है।
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12- विवाह शुल्क - भरत लक्ष्मण से बड़े छोटे दिखायें
(11) सातवें अंक में जनस्थान में ही राम के राज्याभिषेक का जो
अंकन किया गया है, उसका रामायण में सर्वथा अभाव है। इस प्रकार
भास ने अपने प्रतिमा नाटक में ऐसे कई विवरण प्रस्तुत किए हैं, जो
वाल्मीकि रामायण में नहीं हैं।
चरित्र-चित्रण
(I) राम निष्काम
(1) भास विरचित प्रतिमा नाटक के राम धीरोदात्त नायक हैं। वे
अनासक्त होकर अपने कर्त्तव्य का पालन करने वाले हैं। अपने जीवन के
कठोर कर्मक्षेत्र में वे निष्काम भाव से अवतरित होते हैं। यहाँ तक कि वे
अपने अतुलनीय पराक्रम से प्राप्त लंका के साम्राज्य को भी विभीषण को
दे देते हैं।
(2) राम के चरित्र में प्रारम्भ से ही निर्लोभिता की भावना दृष्टि-
गत होती है। कैकेयी से उन्हें वनवास मिला, पर फिर भी उनके हृदय में
उसके प्रति आक्रोश की भावना नहीं है। अपना अभिषेक छोड़ कर वन
जाते समय वे तनिक भी विचलित नहीं होते। लोग उनके इस धैर्य पर
आश्चर्य प्रकट करते हैं, किन्तु वे इसे सामान्य बात समझते हैं।
(3) राम का हृदय सहिष्णु तथा सुकुमार भावों से ओतप्रोत है।
अपने वनवास के समाचारों से वे दुःखी होने के स्थान पर प्रसन्न ही होते हैं
और इस कार्य के लाभ गिनाते हुए कहते हैं कि "राजा दशरथ का वन जाना
रुका, मुझ पर पिता का वैसा ही वात्सल्य बना रहा, प्रजा को भी नये
राजा के अच्छे-बुरे झंझट से मुक्ति मिली एवं मेरे अन्य भाई भी ऐश्वर्य
भोग से वंचित न रहे।"
(4) प्रतिमा के राम का विनत भाव भी दर्शनीय है। वे अपनी
सौतेली जननी की आज्ञा को सहज रूप से शिरोधार्य कर लेते हैं। उन्हें
कैकेयी के प्रति थोड़ी सी भी अनास्था नहीं है। यदि कोई कैकेयी के विरुद्ध
कुछ भी कहता है, तो राम उस का विरोध तथा कैकेयी के पक्ष का समर्थन
करते हैं।
(5) सीताहरण के अवसर पर रामायण के राम सीता की स्पृहा-
विनोदन के लिए माया मृग मारीच के पीछे जाते हैं। परन्तु प्रतिमा के राम
श्राद्ध
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पितृभक्त पुत्र के रूप में दशरथ के श्राद्ध हेतु कांचनपाश्र्वं मृग को लाने के
लिए प्रस्थान करते हैं ?
(2) सीता
(1) प्रतिमा की सीता का चरित्र भी अत्यन्त सुकुमार एवं उदात्त
है। प्रथम अंक में जब वह अवदातिका और चेटी के साथ वार्तालाप करती
हुई दिखाई देती है, तो वल्कल वस्त्र को देखकर सीता के हृदय मे स्वाभा-
विक रूप मे उसे पहनने की उत्कण्ठा जागृत होती है। यहाँ उसका भोलापन
अत्यन्त सहज तथा आकर्षक है ।
(2) (सीता भी राम के समान ही उदार चरित्र वाली हैं)। न तो
उसे उस समय अत्यधिक प्रसन्नता होती है, जब उसे राम के अभिषेक की
सूचना मिलती है, और न उसे अत्यन्त दुःख होता है, जब उसे राम के
वनवास का पता चलता है। राजकुल के इस उतार-चढाव से उसे कोई
लेना-देना नही है- "बहुवृत्तान्तानि राजकुलानि नाम ।'
(3) कैकेयी के आदेश को वह भी धीरता से सुनती है। जब
लक्ष्मण आवेश में आकर स्वयं युद्ध करने हेतु धनुष धारण करने की बात
कहता है, तो सीता राम से कहती है कि "देखो, लक्ष्मण ने रोने के अवसर
पर धनुष उठाया है।" इससे पता चलता है कि सीता के हृदय में दशरथ
के प्रति भी अपार सम्मान था ।
(4) (सीता का भरत के प्रति भी अपार वात्सल्य है)। जब भरत
ननिहाल से लौटकर वन में गए राम को वापस अयोध्या लाने जाता है और
राम से अनुनय-विनय करता है, तो सीता के इस वाक्य मे, "आर्यपुत्र,
प्रतिकरुण मन्त्रयते भरतः" सब कुछ प्रकट हो जाता है। उसकी ममता
भरत को कुछ समय और अपने पास रखने को प्रेरित करती है ।
(5) वनवास के जीवन में भी सीता अपने सहज कार्यों को सम्पन्न
करती है। तपोवन के पादपो को पुत्रवत् अपना स्नेह प्रदान कर पालती है।
राम का संकेत पाकर परिव्राजक के रूप में आए रावण अतिथि का सत्कार
करती है तथा उसके द्वारा अपहरण करने पर राम और लक्ष्मण को अपनी
रक्षा हेतु पुकारती है ।
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(३) भरत [हस्तलिखित: निर्लोभी]
(१) महाकवि भास ने भरत का एक आकर्षक चरित्र उपस्थित
किया है, जो पश्चात्ताप के दुःख की आँच से निखरा है। उसका व्यक्तित्व
एक प्रबल सङ्कल्प शक्ति पर आधारित है। परिस्थितियों के कारण भरत के
जीवन मे इतने उतार-चढ़ाव आते है कि वह बहता जाता है।
(२) अपने मन मे मधुर कल्पनाएँ संजोए हुए भरत ननिहाल से
लौटता है, किन्तु अयोध्या के निकट प्रतिमा गृह मे विद्यमान दशरथ की
मूर्ति को देखकर उसे नियति का क्रूर अट्टहास सुनाई देता है। वह कैकयी को
बुरा-भला कह कर राम को लाने जनस्थान दौड़ता है, पर असफल रहता है।
(३) भरत का त्याग वास्तव मे स्तुत्य है, जो परिवार के विघटन को
आगे नहीं बढ़ने देता। वस्तुतः विश्व के इतिहास में ऐसा चरित्र दुर्लभ है, जो
अपने को प्राप्त वैभव को इस प्रकार ठुकरा दे। व्यवहार मे तो हम दूसरी ही
प्रकार की बातो को पाते है, जो भरत के आचरण से विलोम हैं।
(४) कैकयी के हृदय में अपने पुत्र भरत को राज्य दिलाने की विशे-
षाधिकार की भावना थी। किन्तु भरत ने उसे अपने भ्रातृत्व की वेदी पर
चढ़ा दिया। भरत का यह विचार अपने क्षणिक भावावेश पर नही, अपितु
अन्तर्व्यथा से उत्पन्न श्रद्धा व निष्ठा की ज्वाला मे तपा हुआ था। तभी तो
राम कहते हैं कि "जो यश मैंने दीर्घ काल मे पाया, भरत ने वह अति शीघ्र
संचित कर लिया।” (4.26)
(५) राम के प्रति भरत की निरतिशय भावुकता श्रद्धामूलक थी।
भरत के समर्पण, चिन्तन, साधन एवं जीवन मे भी राम ही थे। लक्ष्मण ने
इस तथ्य को अच्छी तरह समझ कर प्रकट किया है—
"अयं ते दयितो भ्राता भरतो भ्रातृवत्सलः।
संक्रान्तं यत्र ते रूपमादर्श इव तिष्ठति॥" (4.11)
(४) लक्ष्मण
(१) रामकथा के अन्तर्गत लक्ष्मण का चरित्र कठोरता एवं क्रोध से
परिपूर्ण उपलब्ध होता है। किन्तु उसे कोमल, स्वाभाविक और सरल रीति
से अभिव्यक्त कर नाटककार ने सांस्कृतिक चेतना का विकास किया है।
(२) लक्ष्मण के चरित्र में त्याग, भ्रातृप्रेम, आत्मविश्वास, वीरता
एवं उत्साह का एक समन्वित परिपाक है। उसका जीवन उच्छृंखल न।
हुए भी अत्यन्त उग्र है। उसका आचरण शिष्ट संकल्प, समुचित दृढ़ता ।
भक्तिपूर्ण शक्ति का प्रदर्शन है। फिर भी कभी-कभी वह उद्धत बन जाता
(3) जब लक्ष्मण को पता चलता है कि राम के अभिषेक में कैक
ने टाँग अड़ाई है, तो वे रमार से समो युवतियो को समाप्त कर देने :
घोषणा करता है। इस प्रकार उसमे वीरता है, किन्तु अमर्यादित । लक्ष्म
की वीरता में सन्तुलन का अभाव है। उसको इस प्रकार उद्धत बनने
लिए उसका भ्रातृप्रेम ही बाध्य करता है।
(4) लक्ष्मण का धैर्य भयकर से भयंकर विपत्ति मे भी वहिर्नि
वस्तुओं की अपेक्षा आन्तरिक निगूढ़ताओं से अधिक मिला हुआ है। तभी त
राम के समझाने पर वह कहता है कि आपने मेरा आशय नही समझा
आपको राज्य से च्युत किया गया, इस कारण मुझे दुःख नहीं है, किन्तु मे
क्रोध का कारण यह है कि आपको 14 वर्ष तक वन मे रहना पडेगा।
(5) इस प्रकार समग्र हृदय, आशा और आश्वासन, शक्ति औ
सकल्प, प्रेम और प्रार्थना से जीवन और यौवन को कर्त्तव्य की बलि वेदी
पर चढाने वाले लक्ष्मण अपने अग्रज राम का परम भक्त है।
(5) दशरथ
(1) राजा दशरथ एक स्नेही पिता है । सन्तान का स्नेह उनके
जीवन का सम्बल है । वृद्धावस्था मे उत्पन्न अपने चारो पुत्रो मे से राम उनको
प्राणों से भी अधिक प्रिय है। तभी तो राम के वन चले जाने पर दशरथ
पुत्र वियोग में व्याकुल होकर गिरते हैं, उठते है और हाय-हाय की रट लगाते
हैं ।
(2) यही पुत्र वियोग उनके सामने साक्षात् मृत्यु बन कर खडा हो
जाता है। राम के अभाव मे उनके प्राण जलहीन मछली की तरह छटपटाते
है। इसके सामने दशरथ का सासारिक स्नेह टूटता जाता है। वे अपने कष्ट से
घबरा कर कहीं भाग नहीं पाते और दुःख का यह अस्तित्व उनमें एक विचित्र
परिवर्तन ला देता है ।
(3) दशरथ की यह पीड़ा और भी अधिक घनी हो जाती है। वे
अपनी प्राणाधिक प्रिय पत्नी कैकेयी के लिए भी सोचते हैं कि यदि वह वन मे
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५ प्रतिज्ञा पालक
व्याघ्री बन जाती तो अच्छा रहता (2.8)। इस प्रकार राजा दशरथ के चरित्र
मे अपूर्व पुत्र प्रेम ही अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा है।
(4) कौसल्या के यह कहने पर कि 'मै वही अभागिन हूँ" दशरथ
तड़प उठते है। वे कहते है- "नही, नही कौसल्ये, तुम धन्य हो । तुमने तो, राम
को गर्भ मे धारण किया है। अभागा तो मैं हूँ, जो अग्नि के समान असह्य
इस दुःख को न सह सकता हूँ तथा न दूर कर सकता हूँ।"
(5) इस प्रकार दशरथ अपने पुत्र वियोग में ही प्राणों को छोड देते है ।
उनकी मृत्यु मे अन्ध मुनि पुत्र का वध भी कारण माना गया है, जो उन्हें
शाप के रूप मे प्राप्त हुआ था। एक पराक्रमी सम्राट का इस प्रकार का अन्त
भाग्य की बलवत्ता और प्राणी की असहाय स्थिति को प्रकट करता है ।
(6) कौसल्या
प्रतिमा की कौसल्या त्याग, तपस्या और अनुराग की प्रतिमूर्ति है। वह
कैकेयी अथवा भरत से रुष्ट या क्षुब्ध नही होती। वह तो भरत को देखते
ही अपने आशीष से उसे स्नान करा देती है—"जात, निस्सन्तापो भव ।"
अपनी जननी कैकेयी की अवहेलना करने वाले भरत को भी वह उपदेश देते
हुए कहती है कि "तुम तो सदाचार का पालन करने वाले हो, फिर अपनी
माँ की वन्दना क्यो नही करते ।" इस नाटक की कौसल्या आदर्श की प्रति-
मूर्ति है। उसका पारिवारिक स्नेह अर्थात, पुत्र प्रेम तथा पति प्रेम अपूर्व एवं
उच्चकोटि का है। वह कमल से भी कोमल और वज्र से भी कठोर है।
कैकेयी के कुचक्र के कारण राम का अभिषेक रुका तथा इसका अप्रिय व
कठोर आघात कौसल्या को लगा। पहले तो वह तिलमिला उठती है, पर
शीघ्र ही संभल जाती है। इसीलिए तो वह दुःखी और सन्तप्त महाराज
दशरथ को अति गम्भीर तथा शान्त भाव से सान्त्वना देती है। वह यद्यपि
महाराज से कैकेयी के विरुद्ध पता नही क्या-क्या कहने वाली थी, किन्तु स्वयं
दशरथ की दशा देखकर इतना ही कह सकी—"महाराज, धैर्य धारण कीजिए,
धैर्य धारण कीजिए।" : इस प्रकार भास द्वारा प्रस्तुत राम जननी कौसल्या
सेवा, त्याग, ममता, करुणा, क्षमा आदि नारी हृदय की सभी उदात्त वृत्तियों
का प्रतीक है।
(7) कैकेयी
भास द्वारा प्रस्तुत किया गया कैकेयी का चरित्र सर्वथा नवीन रूप में
( 26 )
प्राप्त होता है। कुमार भरत के सम्पर्क मे उसका हृदय पश्चात्ताप के आँसुओ
से घुल कर सर्वथा स्वच्छ और निर्मल हो गया है। पहले तो प्रतिहारी से यह
जान कर कि भरत उससे मिलने आया है, वह घबरा जाती है कि भरत, पता
नही किस बात का उलाहना दे बैठें। किन्तु वह शीघ्र ही संभल जाती है और
भरत के सामने राजा दशरथ को दिए अन्धमुनि के शाप का रहस्योद्-
घाटन करती है। वस्तुतः कैकेयी उदात्तचरिता है। उसने राम के लिए वन-
वास का वर इसलिए माँगा था कि उन्हें ऋषि के द्वारा दिए गए शाप से
मुक्ति मिले। इस तथ्य को वह भरत के सामने उचित अवसर पर अर्थात्
सीता हरण के बाद स्पष्ट कर देती है।
कैकेयी के चरित्र मे भावनाओ की गम्भीरता और विविधता का जैसा
आदर्श दृढ रूप में प्रकट किया गया है, वैसा इतनी कुशलता के साथ किसी
अन्य राम काव्य में उपलब्ध नही होता। प्रतिमा नाटक की कैकेयी स्वतन्त्र
व्यक्तित्व के पूर्ण जीवन से श्रोतप्रोत है। इसमें सजीवता और स्वाभाविकता
है। यह पात्र करुणा से भरा है। वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त होने पर इसके
सम्मुख भरत भी नतमस्तक हो जाता है। रामायण की कैकेयी की तुलना
में यह बहुत ही अच्छे रूप मे प्रस्तुत की गई है।
( 27 )
प्रतिमा नाटक के पद्यों की सूची
इस नाटक मे कुल 7 अंक तथा 157 पद्य है। क्रमानुसार इनकी
सूची इस प्रकार है—1 अंक-31 पद्य, 2 अंक-21 पद्य, 3 अंक-24 पद्य,
4 अंक-28 पद्य, 5 अंक-22 पद्य, 6 अंक-16 पद्य तथा 7 अंक-15
पद्य। अकारादि क्रम से इनका विवरण इस प्रकार है—
नम्बर पद्य के प्रथम शब्द अंक नंबर पद्य नंबर
'अ' के 20 पद्य—
- अंगं मे स्पृश 2 18
- अक्षोभ्यः क्षोभितः 1 17
- अत्र रामश्च सीता 4 4
- अद्य खल्ववगच्छामि 4 12
- अद्यैव यास्यामि 7 14
- अधिगत-नृप-शब्द 7 12
- अनपत्या वयं 2 8
- अनुचरति शशांकं 1 25
- अन्वास्यमानश्चिर 3 15
- अपि सुगुण ममापि 4 21
- अय ते दयितो 4 11
- अयं सैन्येन महता 7 5
- अयं हि पतित : 3 14
14 अयममरपतेः सखा 2 21 - अयशांसि यदि लोभः 3 21
- अयोध्यामटवीभूता 3 10
- असुर-समर-दक्षे 4 10
- अह पश्चात् प्रवेक्ष्यामि 4 15
- अहं हि दुःखम् 2 9
- अहो बलमहो 5 14
'आ' के 4 पद्य— - आदर्श वल्कलानीव 1 9
( 28 )
22. आपृच्छ पुत्रकृतकान् 5 11
23. आरब्धे पटहे 1 5
24. आशावन्तः पुरे 4 28
'इ' के 7 पद्य —
25. इद गृह् तत् 3 13
26. इद तत् स्त्रीमयं 4 14
27. इदानीं भूमिपालेन 1 4
28. इय स्वय गच्छतु 4 13
29. इय हि नीलोत्पल 6 1
30. इयमेका पृथिव्या 5 8
31. इह स्थास्यामि देहेन 4 19
'उ' का 1 पद्य—
32 उभयस्यास्ति सान्निध्य 5 9
'ए' के 3 पद्य—
33. एतदार्याभिषेकेण 7 13
34. एते ते देवताना० 3 7
35. एते भृत्या. स्वानि 2 13
'क' के 10 पद्य—
36. कमप्यर्थम् चिरम् 2 17
37. कर्णाौ त्वरा 1 8
38. कस्यासौ मद्वशतरः 4 6
39. कामं दैवतमित्येव 3 5
40. काले खल्वागता 3 12
41. कुतः क्रोधो विनीतानाम् 6 9
42. कृतान्त-शल्याभिहते 5 4
43. कृत्वा रव वीर्यसदृश 6 4
44. क्रमप्राप्ते हृते 1 19
45. क्व ते ज्येष्ठो रामः 2 14
( 29 )
'ग' के 6 पद्य—
46. गच्छति तुष्टिं खलु 5 5
47. गतो रामः प्रियं 2 20
48. गत्वा तु पूर्वमय० 6 7
49. गत्वा पूर्वम् स्वसैन्यै० 4 17
50. गुरोर्मे पाद 1 27
51. गोपहीना यथा गावो 3 23
'घ' का 1 पद्य—
52. घनः स्पष्टो धीरः 4 7
'च' के 2 पद्य—
53. चरति पुलिनेषु 1 2
54. चीरमात्रोत्तरीयाणाम् 1 31
'छ' का 1 पद्य—
55. छत्र सव्यजनं 1 3
'ज' का 1 पद्य—
56 जय नरवर जेयः 7 1
'त' के 14 पद्य—
57. तं स्मृत्वा शुल्कदोषं 3 11
58. तत्र यास्यामि यत्रासौ 3 24
59. तपः सग्राम कवच 1 28
60. तवैव पुत्रः 2 9
61. तातस्यैतानि 5 13
62. ताते धनुर्नमयि० 1 22
63. तीर्थोदकेन मुनिभिः 1 9
64. तेनोक्त रुदित 6 15
65. तैस्तर्पिताः सुतफलं 5 10
66. तैस्तैः प्रवृद्ध-विषयै० 7 6
67. त्यक्त्वा ता गुरुणा 5 1
( 30 )
68. त्यक्त्वा स्नेहं 3 18
69. त्रैलोक्यं दग्धुकामेव 1 21
70. त्वया राज्यैषिण्या 3 22
'द' के 2 पद्य—
71. द्रुमा धावन्तीव 3 2
72. दैत्येन्द्र-मान-मथनस्य 4 2
'ध' का 1 पद्य—
73. धन्याः खलु वने 2 12
'न' के 7 पद्य—
74. नरपति निधन 4 18
75. नरपतिनिधनं मया 6 8
76. नागेन्द्रा दिवसा 2 2
77. नारीणा पुरुषाणां 1 11
78. नियतमनियतात्मा 5 7
79. निघृणश्च कृतघ्नश्च 4 5
80 निर्योगाद् भूषणान् 1 26
'प' के 10 पद्य—
81. पक्षाभ्या परिभूय 6 3
82. प्रतत्युत्थाय 2 3
83 पादोपभुक्ते तव 4 25
84. पतितमिव शिरः 3 3
85. पित्रा च बान्धवजनेन 6 12
86. पितुर्नियोगादह० 4 20
87. पितुः प्राणपरित्याग 3 4
88. पितुर्मे औरसः 3 19
89. पितुर्मे को व्याधिः 3 1
90. प्रख्यात-सद्गुण-गणः 6
'फ का 1 पद्य—
91. फलानि दृष्ट्वा दर्भेषु
( 31 )
'ब' का 1 पद्य—
92. बलादेव दशग्रीवः 5 21
'भ' के 3 पद्य—
93. भग्नः शक्रः 5 17
94. भरतो वा भवेद् 1 20
95. भ्रमति सलिल 5 2
'म' के 8 पद्य—
96. मंगलार्थेऽनया 1 24
97. मद्भुजाकृष्ट 5 22
98. मम मातुः प्रियं 4 3
99. मम मातुश्च 3 16
100. मायया ऽ पहृते रामे 5 15
101 मा स्वय मन्यु 1 10
102. मुखमनुपम 4 8
103. मेरुश्चलन्निव 2 1
'य' के 12 पद्य—
104. य चिन्तयामि नृपतिं 4 22
105. यत्कृते महति 1 23
106. यत्सत्य परितोषितो 4 23
107. यथा रामश्च 7 15
108. यदि न सहसे 1 18
109. यस्याः शक्रसमो 1 13
110. य. स्वराज्यं परित्यज्य 6 -13
111. यावद् भविष्यति 4 24
112. युद्धे यन सुराः 5 16
113. येन प्राणाश्च राज्य 3 8
114. योऽस्या. करः 5 3
115. यो ऽहमुत्पतितो 5 20
( 32 )
'र' के 6 पद्य—
116. रघोश्चतुर्थो 4 9
117. राज्ये त्वामभिषिच्य 2 19
118. रामं वा शरणमुपेहि 5 18
119. रामलक्ष्मणयोर्मध्ये 2 15
120. रामेणापि परित्यक्तो 2 5
121. रेणु. समुत्पतति 7 4 .
'व' के 11 पद्य -
122. वक्तव्यं किंचिदस्मासु 3 6
123. वक्षः प्रसारय 4 16
124. वक्ष. प्रसारय कवाट 7 7
125. वनगमन निवृत्ति. 1 14
126. वयमयशसा 3 17
127. वल्कलै हृ'तराजश्रीः 3 20
128. विचेष्टमानेव 6 2
129. विलपसि किमिदं 5 19
130. विविधैर्व्यसनै. 7 8
131. वेलामिमा मत्त० 6 16
132. वैरं मुनिजनस्यार्थे 6 11
'श' के 7 पद्य—
133. शत्रुघ्न-लक्ष्मण 1 7
134. शरीरैऽरि. 1 12
135 शुल्कं विगणितम् 1 15
136 शून्यः प्राप्तो यदि 2 11
137. शोकादवचनाद् 1 16
138. श्रद्धेय स्वजनस्य 4 27
139 श्रुत्वा ते वनगमन 1 30
'स' के 13 पद्य—
140. सकृत् स्पृशामि 2 16
141. सञ्जीते सीतान 7 3
( 33 )
42. सत्यसन्ध जितक्रोध २ ६
43. सम वाष्पेण १ ६
44. समुदित-बल-वीर्यम् ७ २
45 सीताभव. पातु १ १
146. सुग्रीवो भ्रशितो ६ १०
147. सुचिरेणापि कालेन ४ २६
148 सूर्य इव गतो २ ७
149. सौवर्णान् वा मृगा ५ १२
150. स्वर्ग गते नरपतौ ४ १
151. स्वर्गेऽपि तुष्टि ७ ११
152. स्वैरं हि पश्यन्तु १ २९
'ह' के 5 पद्य—
153. हत्वा रिपुप्रभव० ७ १०
154 हन्त भो सत्वयुक्ता ६ १४
155. हा वत्स राम २ ४
156. हृदय भव सकामं ३ ९
157. हृदयस्थितशोकाग्नि ६ ५
( 34 )
पात्र-परिचय
प्रतिमा नाटक में, जो रामायण की कथावस्तु से सम्बन्ध रखता है,
कुल 27 पात्र हैं। इनमे 16 पुरुष पात्र तथा 11 स्त्री पात्र है। इनके नाम
इस प्रकार है—
पुरुष पात्र
(1) सूत्रधार—नाटक का स्थापक
(2) राजा—अयोध्यानरेश महाराज दशरथ
(3) राम—राजा दशरथ के बड़े पुत्र (नायक)
( ) लक्ष्मण—राम के भाई, सुमित्रा के पुत्र
(5) भरत—राम के भाई, कैकेयी के पुत्र
(6) शत्रुघ्न—राम के सबसे छोटे भाई
(7) सुमन्त्र—राजा दशरथ के मन्त्री
(8) सूत—भरत का सारथी
(9) रावण—लका का राजा (नाटक का प्रतिनायक)
(10) वृद्ध-तापस-द्वय—रावण व जटायु के युद्ध को देखने वाले
(11) देवकुलिक—प्रतिमागृह (मन्दिर) का पुजारी
(12) तापस—दण्डकारण्य के तपस्वी
(13) नन्दिलक—तपस्वी के परिजन
(14) भट—राजपुरुष
(15) सुधाकार—प्रतिमागृह मे सफेदी करने वाला
(16) काञ्चुकीय—अन्तःपुर (रनिवास) का वृद्ध सेवक
स्त्री पात्र
(1) नटी—सूत्रधार की स्त्री
(2) कौसल्या—राम की जननी, दशरथ की पहली रानी
(3) कैकेयी—भरत की जननी, दशरथ की दूसरी रानी
(4) सुमित्रा—लक्ष्मण व शत्रुघ्न की जननी, दशरथ की तीसरी रानी
(5) सीता—राम की पत्नी (नायिका)
( ३५ )
(६) अवदातिका—सीता की सखी
(७) चेटी—सीता की सेविका
सम्बन्ध रहता (८) प्रतिहारी—द्वारपालिका
॰ है। इनके (९) विजया कैकेयी के रनिवास की द्वारपालिका
(१०) नन्दिनिका—कैकेयी की सेविका
(११) तापसी—दण्डकारण्य की तपस्विनी
प्रतिमा नाटकम्
प्रथम अंक
(१) मूल
(नान्द्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः )
सूत्रधारः—सीताभवः पातु सुमन्त्रतुष्टः
सुग्रीवरामः सहलक्ष्मणश्च ।
यो रावणार्थप्रतिमश्च देव्या
विभीषणात्मा भरतोऽनुसर्गम् ॥ (१)
(नेपथ्याभिमुखम् अवलोक्य)
आर्ये ! इतस्तावत् ।
(प्रविश्य)
नटी—आर्य ! इयमस्मि ।
सूत्रधारः—आर्ये ! इममेवेदानीं शरत्कालमधिकृत्य गीयतां
तावत् ।
नटी—आय ! तथा । (गायति)
सूत्रधारः—अस्मिन् हि काले,
चरति पुलिनेषु हंसी काशांशुकवासिनी सुसंहृष्टा ।
(नेपथ्ये)
आर्य ! आर्य !
(आकर्ण्य)
सूत्रधारः— भवतु, विज्ञातम् ।
मुदिता नरेन्द्रभवने त्वरिता प्रतिहाररक्षीव ॥ (२)
(निष्क्रान्तौ)
स्थापना ।
शब्दार्थ—नान्द्यन्ते=मंगलाचरण के अन्त मे । सीताभवः = सीता
आनन्ददाता । पातु = रक्षा करें । सुमन्त्रतुष्टः = अच्छे मन्त्र के पक्षपाती
( 37 )
सुग्रीवरामः = अच्छे कण्ठ वाले राम । सहलक्ष्मणः = लक्ष्मण के सहित ।
रावणारि = रावण के शत्रु । अप्रतिमः = निरुपम वीर । देव्या = सीता के साथ ।
विभीषणात्मा = शत्रुओं के लिए भयकर । भरतः = श्रीराम (भरः भरणम्
जगद्रक्षणम् त तनोति इति भारतः अर्थात् ससार की रक्षा करने वाले) ।
अनुसर्गम् = जन्म-जन्म मे (सर्गे सर्गे प्रति अनुसर्गम् अर्थात् जन्मनि-जन्मनि
'प्रादुर्भावम्) । नेपथ्याभिमुखम् = पर्दे की ओर । अवलोक्य = देख कर । शरत्कालम्
= शरद् ऋतु के । अधिकृत्य = सम्बन्ध मे । चरति = चल रही है । पुलिनेषु =
किनारो पर । काशांशुकवासिनी = काश के फूलों के समान धवल प्रकाश वाली ।
सुसंहृष्टा = प्रसन्न हृदय वाली । मुदिता = प्रसन्नचित्त वाली । नरेन्द्रभवने =
राजमहल में । त्वरिता = शीघ्रतापूर्वक । प्रतिहाररक्षी इव = द्वारपालिका
के समान । स्थापना = प्रस्तावना ।
अन्वय—सीताभव. सुमन्त्रतुष्टः सहलक्ष्मणः च सुग्रीवरामः अनुसर्गम्
पातु । यः च रावणार्यप्रतिम. देव्या विभीषणात्मा भरतः । (१)
अन्वय---काशांशुकवासिनी सुसंहृष्टा हसी पुलिनेषु चरति, नरेन्द्रभवने
मुदिता त्वरिता प्रतिहाररक्षी इव । (२)
हिन्दी अर्थ
(नान्दी पाठ के अन्त मे सूत्रधार आता है )
सूत्रधार — सीता के जीवन, सद् विचार से सन्तुष्ट, लक्ष्मण के सहचर और
सुन्दर शरीर वाले राम जन्म-जन्मान्तर में आप दर्शको की रक्षा करें,
जो रावण के शत्रु, अद्वितीय वीर, सीता देवी के साथ, शत्रुओं को
भयभीत करने वाले तथा संसार का भरण-पोषण करने वाले हैं । (१)
(नेपथ्य की ओर देख कर)
आर्ये, जरा इधर तो आना ।
नटी — आर्य, यह आ गई हूं ।
सूत्रधार — अब इसी शरद् ऋतु के सम्बन्ध में कुछ गाओ ।
नटी — आर्य, ठीक है । (गाती है ।)
सूत्रधार — अरे, इस शरद् ऋतु के समय में —
काश के पुष्पो के सदृश श्वेत प्रकाश वाली हसी प्रसन्न चित्त होकर
नदी के तट पर विचरण कर रही है ।
( 38 )
(नेपथ्य मे)
आर्य, आर्य,
(सुनकर)
सूत्रधार-- अच्छा, समझ गया ।
जिस तरह काश पुष्पों के समान श्वेत रेशमी वस्त्र पहने प्रसन्नहृदय
द्वारपालिका शीघ्रतापूर्वक महाराज दशरथ के अन्तः-पुर में घूम रह
है । (२)
(दोनो निकल जाते हैं ।)
इति स्थापना ।
(२) मूल
(प्रविश्य)
प्रतिहारी—आर्य ! क इह काञ्चुकीयानां सन्निहितः ।
(प्रविश्य)
काञ्चुकीयः—भवति ! अयमस्मि । कि क्रियताम् ?
प्रतिहारी—आर्य ! महाराजो देवासुरसङ्ग्रामेष्वप्रतिहतमहारथो दशरथ
आज्ञापयति-शीघ्रं भर्तृ दारकस्य रामस्य राज्यप्रभावसंयोग
कारका अभिषेकसम्भारा आनीयन्तामिति ।
काञ्चुकीयः—भवति ! यदाज्ञप्तं महाराजेन, तत् सर्वम् सक
ल्पितम् । पश्य-
छत्रं सव्यजनं सनन्दिपटहं भद्रासन कल्पित
न्यस्ता हेममया. सदर्भकुसुमास्तीर्थाम्बुपूर्णा घटाः ।
युक्तः पुष्यरथश्च मन्त्रिसहिताः पौरा. समभ्यागताः
सर्वस्यास्य हि मंगलं स भगवान् वेद्यां वसिष्ठः स्थितः ॥ (३)
प्रतिहारी-यद्येवं, शोभनं कृतम् !
काञ्चुकीयः-हन्त भोः !
इदानीं भूमिपालेन कृतकृत्याः कृताः प्रजाः ।
रामाभिधानं मेदिन्यां शशाङ्कमभिषिञ्चता ॥ (४)
प्रतिहारी-त्वरतां त्वरतामिदानीमार्यः ।
काञ्चुकीयः—भवति ! इदं त्वर्यते । (निष्क्रान्तः)
प्रतिहारी-(परिक्रम्यावलोक्य) आर्य ! सम्भवक ! सम्भवक !