परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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प्रकार सभी पटलों का एक साथ स्मरण कर इस महोपनिषद् को पूर्णता प्रदान
की गयी है॥८४॥
ग्रन्थकर्त्तारं तद्गुणोत्कर्षं च प्रकटयति
इति श्रीदुष्टक्षत्रियकुलकालान्तकरेणुकागर्भसम्भूतमहादेव-
प्रधानशिष्य-जामदग्न्यश्रीपरशुरामभार्गवमहोपाध्यायमहाकुलाचार्य-
निर्मितं कल्पसूत्रं सम्पूर्णम्॥८५॥
दुष्टेत्यनेन दुष्टनिग्रहपूर्वकधर्मव्यवस्थापकत्वं दर्शितम्। महादेवेत्यनेन
सम्प्रदायप्रवर्त्तकशुद्धिर्दर्शिता। कुलाचार्य इत्यनेन स्वस्य सर्वतन्त्रस्वतन्त्रता
सूचिता। एतैः सर्वविशेषणैः स्वप्रणीतग्रन्थे अप्रामाण्यशङ्काकलङ्कलेशाभावः
सूचितः॥८५॥
सूत्र में दुष्टक्षत्रियकालान्तक विशेषण एक ऐतिहासिक सन्दर्भ को सूचित
करता है। यद्यपि इस श्रीविद्या-साधना की परम्परा में इस विशेषण की कोई
प्रासङ्गिकता नहीं, फिर भी इस उपनिषद् की धर्ममूलकता को ध्यान में रखते
हुए एक धर्मप्रवर्त्तक द्वारा ही यह धर्माङ्ग शास्त्र प्रवर्त्तित है, इसका गर्व लेखक
में होना स्वाभाविक लगता है। अध्येता को भी इस रहस्य से परिचित होना
चाहिये।
भगवान् परशुराम का महत्त्व सूचित करते हुए यह घोषणा करते हैं कि,
मैं रेणुका सदृश विश्वविश्रुता विदुषी ऋषि का पुत्र हूँ। तत्पश्चात् गुरु स्मरण भी
प्रसङ्गसम्मत है। ये भार्गव हैं महोपाध्याय हैं। ये महाकुलाचार्य हैं। इन सद्विशेषणों
से विभूषित भगवान् परशुराम इस महोपनिषद् के रचनाकार हैं। उनकी जय हो।
इति शिवम्॥८५॥
वृत्तिकारपरिचयः
एषोऽपराजितानन्दनाथः श्रीगुरुसेवया।
सम्यन्त्रसूक्ष्मविज्ञानः श्रीदेवीप्रेरितः कृती॥
जामदग्न्यं कल्पसूत्रं व्याचख्यौ गूढभावकम्।
बालानां सुखबोधाय श्रीदेवीप्रीतयेऽपि च।