परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ परशुरामकल्पसूत्रम्
गुरुः प्रसिद्धः। प्रगुरुः गुरोर्गुरुः। तयोः सन्निपाते एकत्र वासे प्रगुरोः
प्रथमं नमस्कारः कार्यः। यावद् गुरुः प्रगुरुसन्निधौ तिष्ठति तावत्पर्यन्तं गुरुं
न नमेत्। प्रगुरोरनुरोधेन तिष्ठेत् ।।७१।।
धर्मान्तर के रूप (गुरु और प्रगुरु) नमस्कारविषयक नियम प्रस्तुत कर
रहे हैं—
जब तक गुरु प्रगुरु के समक्ष रहे, प्रगुरु में आदराधिक्य के कारण
गुरुनमस्कार वर्जित है। प्रगुरु के समक्ष उसकी आज्ञा से बैठे॥७१॥
धर्मान्तरमाह
अभ्यर्हितेष्वपराङ्मुख्यम् ।।७२।।
अभ्यर्हितेषु श्रेष्ठेषु। अपराङ्मुख्यम् औदासीन्याभावः।।७२।।
अपने से श्रेष्ठ जनों के प्रति आदर का प्रदर्शन करना चाहिये। कभी
भी यह नहीं सोचना चाहिये कि, इनसे मुझे क्या लेना-देना? अतः उनकी
ओर आदरभाव से आभिमुख्य का आचरण करना चाहिये। यह सांस्कृतिक
दृष्टिकोण है॥७२॥
धर्मान्तरमाह
मुख्यतया प्रकाशविभावना ।।७३।।
प्रकाशः परमशिवस्तत्त्वातीतः। यदुपनिषत्प्रतिपाद्यं ब्रह्मेति व्यवह्रियते स
तस्य विभावना मुख्यतया सकलशास्त्राभ्यासफलमिति जानीयादित्यर्थः।
तादृशभावनासिध्युपायमेव सर्वं शास्त्रं ब्रूते, तदन्यदफलमिति ब्रूते। इति
तत्त्वार्थं जानीयादिति सूत्ररहस्यतात्पर्यं ज्ञेयम् ।।७३।।
उपासक का जीवन 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' का प्रतीक होता है। प्रमुख
रूप से वह इस प्रपञ्चात्मक विश्वविलास की मोहनिशा में परमशिवरूप प्रकाश
का ही आश्रय लेकर उपासना में रत रहता है। उसी की विभावना करता है।
भौतिक प्रकाश तो साधक के लिये बकौल गीता के अनुसार निशा की ही
निशानी है॥७३॥