परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० परशुरामकल्पसूत्रम्
परशुरामकल्पसूत्र की अब तक की विशिष्ट शिक्षाओं की जानकारी साधक
अध्येता प्राप्त करता रहा है। अब इसका पूरा ज्ञान हो गया है। विधिपूर्वक वह
कुलनिष्ठ रहते हुए सारे अनुष्ठान कर रहा है। उसी के फलस्वरूप वह कृतकृत्य
हो गया है। जीवन में उसे शास्त्रानुसार अनुष्ठित करना था, उसका अनुष्ठान
कर वह कृतार्थ हो गया है। उसका जीवन धन्य है। अब वह जीवन्मुक्त हो
गया है। उसे श्वपच गृह और काशी में कोई अन्तर नहीं रह जाता।।८२।।
एवं दशखण्डैर्विहितानुष्ठानकर्त्तारं स्तुत्वा दशखण्डाध्येतारं स्तौति
य इमां दशखण्डीं महोपनिषदं, महात्रैपुरसिद्धान्तसर्वस्वभूता-
मधीते, सः सर्वेषु यज्ञेषु यष्टा भवति। यं यं क्रतुमधीते तेन तेनास्येष्टं
भवति इति हि श्रूयते इत्युपनिषद् इति शिवम्।।८३।।
इमां पूर्वोक्तां दशखण्डीं महोपनिषदं दशखण्डसमुदायात्मिकाम्।
उपनिषदिति ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादकवेदस्य संज्ञा। तत्र ब्रह्मप्रतिपादनं साक्षात्
परम्परया चेति द्विविधम्। तत्र साक्षात्प्रतिपादिका महोपनिषद्। अस्यापि
साक्षात्प्रतिपादकश्रुत्यर्थानुवादकत्वाद् महोपनिषत्त्वमौपचारिकम्।
एतेन केवलब्रह्मप्रापकशास्त्ररूपत्वात् परमपुरुषार्थसाधनमेतदध्ययनमिति
ध्वनितम्। त्रैपुरसिद्धान्तमिति। त्रिभ्यः सृष्टिस्थितिलयेभ्यः पुरा पूर्ववर्तिनी
नित्येति यावत् सा त्रिपुरेति। तदुक्तं त्रैपुरसिद्धान्ते—
त्रिभ्यः पुरा त्रिपुरा त्रिपुरासम्बन्धी त्रैपुरः। स चासौ
सिद्धान्तश्च तस्मिन्।
सर्वस्वभूतां दध्नो नवनीतवत् सारभूतां तां योऽधीते स सर्वयज्ञेषु
गाणपत्यादिपरान्तेषु यज्ञेषु यष्टा भवति। क्रियाननुष्ठानेऽप्यध्ययनमात्रेणैव
तावदनुष्ठानफलं भवतीत्यर्थः। शिवमिति कल्याणवाचि।।८३।।
परशुरामकल्पसूत्र दशखण्डी महोपनिषद् है। उपनिषद् ब्रह्मविद्या को कहते
हैं। उसका साक्षात् और परम्परापूर्वक प्रतिपादन होता है। इसमें पारम्परिक
प्रतिपादन होने के कारण महोपनिषद् संज्ञा औपचारिक है। साक्षात् प्रतिपादन में
महोपनिषद् संज्ञा मुख्य होती है। यह त्रैपुरसिद्धान्त की सर्वस्व है। इसका अध्येता