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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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सर्वसाधारणक्रमः २६९
उपासक को सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये। सक्रियतापूर्वक गुरुप्रदत्त
श्रीविद्या की समाराधना में संलग्न रहना उपासक का प्रधान धर्म है। इसके
सम्पादन के माध्यम से सर्वदा पूर्णख्याति समावेश का उत्कट अभिलाष स्वात्म
में उद्वेलित रहना चाहिये। इससे कुलशास्त्र और गुरुपरम्परा की मर्यादा में
अभिवृद्धि होती है। पालनीय धर्म समय कहलाते हैं। समय से सम्बद्ध धर्म
सामयिक धर्म हैं। इनका पालन करना चाहिये।।८०।।
परे च शास्त्रानुशिष्टाः ।।८१।।
ये पूर्वोक्तास्तेभ्यः परे अन्यधर्मास्ते शास्त्रे तन्त्रान्तरेऽनुशिष्टास्तेऽपि
ग्राह्या इति शेषः।।८१।।
पहले सूत्रों में निर्दिष्ट जितने समय धर्मों का निर्देश हैं, इनके अतिरिक्त
भी धर्म के अन्य भेद हैं। उनकी विधियाँ हैं। यहाँ उनका उल्लेख नहीं है।
हाँ, सूत्रकार यह कह रहे हैं कि, शास्त्रों में ये अनुशिष्ट हैं। यहाँ शास्त्रों से
शास्त्रान्तर और तन्त्रान्तर दोनों भाव लिये गये हैं। वे भी ग्राह्य हैं।।८१।।
कुलमार्गनिष्ठप्रशंसा
इत्थं विदित्वा विधिवदनुष्ठितवतः कुलनिष्ठस्य सर्वतः
कृतकृत्यता शरीरत्यागे श्वपचगृहकाश्योर्नन्तरं जीवन्मुक्तः ।।८२।।
इत्थमुक्तप्रकारं विदित्वा सम्यग्विदित्वा विधिवद् यथाशास्त्रम्
अनुष्ठितवतः अनुष्ठानं कुर्वतः कुलनिष्ठस्य कुलमार्गे श्रद्धाभक्तिमतः। सर्वतः
सर्वप्रकारैः कृतकृत्यता। अनुष्ठेयशेषरहितता सम्पन्नेति शेषः। एवं
शरीरस्थितिकाले फलमुक्त्वा देहत्यागेऽपि। फलमाह— शरीरत्याग इति।
एतदनुष्ठातृभिन्नानां काश्यां देहत्यागे मुक्तिः, कीकटे नरकः, पुण्यप्रदेशे
स्वर्गः, इति फलतारतम्यम्। अस्य तु श्वपचः चाण्डालः, तद्गृहकाश्योर्न
किञ्चिदन्तरम्। अत्र हेतुमाह— जीवन्मुक्त इति। यतोऽयं जीवन्नेव मुक्तः।
प्रथमखण्डे श्रुतं फलं दीक्षाया एव। एवं तत्तत्कारणावसाने दर्शितं फलं
तस्य तस्यैव। इदं तु विशिष्टानुष्ठानस्यैव इति बोध्यम्।।८२।।