प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
दक्षिणी लिपियाँ, अंक-पद्धति, संवत्-गणना, गुप्त-कूटलिपि व लिपिमाला उपसंहार
भारतीय संवत्. १८७
चला था. इसका वर्ष ज्येष्ठ शुक्ला १३ से पलटता था और वर्तमान ही लिखा जाता था. इसका
प्रचार मराठों के राज्य में रहा परंतु अब यह लिखा नहीं जाता.
२१—बार्हस्पत्य संवत्सर ( १२ वर्ष का ).
यह बार्हस्पत्य संवत्सर १२ वर्ष का चक्र है और इसका संबंध बृहस्पति की गति से है.
इसके वर्षों के नाम कार्तिकादि १२ महीनों के अनुसार हैं परंतु कभी कभी महीनों के नाम के पहिले
‘महा’ लगाया जाता है जैसे कि 'महाचैत', 'महावैशाख' आदि.
सूर्य समीप आने से बृहस्पति अस्त हो कर जब सूर्य उससे आगे निकल जाता है तब
( २५ से ३१ दिन के बाद ) जिस नक्षत्र पर फिर वह (बृहस्पति) उदय होता है उस नक्षत्र के अनुसार
संवत्सर (वर्ष) का नाम नीचे लिखे क्रम से रक्खा जाता है—
कृत्तिका या रोहिणी पर उदय हो तो महाकार्तिक (कार्तिक); मृगशिर या आर्द्रा पर
महामार्गशीर्ष (मार्गशीर्ष); पुनर्वसु या पुष्य पर महापौष; अश्लेषा या मघा पर महामाघ;
पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी या हस्त पर महाफाल्गुन; चित्रा या स्वाति पर महाचैत्र; विशाखा या
अनुराधा पर महावैशाख; ज्येष्ठा या मूल पर महाज्येष्ठ; पूर्वाषाढा या उत्तराषाढा पर महाआषाढ;
श्रवण या धनिष्ठा पर महाश्रावण; शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा या उत्तराभाद्रपदा पर महाभाद्रपद और
रेवती, अश्विनी या भरणी पर उदय हो तो महाआश्वयुज (आश्विन) संवत्सर कहलाता है¹. इस चक्र
में १२ वर्षों में एक संवत्सर क्षय² हो जाता हैं. प्राचीन शिलालेख और दानपत्रों में बार्हस्पत्य
संवत्सर दिये हुए मिलते हैं,³ जो सब ई. स. की ७ वीं शताब्दी के पूर्व के हैं. उसके पीछे इस
का प्रचार सामान्य व्यवहार से उठ गया और केवल पंचांगों में वर्ष का नाम⁴ बतलाने में ही रह
गया जो अब तक चला जाता है.
२२-बार्हस्पत्य संवत्सर ( ६० वर्ष का ).
यह बार्हस्पत्य संवत्सर ६० वर्ष का चक्र है. इसमें वर्षों की संख्या नहीं किंतु १ से ६० तक
के नियत नाम ही लिखे जाते हैं. मध्यम मान से बृहस्पति के एक राशि पर रहने के समय को
‘बार्हस्पत्य संवत्सर' (वर्ष) कहते हैं⁵ जो ३६१ दिन, २ घड़ी और ५ पल का होता है, और सौर
१. नक्षत्रेण सहोदयमुपगच्छति येन देवपतिमन्त्री । तत्संज्ञं वक्तव्यं वर्ष मासक्रमेणैव ॥ वर्षाणि कार्तिकादीन्याग्नेयाद्द्वयद्वयानुयोगीनि ।
क्रमशस्त्रिभं तु पञ्चममुपान्त्यमन्त्यं च यद्वर्षम् ॥ (वाराही संहिता; अध्याय ८, श्लोक १-२).
२. १२ सौर वर्षों में ११ बार गुरु अस्त होकर फिर उदय होता है इसलिये १२ वर्ष में एक बार्हस्पत्य संवत्सर क्षय हो
जाता है. जैसे कि पं. श्रीधर शिवलाल के वि. सं. १६६५ के पंचांग में 'वर्षनाम पौष' लिखा है परंतु १६६६ के पंचांग में
'वर्षनाम फाल्गुन' लिखा है जिससे माघ (महामाघ) संवत्सर क्षय हो गया.
३. भरतपुर राज्य के कोट नामक गांव से मिले हुए शिलालेख में 'महाचैत्र' संवत्सर (रि. रा. म्यु अ; ई. स. १६१६-
१७, पृ. २), परिव्राजक महाराज हस्तिन् के गुप्त संवत् १६३ (ई. स. ४८२-८३) के दानपत्र में 'महाआश्वयुज' संवत्सर
(त्रिषष्ट्युत्तरेऽब्दशते गुप्तनृपराज्यभुक्तौ महाश्वयुजसंवत्स(त्त्स)रे चैत्रमासशुक्लपक्षद्वितीयायाम्—की; गु. इं; पृ. १०२) और कदंबवंशी
राजा मृगेशवर्मन् के राज्यवर्ष तीसरे के दानपत्र में 'पौष' संवत्सर—श्रीमृगेशवर्म्मा आत्मनः राज्यस्य तृतीये वर्षे पौषे संवत्सरे कार्त्ति-
कमासबहुलपक्षे दशम्यां तिथौ (इं. ऐं; जि. ७, पृ. ३५) आदि.
४. पं. श्रीधर शिवलाल के वि. सं. १६७४ के पंचांग में 'वर्षनाम आश्विन' और १६७५ के पंचांग में 'वर्षनाम कार्तिक'
लिखा है. ये वर्षनाम १२ बरसवाले बार्हस्पत्य संवत्सर के ही हैं.
५. बृहस्पतेर्मध्यमराशिभोगात्संवत्सरं सांहितिका वदन्ति (भास्कराचार्य का 'सिद्धांतशिरोमणि १।३०).
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१८८ प्राचीनलिपिमाला.
वर्ष ३६५ दिन, १५ घड़ी, ३१ पल और ३० विपल का होता है, अतएव बार्हस्पत्य संवत्सर सौर
वर्ष से ४ दिन, १३ घड़ी और २६ पल के करीब छोटा होता है जिससे प्रति ८५ वर्ष में एक संवत्सर
क्षय हो जाता है. इस चक्र के ६० वर्षों के नाम ये हैं—
१ प्रभव, २ विभव, ३ शुक्ल, ४ प्रमोद, ५ प्रजापति, ६ अंगिरा, ७ श्रीमुख, ८ भाव, ९ युवा,
१० धाता, ११ ईश्वर, १२ बहुधान्य, १३ प्रमाथी, १४ विक्रम, १५ वृष, १६ चित्रभानु, १७ सुभानु,
१८ तारण, १९ पार्थिव, २० व्यय, २१ सर्वजित्, २२ सर्वधारी, २३ विरोधी, २४ विकृति, २५ खर,
२६ नंदन, २७ विजय, २८ जय, २९ मन्मथ, ३० दुर्मुख, ३१ हेमलंब, ३२ विलंबी, ३३ विकारी,
३४ शार्वरी, ३५ प्लव, ३६ शुभकृत्, ३७ शोभन, ३८ क्रोधी, ३९ विश्वावसु, ४० पराभव, ४१ प्लवंग,
४
भारतीय संवत्. १८६
उत्तरी हिंदुस्तान के शिलालेखादि में बार्हस्पत्य संवत्सर लिखे जाने के उदाहरण बहुत ही
कम मिलते हैं परंतु दक्षिण में इसका प्रचार अधिकता के साथ मिलता है. लेखादि में इसका
सबसे पहिला उदाहरण दक्षिण के चालुक्य (सोलंकी) राजा मंगलेश (ई. स. ५६१-६१०) के समय
के बादामी (महाकूट) के स्तंभ पर के लेख में मिलता है जिसमें 'सिद्धार्थ' संवत्सर लिखा है १.
२३—ग्रहपरिवृत्ति संवत्सर.
ग्रहपरिवृत्ति संवत्सर ६० वर्ष का चक्र है जिसके ६० वर्ष पूरे होने पर फिर वर्ष १ से लिखना
शुरू करते हैं. इसका प्रचार बहुधा मद्रास इहाते के मदुरा जिले में है. इसका प्रारंभ वर्तमान कलियुग
संवत् ३०७६ (ई. स. पूर्व २४) से होना बतलाते हैं. वर्तमान कलियुग संवत् में ७२ जोड़ कर ६०
का भाग देने से जो बचे वह उक्त चक्र का वर्तमान वर्ष होता है; अथवा वर्तमान शक संवत् में ११
जोड़ कर ६० का भाग देने से जो बचे वह वर्तमान संवत्सर होता है. इसमें सप्तर्षि संवत् की नांई
वर्षों की संख्या ही लिखी जाती है.
२४—सौर वर्ष.
सूर्य के मेष से मीन तक १२ राशियों के भोग के समय को सौर वर्ष कहते हैं. सौर वर्ष बहुधा
३६५ दिन, १५ घड़ी, ३१ पल और ३० विपल का माना जाता है २ (इसमें कुछ कुछ मत भेद भी
है). सौर वर्ष के १२ हिस्से किये जाते हैं जिनको सौर मास कहते हैं. सूर्य के एक राशि से
दूसरी में प्रवेश को संक्रांति (मेष से मीन तक) कहते हैं. हिंदुओं के पंचांगों में मास, पक्ष और तिथि
आदि की गणना तो चांद्र है परंतु संक्रांतियों का हिसाब सौर है. बंगाल, पंजाब आदि उत्तर के
पहाड़ी प्रदेशों तथा दक्षिण के उन हिस्सों में, जहां कोल्लम् संवत् का प्रचार है, बहुधा सौर वर्ष ही
व्यवहार में आता है. कहीं महीनों के नाम संक्रांतियों के नाम ही हैं और कहीं चैत्रादि नामों का
प्रचार है. जहां चैत्रादि का व्यवहार है वहां मेष को वैशाख, वृष को ज्येष्ठ आदि कहते हैं. सौर मान
के मासों में १ से २६, ३०, ३१ या ३२ तक दिनों का ही व्यवहार होता है, तिथियों का नहीं. बंगालवाले
संक्रांति के दूसरे दिन से पहिला दिन गिनते हैं और पंजाब आदि उत्तरी प्रदेशों में यदि संक्रांति का
प्रवेश दिन में हो तो उसी दिन को और रात्रि में हो तो दूसरे दिन को पहिला दिन (जैसे
मेषार्कभुक्तदिन १, मेषगते १, मेषप्रविष्टे १) मानते हैं.
२५—चांद्र वर्ष.
दो चांद्र पक्ष का एक चांद्र मास होता है. उत्तरी हिंदुस्तान में कृष्णा १ से शुक्ला १५ तक
(पूर्णिमांत) और नर्मदा से दक्षिण में शुक्ला १ से अमावास्या तक (अमांत ३) एक चांद्र मास माना
उदाहरण—शक संवत् १८४० में बार्हस्पत्य संवत्सर कौनसा होगा?
१८४०+१२=१८५२, १८५२/६० = ३०, शेष ५२; इसलिये वर्तमान संवत्सर ५२ वां कालयुक्त. गत शक संवत् १८४०=गत
कलियुग संवत् (१८४०+३१७६ = ) ५०१६, ५०१६+१२= ५०२८, ५०२८/६० = ८३, शेष ४८ गत संवत्सर; इस लिये वर्तमान = ४९
वां कालयुक्त संवत्सर.
१. उत्तरोत्तरप्रवर्द्धमानराज्य........वर्षेऽप्रवर्त्तमाने सिद्धार्थे वैशाखपौर्णमास्याम् (ई. पॅ; जि. १६, पृ. १८ के पास का प्लेट).
२. मूल सूर्यसिद्धांत के अनुसार (पंचसिद्धान्तिका).
३. मूल गणना अमांत हो ऐसा प्रतीत होता है. उत्तरी भारतवालों के वर्ष का एवं अधिमास का प्रारंभ शुक्ला १ से
होना तथा अमावास्या के लिये ३० का अंक लिखना यही बतलाता है कि पहिले मास भी वर्ष की तरह शुक्ला १ से प्रारंभ
हो कर अमावस्या को समाप्त होता होगा.
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१६० प्राचीनलिपिसमाला.
जाता है. ऐसे १२ चांद्र मास का एक चांद्र वर्ष कहलाता है. चांद्र वर्ष ३५४ दिन, २२ घड़ी, १ पल
और २४ विपल के करीब होता है१. हिंदुओं के पंचांगों में मास, पक्ष, तिथि आदि चांद्र मान से ही
हैं. चांद्र वर्ष सौर वर्ष से १० दिन, ५३ घड़ी, ३० पल और ६ विपल छोटा होता है. सौर मान
और चांद्र मान में करीब ३२ महीनों में १ महीने का अंतर पड़ जाता है. हिंदुओं के यहां
शुद्ध चांद्र वर्ष नहीं किंतु चांद्रसौर है और चांद्र मासों तथा ऋतुओं का संबंध बना रखने तथा
चांद्र को सौर मान से मिलाने के लिये ही जिस चांद्र मास में कोई संक्रांति न हो उसको अधिक (मल)
मांस और जिस चांद्र मास में दो संक्रांति हों उसको क्षय मास मानने की रीति निकाली है. हिंदूमात्र के
श्राद्ध, व्रत आदि धर्म कार्य तिथियों के हिसाब से ही होते हैं इस लिये बंगाल आदि में जहां जहां सौर
वर्ष का प्रचार है वहां भी धर्मकार्यों के लिये चांद्र मान की तिथियों आदि का व्यवहार करना ही पड़ता है.
इसीसे वहां के पंचांगों में सौर दिनों के साथ चांद्र मास, पक्ष, तिथियां आदि भी लिखी रहती हैं.
२६-हिजरी सन्.
हिजरी सन् का प्रारंभ मुसलमान धर्म के प्रवर्तक पैगंबर मुहम्मद साहब के मक्के से भाग कर
मदीने को कूच करने के दिन से माना जाता है. अरबी में 'हिजर' धातु का अर्थ 'अलग होना',
'छोड़ना' आदि है इसी लिये इस सन् को हिजरी सन् कहते हैं. प्रारंभ से ही इस सन् का प्रचार
नहीं हुआ किंतु मुसलमान होनेवालों में पहिले पैगंबर के कामों के नामों से वर्ष बतलाये जाते थे जैसे कि
पहिले वर्ष को 'यर्जन' अर्थात् 'आज्ञा' (मक्के से मदीना जाने की) का वर्ष, दूसरे को हुक्म का वर्ष
(उस वर्ष में मुसलमान न होनेवालों से लड़ने का हुक्म होना माना जाता है) आदि. ख़लीफा
उमर (ई. स. ६३४ से ६४४ तक) के समय यमन के हाकिम अबूमुसा अशअरी ने खलीफा को
अर्जी भेजी कि दरगाह से (श्रीमन् के यहां से) शाबान् महीने की लिखी हुई लिखावटें आई हैं परंतु
उनसे यह मालूम नहीं होता कि कौनसा (किस वर्ष का) शाबान है? इस पर ख़लीफा ने कोई
सन् नियत करने के लिये विद्वानों की संमति ली और अंत में यह निश्चय हुआ कि पैगंबर के मक्का
छोड़ने के समय से (अर्थात् तारीख १५ जुलाई ई. स. ६२२=वि. सं ६७९ श्रावण शुक्ला २ की
शाम से) इस सन् का प्रारंभ माना जावे२. यह निश्चय हि. स. १७ में होना माना जाता है३.
हिजरी सन् का वर्ष शुद्ध चांद्र वर्ष है. इसके प्रत्येक मास का प्रारंभ चंद्रदर्शन (हिंदुओं के प्रत्येक
मास की शुक्ला २) से होता है और दूसरे चंद्रदर्शन तक मास माना जाता है. प्रत्येक तारीख सायंकाल
से प्रारंभ हो कर दूसरे दिन के सायंकाल तक मानी जाती है. इसके १२ महीनों के नाम ये हैं-
१ मुहर्रम, २ सफ़र, ३ रबीउल् अव्वल, ४ रबीउल् आखिर या रबी उस् सानी, ५ जमादिउल्
अव्वल, ६ जमादिउल् आखिर या जमादि उस्सानी, ७ रजब, ८ शाबान, ६ रमज़ान, १० शव्वाल, ११
ज़िल्काद और १२ ज़िलहिज्ज. चांद्र मास २६ दिन, ३१ घड़ी, ५० पल और ७ विपल के करीब होने
से चांद्र वर्ष सौर वर्ष से १० दिन, ५३ घड़ी, ३० पल और ६ विपल के करीब कम होता है. तारीख १५
जुलाई ई. स. १६२२ (वि. सं. १६७६ श्रावण कृष्णा ६) की शाम को इस सन् को प्रारंभ हुए
१३०० सौर वर्ष होंगे. उस समय हिजरी सन् १३४० तारीख २० ज़िल्काद का प्रारंभ होगा अत एव
१३०० सौर वर्षों में ३६ चांद्र वर्ष, १० महीने और १६ दिन बढ़ गये. इस हिसाब से १०० सौर
वर्ष में ३ चांद्र वर्ष २४ दिन और ६ घड़ी बढ़ जाती हैं. ऐसी दशा में ईसवी सन् (या विक्रम
संवत्) और हिजरी सन् का कोई निश्चित अंतर नहीं रहता. उसका निश्चय गणित से ही होता है.
१ सूर्यसिद्धांत के अनुसार. २ नवलकिशोर प्रेस (लखनऊ) की छपी हुई 'आईन अकबरी' दफ़्तर १, पृ. ३३७.
३ 'ग़यासुललुगात' में 'अजायबउल्बुल्दान' के हवाले से हिजरी सन् १७ में यह निर्णय होना लिखा है (नवलकिशोर
प्रेस का छपा, 'ग़यासुललुगात', पृ. ३२४).
भारतीय संवत्. १६१
हिंदुस्तान में मुसलमानों का अधिकार होने पर इस सन् का प्रचार इस देश में हुआ और कभी
कभी संस्कृत लेखों में भी यह सन् मिल जाता है१. इसका सब से पहिला उदाहरण महमूद
ग़ज़नवी के महमूदपुर ( लाहोर ) के सिक्कों पर के दूसरी ओर के संस्कृत लेखों में मिलता है२ जो
हिजरी सन् ४१८ और ४१६ ( ई. स. १०२७ और १०२८ ) के हैं.
२७-शाहूर सन्.
शाहूर सन् को 'सूर सन्' और 'अरबी सन्' भी कहते हैं. 'शाहूर सन्' नाम की उत्पत्ति का
ठीक पता नहीं लगता परंतु अनुमान है कि अरबी भाषा में महीने को 'शहर' कहते हैं और उस
का बहुवचन 'शहूर' होता है जिसपर से 'शाहूर' शब्द की उत्पत्ति हुई हो. यह सन् हिजरी सन्
का प्रकारांतर मात्र है. हिजरी सन् के चांद माह इसमें सौर माने गये हैं जिससे इस सन् का वर्ष
सौर वर्ष के बराबर होता है और इसमें मौसिम और महीनों का संबंध बना रहता है. इस सन् में
५६६-६०० मिलाने से ई. स. और ६५६-५१ मिलाने से वि. सं. बनता है इससे पाया जाता है कि
तारीख १ मुहर्रम हिजरी सन् ७४५ ( ई. स. १३४४ तारीख १५ मई=वि. सं. १४०१ ज्येष्ठ शुक्ला २) से,
जब कि सूर्य मृगशिर नक्षत्र पर आया था, इसका प्रारंभ हुआ है. इसका नया वर्ष सूर्य के मृगशिर
नक्षत्र पर आने के ( मृगे रविः ) दिन से बैठता है जिससे इसके वर्ष को 'मृग साल' भी कहते हैं.
इसके महीनों के नाम हिजरी सन् के महीनों के अनुसार ही हैं. यह सन् किसने चलाया इसका
ठीक ठीक पता नहीं चलता परंतु संभव है कि देहली के सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ ( ई. स. १३२५-१३५१ )
ने, जिसने अपनी राजधानी देहली से उठा कर देवगिरि ( दौलताबाद ) में स्थिर करने का उद्योग
किया था, दोनों फ़स्लों ( रबी और ख़रीफ़ ) का हासिल नियत महीनों में लिये जाने के लिये इसे दक्षिण
में चलाया हो३ जैसे कि पीछे से अकबर बादशाह ने अपने राज्य में फ़सली सन् चलाया. इस सन् के वर्ष
अंकों में नहीं किंतु अंक सूचक अरबी शब्दों४ में ही लिखे जाते हैं. मरहठों के राज्य में इस सन् का
प्रचार रहा परंतु अब तो इसका नाममात्र रह गया है और मराठी पंचांगों में ही इसका उल्लेख मिलता है५.
१- देखो, ऊपर पृ. १५५ और उसीका टिप्पण ४.
२- ऐडवर्ड थॉमस रचित 'क्रॉनिकल्स ऑव् दी पठान किंग्स ऑव् देहली', पृ. ४८.
३- ग्रॅट डफ रचित 'हिस्टरी ऑव दी महरॅट्टाज़' जि. १, पृ. ४०, टिप्पण; *; ई. स. १८६३ का संस्करण.
४- इस सन् के वर्ष लिखने में नीचे लिखे अनुसार अंकों के स्थान में उनके सूचक अरबी शब्दों का प्रयोग किया
जाता है. मराठी में अरबी शब्दों के रूप कुछ कुछ बिगड़ गये हैं जो ( ) चिह्न के भीतर जे. टी. मोलेज़वर्थ के मराठी-
अंग्रेज़ी कोश के अनुसार दिये गये हैं. १=अहद् ( अहदे, इददे ); २ = अन्ना ( इसने ); ३ = सलासह ( सल्लौज ); ४=अरबा;
५=खमसा ( खम्मस ); ६=सित्ता ( सिन ?=सित्त ); ७ = सबा ( सब्या ); ८=समानिआ ( सम्मान ); ६=तसआ ( तिस्सा );
१०=अशर; ११=अहद् अशर; १२=अस्ना ( इसने ) अशर; १३=सलासह ( सल्लास ) अशर; १४ अरबा अशर; २०=अशरीन;
३० = सलासीन ( सल्लासीन ); ४०=अरबईन; ५०=खमसीन; ६०=सित्तीन् ( सित्तैन ); ७०=सबीन ( सब्बैन ); ८०=ससानीन्
( सम्नानीन ); ६०=तिसईन ( तिस्सैन ); १००=माया ( मया ); २००=मथ्नतीन ( मयातैन ); ३००=जलाल माया ( सल्लास मया );
४००=अरबा माया; १०००=अलफ् ( अलफ ); १००००=अशर् अलफ़. इन अंक सूचक शब्दों के लिखने में पहिले शब्द से
इकाई, दूसरे से दहाई, तीसरे से सैकड़ा और चौथे से हज़ार बतलाये जाते हैं जैसे कि १३१३ के लिये 'सलासो अशी
सलास माया व अलफ्'.
५- ज्योतिषपरिषद् के नियमानुसार रामचंद्र पांडुरंग शास्त्री मोघे वसईकर के तय्यार किये हुए शक संवत् १८३०
( चैत्रादि वि. सं. १६७५ ) के मराठी पंचांग में वैशाख कृष्णा १३ ( अमांत मूर्त्तिमान ज्येष्ठ कृष्णा १३ ) शुक्रवार को 'मृगार्क'
लिखा है और साथ में फसली सन १३२८ अर्बी सन १३१६ सूरसन 'तिसा अशर सल्लासे मया व अल्लफ' लिखा है
( तिसा = ६; अशर = १०; सल्लासें मया = ३००; व = और; अल्लफ = १०००. ये सब अंक मिलाने से १३१६ होते हैं ).
१६२ प्राचीनलिपिमाला.
२८—फसली सन्.
हिंदुस्तान में मुसल्मानों का राज्य होने पर हिजरी सन् उनका राजकीय सन् हुआ परंतु उसका
वर्ष शुद्ध चांद्र होने के कारण सौर वर्ष से वह करीब ११ दिन छोटा होता है इससे महीनों एवं फसलों का
परस्पर कुछ भी संबंध नहीं रहता. दोनों फसलों (रबी और खरीफ़) का हासिल नियत महीनों में लेने
में सुभीता देख कर बादशाह अकबर ने हिजरी सन् ९७१ (ई. स. १५६३=वि. सं. १६२०) से यह
संन् जारी किया. इसीसे इसको फसली सन् कहते हैं. सन् तो हिजरी (६७१) ही रक्खा गया परंतु
महीने सौर (या चांद्रसौर) माने गये जिससे इसका वर्ष सौर (या चांद्रसौर) वर्ष के बराबर
हो गया. अत एव फसली सन् भी शाहूर सन् की नांई हिजरी सन् का प्रकारांतर मात्र है. पहिले
इस सन् का प्रचार पंजाब और संयुक्त प्रदेश में हुआ और पीछे से जब बंगाल आदि देश अकबर के राज्य में
मिले तब से वहां भी इसका प्रचार हुआ. दक्षिण में इसका प्रचार शाहजहां बादशाह के समय
में हुआ. अब तक यह सन् कुछ कुछ प्रचलित है परंतु भिन्न भिन्न हिस्सों में इसकी गणना में अंतर है.
पंजाब, संयुक्त प्रदेश तथा बंगाल में इसका प्रारंभ आश्विन कृष्णा १ (पूर्णिमांत) से माना
जाता है जिससे इसमें ५६२-६३ मिलाने से ई. स. और ६४६-५० मिलाने से विक्रम संवत् बनता है.
दक्षिण में इसका प्रचार बादशाह शाहजहां के समय हिजरी सन् १०४६ (ई. स. १६३६=वि.
सं. १६६३) से हुआ और वहां इसका प्रारंभ उसी सन् से गिना गया जिससे उत्तरी और दक्षिणी
फसली संनों के बीच करीब सवा दो वर्ष का अंतर पड़ गया. बंबई इहाते में इसका प्रारंभ
शाहूर सन् की नांई सूर्य के मृगशिर नक्षत्र पर आने के दिन से (तारीख ५, ६ या ७ जून से)
माना जाता है और महीनों के नाम मुहर्रम आदि ही हैं. मद्रास इहाते में इस सन् का प्रारंभ
पहिले तो आडि (कर्क) संक्रांति से ही होता रहा परंतु ई. स. १८०० के आसपास से तारीख १३
जुलाई से माना जाने लगा और ई. स. १८५५ से तारीख १ जुलाई से प्रारंभ स्थिर किया गया है.
दक्षिण के फसली सन् में ५९०-६१ जोड़ने से ई. स. और ६४७-४८ जोड़ने से वि. सं. बनता है.
२६—विलायती सन्.
विलायती सन् एक प्रकार से बंगाल के फसली सन् का ही दूसरा नाम है. इसका प्रचार
उड़ीसे तथा बंगाल के कुछ हिस्सों में है. इसके मास और वर्ष सौर हैं और महीनों के नाम
चैत्रादि नामों से हैं. इसका प्रारंभ सौर आश्विन अर्थात् कन्या संक्रांति से होता है और जिस
दिन संक्रांति का प्रवेश होता है उसीको मास का पहिला दिन मानते हैं. इस सन् में ५६२-६३
जोड़ने से ई. स. और ६४६-५० जोड़ने से वि. सं. बनता है.
३०—अमली सन्.
अमली सन् विलायती सन् के समान ही है. इसमें और विलायती सन् में अंतर केवल इतना
ही है कि इसके नये वर्ष का प्रारंभ भाद्रपद शुक्ला १२ से और उसका कन्या संक्रांति से होता है.
इस संवत् का पक्ष के बीच में ही प्रारंभ होने का कारण ऐसा बतलाया जाता है कि उक्त तिथि को
उड़ीसे के राजा इंद्रद्युम्न का जन्म हुआ था. इस सन् का प्रचार उड़ीसे के व्योपारियों में तथा वहां
की कचहरियों में है.
३१—बंगाली सन्.
बंगाली सन् को 'बंगाब्द' भी कहते हैं. यह भी एक प्रकार से बंगाल के फसली सन् का
प्रकारांतर मात्र है. बंगाली सन् और फसली सन् में अंतर इतना ही है कि इसका प्रारंभ आश्विन
भारतीय संवत् १६३
कृष्णा १ से नहीं किंतु उससे सात महीने बाद मेष संक्रांति (सौर वैशाख) से होता है और महीने सौर हैं
जिससे उनमें पक्ष और तिथि की गणना नहीं है. जिस दिन संक्रांति का प्रवेश होता है उसके दूसरे दिन
को पहिला दिन मानते हैं. इस सन् में ५६३-६४ जोड़ने से ई. स. और ६५०-१ जोड़ने से वि. सं. बनता है.
३२-मगि सन्.
मगि सन् बहुधा बंगाली सन् के समान ही है. अंतर केवल इतना ही है कि इसका प्रारंभ
बंगाली सन् से ४५ वर्ष पीछे माना जाता है. इस लिये इसमें ६३८-३६ जोड़ने से ई. स. और ६६५-
६६ जोड़ने से वि. सं. बनता है. इसका प्रचार बंगाल के चिटागांग ज़िले में है. अनुमान होता है
कि वहांवालों ने बंगाल में फसली सन् का प्रचार होने से ४५ वर्ष पीछे उसको अपनाया हो. इस
सन् के 'मगि' कहलाने का ठीक कारण तो ज्ञात नहीं हुआ परंतु ऐसा माना जाता है कि आरा-
कान के राजा ने ई. स. की ६ वीं शताब्दी में चिटागांग ज़िला विजय किया था और ई. स. १६६६ में
मुग़लों के राज्य में वह मिलाया गया तब तक वहां पर अराकानियों अर्थात् मगों का अधिकार किसी
प्रकार बना रहा था. संभव है कि मगों के नाम से यह मगि सन् कहलाया हो १.
३३-इलाही सन्.
बादशाह अकबर के धर्मसंबंधी विचार पलटने पर उसने 'दीन-इ-इलाही' नाम का नया धर्म
चलाने का उद्योग किया जिसके पीछे उसने 'इलाही सन्' चलाया. अब्दुल कादिर बदायूनी, जो
अकबर के दरबार के विद्वानों में से एक था, अपनी 'मुंतख़बुत्तवारीख' में लिखता है कि 'बादशाह
अकबर ने हिजरी सन् को मिटा कर तारीख़-इ-इलाही नाम का नया सन् चलाया जिसका पहिला वर्ष
बादशाह की गद्दीनशीनी का वर्ष था २.' वास्तव में यह सन् बादशाह अकबर के राज्यवर्ष २६ वें
अर्थात् हिजरी सन् ६६२ (ई. स. १५८४) से चला परंतु पूर्व के वर्षों का हिसाब लगा कर इसका
प्रारंभ अकबर की गद्दी नशीनी के वर्ष से मान लिया गया है. अकबर की गद्दीनशीनी तारीख़ २
रबीउस्सानी हिजरी सन् ६६३ (ई. स. १५५६ तारीख १४ फरवरी=वि. सं. १६१२ फाल्गुन कृष्णा ४)
को हुई थी परंतु उसी दिन से इसका प्रारंभ माना नहीं गया किंतु उससे २५ दिन पीछे तारीख़ २८ रबी-
उस्सानी हि. स. ६६३ (ई. स. १५५६ तारीख ११ मार्च=वि. सं. १६१२ चैत्र कृष्णा अमावास्या) से,
जिस दिन कि ईरानियों के वर्ष का पहिला महीना फरवरदीन लगा, माना गया है. इस सन् के
वर्ष सौर हैं और महीनों ३ तथा दिनों ४ (तारीखों) के नाम ईरानी ही हैं. इस में दिनों (तारीखों)
की संख्या नहीं किंतु १ से ३२ तक के दिनों के नियत नाम ही लिखे जाते थे.
१. ए. ब्रि; जि. १३, पृ. ५००; ११ वां संस्करण. २. क; इं; ई; पृ. ८४.
३. इलाही सन् के १२ महीनों के नाम ये हैं-१ फरवरदीन; २ उर्दिवहिश्त; ३ खूर्दाद; ४ तीर; ५ अमरदाद; ६ शहरेवर;
७ मेहर; ८ आबां (आबान्); ६ आज़र (आदर); १० दे; ११ बहमन; १२ अस्फ़ंदियारमह्. ये नाम ईरानियों के यज्दजर्द सन् के
ही लिये गये हैं.
४. ईरानियों का वर्ष सौर वर्ष है. उसमें तीस तीस दिन के १२ महीने हैं और १२ वें महीने में ५ दिन गाथा
(अहुनवद्, ओश्तवद्, स्पेंतोमद्, वहूक्ष्प्रथ और वहिश्तोयश्त) के मिलाकर ३६५ दिन का वर्ष माना जाता है और १२० वर्ष
में १ अधिक मास महीनों के क्रम से जोड़ा जाता है जिसको 'कबीसा' कहते हैं, परंतु इलाही सन् के महीने कुछ २६ दिन के,
कुछ ३० के, कुछ ३१ के और एक ३२ दिन का भी माना जाता था और वर्ष ३६५ दिन का होता था एवं चौथे वर्ष १
दिन और जोड़ दिया जाता था. महीनों के दिनों की संख्या किस हिसाब से लगाई जाती थी इसका ठीक हाल मालूम
नहीं हो सका. १ से ३२ तक के दिनों के नाम ये हैं-
१ अहुर्मुज्द; २ बहमन; ३ उर्दिवहिश्त; ४ शहरेवर्; ५ स्पंदारमद्; ६ खुर्दाद; ७ मुरदाद (अमरदाद); ८ देपादूर; ६
आज़र (आदर); १० आवां (आवान्); ११ खुरशेद्; १२ माह (महोर); १३ तीर; १४ गोश; १५ देपमेहर; १६ मेहर;
१७ सरोश; १८ रशनह; १६ फरवरदीन; २० बेहराम; २१ राम; २२ गोवाद; २३ देपदीन; २४ दीन; २५ अद् (अशीश्वंग);
२६ आस्ताद; २७ आस्मान्; २८ ज़मिआद; २६ मेहरेस्पंद; ३० अनेरां; ३१ रोज़; ३२ शब. इनमें से ३० तक के नाम तो
ईरानियों के दिनों (तारीखों) के ही हैं और अंतिम दो नये रक्खे गये हैं.
१६४ प्राचीनलिपिमाला.
इस सन् में १५५५-५६ मिलाने से ई. स. और १६१२ मिलाने से विक्रम संवत् बनता है.
यह सन् अक्बर और जहांगीर के समय तक चलता रहा परंतु शाहजहां ने गद्दी बैठते ही (ई. स.
१६२८) इस सन् को मिटा दिया. यह सन् केवल ७२ के करीब ही प्रचलित रहा और अक्बर तथा
जहांगीर के समय की लिखावटों, सिक्कों तथा इतिहास के पुस्तकों में लिखा मिलता है.
३४-ईसवी सन्.
ईसवी सन् ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा मसीह (जीसम् क्राइस्ट) के जन्म के वर्ष से¹ चला
हुआ माना जाता है और ईसा मसीह के नाम से इसको ईसवी सन् कहते हैं. ई. स. की पांचवीं
शताब्दी तक तो इस सन् का प्रादुर्भाव भी नहीं हुआ था. ई. स. ५२७ के आसपास रोम नगर (इटली
में) के रहनेवाले डायोनिसिअस् एक्सिगुअस् नामक विद्वान् पादरी ने मज़हबी सन् चलाने के विचार
से हिसाब लगा कर १८४ वें ओलिंपियड्² के चौथे वर्ष अर्थात् रोम नगर की स्थापना³ से ७५४ वें वर्ष
में ईसा मसीह का जन्म होना स्थिर किया और वहां से लगा कर अपने समय तक के वर्षों की संख्या
नियत कर ईसाइयों में इस सन् का प्रचार करने का उपयोग किया. ई. स. की छठी शताब्दी में
इटली में, आठवीं में इंग्लैंड में, आठवीं तथा नवीं शताब्दी में फ्रान्स, बेल्जिअम्, जर्मनी और
स्विट्ज़रलैंड में और ई. स. १००० के आस पास तक यूरोप के समस्त ईसाई देशों में इसका प्रचार
हो गया, जहां की काल गणना पहिले भिन्न भिन्न प्रकार से थी. अब तो बहुधा सारे भूमंडल में
इसका, कहीं कम कहीं ज्यादा, प्रचार है. सन् के अंकों को छोड़ कर बाकी सब बातों में यह रोमन
लोगों का ही वर्ष है. रोमन लोगों का पंचांग पहिले जुलिअस सीज़र ने स्थिर और ठीक किया था⁴.
१. ईसा मसीह का जन्म किस वर्ष में हुआ यह अनिश्चित है. इस सन् के उत्पादक डायोनिसिअस एक्सिगुअस्
ने ईसा का जन्म रोम नगर की स्थापना से ७५४ वें वर्ष (वि. सं. ५७) में होना मान कर इस संवत् के गत वर्ष स्थिर किये
परंतु अब बहुत से विद्वानों का मानना यह है कि ईसा का जन्म ई. स. पूर्व ८ से ४ के बीच हुआ था न कि ई. स. १ में
(दी न्यू एन्साइक्लोपीडिआ; ऍच. सी. ओ' नील संपादित; पृ. ८७०).
२. ग्रीस (यूनान) देश में ज़ेअस (=जुपिटर = इंद्र) आदि देवताओं के मंदिरों के लिये पवित्र माने जानेवाले ओलिं-
पस् पर्वत के आगे के मैदान में प्राचीन काल से ही प्रति चौथे वर्ष शारीरिक बल की परीक्षा के दंगल हुआ करते थे
जिनको 'ओलिंपिक गेम्स्' कहते थे. इसपर से एक दंगल से दूसरे दंगल के बीच के ४ वर्षों की संज्ञा 'ओलिंपियड्'
हुई. पहिले उस देश में कालगणना के लिये कोई सन् (संवत्) प्रचलित न था इस लिये ई. स. पूर्व २६४ के आसपास
सिसिली नामक द्वीप के रहनेवाले टिमेइअस् नामक विद्वान् ने हिसाब लगा कर जिस ऑलिंपियड् में कोरोइबस् पैदल दौड़
में जीत पाया था उसको पहिला ओलिंपियड् मान कर ग्रीकों में कालगणना की नींव डाली. यह पहिला ओलिंपियड् ई. स.
पूर्व ७७६ में होना माना गया.
३. ग्रीकों की नांई रोमन लोगों में भी प्राचीन काल में कालगणना के लिये कोई सन् प्रचलित न था इस लिये पीछे
से रोम नगर की स्थापना के वर्ष से सन् कायम किया गया, परंतु जिस समय यह सन् स्थिर किया गया उस समय रोम
नगर को बसे कई शताब्दियां बीत चुकी थीं इस लिये वहां के इतिहास के भिन्न भिन्न पुस्तकों में रोम की स्थापना से जो
सन् लिखा गया है उसका प्रारंभ एकसा नहीं मिलता. रोमन इतिहास का सब से प्राचीन लेखक फैबिअस पिक्टर (ई.
स. पूर्व २२०) ई. स. पूर्व ७४७ से; पोलिविअस् (ई. स. पूर्व २०४-१२२) ७५० से; पॉसिअस् कैटो (ई. स. पूर्व २३४-
१४६) ७५१ से; वॉरिअस् फ्लैकस् ७५२ से और टेरेंटिअस् वैर्रो (ई. स. पूर्व ११६-२७) ई. स. पूर्व ७५३ से इस सन् का
प्रारंभ मानता है. वर्तमान इतिहास लेखक वैर्रो का अनुकरण करते हैं.
४. प्रारंभ में रोमन लोगों का वर्ष ३०४ दिन का था जिसमें मार्च से डिसेंबर तक के १० महीने थे. जुलाई के
स्थानापन्न मास का नाम 'क्विंक्टिलिस' और ऑगस्ट के स्थानापन्न का नाम 'सेक्स्टिलिस' था. फिर नुमा पॉम्पिलि-
अस् (ई. स. पूर्व ७१५-६७२) राजा ने वर्ष के प्रारंभ में जैन्युअरी (जनवरी) और अंत में फेब्रुअरी (फरवरी) मास
बढ़ा कर १२ चांद्र मास अर्थात् ३५५ दिन का वर्ष बनाया. ई. स. पूर्व ४५२ से चांद्र वर्ष के स्थान पर सौर वर्ष माना जाने
लगा जो ३५५ दिन का ही होता था परंतु प्रति दूसरे वर्ष (एकांतर से) क्रमशः २२ और २३ दिन बढ़ाते थे,
जिससे ४ वर्ष के १४६५ दिन और १ वर्ष के ३६६ १/४ दिन होने लगे. उनका यह वर्ष वास्तविक सौर वर्ष से करीब
भारतीय संवत्. १६५
उसके पीछे जो अंतर पड़ा उसको पोप ग्रेगरी ने ठीक कर दिया१. इस सन् का वर्ष सौर है जिसका
प्रारंभ तारीख १ जनवरी २ से होता है और जो ३६५ दिन के १२ महीनों में विभक्त है. प्रति चौथे
वर्ष १ दिन ३ फ़रवरी मास में बढ़ा दिया जाता है. ईसाइयों का दिन (तारीख) मध्य रात्रि से प्रारंभ
हो कर दूसरे दिन की मध्य रात्रि तक माना जाता है. इस सन् में ५७-५६ जोड़ने से वि. सं. बनता है.
हिंदुस्तान में अंग्रेज़ों का राज्य होने पर इसका प्रचार इस देश में भी हुआ और यहां का राज-
कीय सन् यही है. लोगों के सामान्य व्यवहार में भी इसका प्रचार बहुत कुछ है.
१ दिन अधिक बड़ा था. इस वर्षगणना से २६ वर्ष में करीब २६ दिन का अंतर पड़ गया जिससे ग्रीकों के वर्षमान का
अनुकरण किया गया जिसमें समय समय पर अधिक मास मानना पड़ता था. इससे भी अंतर बढ़ता ही चला और
जुलिअस सीज़र के समय वह अंतर ६० दिन का हो गया जिससे उसने ई. स. पूर्व ४६ को ४५५ दिन का वर्ष मान कर वह
अंतर मिटा दिया, क्विंक्टिलिस मास का नाम अपने नाम पर से 'जुलाई' रक्खा और आगे के लिये अधिक मास का
झगड़ा मिटा कर ३६५ १/४ दिन का वर्ष नियत कर जैन्युअरी, मार्च, मे, जुलाई, सेप्टेंवर और नवेंवर महीने तो ३१, ३१
दिन के, बाकी के, फेब्रुअरी (फरवरी) के सिवाय, ३०, ३० दिन के और फेब्रुअरी २६ दिन का, परंतु प्रति चौथे वर्ष ३० दिन
का, स्थिर किया. जुलिअस् सीज़र के पीछे ऑगस्टस् ने, जो रोम का पहिला बादशाह हुआ, सेक्स्टाइलिस मास का नाम अपने
नाम से ऑगस्ट रक्खा और उसको ३१ दिन का, फेब्रुअरी को २८ दिन का, सप्टेंबर और नवंबर को ३०, ३० दिन का और
डिसंबर को ३१ का बनाया. इसी परिवर्तन के अनुसार ई. स. के महीनों के दिनों की संख्या अब तक चली आ रही है.
१. जुलिअस् सीज़र का स्थिर किया हुआ ३६५ १/४ दिन का सौर वर्ष वास्तविक सौर वर्ष से ११ मिनिट और १४
सैकंड बड़ा था जिससे करीब १२८ वर्ष में १ दिन का अंतर पड़ने लगा. इस अंतर के बढ़ते बढ़ते ई. स. ३२५ में मेष का
सूर्य, जो जुलिअस् सीज़र के समय २५ मार्च को आया था, ता० २१ मार्च को आ गया और ई. स. १५८२ में ११ मार्च को
आ गया. पोप ग्रेगरी (१३ वें) ने सूर्य के चार में इतना अंतर पड़ा हुआ देख कर ता० २२ फ़रवरी ई. स. १५८२ को यह
आज्ञा दी कि इस वर्ष के अक्टूबर मास की चौथी तारीख के बाद का दिन १५ अक्टोबर माना जावे. इससे लौकिक सौर
वर्ष वास्तविक सौर वर्ष से मिल गया. फिर आगे के लिये ४०० वर्ष में ३ दिन का अंतर पड़ता देख कर उसको मिटाने के
लिये पूरी शताब्दियों के वर्षों (१६००, १७०० आदि) में से जिनमें ४०० का भाग पूरा लग जावे उन्हीं में फेब्रुअरी के २६
दिन मानने की व्यवस्था की. इस व्यवस्था के बाद अंतर इतना सूक्ष्म रहा है कि करीब ३३२० वर्ष के बाद फिर १ दिन का अंतर
पड़ेगा. पोप ग्रेगरी की आज्ञा के अनुसार रोमन कैथॉलिक संप्रदाय के अनुयायी देशों अर्थात् इटली, स्पेन, पोर्चुगाल आदि
में तो ता० ४ ऑक्टूबर के स्थान में १५ ऑक्टूबर मान ली गई परंतु प्रोटेस्टंट संप्रदाय के अनुयायी देशवालों ने प्रारंभ में
इसका विरोध किया तो भी अंत में उनको भी लाचार इसे स्वीकार करना पड़ा. जर्मनीवालों ने ई. स. १७६६ के अंत के १०
दिन छोड़ कर १७०० के प्रारंभ से इस गणना का अनुकरण किया. इंग्लैंड में ई. स. १७५२ में इसका प्रचार हुआ परंतु
उस समय तक एक दिन का और अंतर पड़ गया था इस लिये ता० २ सेप्टेंवर के बाद की तारीख (३) को १४ सप्टेंबर
मानना पड़ा. रशिया, ग्रीस आदि ग्रीक चर्च संप्रदाय के अनुयायी देशों में केवल अभी अभी इस शैली का अनुकरण हुआ
है. उनके यहां के दस्तावेज़ आदि में पहिले दोनों तरह अर्थात् जुलिअस् एवं ग्रेगरी की शैली से तारीखें लिखते रहे जैसे
कि २० एप्रिल तथा ३ मे आदि.
२. ई. स. का प्रारंभ तारीख १ जनवरी से माना जाता है परंतु यह गणना अधिक प्राचीन नहीं है. ई. स. के उत्पादक
डायोनिसिअस् ने इसका प्रारंभ तारीख २५ मार्च से माना था और वैसा ही ई. स. की १६ वीं शताब्दी के पीछे तक युरोप
के अधिकतर राज्यों में माना जाता था. फ्रान्स में ई. स. १६६३ से वर्ष का प्रारंभ तारीख १ जनवरी से माना जाने लगा.
इंग्लैंड में ई. स. की सातवीं शताब्दी से क्रिस्टम्स् के दिन (तारीख २५ डिसंबर) से माना जाता था. १२ वीं शताब्दी से २५
मार्च से माना जाने लगा और ई. स. १७५२ से, जब कि पोप ग्रेगरी के स्थिर किये हुए पंचांग का अनुकरण किया गया,
तारीख १ जनवरी से सामान्य व्यवहार में वर्ष का प्रारंभ माना गया (इसके पूर्व भी अंग्रेज़ ग्रंथकारों का ऐतिहासिक वर्ष
तारीख १ जनवरी से ही प्रारंभ होता था).
३. जिस वर्ष के अंकों में ४ का भाग पूरा लग जाय उसमें फेब्रुअरी के २६ दिन होते हैं. शताब्दियों के वर्षों में से
जिसमें ४०० का भाग पूरा लग जाय उसके २६ और बाकी के २८ जैसे कि ई. स. १६०० और २००० के २६, २६ दिन और
१७००, १८०० और १९०० के २८, २८ दिन.
परिशिष्ट में दिये हुए भिन्न भिन्न संवतों का ईसवी सन् से संबंध.
शताब्दी के अंक रहित सप्तर्षि संवत् = ई. स. २४-२५ (शताब्दी के अंक रहित).
कलियुग संवत् (गत) – ३१०१-३१०० = ईसवी सन्.
वीरनिर्वाण संवत् – ५२७-२६ = ईसवी सन्.
बुद्धनिर्वाण संवत् – ४८७ (?) = ईसवी सन्.
मौर्य संवत् -- ३२० (?) = ईसवी सन्.
सेल्युकिडि संवत् – ३१२-११ = ईसवी सन्.
चैत्रादि विक्रम संवत् (गत) – ५७-५६ = ईसवी सन्.
शक संवत् (गत) + ७८-७९ = ईसवी सन्.
कलचुरि संवत् + २४८-४९ = ईसवी सन्.
गुप्त संवत् + ३१९-२० = ईसवी सन्.
गांगेय संवत् + ५७० (?) = ईसवी सन्.
हर्ष संवत् + ६०६-७ = ईसवी सन्.
भाटिक
शुद्धिपत्र.
इन अशुद्धियों में से बहुत सी तो छपते समय मात्राओं के टूटने या हिल जाने या अक्षरों के निकलने से हुई हैं. संभव
है कि कितनी एक प्रतियों में इनमें से कुछ अशुद्धियां न हुई हों और उसी कारण से दूसरी अशुद्धियां हो
गई हों इसलिये पाठकों से निवेदन है कि अर्थ के अनुसार उन्हें सुधार कर पढ़ें.
पृष्ठ. पंक्ति. अशुद्ध. शुद्ध. | पृष्ठ. पंक्ति. अशुद्ध. शुद्ध.
१ ३५ कहते ह ... कहते हैं | ५२ ३१ सचत् ... संवत्
८ ३१ ॰ह्यापराह्ण ... ॰ह्यपराह्ण | ५५ २५ जाड कर ... जोड़ कर
,, ३७ तृषिमषि॰ ... तृषिमृषि॰ | ७४ ६ श्रौ और श्रौ ... श्रो और श्रो
६ २७ मत्योरा॰ ... मृत्योरा॰ | ,, १४ अंशो में ... अंशों में
,, ३० स्पर्षरूपं ... स्पर्शरूपं | ७५ १ ॰लङ्कति॰ ... ॰लङ्कृति॰
,, ३३ अणकराँ ... अणकाराँ | ,, २६ जिनमें, स ... जिनमें से
,, ४१ ॰वदत्त ते. ... ॰वदत् ते | ७६ ७ सुरारिः ... मुरारिः
१० ३३ ११८; १४।१६; २८।१४... ... ११६; १४।१२; २८।२४ | ७६ २३ सी; गु. इ; ... क्री; गु. इ;
,, ३६ सप्तक्षरं ... सप्ताक्षरं | ८३ ३८ जि. पृ. १७२ ... जि. ६, पृ. १७२
,, ४२ पृष्ट ... पृष्ठ | ८४ ४ ॰गोप्रद परम॰ ... ॰गोप्रदपरम॰
११ २८ द्यते प्रवृत्तानां ... द्यूते प्रवृत्तानां | ८५ १६ जयत्यहं ... जयत्यहँ
१४ ३४ इसस ... इससे | ,, १६ ॰स्वाङ्ध्य॰ ... ॰स्वाङ्ख्या॰
१६ १७ ‘पंपायरस्’ ... ‘पॅपायरस्’ | ८७ १२ कारणः ... कारणं
१८ ३७ ॰मृत्य्र्यद्धा॰ ... ॰रयितं ॰मृत्युद्धा॰ ... रयितुं | ८६ १६ जसी ... जैसी
यज्य॰ ... ॰रयितं यज्य॰ युज्य॰ ... रयितुं युज्य॰ | ६६ ३० वालककायम ... वालककामय
२२ २७ पहिला ... पहिली | ८८ १ हस्व ... ह्रस्व
२७ ३४ और ... ओर | ८६ १६ संयुक्ताक्षिरों ... संयुक्ताक्षरों
२६ ६ रात दिन ... दिन रात | १०१ ३५ संभव हे ... संभव है
,, १२ सहित्य ... साहित्य | १०३ २८ चिह्नां के ... चिह्नों के
३२ २३ पश्चिर्मों ... पश्चिमी | ,, ३० शंका की है ... शंका ही है
३४ ३१ जामाया ... जमाया | १०४ २ चिह्न क साथ ... चिह्न के साथ
३५ ७ ई. स. पूर्व ३१६ ... ई. स. पूर्व ५१६ | १०६ २० दहाईयों ... दहाइयों
४० ५ हुई ... ... हुई | १०७ ६ किन्ही ... किन्हीं
४७ १६ गोलाइदार ... गोलाईदार | ११० १६ बन्नैल ... बर्नेल
४८ ३७ लकरि ... लकीर | १११ २४ अकौं ... ... अंकों
५२ २ नागरा ... नागरी | ११२ ३२ डिमाटिक ... डिमॉटिक्
५५ १६ ‘नौ’ और ‘मा’ ... ‘नौ’ और ‘मौ’ | ,, ३४ सामनता ... समानता
५६ १८ पांचवा ... पांचवां | ११४ १२ हिएरोग्लिफि ... हिएरोग्लिफिक्
,, ३४ त्र्रकूटक ... त्रैकूटक | ,, २५ हिपेरंटि ... हिपेरैटिक्
६१ १४ ॰जंटान्तर्गुहा- ... ॰जंटान्तर्गुहा- | ११६ २ सहाचार्य ... सिंहाचार्य
६२ ५ मतापि॰ ... मातापि॰ | ,, १६ रव्यदये ... रव्युदये
,, २३ पूवयमु॰ ... पूर्वेयमु॰ | ,, २० तदगरूणा ... तद्गुरूणा
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitized by eGangotri
Plate 1. लिपिपत्र पहिला.
मौर्यवंशी राजा अशोक के गिरनार के चटान पर के लेख से
(ईसवी सन् पूर्व की ३री शताब्दी.)
अ अ अ अ आ इ इ ई उ उ ए ए ए ओ अं कं क
𑀅 𑀅 𑀅 𑀅 𑀆 𑀇 𑀇 𑀈 𑀉 𑀉 𑀏 𑀏 𑀏 𑀑 𑀅𑀁 𑀓𑀁 𑀓
ख ख ग ग ग घ च च च छ छ ज ज ज ज झ झ
𑀔 𑀔 𑀕 𑀕 𑀕 𑀖 𑀘 𑀘 𑀘 𑀙 𑀙 𑀚 𑀚 𑀚 𑀚 𑀛 𑀛
ञ ट ट ड ढ ण त त त त थ द द द ध ध न
𑀜 𑀝 𑀝 𑀟 𑀠 𑀡 𑀢 𑀢 𑀢 𑀢 𑀣 𑀤 𑀤 𑀤 𑀥 𑀥 𑀦
न प प फ फ ब ब भ भ म म य य य र र र र
𑀦 𑀧 𑀧 𑀨 𑀨 𑀩 𑀩 𑀪 𑀪 𑀫 𑀫 𑀬 𑀬 𑀬 𑀭 𑀭 𑀭 𑀭
ल ल व व व व स स स ह ह खा जा मा रा बा टि नि
𑀮 𑀮 𑀯 𑀯 𑀯 𑀯 𑀲 𑀲 𑀲 𑀳 𑀳 𑀔𑀸 𑀚𑀸 𑀫𑀸 𑀭𑀸 𑀩𑀸 𑀝𑀺 𑀦𑀺
लि टो ढी यी पी मी तु धु नु सु कू जू के टे णै थै
𑀮𑀺 𑀝𑁄 𑀠𑀻 𑀬𑀻 𑀧𑀻 𑀫𑀻 𑀢𑀼 𑀥𑀼 𑀦𑀼 𑀲𑀼 𑀓𑀽 𑀚𑀽 𑀓𑁂 𑀝𑁂 𑀡𑁃 𑀣𑁃
गो ञो नो क्र त्र त्पा ब्रा म्य न्हि र्व व्यो स्टा स्ति स्ति स्मा ख्व
𑀕𑁄 𑀜𑁄 𑀦𑁄 𑀓𑁆𑀭 𑀢𑁆𑀭 𑀢𑁆𑀧𑀸 𑀩𑁆𑀭𑀸 𑀫𑁆𑀬 𑀦𑁆𑀳𑀺 𑀭𑁆𑀯 𑀯𑁆𑀬𑁄 𑀲𑁆𑀝𑀸 𑀲𑁆𑀢𑀺 𑀲𑁆𑀢𑀺 𑀲𑁆𑀫𑀸 𑀔𑁆𑀯
𑀇𑀬𑀁 𑀥𑀁𑀫𑀮𑀺𑀧𑀺 𑀤𑁂𑀯𑀸𑀦𑀁𑀧𑀺𑀬𑁂𑀦 𑀧𑀺𑀬𑀤𑀲𑀺𑀦𑀸 𑀭𑀸𑀜𑀸
𑀮𑁂𑀔𑀸𑀧𑀺𑀢𑀸 𑀇𑀥 𑀦 𑀓𑀺𑀁𑀘𑀺 𑀚𑀻𑀯𑀁 𑀆𑀭𑀪𑀺𑀢𑁆𑀧𑀸 𑀧𑁆𑀭𑀚𑀽𑀳𑀺𑀢𑀯𑁆𑀬𑀁 𑀦
𑀘 𑀲𑀫𑀸𑀚𑁄 𑀓𑀢𑀯𑁆𑀬𑁄 𑀩𑀳𑀼𑀓𑀁 𑀳𑀺 𑀤𑁄𑀲𑀁 𑀲𑀫𑀸𑀚𑀫𑁆𑀳𑀺 𑀧𑀲𑀢𑀺
𑀤𑁂𑀯𑀸𑀦𑀁𑀧𑀺𑀬𑁄 𑀧𑀺𑀬𑀤𑀲𑀺 𑀭𑀸𑀚𑀸 𑀅𑀲𑁆𑀢𑀺 𑀧𑀺𑀢𑀼 𑀏𑀓𑀘𑀸 𑀲𑀫𑀸𑀚𑀸
𑀲𑀸𑀥
Plate II. लिपिपत्र दूसरा.
मोर्य्यवंशी राजा अशोक के अन्य लेखों से उद्धृत किये हुए मुख्य मुख्य अक्षर.
(ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी).
देहल्ली के शिवालिक स्तंभ के लेख से.
अ आ ओ ख च ज ठ द ध म स जा पिं नी ख्य ध्य भ्युं
𑀅 𑀆 𑀑 𑀔 𑀘 𑀚 𑀞 𑀤 𑀥 𑀫 𑀲 𑀚𑀸 𑀧𑀺𑀁 𑀦𑀻 𑀔𑁆𑀬 𑀥𑁆𑀬 𑀪𑁆𑀬𑀼𑀁 .
खालसी के चटान के लेख से.
अ अ उ ए ए ख ख ग घ कू ज ज ज ड त ल ल गू
𑀅 𑀅 𑀉 𑀏 𑀏 𑀔 𑀔 𑀕 𑀖 𑀓𑀽 𑀚 𑀚 𑀚 𑀟 𑀢 𑀮 𑀮 𑀕𑀽
गू गू गू ष ष स ह ता शा शि तु खे गे ले व्य ह्म
𑀕𑀽 𑀕𑀽 𑀕𑀽 𑀱 𑀱 𑀲 𑀳 𑀢𑀸 𑀰𑀸 𑀰𑀺 𑀢𑀼 𑀔𑁂 𑀕𑁂 𑀮𑁂 𑀯𑁆𑀬 𑀳𑁆𑀫 .
जोगड के लेख से. सिद्धापुर. रधिआ. सारनाथ. सांची.
ओ द ल स ह ह अ फ म र खु ड द ह खु
𑀑 𑀤 𑀮 𑀲 𑀳 𑀳 . 𑀅 𑀨 𑀫 𑀭 . 𑀔𑀼 𑀟 . 𑀤 𑀳 . 𑀔𑀼 .
𑀤
Plate III. लिपिपत्र तीसरा.
रामगढ़, घोसुंडी आदि के लेखों से उद्धृत किये हुए मुख्य मुख्य अक्षर.
(ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी).
रामगढ़. घौंसुंडी. बेसनगर.
खे चि गु क चे प्रा र्णं अ आ य चा चे द्र छ्व मं
𑀔𑁂 𑀘𑀺 𑀕𑀼 𑀓 𑀘𑁂 𑀧𑁆𑀭 𑀭𑁆𑀡𑀁 𑀅 𑀆 𑀬 𑀘𑀸 𑀘𑁂 𑀤𑁆𑀭 𑀙𑁆𑀯 𑀫𑀁.
नागार्जुनी गुफ़ा. नाना घाट के लेखों से.
द ल ष सू इं ख ग च ड त प भ ल स ह णी
𑀤 𑀮 𑀱 𑀲𑀽 . 𑀇 𑀔 𑀕 𑀘 𑀟 𑀢 𑀧 𑀪 𑀮 𑀲 𑀳 𑀡𑀻
वी पु ऊ सु सु धू यो लो कं प्र ब्र न्ह र्ग ब्र
𑀯𑀻 𑀧𑀼 𑀊 𑀲𑀼 𑀲𑀼 𑀥𑀽 𑀬𑁄 𑀮𑁄 𑀓𑀁 𑀧𑁆𑀭 𑀩𑁆𑀭 𑀦𑁆𑀳 𑀭𑁆𑀕 𑀩𑁆𑀭 .
भरझुत स्तूप के लेखों से. सांची हाथो गुंफा.
उ ऊ ख ज ण र क्रि वि गो ळी ए ऐ क घ कू
𑀉 𑀊 𑀔 𑀚 𑀡 𑀭 𑀓𑁆𑀭𑀺 𑀯𑀺 𑀕𑁄 . 𑀴𑀻 . 𑀏 𑀐 𑀓 𑀖 𑀓𑀽
ड त द न प म र धि भिं लिं वो रो ङ ळे ले गो मो यो
𑀟 𑀢 𑀤 𑀦 𑀧 𑀫 𑀭 𑀥𑀺 𑀪𑀺𑀁 𑀮𑀺𑀁 𑀯𑁄 𑀭𑁄 𑀴𑁂 𑀮𑁂 𑀕𑁄 𑀫𑁄 𑀬𑁄
𑀲𑀼𑀢𑀦𑀼𑀓𑀸 𑀦𑀸𑀫 | 𑀤𑁂𑀯𑀤𑀸𑀲𑀺𑀓𑁆𑀬𑀺 | 𑀢𑀁 𑀓𑀸𑀫𑀬𑀣 | 𑀯𑀮𑀦𑀼𑀱𑁂
𑀤𑁂𑀯𑀤𑀺𑀦𑁂 𑀦𑀸𑀫 | 𑀮𑀼𑀧𑀤𑀔𑁂 | 𑀤𑁂𑀯𑀤𑀸𑀲𑀺𑀓𑁆𑀬𑀺 | 𑀢𑀁 𑀓𑀸𑀫𑀬𑀣 |
𑀯𑀮𑀦𑀼𑀱𑁂 𑀤𑁂𑀯𑀤𑀺𑀦𑁂 𑀦𑀸𑀫 𑀮𑀼𑀧𑀤𑀔𑁂 .
𑀲𑀺𑀥𑀁 𑀭𑀜𑁄 :: 𑀲𑀺𑀥𑀁 𑀭𑀜𑁄 𑀫𑀸𑀠𑀭𑀺𑀧𑀼𑀢𑀲 𑀲𑀺-
𑀯𑀲---------𑀭---------𑀲𑀺𑀤𑀢𑁄 . 𑀲 𑀚𑀸𑀢𑀼𑀓𑀡𑁄 𑀲𑀯𑀞𑀸𑀦-
𑀢𑀯𑀸𑀲𑀺𑀓𑀸𑀦𑀁 𑀭𑀜𑁄 𑀢𑁂𑀯𑀸𑀲𑀺𑀓𑁂𑀦 𑀉𑀧𑀸𑀲𑀓𑁂𑀦 |----------
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Plate IV. लिपिपत्र चौथा.
भट्टिप्रोलु के स्तूप के १० लेखों से.
(ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी.)
अ अ आ आ उ ओ क ख ग ग घ च छ ज ठ ण त
𑀅 𑀅 𑀆 𑀆 𑀉 𑀑 𑀓 𑀔 𑀕 𑀕 𑀖 𑀘 𑀙 𑀚 𑀞 𑀡 𑀢
त थ द ध न प फ ब भ म म य र र ल ल व ष
𑀢 𑀣 𑀤 𑀥 𑀦 𑀧 𑀨 𑀩 𑀪 𑀫 𑀫 𑀬 𑀭 𑀭 𑀮 𑀮 𑀯 𑀱
श ह ह ळ का खा जा दा ता पा रा रा कि ठि नि पि वि
𑀰 𑀳 𑀳 𑀴 𑀓𑀸 𑀔𑀸 𑀚𑀸 𑀤𑀸 𑀢𑀸 𑀧𑀸 𑀭𑀸 𑀭𑀸 𑀓𑀺 𑀞𑀺 𑀦𑀺 𑀧𑀺 𑀯𑀺
ळि णी षी कु खु जु जु तु तु तु पु बु मु जू बू बू
𑀴𑀺 𑀡𑀻 𑀱𑀻 𑀓𑀼 𑀔𑀼 𑀚𑀼 𑀚𑀼 𑀢𑀼 𑀢𑀼 𑀢𑀼 𑀧𑀼 𑀩𑀼 𑀫𑀼 𑀚𑀽 𑀩𑀽 𑀩𑀽
के के खे जे को गो गो टो णो णो दो नो पो बो रो रो
𑀓𑁂 𑀓𑁂 𑀔𑁂 𑀚𑁂 𑀓𑁄 𑀕𑁄 𑀕𑁄 𑀝𑁄 𑀡𑁄 𑀡𑁄 𑀤𑁄 𑀦𑁄 𑀧𑁄 𑀩𑁄 𑀭𑁄 𑀭𑁄
लो षो सो हो गं जं सं ग ला ग्र श्ला हि
𑀮𑁄 𑀱𑁄 𑀲𑁄 𑀳𑁄 𑀕𑀁 𑀚𑀁 𑀲𑀁 . 𑀕 𑀮𑀸 𑀕𑁆𑀭 𑀰𑁆𑀮𑀸 𑀳𑀺 .
𑀓𑀼𑀭𑀲𑀧𑀺𑀢𑀼 𑀘 𑀓𑀼𑀭𑀲 𑀘 𑀓𑀼𑀭𑀼𑀘𑀳𑀼 𑀘 𑀉𑀢𑀭𑁄 𑀘 𑀫... (कुरा[र]सपितु च कुरस च कुरुचहु च उतरो च म...)
𑀧𑀸𑀲𑀁 𑀧𑁄𑀝𑀓 𑀕𑁄𑀯𑀢𑀺𑀲𑀲 𑀘 𑀩𑀼𑀥𑀺𑀲𑀺𑀭𑀺𑀲𑁄 𑀲𑀸𑀢... (पास[ष] पोटक गोवतिसस च बुधिसिरिसो सात...)
𑀩𑀼𑀯𑀺𑀲𑀲 𑀓𑀼𑀭𑀼 𑀅𑀧𑀮𑀓𑀲 𑀫𑀳𑀺... 𑀧𑀸𑀭𑀸 𑀳𑀺... (बुविसस कुरु अपलकस महि... पारा हि...)
𑀕𑁄𑀯𑀺𑀲 𑀓𑁂𑀯𑀝... 𑀆𑀚𑀤𑀸𑀢𑀺... 𑀲𑀫𑀡... (गोविस केवल... आजदाति... समण...)
𑀳 𑀘 𑀅𑀭𑀕 𑀘 𑀢𑁄𑀲𑁄 𑀓𑁂𑀯𑀝𑁄 𑀚𑀦𑁄 𑀓𑁄𑀭𑀸𑀓𑁄 𑀭𑁂 (ह च अरग च तोसो केवल जनो कोराको रे)
𑀭𑀢... 𑀦𑀸𑀣 𑀞𑀞 𑀘𑀧 𑀧𑁂𑀭 𑀧𑀢 𑀢𑀭 𑀦𑀢... (रत... नाथ ठठ चप पेर पत तर नत...)
𑀫𑀤𑀦 𑀅𑀦𑀓 𑀫𑀢𑀭 𑀓𑁂𑀮 𑀓𑁂 𑀯𑀝 𑀢𑁂 𑀞𑀤... (मदन अनक मतर केल के वट ते ठद...)
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Plate V.
लिपिपत्र पांचवां.
पभोसा और मथुरा के लेखों से उद्धृत किये हुए मुख्य मुख्य अक्षर.
(ई. स. पूर्व की पहिली शताब्दी के आसपास).
पभोसा के २ लेखों से.
अ आ ज क ढ त द र सा मि री पू ले गो ज्ञो
𑀅 𑀆 𑀚 𑀓 𑀠 𑀢 𑀤 𑀭 𑀲𑀸 𑀫𑀺 𑀭𑀻 𑀧𑀽 𑀮𑁂 𑀕𑁄 𑀚𑁆𑀜𑁄
मथुरा के ४ जैन लेखों से.
आं इं उ ख त द प फ म य र र र र व व व स
𑀆𑀁 𑀇𑀁 𑀉 𑀔 𑀢 𑀤 𑀧 𑀨 𑀫 𑀬 𑀭 𑀭 𑀭 𑀭 𑀯 𑀯 𑀯 𑀲
ह ळ मा कि शि शि गो पो तो मो च द्र र्ध स्य
𑀳 𑀴 𑀫𑀸 𑀓𑀺 𑀰𑀺 𑀰𑀺 𑀕𑁄 𑀧𑁄 𑀢𑁄 𑀫𑁄 𑀘 𑀤𑁆𑀭 𑀭𑁆𑀥 𑀲𑁆𑀬
महाक्षत्रप शोडास के समय के मथुरा के जैन लेख से:
अ आ क ज ठ ड त थ द ध न प भ म य र
𑀅 𑀆 𑀓 𑀚 𑀞 𑀟 𑀢 𑀣 𑀤 𑀥 𑀦 𑀧 𑀪 𑀫 𑀬 𑀭
ल व श स ह जा था दि घो शो क्ष त्त त्थ र्ध स्व
𑀮 𑀯 𑀰 𑀲 𑀳 𑀚𑀸 𑀣𑀸 𑀤𑀺 𑀖𑁄 𑀰𑁄 𑀓𑁆𑀱 𑀢𑁆𑀢 𑀢𑁆𑀣 𑀭𑁆𑀥 𑀲𑁆𑀯
[अभिलेख पं० १] 𑀭𑀸𑀜𑁄 𑀯𑀁𑀕𑀧𑀸𑀮𑀲 𑀅𑀳𑀺𑀙𑀢𑁆𑀭𑀸𑀥𑀺𑀧𑀢𑀺𑀦𑁄 𑀩𑁄𑀥𑀺𑀫𑀺𑀢𑁆𑀢𑀧𑁄𑀢𑁆𑀢𑀲
[अभिलेख पं० २] 𑀬𑀲 ---------- 𑀢𑁂𑀦𑁂𑀤𑀁 𑀮𑁂𑀡𑀁 𑀓𑀸𑀭𑀺𑀢𑀁 ----------
[अभिलेख पं० ३] 𑀲𑀯𑀦 𑀫𑀼𑀔𑀲𑀯𑀲 𑀅𑀫𑁄𑀳𑀺𑀦𑀸𑀬𑁂 𑀓𑁄𑀘𑀺𑀬𑀸𑀬𑁂
[अभिलेख पं० ४] 𑀭𑀡𑁄 𑀪𑀸𑀭𑀺𑀬𑀸𑀬𑁂 𑀯𑀸𑀡𑀲 𑀲𑀢𑁄 . 𑀪𑀤𑁆𑀭𑀖𑁄𑀱𑀲 𑀪𑀚𑀸𑀬𑀸
[अभिलेख पं० ५] 𑀢𑀲𑀸 𑀧𑀼𑀢𑁂𑀡 𑀫𑁄𑀳𑀺𑀬𑁂𑀡 𑀧𑀸𑀲𑀸𑀤𑁄 𑀭𑀢𑁄 𑀅𑀭𑀳𑀁𑀢𑀧𑀽𑀚𑀸𑀬𑁂
[अभिलेख पं० ६] 𑀦𑀸𑀦𑀸𑀯𑀺𑀥𑀸𑀬 𑀧𑀽𑀚𑀸𑀬 𑀉𑀧𑀝𑁆𑀞𑀺𑀢𑁄 𑀪𑀯𑀢𑀼 𑀲𑀯𑁆𑀯𑀲𑀢𑁆𑀢𑀸𑀦𑀁
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Plate VI.
लिपिपत्र छठा.
कुशनवंशी राजाओं के समय के मथुरा, सारनाथ आदि के लेखों से.
(ई. स. की पहिली व दूसरी शताब्दी).
मथुरा के लेखों से.
अ अ अ आ इ ई उ उ ए ए ए ओ क ख ख ख ग ग
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
ग घ च च च च च छ ज ज झ ट ठ ड ढ ढ ण ण
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
ण ण ण त थ द द ध न न न प ब भ भ भ म म
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
य य र र र ल ल व व श श ष ष ष स स स स
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
ह ह ह ह ळ जा जा णा णा ता वा रा षा णि थि वी सी
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
दु तु तु दू गु गृ वृ $\frac{हि}{हे}$ $\frac{तो}{गो}$ खो ग्ग द्य द्ध र्य्य स्ति स्य
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
सारनाथ के लेखों से. चार गांव के लेख से.
णि दि वु च छ द्धे व्य स्फ . ग ह ण्ड य्य य्य स्य स्य
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
[चारगांव अभिलेख, पंक्ति १ — ब्राह्मी लिपि: महाराजस्य राजातिराजस्य देवपुत्रस्य हुविष्कस्य सं...]
[चारगांव अभिलेख, पंक्ति २ — ब्राह्मी लिपि]
[चारगांव अभिलेख, पंक्ति ३ — ब्राह्मी लिपि]
[चारगांव अभिलेख, पंक्ति ४ — ब्राह्मी लिपि]
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Plate VII.
लिपिपत्र सातवां.
शक उषवदात और उसकी स्त्री दक्षमित्र के नाशिक के ५ लेखों से.
(ई. स. की दूसरी शताब्दी).
अ आ इ उ उ ए ओ क ख ख ख ग घ च च छू ज
झ ट ठ ड ढ ण त त थ द द ध न प फ ब भ
भ म य य र र ल ल ल व व श ष स स ह ह
ळ म् जा जा टा दा सा नि यि रि लि ली दो नो कु खु डुं नू
भू मू क्त वृ ये ले पो न्न या ज्ञः त्य त्र ब्रा ब्रा र्णी र्षस्य
𑀲𑀺𑀥𑀁 [𑀭𑀜𑁄] 𑀔𑀳𑀭𑀸𑀢𑀲 𑀔𑀢𑀧𑀲 𑀦𑀳𑀧𑀸𑀦𑀲 𑀤𑀸-
𑀢𑀼 𑀤𑀻𑀦𑀻𑀓𑀧𑀼𑀢𑁂𑀦 𑀉𑀱𑀯𑀤𑀸𑀢𑁂𑀦 𑀢𑁆𑀭𑀺𑀭𑀲𑁆𑀫𑀺𑀧𑀯𑀢𑁂𑀱𑀼 𑀕𑁄-
𑀯𑀥𑀦𑁂 𑀢𑁆𑀭𑀬𑁄𑀤𑀰𑀮𑁂𑀡𑀓𑁂𑀱𑀼 𑀇𑀫𑀸𑀦𑀺 𑀘𑁂𑀢𑀺𑀬-𑀖𑀭𑀸𑀡𑀺
𑀘𑁂𑀢𑀺𑀬𑀯𑀭𑀸𑀡𑀺 𑀘 𑀧𑀢𑀺𑀞𑀸𑀧𑀺𑀢𑀸𑀦𑀺 𑀅𑀦𑁂𑀓𑀸𑀦𑀺 𑀧𑁄𑀣𑀺𑀬𑁄-
𑀤𑀓𑀯𑀸𑀧𑀻𑀑 𑀘 𑀧𑀤𑀭𑀢𑁄 𑀢𑀢𑁄 𑀧𑀯𑀢𑁂𑀲𑀼 𑀅𑀧𑀭𑀸𑀦𑁆𑀢𑁂𑀱𑀼
𑀲𑀧𑁆𑀢𑀸𑀡𑀁 𑀅𑀧𑀡𑁂 𑀕𑀸𑀯𑁂 𑀓𑀤𑀺𑀢𑀸 𑀯𑀮𑀽𑀭𑀓𑁂𑀲𑀼
𑀧𑀼𑀯𑀭𑀫𑁂𑀢𑁂𑀱𑀼 𑀅𑀚𑀺𑀢𑀫𑁂𑀢𑁂𑀱𑀼 𑀏𑀢𑁂𑀱𑀼 : 𑀩𑀸𑀳𑀼𑀓𑀸𑀬𑀁
𑀦𑀤𑀺𑀬𑀁 𑀩𑀸𑀡𑀸𑀲𑀸𑀬𑀁 𑀧𑀺𑀢𑀮𑀺𑀬𑀸𑀁 𑀓𑀭𑀯𑀺𑀓𑀸𑀬𑀁 𑀤𑀳𑀦𑀼𑀓𑀸𑀬𑀁
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Plate VIII. लिपिपत्र आठवां.
क्षत्रप वंशी राजा रुद्रदामा के गिरनार के चट्टान पर के लेख से.
(ई. स. की दूसरी शताब्दी).
अ आ इ ए क ख ग घ च छ ज झ ञ ट ठ ड
𑀅 𑀆 𑀇 𑀏 𑀓 𑀔 𑀕 𑀖 𑀘 𑀙 𑀚 𑀛 𑀜 𑀝 𑀞 𑀟
ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म म य य र
𑀟 𑀠 𑀡 𑀢 𑀣 𑀤 𑀥 𑀦 𑀧 𑀨 𑀩 𑀪 𑀫 𑀫 𑀬 𑀬 𑀭
र ल ल व व श ष स स ह ह ळ का जा टा मा धि
𑀭 𑀮 𑀮 𑀯 𑀯 𑀰 𑀱 𑀲 𑀲 𑀳 𑀳 𑀴 𑀓𑀸 𑀚𑀸 𑀝𑀸 𑀫𑀸 𑀥𑀺
यिं की पी कु नु रु डू मू रू क्क गृ वृ दे पे नै वै गो तो
𑀬𑀺𑀁 𑀓𑀻 𑀧𑀻 𑀓𑀼 𑀦𑀼 𑀭𑀼 𑀟𑀽 𑀫𑀽 𑀭𑀽 𑀓𑁆𑀓 𑀕𑀾 𑀯𑀾 𑀤𑁂 𑀧𑁂 𑀦𑁃 𑀯𑁃 𑀕𑁄 𑀢𑁄
नौ पौ मौ यौ क्रि च्त ज्ञ द्वा द्य द्यु द्र प्र र्जि र्या द्व स्मा त्
𑀦𑁅 𑀧𑁅 𑀫𑁅 𑀬𑁅 𑀓𑁆𑀭𑀺 𑀘𑁆𑀢 𑀚𑁆𑀜 𑀤𑁆𑀯𑀸 𑀤𑁆𑀬 𑀤𑁆𑀬𑀼 𑀤𑁆𑀭 𑀧𑁆𑀭 𑀭𑁆𑀚𑀺 𑀭𑁆𑀬𑀸 𑀤𑁆𑀯 𑀲𑁆𑀫𑀸 𑀢𑁆
𑀲𑀺𑀤𑁆𑀥𑀁 𑀇𑀤𑀁 𑀢𑀟𑀸𑀓𑀁 𑀲𑀼𑀤𑀭𑁆𑀰𑀦𑀁 𑀕𑀺𑀭𑀺𑀦𑀕𑀭𑀸𑀤𑁆𑀭𑀺𑀧𑀸-
𑀤𑀸𑀤𑁆 𑀯𑀺𑀱𑁆𑀝𑀫𑁆𑀪𑀯𑁆𑀬𑀸𑀬𑀢𑀧𑀭𑀺𑀡𑀸𑀳𑀁 𑀧𑀭𑁆𑀯𑁆𑀯𑀢𑀧𑀸𑀤𑀧𑁆𑀭𑀢𑀺-
𑀲𑁆𑀧𑀭𑁆𑀤𑁆𑀥𑀺 𑀩𑀦𑁆𑀥𑀫𑀦𑀼𑀢𑁆𑀢𑀫 𑀧𑁆𑀭-----------------𑀣𑀁 𑀯𑀸𑀧𑀻𑀓𑀸𑀭𑀼𑀡𑁆𑀬𑀢𑁄
𑀘 𑀲𑀼𑀧𑁆𑀭𑀢𑀺𑀯𑀺𑀳𑀺𑀢 𑀧𑁆𑀭𑀦𑀸𑀮𑀻𑀧𑀭𑀻𑀯𑀸𑀳𑀫𑀻𑀟𑁆𑀯𑀺𑀥𑀸𑀦𑀁 𑀘𑀧𑁆𑀭𑀢𑀻𑀖𑀸𑀢𑀁 𑀏𑀱𑀁
𑀫𑀼𑀭𑁆𑀢𑁆𑀢𑀺𑀫𑀤𑁆𑀪𑀺𑀭𑀺𑀯 𑀥𑀭𑁆𑀫𑁆𑀫 𑀓𑀸𑀫𑀸𑀭𑁆𑀣𑁃𑀂 𑀧𑁆𑀭𑀣𑀺𑀢𑀥𑀭𑁆𑀫𑁆𑀫𑀡𑀸 𑀘 𑀭𑀸𑀚𑁆𑀜𑀸
𑀫𑀳𑀸𑀔𑀢𑁆𑀭𑀧𑁂𑀦 𑀲𑀼𑀕𑀾𑀳𑀻𑀢 𑀦𑀸𑀫𑁆𑀦𑀸 𑀭𑀼𑀤𑁆𑀭------------------𑀬𑀢𑁆𑀢𑁆𑀭 𑀮𑀸𑀪𑀸𑀦𑀸𑀁
𑀯𑀭𑁆𑀱𑁂 𑀲𑀧𑁆𑀢𑀲𑀧𑁆𑀢𑀢𑀻𑀢𑀫𑁂 𑁭𑁦 𑁭 𑀭𑀸𑀚𑁆𑀜𑁄 𑀫𑀳𑀸𑀔𑀢𑁆𑀭𑀧𑀲𑁆𑀬 𑀚𑀬𑀤𑀸𑀫𑀧𑀼𑀢𑁆𑀭𑀲𑁆𑀬 𑀭𑀸𑀚𑁆𑀜𑁄 𑀫𑀳𑀸-
𑀔𑀢𑁆𑀭𑀧𑀲𑁆𑀬 𑀭𑀼𑀤𑁆𑀭𑀤𑀸𑀫𑁆𑀦𑁄 𑀯𑀭𑁆𑀱𑀧𑁆𑀭𑀪𑀯𑀸𑀪𑀺𑀯𑀭𑁆𑀥𑀺𑀢𑀯𑁃𑀰𑁆𑀬𑀸𑀦𑀼𑀕𑁆𑀭𑀳𑀸𑀭𑁆𑀣𑀁 𑀧𑀭𑀺𑀯𑀭𑁆𑀢𑀺𑀢𑁂𑀦
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