परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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धर्मान्तरमाह
अधिजिगमिषा शरीरार्थासूनां गुरवे धारणम् ।।७४।।
अत्रापि पूर्वसूत्राद् मुख्यतयेत्यनुषज्यते।
अधिजिगमिषा मननेच्छा। सा हि द्विप्रकारा—स्वार्था, गुर्वर्था वा। तत्र
द्वयोः सन्निपाते मुख्यतया गुर्वर्थं या जिगमिषा तदनुरोधेन स्वार्थजिगमिषां
साधयेत्। एवं शरीरस्य द्रव्यस्य प्राणस्य च धारणं गुर्वर्थं मुख्यं, स्वार्थं
गौणम् ।।७४।।
वस्तुतः अधिजिगमिषा स्वतन्त्र धर्मान्तर है और शरीरार्थासु धारण दूसरा
धर्मान्तर है। साधिकार गति अर्थात् गति (मोक्ष) की आकांक्षा ही अधिजिगमिषा
है। इसी में मुख्यतया की अनुवृत्ति करनी चाहिये।
मोक्ष की आकांक्षा वाले उपासक को यह शरीर, यह धन-सम्पत्ति और
यहाँ तक कि, अपना प्राण भी महत्त्वहीन हो जाता है। अतः इन तीनों का
धारण स्वार्थ के लिये नहीं, गुर्वर्थ ही उपासक करता है।।७४।।
धर्मान्तरमाह
एतदुक्तकरणम् ।।७५।।
एतदुक्तं गुरूक्तम् अभिमानमुत्सृज्य कार्यम् ।।७५।।
एतद् शब्द गुर्वर्थप्रयुक्त सर्वनाम है। गुरु की आज्ञा का पालन अभिमान
का परित्याग कर करना चाहिये। 'आज्ञा गुरूणामविचारणीया' यह वाक्य हमारी
सांस्कृतिक आस्था का प्रतीक है।।७५।।
अपरीक्षणं तद्वचने व्यवस्था ।।७६।।
तद्वचने गुरुवचने। गुरुलक्षणविशिष्टं गुरुवचनं स्वबुद्ध्या न परीक्षयेत्।
सदसद्वेति न विचारयेत्। अयं सर्वतन्त्रार्थविद् अन्यथा न वदिष्यति, किन्तु
शास्त्रयुक्तमेव वदिष्यतीति निश्चयं कुर्यात्।।७६।।
सूत्रकार यह व्यवस्था दे रहे हैं कि, गुरु समस्त तन्त्रार्थ का मर्मज्ञ होता
है। वह शास्त्रशुद्ध ही बोलता है। यह विश्वास उपासक में होना चाहिये।।७६।।