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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 24

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12- विवाह शुल्क - भरत लक्ष्मण से बड़े छोटे दिखायें
(11) सातवें अंक में जनस्थान में ही राम के राज्याभिषेक का जो
अंकन किया गया है, उसका रामायण में सर्वथा अभाव है। इस प्रकार
भास ने अपने प्रतिमा नाटक में ऐसे कई विवरण प्रस्तुत किए हैं, जो
वाल्मीकि रामायण में नहीं हैं।
चरित्र-चित्रण
(I) राम निष्काम
(1) भास विरचित प्रतिमा नाटक के राम धीरोदात्त नायक हैं। वे
अनासक्त होकर अपने कर्त्तव्य का पालन करने वाले हैं। अपने जीवन के
कठोर कर्मक्षेत्र में वे निष्काम भाव से अवतरित होते हैं। यहाँ तक कि वे
अपने अतुलनीय पराक्रम से प्राप्त लंका के साम्राज्य को भी विभीषण को
दे देते हैं।
(2) राम के चरित्र में प्रारम्भ से ही निर्लोभिता की भावना दृष्टि-
गत होती है। कैकेयी से उन्हें वनवास मिला, पर फिर भी उनके हृदय में
उसके प्रति आक्रोश की भावना नहीं है। अपना अभिषेक छोड़ कर वन
जाते समय वे तनिक भी विचलित नहीं होते। लोग उनके इस धैर्य पर
आश्चर्य प्रकट करते हैं, किन्तु वे इसे सामान्य बात समझते हैं।
(3) राम का हृदय सहिष्णु तथा सुकुमार भावों से ओतप्रोत है।
अपने वनवास के समाचारों से वे दुःखी होने के स्थान पर प्रसन्न ही होते हैं
और इस कार्य के लाभ गिनाते हुए कहते हैं कि "राजा दशरथ का वन जाना
रुका, मुझ पर पिता का वैसा ही वात्सल्य बना रहा, प्रजा को भी नये
राजा के अच्छे-बुरे झंझट से मुक्ति मिली एवं मेरे अन्य भाई भी ऐश्वर्य
भोग से वंचित न रहे।"
(4) प्रतिमा के राम का विनत भाव भी दर्शनीय है। वे अपनी
सौतेली जननी की आज्ञा को सहज रूप से शिरोधार्य कर लेते हैं। उन्हें
कैकेयी के प्रति थोड़ी सी भी अनास्था नहीं है। यदि कोई कैकेयी के विरुद्ध
कुछ भी कहता है, तो राम उस का विरोध तथा कैकेयी के पक्ष का समर्थन
करते हैं।
(5) सीताहरण के अवसर पर रामायण के राम सीता की स्पृहा-
विनोदन के लिए माया मृग मारीच के पीछे जाते हैं। परन्तु प्रतिमा के राम
श्राद्ध