सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 224

भारतीय संवत्. १६५
उसके पीछे जो अंतर पड़ा उसको पोप ग्रेगरी ने ठीक कर दिया१. इस सन् का वर्ष सौर है जिसका
प्रारंभ तारीख १ जनवरी २ से होता है और जो ३६५ दिन के १२ महीनों में विभक्त है. प्रति चौथे
वर्ष १ दिन ३ फ़रवरी मास में बढ़ा दिया जाता है. ईसाइयों का दिन (तारीख) मध्य रात्रि से प्रारंभ
हो कर दूसरे दिन की मध्य रात्रि तक माना जाता है. इस सन् में ५७-५६ जोड़ने से वि. सं. बनता है.
हिंदुस्तान में अंग्रेज़ों का राज्य होने पर इसका प्रचार इस देश में भी हुआ और यहां का राज-
कीय सन् यही है. लोगों के सामान्य व्यवहार में भी इसका प्रचार बहुत कुछ है.


१ दिन अधिक बड़ा था. इस वर्षगणना से २६ वर्ष में करीब २६ दिन का अंतर पड़ गया जिससे ग्रीकों के वर्षमान का
अनुकरण किया गया जिसमें समय समय पर अधिक मास मानना पड़ता था. इससे भी अंतर बढ़ता ही चला और
जुलिअस सीज़र के समय वह अंतर ६० दिन का हो गया जिससे उसने ई. स. पूर्व ४६ को ४५५ दिन का वर्ष मान कर वह
अंतर मिटा दिया, क्विंक्टिलिस मास का नाम अपने नाम पर से 'जुलाई' रक्खा और आगे के लिये अधिक मास का
झगड़ा मिटा कर ३६५ १/४ दिन का वर्ष नियत कर जैन्युअरी, मार्च, मे, जुलाई, सेप्टेंवर और नवेंवर महीने तो ३१, ३१
दिन के, बाकी के, फेब्रुअरी (फरवरी) के सिवाय, ३०, ३० दिन के और फेब्रुअरी २६ दिन का, परंतु प्रति चौथे वर्ष ३० दिन
का, स्थिर किया. जुलिअस् सीज़र के पीछे ऑगस्टस् ने, जो रोम का पहिला बादशाह हुआ, सेक्स्टाइलिस मास का नाम अपने
नाम से ऑगस्ट रक्खा और उसको ३१ दिन का, फेब्रुअरी को २८ दिन का, सप्टेंबर और नवंबर को ३०, ३० दिन का और
डिसंबर को ३१ का बनाया. इसी परिवर्तन के अनुसार ई. स. के महीनों के दिनों की संख्या अब तक चली आ रही है.
१. जुलिअस् सीज़र का स्थिर किया हुआ ३६५ १/४ दिन का सौर वर्ष वास्तविक सौर वर्ष से ११ मिनिट और १४
सैकंड बड़ा था जिससे करीब १२८ वर्ष में १ दिन का अंतर पड़ने लगा. इस अंतर के बढ़ते बढ़ते ई. स. ३२५ में मेष का
सूर्य, जो जुलिअस् सीज़र के समय २५ मार्च को आया था, ता० २१ मार्च को आ गया और ई. स. १५८२ में ११ मार्च को
आ गया. पोप ग्रेगरी (१३ वें) ने सूर्य के चार में इतना अंतर पड़ा हुआ देख कर ता० २२ फ़रवरी ई. स. १५८२ को यह
आज्ञा दी कि इस वर्ष के अक्टूबर मास की चौथी तारीख के बाद का दिन १५ अक्टोबर माना जावे. इससे लौकिक सौर
वर्ष वास्तविक सौर वर्ष से मिल गया. फिर आगे के लिये ४०० वर्ष में ३ दिन का अंतर पड़ता देख कर उसको मिटाने के
लिये पूरी शताब्दियों के वर्षों (१६००, १७०० आदि) में से जिनमें ४०० का भाग पूरा लग जावे उन्हीं में फेब्रुअरी के २६
दिन मानने की व्यवस्था की. इस व्यवस्था के बाद अंतर इतना सूक्ष्म रहा है कि करीब ३३२० वर्ष के बाद फिर १ दिन का अंतर
पड़ेगा. पोप ग्रेगरी की आज्ञा के अनुसार रोमन कैथॉलिक संप्रदाय के अनुयायी देशों अर्थात् इटली, स्पेन, पोर्चुगाल आदि
में तो ता० ४ ऑक्टूबर के स्थान में १५ ऑक्टूबर मान ली गई परंतु प्रोटेस्टंट संप्रदाय के अनुयायी देशवालों ने प्रारंभ में
इसका विरोध किया तो भी अंत में उनको भी लाचार इसे स्वीकार करना पड़ा. जर्मनीवालों ने ई. स. १७६६ के अंत के १०
दिन छोड़ कर १७०० के प्रारंभ से इस गणना का अनुकरण किया. इंग्लैंड में ई. स. १७५२ में इसका प्रचार हुआ परंतु
उस समय तक एक दिन का और अंतर पड़ गया था इस लिये ता० २ सेप्टेंवर के बाद की तारीख (३) को १४ सप्टेंबर
मानना पड़ा. रशिया, ग्रीस आदि ग्रीक चर्च संप्रदाय के अनुयायी देशों में केवल अभी अभी इस शैली का अनुकरण हुआ
है. उनके यहां के दस्तावेज़ आदि में पहिले दोनों तरह अर्थात् जुलिअस् एवं ग्रेगरी की शैली से तारीखें लिखते रहे जैसे
कि २० एप्रिल तथा ३ मे आदि.
२. ई. स. का प्रारंभ तारीख १ जनवरी से माना जाता है परंतु यह गणना अधिक प्राचीन नहीं है. ई. स. के उत्पादक
डायोनिसिअस् ने इसका प्रारंभ तारीख २५ मार्च से माना था और वैसा ही ई. स. की १६ वीं शताब्दी के पीछे तक युरोप
के अधिकतर राज्यों में माना जाता था. फ्रान्स में ई. स. १६६३ से वर्ष का प्रारंभ तारीख १ जनवरी से माना जाने लगा.
इंग्लैंड में ई. स. की सातवीं शताब्दी से क्रिस्टम्स् के दिन (तारीख २५ डिसंबर) से माना जाता था. १२ वीं शताब्दी से २५
मार्च से माना जाने लगा और ई. स. १७५२ से, जब कि पोप ग्रेगरी के स्थिर किये हुए पंचांग का अनुकरण किया गया,
तारीख १ जनवरी से सामान्य व्यवहार में वर्ष का प्रारंभ माना गया (इसके पूर्व भी अंग्रेज़ ग्रंथकारों का ऐतिहासिक वर्ष
तारीख १ जनवरी से ही प्रारंभ होता था).
३. जिस वर्ष के अंकों में ४ का भाग पूरा लग जाय उसमें फेब्रुअरी के २६ दिन होते हैं. शताब्दियों के वर्षों में से
जिसमें ४०० का भाग पूरा लग जाय उसके २६ और बाकी के २८ जैसे कि ई. स. १६०० और २००० के २६, २६ दिन और
१७००, १८०० और १९०० के २८, २८ दिन.