परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 307, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वसाधारणक्रमः २६५
रक्ता आत्मना साकं भोगे आसक्तां तां न त्यजेत्। एवं स्वस्मिन् विरक्ता
या तां बलात्कारेण नोपभुञ्जीत। या चोदासीना तां धनादिना प्रलोभ्य
तदुपभोगोऽपि न कार्यः ।।६९।।
स्वभावतः या जन्मजात संस्कारवश यदि कोई कुल-स्त्री अपने में आसक्त
हो, तो उसका परित्याग नहीं करना चाहिये। इसी तरह जो अपने से विरक्त
हो, उसे पाने के लिये बलात्कार आदि नहीं करना चाहिये। जो उदासीन हो
उसे धन आदि का लोभ देकर उपभोग के उपाय नहीं करने चाहिये।।६९।।
घृणाशङ्काभयलज्जाजुगुप्साकुलजातिशीलानां क्रमेणाव-
सादनम् ।।७०।।
घृणा दया। शङ्का विधिविहितहिंसायां द्वितीयादिसम्पादनविषये एवं
प्रथमादिग्रहणे संशयो जुगुप्सा। द्वितीयादिविषयकतिरस्कारोऽन्तःकरणवृत्ति-
विशेषः। कुलं गात्रम्। जातिः ब्राह्मणत्वादिः। शीलं स्वभावः। इमान्य-
विद्यामूलानि अनेकजन्मस्वनुवृत्तानि क्रमेण तत्तद्भूमिकां प्राप्य अवसादनं
त्यागः कार्य इति शेषः।।७०।।
इस विषय में प्रसिद्ध श्लोक है—
घृणा शङ्का भयं लज्जा जुगुप्सा चेति पञ्चमी।
कुलं शीलं च जातिश्चेत्यष्टौ पाशाः प्रकीर्त्तिताः ।।
ये आठ पाश हैं। इन पाशों से बँधा प्राणी पशु बन गया है। किसी
से घृणा, शास्त्रीय वचनों के प्रति शङ्का, सत्याचरण में भय, शास्त्रवचन पालन
में संकोच, किसी की पीठ-पीछे निन्दा, अपना ऊँचा गोत्र, शील, रूप-
सांस्कारिक सद्व्यवहार और अपनी जाति का स्मरण या कथन उपासक धर्म
के विरुद्ध है। ये आठ पाश माने जाते हैं।।७०।।
धर्मान्तरमाह
गुरुप्रगुरुसन्निपाते प्रगुरोः प्रथमं प्रणतिः। तदग्रे तदनुरोधेन
तन्नतिवर्जनम् ।।७१।।