परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
सर्वसाधारणक्रमः २६१
रक्तं तु करवीरं वै तथा कृष्णापराजिता ।
एतत्प्रोक्तं लिङ्गयोन्योः पुष्पं तत्र तु योजयेत् ।।६३ ।। इति ।
पञ्चमकार सम्बन्धी अनुकल्पों की चर्चा यहाँ की गयी है। मकार 'म' अक्षर
आदि में आये द्रव्यों की क्रमिकता इस प्रकार है—
१. मद्य, २. मांस, ३. मत्स्य, ४. मुद्रा, ५. मैथुन।
१. मद्य का अनुकल्प अष्टगन्ध निर्मित द्रव्य है। काँस्य में नारिकेलोदक, ताम्रपात्र
में दूध, गुडमिश्र तक्र भी इसमें स्वीकृत हैं।
२. मांस—प्रथम सम्पादन के बाद द्वितीय और तृतीय पशु के प्राण का वियोग
स्वयं नहीं करना चाहिये। स्वयं सम्पादित करने पर उद्बुद्ध्यस्व मन्त्र का
प्रयोग करना चाहिये। मांस दो प्रकार के स्वीकृत हैं—१. भूचर, २. खेचर।
इन दोनों के न मिलने पर 'मालपूआ' चढा कर पूजा सम्पादित करनी
चाहिये।
३. मत्स्य—इसमें भी दो प्रकार हैं—१. मत्स्य और २. कूर्म अनुकल्पचने के
चूर्ण की मत्स्याकृति बाटी या 'बड़ी' अथवा 'मूली'।
४. मुद्रा—योगिनीतन्त्र के अनुसार चने से निर्मित अथवा माष से निष्पन्न विशेष
मुद्राकृति पदार्थ घी में पकाने पर इसका अनुकल्प बन जाते हैं। अङ्गुलि
मुद्रायें तो प्रसिद्ध हैं।
५. मैथुन— तीन प्रकार के स्वीकृत हैं—
१. दूती सम्बन्धी— इसमें सदाशिव स्तरीय योगिराज ही अधिकृत हैं।
२. दूत की पूजा और कुण्ड योनि में शुद्ध हवि का अर्पण करने से भी
सुफल। यह स्वपत्नी के साथ भी स्वीकृत है।
३. प्रार्थना करने पर शिष्या आदि के अनुकल्प लाल करवीर पुष्प और
अपराजिता पुष्प दोनों लिङ्ग योनि के प्रतीक हैं। वास्तविकता यह है
कि, इनमें भौतिक दृष्टि का अभाव होना आवश्यक है।।६३।।
अथ पूर्वोक्तावशिष्टाः कुलाचारधर्माः, तानाह सर्वत्र वचनपूर्व
प्रवृत्तिः ।।६४।।
२६२ परशुरामकल्पसूत्रम्
सर्वत्र कुलशास्त्रविहितक्रियासामान्ये अस्मिन् शास्त्रे विहितं किं
अविहितं किम् इति परिशोध्य सप्रमाणं कर्म अनुष्ठेयमिति भावः।।६४।।
वचन का अर्थ शास्त्रोक्त प्रमाण वाक्य है। उपासक विहित और अविहित
के सम्बन्ध में शास्त्र वचनों के आधार पर ही आचरण करे।।६४।।
अन्यं धर्ममाह
दशकुलवृक्षानुपप्लवः ।।६५।।
श्लेष्मातककरञ्जाम्रनिम्बाश्वत्थकदम्बका बिल्ववटोडुम्बरौ च तिन्तिण्या
सहिता दश। श्लेष्मातक (लिसोडे का वृक्ष) करञ्ज (ओषधिवृक्ष) आम्र (आम)
निम्ब (नीम) अश्वत्थ (पीपल) कदम्बक (कदम्ब) बिल्व (श्रीफल) वट
(बरगद) उदुम्बर (गूलर) ये दश वृक्ष कुल वृक्ष माने जाते हैं। इनका काटना
नितान्त निषिद्ध है।।६५।।
धर्मान्तरमाह
स्त्रीवृन्दादिमकलशसिद्धलिङ्गिक्रीडाऽऽकुलकुमारीकुलसहकारा-
शोकैकतरुपरेतावनिप्रमत्तवेश्याश्यामारक्तवसनामत्तेभानां दर्शने
वन्दनम्।।६६।।
स्त्रीवृन्दं सुवासिनीवृन्दं न तु विधवानाम्, सुवासिनी-कुमारीणां समूहं
मदिराघटम् इति तन्त्रान्तरवचनात्। आदिमकलशं मदिरापूर्णघटः। सिद्धाः
मन्त्रसिद्धिमन्तः, तेषां लिङ्गानि तच्छालीनः सिद्धलिङ्गिनः। क्रीडासु आकुलाः
व्यासक्ता कुमार्यस्तासां कुलं समूहः। सहकारः अतिसुगन्धिचूतः। अशोकः
प्रसिद्धः। एकतरुः। परेतावनिः श्मशानम्। मत्तवेश्या। श्यामा यौवनमध्यस्था
तारुण्यनिर्भरा। रक्तवसना। मत्तेभः प्रसिद्धः। एतेषां दर्शने वन्दनं नमनं
कुर्यात् ।।६६।।
सुवासिनी स्त्रियों का समूह, कुमारियों का समूह, मदिरा कलश, मन्त्रसिद्ध
योगियों के चिह्न, क्रीडाकुमारियाँ, आम, अशोक और 'एकतरु' नाम से प्रसिद्ध
एक विशेष वृक्ष, श्मशान, मदविह्वल वेश्या, पूर्ण-यौवना षोडशी और रक्तवस्त्र-
सर्वसाधारणक्रमः २६३
धारिणी युवती तथा मदमस्त हाथी देखकर परमेश्वर की कौतुकमयी सुरुचिपूर्ण
रचना का ध्यान कर इनका वन्दन करना चाहिये।।६६।।
अथ नैमित्तिक-पूजामाह
पञ्चपर्वसु विशेषार्चा ।।६७।।
पञ्चपर्वाणि १. कृष्णाष्टमी, २. कृष्णचतुर्दशी, ३. अमा, ४. पूर्णिमा,
५. सङ्क्रान्तिश्च। देवीभागवते यथा—
“कृष्णाष्टमी च तद्भूता पूर्णिमासंक्रमो रवेः। एतानि पञ्चपर्वाणि दुर्लभं
तत्र पूजनम्”। ‘पञ्चपर्वसु’ इति कथनात् पञ्चपर्वसु सूत्रानुयायिनः पूजन-
मावश्यकम्। दमनपवित्रारोपणाद्यकरणे न प्रत्यवायः। करणे अभ्युदय इति
सिद्धम् ।।६७।।
कृष्णपक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा और संक्रान्ति मिलाकर
पाँच पर्व माने जाते हैं। देवीभागवत भी इसी मत का प्रतिपादन करता है।
कल्पसूत्रानुयायी उपासक इसकी अवश्यकरणीयता स्वीकार करते हैं ।।६७।।
अथैषां कुलधर्माणामनुष्ठानविधिं वक्तुं तदुपोद्घातभूतान् उल्लासान् विभजते
आरम्भतरुणयौवनप्रौढतदन्तोन्मनानवस्थोल्लासेषु प्रौढान्ताः
समयाचाराः। ततः परं यथा कामी। स्वैरव्यवहारेषु वीरावीरेष्व-
यथामननादधःपातः ।।६८।।
आरम्भः, तरुणः, यौवनः, प्रौढः, तदन्तः, उन्मनः, अनवस्थः,
उपासकस्य सप्त दशाविशेषाः। तत्र—
१. आरम्भो नाम उपासनाविषयकेच्छामात्रवत्त्वे सति तन्त्रशास्त्रा
नभिज्ञत्वम्।
२. सम्यग्गुरुं सम्पाद्य दीक्षितस्तदनन्तरं तन्त्रशास्त्रपिपठिषाशालित्वं
तस्योल्लासः।
३. ततस्तच्छास्त्रविषयकज्ञानवत्त्वं यौवनोल्लासः।
२६४ परशुरामकल्पसूत्रम्
४. ततस्तच्छास्त्रविषयकतत्त्वज्ञानवत्त्वं सम्पाद्य शास्त्रप्रतिपादितध्यानंकर्तु-
मीहमानत्वं प्रौढोल्लासः।
५. तदिच्छानन्तरं किञ्चिदभ्यस्ते ध्यानवत्त्वे तदन्तोल्लासः।
६. ततो ध्यानेन कञ्चित्कालं मनोलयशक्तिमत्त्वमुन्मनोल्लासः।
७. पूर्णारूढत्वमनवस्थोल्लासः।
उपासकस्य निरुक्तोल्लासरूपा दशाविशेषाः स्वान्तःकरणैकवेद्याः। स्वयं
विद्वान् स्वीयां दशां सूक्ष्मधिया सम्यक् परिशोधयेत्। एवं परिशोध्य
तुरीयप्रौढोल्लासपर्यन्तं शास्त्रप्रथिताः समयाचाराः कार्याः। अत ऊर्ध्वं
यथाकामो विहरेद् इति भावः।
स्वैरव्यवहारेषु वीरावीरयोः अयथामननाद् याथाथ्र्यम् अविदित्त्वैव यदि
स्वैराचारी भवेत् तर्हि पतेदेव निरय इत्यर्थः ।।६८।।
आरम्भ, तरुण, यौवन, प्रौढ, तदन्त, उन्मना और अनवस्थ ये सात
उपासक के क्रमिक विकास की अवस्थायें हैं। आरम्भ में उपासनाविषयक इच्छा
होती है; किन्तु शास्त्र के प्रति अनभिज्ञता रहती है। तरुण उल्लास में गुरु
द्वारा दीक्षित होकर तन्त्रशास्त्र के पढ़ने की इच्छा उत्पन्न होती है। यौवन
उल्लास में तन्त्र के रहस्य का ज्ञान हो जाता है। ज्ञान-प्राप्ति के साथ शास्त्र
में प्रतिपादित ध्यान में प्रवृत्ति होना प्रौढोल्लास का लक्षण है। अभ्यासपूर्वक
पूर्ण ध्यानसत्ता का अनुसन्धान तदन्त में मनोलय की शक्ति उन्मना में आ जाती
है। पूरा आरूढ भाव हो जाना अवस्थाओं से भी ऊपर उठा देता है। यही
अनवस्थ उल्लास है।
प्रौढ तक समयाचार पालन आवश्यक माना जाता है। इसके बाद स्वतन्त्र
क्रियाशीलता का अधिकारी हो जाता है। उन्नत स्तर पर उपासक द्वारा अपनी
पहुँच बना लेने पर वीर वर्ग की अवमानना नहीं करनी चाहिये। इससे अधःपात
होने की सम्भावना उत्पन्न हो जाती है।।६८।।
अवशिष्टा उपासकधर्माः
रक्तात्यागविरक्ताऽऽक्रमणोदासीना प्रलोभनवर्जनम् ।।६९।।
सर्वसाधारणक्रमः २६५
रक्ता आत्मना साकं भोगे आसक्तां तां न त्यजेत्। एवं स्वस्मिन् विरक्ता
या तां बलात्कारेण नोपभुञ्जीत। या चोदासीना तां धनादिना प्रलोभ्य
तदुपभोगोऽपि न कार्यः ।।६९।।
स्वभावतः या जन्मजात संस्कारवश यदि कोई कुल-स्त्री अपने में आसक्त
हो, तो उसका परित्याग नहीं करना चाहिये। इसी तरह जो अपने से विरक्त
हो, उसे पाने के लिये बलात्कार आदि नहीं करना चाहिये। जो उदासीन हो
उसे धन आदि का लोभ देकर उपभोग के उपाय नहीं करने चाहिये।।६९।।
घृणाशङ्काभयलज्जाजुगुप्साकुलजातिशीलानां क्रमेणाव-
सादनम् ।।७०।।
घृणा दया। शङ्का विधिविहितहिंसायां द्वितीयादिसम्पादनविषये एवं
प्रथमादिग्रहणे संशयो जुगुप्सा। द्वितीयादिविषयकतिरस्कारोऽन्तःकरणवृत्ति-
विशेषः। कुलं गात्रम्। जातिः ब्राह्मणत्वादिः। शीलं स्वभावः। इमान्य-
विद्यामूलानि अनेकजन्मस्वनुवृत्तानि क्रमेण तत्तद्भूमिकां प्राप्य अवसादनं
त्यागः कार्य इति शेषः।।७०।।
इस विषय में प्रसिद्ध श्लोक है—
घृणा शङ्का भयं लज्जा जुगुप्सा चेति पञ्चमी।
कुलं शीलं च जातिश्चेत्यष्टौ पाशाः प्रकीर्त्तिताः ।।
ये आठ पाश हैं। इन पाशों से बँधा प्राणी पशु बन गया है। किसी
से घृणा, शास्त्रीय वचनों के प्रति शङ्का, सत्याचरण में भय, शास्त्रवचन पालन
में संकोच, किसी की पीठ-पीछे निन्दा, अपना ऊँचा गोत्र, शील, रूप-
सांस्कारिक सद्व्यवहार और अपनी जाति का स्मरण या कथन उपासक धर्म
के विरुद्ध है। ये आठ पाश माने जाते हैं।।७०।।
धर्मान्तरमाह
गुरुप्रगुरुसन्निपाते प्रगुरोः प्रथमं प्रणतिः। तदग्रे तदनुरोधेन
तन्नतिवर्जनम् ।।७१।।
२६६ परशुरामकल्पसूत्रम्
गुरुः प्रसिद्धः। प्रगुरुः गुरोर्गुरुः। तयोः सन्निपाते एकत्र वासे प्रगुरोः
प्रथमं नमस्कारः कार्यः। यावद् गुरुः प्रगुरुसन्निधौ तिष्ठति तावत्पर्यन्तं गुरुं
न नमेत्। प्रगुरोरनुरोधेन तिष्ठेत् ।।७१।।
धर्मान्तर के रूप (गुरु और प्रगुरु) नमस्कारविषयक नियम प्रस्तुत कर
रहे हैं—
जब तक गुरु प्रगुरु के समक्ष रहे, प्रगुरु में आदराधिक्य के कारण
गुरुनमस्कार वर्जित है। प्रगुरु के समक्ष उसकी आज्ञा से बैठे॥७१॥
धर्मान्तरमाह
अभ्यर्हितेष्वपराङ्मुख्यम् ।।७२।।
अभ्यर्हितेषु श्रेष्ठेषु। अपराङ्मुख्यम् औदासीन्याभावः।।७२।।
अपने से श्रेष्ठ जनों के प्रति आदर का प्रदर्शन करना चाहिये। कभी
भी यह नहीं सोचना चाहिये कि, इनसे मुझे क्या लेना-देना? अतः उनकी
ओर आदरभाव से आभिमुख्य का आचरण करना चाहिये। यह सांस्कृतिक
दृष्टिकोण है॥७२॥
धर्मान्तरमाह
मुख्यतया प्रकाशविभावना ।।७३।।
प्रकाशः परमशिवस्तत्त्वातीतः। यदुपनिषत्प्रतिपाद्यं ब्रह्मेति व्यवह्रियते स
तस्य विभावना मुख्यतया सकलशास्त्राभ्यासफलमिति जानीयादित्यर्थः।
तादृशभावनासिध्युपायमेव सर्वं शास्त्रं ब्रूते, तदन्यदफलमिति ब्रूते। इति
तत्त्वार्थं जानीयादिति सूत्ररहस्यतात्पर्यं ज्ञेयम् ।।७३।।
उपासक का जीवन 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' का प्रतीक होता है। प्रमुख
रूप से वह इस प्रपञ्चात्मक विश्वविलास की मोहनिशा में परमशिवरूप प्रकाश
का ही आश्रय लेकर उपासना में रत रहता है। उसी की विभावना करता है।
भौतिक प्रकाश तो साधक के लिये बकौल गीता के अनुसार निशा की ही
निशानी है॥७३॥
सर्वसाधारणक्रमः २६७
धर्मान्तरमाह
अधिजिगमिषा शरीरार्थासूनां गुरवे धारणम् ।।७४।।
अत्रापि पूर्वसूत्राद् मुख्यतयेत्यनुषज्यते।
अधिजिगमिषा मननेच्छा। सा हि द्विप्रकारा—स्वार्था, गुर्वर्था वा। तत्र
द्वयोः सन्निपाते मुख्यतया गुर्वर्थं या जिगमिषा तदनुरोधेन स्वार्थजिगमिषां
साधयेत्। एवं शरीरस्य द्रव्यस्य प्राणस्य च धारणं गुर्वर्थं मुख्यं, स्वार्थं
गौणम् ।।७४।।
वस्तुतः अधिजिगमिषा स्वतन्त्र धर्मान्तर है और शरीरार्थासु धारण दूसरा
धर्मान्तर है। साधिकार गति अर्थात् गति (मोक्ष) की आकांक्षा ही अधिजिगमिषा
है। इसी में मुख्यतया की अनुवृत्ति करनी चाहिये।
मोक्ष की आकांक्षा वाले उपासक को यह शरीर, यह धन-सम्पत्ति और
यहाँ तक कि, अपना प्राण भी महत्त्वहीन हो जाता है। अतः इन तीनों का
धारण स्वार्थ के लिये नहीं, गुर्वर्थ ही उपासक करता है।।७४।।
धर्मान्तरमाह
एतदुक्तकरणम् ।।७५।।
एतदुक्तं गुरूक्तम् अभिमानमुत्सृज्य कार्यम् ।।७५।।
एतद् शब्द गुर्वर्थप्रयुक्त सर्वनाम है। गुरु की आज्ञा का पालन अभिमान
का परित्याग कर करना चाहिये। 'आज्ञा गुरूणामविचारणीया' यह वाक्य हमारी
सांस्कृतिक आस्था का प्रतीक है।।७५।।
अपरीक्षणं तद्वचने व्यवस्था ।।७६।।
तद्वचने गुरुवचने। गुरुलक्षणविशिष्टं गुरुवचनं स्वबुद्ध्या न परीक्षयेत्।
सदसद्वेति न विचारयेत्। अयं सर्वतन्त्रार्थविद् अन्यथा न वदिष्यति, किन्तु
शास्त्रयुक्तमेव वदिष्यतीति निश्चयं कुर्यात्।।७६।।
सूत्रकार यह व्यवस्था दे रहे हैं कि, गुरु समस्त तन्त्रार्थ का मर्मज्ञ होता
है। वह शास्त्रशुद्ध ही बोलता है। यह विश्वास उपासक में होना चाहिये।।७६।।
२६८ परशुरामकल्पसूत्रम्
सर्वथा सत्यवचनम् ।।७७।।
सर्वथा सङ्कटेऽपि। यद्वा सर्वदा सहसा सङ्कटमन्तरेत्यर्थः।।७७।।
'सत्यं वद' इस वैदिक विधि वाक्य का ही यह सूत्र प्रतिपादक है।
'सर्वथा' शब्द किसी दशा में भी असत्य बोलने का निषेधक ही है।।७७।।
परदारधनेष्वनासक्ति ।।७८।।
परस्त्री, दूसरे के धन के प्रति उपासक में अनासक्ति अनिवार्यतः
आवश्यक है।।७८।।
स्वस्तुति-परनिन्दा-मर्मविरुद्धवचन-परिहास-धिक्काराक्रोश-
त्रासनवर्जनम् ।।७९।।
स्वस्तुति-परनिन्दे प्रसिद्धे। मर्मवचनं गूढदोषप्रकाशकः शब्दः।
विरुद्धवचनः श्रवणकटुवचः। परिहासो हेलम्। धिक्कारस्तु तुच्छीकरणम्।
आक्रोशो रोदनादिः। त्रासनं परस्य भयजनकम् उक्तानाममीषां वर्जनं
कार्यम् ।।७९।।
अपनी बड़ाई को आत्मश्लाघा कहते हैं। यह अच्छी नहीं मानी जाती।
इसी तरह दूसरे भी शिवरूप ही हैं। अतः किसी की निन्दा उपासक न करे।
मर्मवेधक चुभने वाली बातें होती हैं। ऐसी बात उपासक न बोले। किसी की
हँसी न उड़ाये। किसी को धिक्कृत न करे। किसी को क्रोध में आकर कभी
लोग कोसने लगते हैं और कभी डराते-धमकाते भी हैं। यह सब बुरी बातें हैं।
उपासक धर्म के सर्वथा प्रतिकूल हैं। इनसे बचे।।७९।।
एवं सामयिकधर्मेषु अत्यन्तमावश्यकं मुख्यं धर्ममाह
प्रयत्नेन विद्याऽऽराधनद्वारा पूर्णख्यातिसमावेशनेच्छा चेत्येते
सामयिकाचाराः ।।८०।।
प्रयत्नेन श्रीविद्याराधने न प्राक्प्रपञ्चितामपूर्णख्यातिं व्युदस्य जीवस्य या
स्वतःसिद्धा पूर्णख्यातिः सा प्रकटा भवतीत्याकारिका इच्छा तां सदा कुर्यात्।
एते इच्छान्ता निरूपिता धर्मास्ते सामयिकाः। समये कुलशास्त्रमर्यादायां
वर्त्तमानास्ते कुलशास्त्रप्रतिपादिता उपासकधर्मा इति यावत् ।।८०।।
सर्वसाधारणक्रमः २६९
उपासक को सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये। सक्रियतापूर्वक गुरुप्रदत्त
श्रीविद्या की समाराधना में संलग्न रहना उपासक का प्रधान धर्म है। इसके
सम्पादन के माध्यम से सर्वदा पूर्णख्याति समावेश का उत्कट अभिलाष स्वात्म
में उद्वेलित रहना चाहिये। इससे कुलशास्त्र और गुरुपरम्परा की मर्यादा में
अभिवृद्धि होती है। पालनीय धर्म समय कहलाते हैं। समय से सम्बद्ध धर्म
सामयिक धर्म हैं। इनका पालन करना चाहिये।।८०।।
परे च शास्त्रानुशिष्टाः ।।८१।।
ये पूर्वोक्तास्तेभ्यः परे अन्यधर्मास्ते शास्त्रे तन्त्रान्तरेऽनुशिष्टास्तेऽपि
ग्राह्या इति शेषः।।८१।।
पहले सूत्रों में निर्दिष्ट जितने समय धर्मों का निर्देश हैं, इनके अतिरिक्त
भी धर्म के अन्य भेद हैं। उनकी विधियाँ हैं। यहाँ उनका उल्लेख नहीं है।
हाँ, सूत्रकार यह कह रहे हैं कि, शास्त्रों में ये अनुशिष्ट हैं। यहाँ शास्त्रों से
शास्त्रान्तर और तन्त्रान्तर दोनों भाव लिये गये हैं। वे भी ग्राह्य हैं।।८१।।
कुलमार्गनिष्ठप्रशंसा
इत्थं विदित्वा विधिवदनुष्ठितवतः कुलनिष्ठस्य सर्वतः
कृतकृत्यता शरीरत्यागे श्वपचगृहकाश्योर्नन्तरं जीवन्मुक्तः ।।८२।।
इत्थमुक्तप्रकारं विदित्वा सम्यग्विदित्वा विधिवद् यथाशास्त्रम्
अनुष्ठितवतः अनुष्ठानं कुर्वतः कुलनिष्ठस्य कुलमार्गे श्रद्धाभक्तिमतः। सर्वतः
सर्वप्रकारैः कृतकृत्यता। अनुष्ठेयशेषरहितता सम्पन्नेति शेषः। एवं
शरीरस्थितिकाले फलमुक्त्वा देहत्यागेऽपि। फलमाह— शरीरत्याग इति।
एतदनुष्ठातृभिन्नानां काश्यां देहत्यागे मुक्तिः, कीकटे नरकः, पुण्यप्रदेशे
स्वर्गः, इति फलतारतम्यम्। अस्य तु श्वपचः चाण्डालः, तद्गृहकाश्योर्न
किञ्चिदन्तरम्। अत्र हेतुमाह— जीवन्मुक्त इति। यतोऽयं जीवन्नेव मुक्तः।
प्रथमखण्डे श्रुतं फलं दीक्षाया एव। एवं तत्तत्कारणावसाने दर्शितं फलं
तस्य तस्यैव। इदं तु विशिष्टानुष्ठानस्यैव इति बोध्यम्।।८२।।
२७० परशुरामकल्पसूत्रम्
परशुरामकल्पसूत्र की अब तक की विशिष्ट शिक्षाओं की जानकारी साधक
अध्येता प्राप्त करता रहा है। अब इसका पूरा ज्ञान हो गया है। विधिपूर्वक वह
कुलनिष्ठ रहते हुए सारे अनुष्ठान कर रहा है। उसी के फलस्वरूप वह कृतकृत्य
हो गया है। जीवन में उसे शास्त्रानुसार अनुष्ठित करना था, उसका अनुष्ठान
कर वह कृतार्थ हो गया है। उसका जीवन धन्य है। अब वह जीवन्मुक्त हो
गया है। उसे श्वपच गृह और काशी में कोई अन्तर नहीं रह जाता।।८२।।
एवं दशखण्डैर्विहितानुष्ठानकर्त्तारं स्तुत्वा दशखण्डाध्येतारं स्तौति
य इमां दशखण्डीं महोपनिषदं, महात्रैपुरसिद्धान्तसर्वस्वभूता-
मधीते, सः सर्वेषु यज्ञेषु यष्टा भवति। यं यं क्रतुमधीते तेन तेनास्येष्टं
भवति इति हि श्रूयते इत्युपनिषद् इति शिवम्।।८३।।
इमां पूर्वोक्तां दशखण्डीं महोपनिषदं दशखण्डसमुदायात्मिकाम्।
उपनिषदिति ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादकवेदस्य संज्ञा। तत्र ब्रह्मप्रतिपादनं साक्षात्
परम्परया चेति द्विविधम्। तत्र साक्षात्प्रतिपादिका महोपनिषद्। अस्यापि
साक्षात्प्रतिपादकश्रुत्यर्थानुवादकत्वाद् महोपनिषत्त्वमौपचारिकम्।
एतेन केवलब्रह्मप्रापकशास्त्ररूपत्वात् परमपुरुषार्थसाधनमेतदध्ययनमिति
ध्वनितम्। त्रैपुरसिद्धान्तमिति। त्रिभ्यः सृष्टिस्थितिलयेभ्यः पुरा पूर्ववर्तिनी
नित्येति यावत् सा त्रिपुरेति। तदुक्तं त्रैपुरसिद्धान्ते—
त्रिभ्यः पुरा त्रिपुरा त्रिपुरासम्बन्धी त्रैपुरः। स चासौ
सिद्धान्तश्च तस्मिन्।
सर्वस्वभूतां दध्नो नवनीतवत् सारभूतां तां योऽधीते स सर्वयज्ञेषु
गाणपत्यादिपरान्तेषु यज्ञेषु यष्टा भवति। क्रियाननुष्ठानेऽप्यध्ययनमात्रेणैव
तावदनुष्ठानफलं भवतीत्यर्थः। शिवमिति कल्याणवाचि।।८३।।
परशुरामकल्पसूत्र दशखण्डी महोपनिषद् है। उपनिषद् ब्रह्मविद्या को कहते
हैं। उसका साक्षात् और परम्परापूर्वक प्रतिपादन होता है। इसमें पारम्परिक
प्रतिपादन होने के कारण महोपनिषद् संज्ञा औपचारिक है। साक्षात् प्रतिपादन में
महोपनिषद् संज्ञा मुख्य होती है। यह त्रैपुरसिद्धान्त की सर्वस्व है। इसका अध्येता
सर्वसाधारणक्रमः २७१
सर्वयज्ञों का यष्टा माना जाता है, जिससे इसके इष्ट की सिद्धि होती है। यह
परम्परा से श्रुत सत्य है। इससे विश्व का कल्याण हो।।८३।।
खण्डादिपरिपठनम्
अथातः सर्वेषां मन्त्राणाम्, अथ स्वेष्टमन्त्रस्य, इति विधिवत्,
इत्थं साङ्गम्, इयमेव महती विद्या। अथ प्राथमिके चतुरस्रे, अथ
हृच्चक्रस्थिताम्। एवं गणपतिमिष्ट्वा। इत्थं सद्गुरोः, अथातो दीक्षां
व्याख्यास्यामः। अथ, एवम्, अथ, इत्थम्। अथ स्वेष्टेति
पञ्च ।।८४।।
अथातः सर्वेषां मन्त्राणाम्, अथातो दीक्षाम् इत्यनेन खण्डविभागमुक्त्वा
पटलानुक्रमणिकां दर्शयति—अथेत्यारभ्य खण्डद्वयानन्तरं तृतीयखण्डादारभ्य
एवमिति। अथ १. एवं, २. अथ, ३. इत्थं, ४. अथ स्वेष्टम्, ५. एवमेकैकं
पटलं खण्डद्वयात्मकं ज्ञेयम् ।।८४।।
प्रथम पटल—दीक्षाविधि—अथ से प्रारम्भ—अथातो दीक्षां सूत्र में
द्वितीय पटल—गणनायक-पद्धति—इत्थं से प्रारम्भ—इत्थं सद्गुरोः सूत्र में
तृतीय पटल—श्रीक्रम-पद्धति—एवं से प्रारम्भ—एवं गणपतिम् सूत्र में
चतुर्थ पटल—ललिता-क्रम—अथ से प्रारम्भ—अथ हृच्चक्र सूत्र में
पञ्चम पटल—अनावरणपूजा—अथ से प्रारम्भ—अथ प्राथमिके सूत्र में
षष्ठ पटल—श्यामाक्रम—इयम् से प्रारम्भ—इयमेव महती सूत्र में
सप्तम पटल—वाराही-क्रम—इत्थं से प्रारम्भ—इत्थं साङ्गं सूत्र में
अष्टम पटल—पराक्रम—इति से प्रारम्भ—इति विधिवत् सूत्र में
नवम पटल—होम-विधि—अथ से प्रारम्भ—अथ स्वेष्टमन्त्र सूत्र में
दशम पटल—सर्वसाधारणक्रम—अथ से प्रारम्भ—अथातः सर्वेषां सूत्र में।
इस तरह पाँच खण्ड का आकलन, इन प्रारम्भ में प्रयुक्त अव्यय शब्दों
से हो जाता है। १. अथ से प्रथम-द्वितीय, २. एवं से तृतीय-चतुर्थ, ३. अथ
से पञ्चम-षष्ठ, ४. इत्थं से सप्तम-अष्टम और ५. अथ से नवम-दशम। इस
२७२ परशुरामकल्पसूत्रम्
प्रकार सभी पटलों का एक साथ स्मरण कर इस महोपनिषद् को पूर्णता प्रदान
की गयी है॥८४॥
ग्रन्थकर्त्तारं तद्गुणोत्कर्षं च प्रकटयति
इति श्रीदुष्टक्षत्रियकुलकालान्तकरेणुकागर्भसम्भूतमहादेव-
प्रधानशिष्य-जामदग्न्यश्रीपरशुरामभार्गवमहोपाध्यायमहाकुलाचार्य-
निर्मितं कल्पसूत्रं सम्पूर्णम्॥८५॥
दुष्टेत्यनेन दुष्टनिग्रहपूर्वकधर्मव्यवस्थापकत्वं दर्शितम्। महादेवेत्यनेन
सम्प्रदायप्रवर्त्तकशुद्धिर्दर्शिता। कुलाचार्य इत्यनेन स्वस्य सर्वतन्त्रस्वतन्त्रता
सूचिता। एतैः सर्वविशेषणैः स्वप्रणीतग्रन्थे अप्रामाण्यशङ्काकलङ्कलेशाभावः
सूचितः॥८५॥
सूत्र में दुष्टक्षत्रियकालान्तक विशेषण एक ऐतिहासिक सन्दर्भ को सूचित
करता है। यद्यपि इस श्रीविद्या-साधना की परम्परा में इस विशेषण की कोई
प्रासङ्गिकता नहीं, फिर भी इस उपनिषद् की धर्ममूलकता को ध्यान में रखते
हुए एक धर्मप्रवर्त्तक द्वारा ही यह धर्माङ्ग शास्त्र प्रवर्त्तित है, इसका गर्व लेखक
में होना स्वाभाविक लगता है। अध्येता को भी इस रहस्य से परिचित होना
चाहिये।
भगवान् परशुराम का महत्त्व सूचित करते हुए यह घोषणा करते हैं कि,
मैं रेणुका सदृश विश्वविश्रुता विदुषी ऋषि का पुत्र हूँ। तत्पश्चात् गुरु स्मरण भी
प्रसङ्गसम्मत है। ये भार्गव हैं महोपाध्याय हैं। ये महाकुलाचार्य हैं। इन सद्विशेषणों
से विभूषित भगवान् परशुराम इस महोपनिषद् के रचनाकार हैं। उनकी जय हो।
इति शिवम्॥८५॥
वृत्तिकारपरिचयः
एषोऽपराजितानन्दनाथः श्रीगुरुसेवया।
सम्यन्त्रसूक्ष्मविज्ञानः श्रीदेवीप्रेरितः कृती॥
जामदग्न्यं कल्पसूत्रं व्याचख्यौ गूढभावकम्।
बालानां सुखबोधाय श्रीदेवीप्रीतयेऽपि च।
सर्वसाधारणक्रमः २७३
रचनाकालः -
अग्निबाणाद्रिभूसंख्ये शाके तपसि गीष्पतेः।
वासरे शुक्लपक्षस्य दिन आद्ये निशामुखे।।
अर्पितः श्रीकालिकायामनेन प्रीयतां शिवा।।
।। इति श्रीपण्डितकुलावतंसनिखिलनित्यनैमित्तिकानुष्ठानपुष्टीकृतकलशो-
द्भवाद्युपासकवर्य्यामृतेशानन्दनाथप्रेमपात्रसुब्रह्मण्यतनूद्भवश्रीरामेश्वरविरचिता
सौभाग्योदयसंज्ञिका परशुरामकल्पसूत्र(मुख्यांश)वृत्तिः परिपूर्णा।।
।। इति शिवम्।।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का सर्वसाधारणक्रम नामक दशम खण्ड परिपूर्ण ।।१०।।
।। शुभं भूयात् ।।
इस पृष्ठ पर कोई भी स्पष्ट अथवा पठनीय देवनागरी पाठ (Text) मुद्रित नहीं है। यह पृष्ठ वस्तुतः रिक्त (blank) है अथवा इस पर केवल पिछले पृष्ठ की अत्यधिक धुंधली एवं अपठनीय छाया (bleed-through/ghosting) दिखाई दे रही है, जिसे प्रमाणित रूप से लिप्यंतरित नहीं किया जा सकता।
CC.0 Digitized by Arya Samaj Foundation, Chennai and eGangotri
Vidya Niwas Mishra Collection, Varanasi. Courtesy. Dayanidhi Mishra ji
CC.0 Digitized by Arya Samaj Foundation, Chennai and eGangotri
Vidya Niwas Mishra Collection, Varanasi. Courtesy. Dayanidhi Mishra ji
CC.0 Digitized by Arya Samaj Foundation, Chennai and eGangotri
Vidya Niwas Mishra Collection, Varanasi. Courtesy. Dayanidhi Mishra ji
सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालयः
श्रुतम् मे गोपाय
श्रीजी कम्प्यूटर प्रिण्टर्स, वाराणसी