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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

३१२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-मूलमें 'वह्नि' पद तेज मात्रका वाचक है; एवं तेजसंयोगजन्यका
नाम नैमित्तिकद्रवत्व सिद्ध हुआ. वह नैमित्तिकद्रवत्व स्वर्णादिरूप तेजमें और
घृतलाक्षादि पृथिवीमें रहता है. वह द्रवत्व स्यन्दनरूपाक्रियामें असमवायिकारण है.
और संग्रहमें अर्थात् सक्तुआदिके परस्पर मिलापविशेषमें वह द्रवत्व निमित्तकारण
है; परन्तु सक्तु आदिके मिलापमें निमित्ततास्नेहसहित द्रवत्वको जाननी चाहिये.
एवं द्रुतस्वर्णादिका संग्रह न हुआ अर्थात् द्रुतस्वर्णादिमें द्रवत्वके होनेसे उसमें
चूर्णादिके पिण्डीभावकी आपत्ति नहीं हुई; क्योंकि स्वर्णादिमें स्नेहसहित द्रवत्व
नहींहै ॥ १५६ ॥
स्नेहं निरूपयति, स्नेहो जल इति-
भाषा-एवं 'स्नेहः' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्नेहका निरूपण करतेहैं-
स्नेहो जले स नित्योऽणावनित्योऽवयविन्यसौ ॥
तैलान्तरे तत्प्रकर्षाद्दहनस्यानुकूलता ॥ १५७ ॥
भाषा-स्नेहगुण केवल जलमात्रमें रहताहै और जलीयपरमाणुओंमें वह नित्य
है; अन्यत्र द्व्यणुकादिकोंमें अनित्य है. तैलके बीचमें उसकी प्रकर्षतासे दहनकी
अनुकूलता है ॥१५७ ॥
जलइति, जल एवेत्यर्थः। असौ स्नेहः । ननु पृथिव्यामपि तैले स्नेह
उपलभ्यते न चासौ जलीयस्तथासति दहनप्रातिकूल्यं स्यादत
आह । तैलान्तर इति। तत्प्रकर्षात्स्नेहप्रकर्षात् तैल उपलभ्यमा-
नः स्नेहोऽपि जलीय एव, तस्य प्रकृष्टत्वादग्नेरानुकूल्यम्, अप-
कृष्टस्नेहं हि जलं वह्निं नाशयतीति भावः ॥ १५७ ॥
भाषा-स्नेह जलहीमें रहताहै. 'असौ' पदसे स्नेहका ग्रहण है. शंका-तैलरूपा
पृथिवीमेंभी स्नेह प्रतीत होताहै परन्तु वह स्नेह जलका नहींहै, क्योंकि यदि जलका
होय तो अग्निका विरोधी हुआ चाहिये? समाधान-इसका उत्तर 'तैलान्तरे'इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार स्वयं देतेहैं. मूलमें 'तत्प्रकर्ष' शब्दसे स्नेहप्रकर्षका ग्रहण है. तेलमें
प्रतीत होनेवाला स्नेहभी जलहीका है उसको प्रकृष्ट होनेसे अर्थात् अति उत्कट
होनेसे अग्निकी अनुकूलता है. भाव यह कि-अपकृष्ट स्नेहवाला जलही अग्निका
नाशक है, तैल नहीं ॥ १५७ ॥
संस्कारं निरूपयति, संस्कारेति-
भाषा-एवं 'संस्कारभेद'इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार संस्कारोंका निरूपण करते हैं-

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३१३
संस्कारभेदो वेगोऽथ स्थितिस्थापकभावने ॥
मूर्तमात्रे तु वेगः स्यात्कर्मजो वेगजः क्वचित् ॥१५८॥
भाषा-वेग, स्थितिस्थापक, तथा भावनाख्यभेदसे संस्कार तीन प्रकारका है.
उनमें वेगाख्य संस्कार तो मूर्तपदार्थमात्रमें रहताहै; वह वेगाख्य संस्कार किसी
स्थलमें क्रियासे उत्पन्न होताहै और किसी स्थलमें वेगसे उत्पन्न होताहै ॥ १५८ ॥
संस्कारेति । वेगस्थितिस्थापकभावनाभेदात् संस्कारस्त्रिविध
इत्यर्थः । मूर्तमात्र इति । कर्मजवेगजभेदाद्वेगो द्विविध इत्यर्थः ।
शरीरादौ हि नोदनजनितेन कर्मणा वेगो जन्यते, तेन च पूर्वकर्म,
नाशस्तत उत्तरकर्म । एवमग्रेऽपि ।
भाषा--वेग, स्थितिस्थापक, तथा भावना इन भेदसे संस्कार तीन प्रकारके हैं. (मूर्त
मात्रे इति ) कर्मजन्य तथा वेगजन्य इस भेदसे वेगाख्यसंस्कार फिर दोप्रकारका है.
बाणादिकोंमें नोदनसे उत्पन्न हुई क्रियासे वेग उत्पन्न होताहै. ( तेनच ) उस वेगसे
पूर्व क्रियाका नाश होता है उस पूर्वकर्मनाशके अनन्तर फिर उत्तर क्रिया होती है.
ऐसेही आगे २ जबतक बाणादिका उत्तरसंयोग न होय तबतक पूर्व २ कर्मका नाश-
क वेगहीको समझना चाहिये. भाव यह कि-कर्मका नाशक उत्तरसंयोग तो उसका-
लमें हैही नहीं; इसलिये पूर्व पूर्व कर्मनाशकता वेगहीमें कल्पना करी जातीहै ऐसेही
उत्तर २ कर्मसेभी पूर्व २ वेगका नाश होता है उस पूर्व वेगनाशके अनन्तर
वेगान्तरकी उत्पत्ति होती है. यही ‘ एवमग्रेपि ’ इस ग्रन्थका तात्पर्य है-ऐसे स्थल
में कर्मका कोई नाशकान्तर तो हैही नहीं.
विना च वेगं कर्मणः कर्मप्रतिबन्धकत्वात् पूर्वकर्मनाश उत्तरकर्मो-
त्पत्तिश्च न स्यात् । यत्र वेगवता कपालेन जनिते घटे वेगो
जन्यते स वेगजो वेगः ॥ १५८ ॥
भाषा-इसलिये वेगसे बिना अर्थात् यदि वेगको नाशक न मानें तो पूर्व कर्म
का नाश नहीं होना चाहिये और उत्तरकर्मकी उत्पत्तिभी नहीं हुई चाहिये; क्योंकि
पूर्वकर्म उत्तरकर्म उत्पत्तिका प्रतिबन्धक है. एवं जहां वेगवाले कपालादिसे उत्पन्न
हुए घटादिमें वेग उत्पन्न हुआहै वह वेगज वेग है ॥ १५८ ॥
स्थितिस्थापकसंस्कारः क्षितौ केचित्चतुर्ष्वपि ॥
अतीन्द्रियोऽसौविज्ञेयः क्वचित्स्पन्देऽपिकारणम् १५९
२५

३१४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-स्थितिस्थापकाख्य संस्कार केवल पृथिवीहीमें रहता है; परन्तु कई
लोग इसको पृथिवीआदि चारोंमें मानतेहैं. वह स्थितिस्थापकाख्य संस्कार सर्वथा
अतीन्द्रय है और किसी २ स्थलमें स्पन्दरूप क्रियाकाभी कारण है ॥ १५९ ॥
स्थितिस्थापकेति । आकृष्टशाखादीनां परित्यागे पुनर्गमनस्य
स्थितिस्थापकसाध्यत्वात् । केचिदिति । चतुर्षु क्षित्यादिषु
स्थितिस्थापकं केचिन्मन्यन्ते तदप्रमाणमिति भावः । असौ
स्थितिस्थापकः । क्वचिदाकृष्टशाखादौ ॥ १५९ ॥
भाषा-वृक्षकी शाखादिको खैंचकर छोड़ दिया जाय तो उसका फिर पूर्ववत्
अवस्थान होजाता है वह आकृष्टशाखादिका प्रथमवत् अवस्थान स्थितिस्थापक-
संस्कारजन्य है. उस स्थितिस्थापक संस्कारको कई लोग पृथिवीआदि चारोंमें
रहनेवाला मानतेहैं; परन्तु ऐसा मानना उनका सर्वथा अप्रमाणक है मूलगत
' असौ ' पदसे स्थितिस्थापकसंस्कारका ग्रहण है और ' क्वचित् ' पदसे आकृष्ट-
शाखादिका ग्रहण है ॥ १५९ ॥
भावनाख्यस्तु संस्कारो जीववृत्तिरतीन्द्रियः ।
उपेक्षानात्मकस्तस्य निश्चयः कारणं भवेत् ॥१६०॥
भाषा-एवं भावनाख्यसंस्कार प्राणीमात्रमें रहता है और अतीन्द्रिय है
अर्थात् उसका किसी इन्द्रियद्वारा ग्रहण नहीं होता. उपेक्षाअनात्मक निश्चय
अर्थात् वस्तुविषयक दृढ बोध ( तस्य ) उस संस्कारका कारणीभूत है ॥ १६०॥
भावनाख्य इति । तस्य संस्कारस्य । उपेक्षात्मकज्ञानात् सं-
स्कारानुत्पत्तेरुपेक्षानात्मकइत्युक्तम् । तत्संशयात् संस्कारानु-
त्पत्तेर्निश्चय इत्युक्तम् । तेनोपेक्षान्यनिश्चयत्वेन संस्कारं प्रति
हेतुतेति भावः ।
भाषा-तस्य-इस मूलगतपदसे संस्कारोंका ग्रहण है. वस्तुविषयक ' उपेक्षात्मक '
ज्ञानसे अर्थात् वस्तुको दत्तचित्त होकर न ग्रहण करनेसे संस्कार उत्पन्न नहीं होता;
इसलिये मूलमें ' उपेक्षानात्मक ' यह निश्चयका विशेषण कहा है. ( तत् ) उपे-
क्षानात्मक संशयसेभी संस्कार उत्पन्न नहीं होता इसलिये संशयसाधारणज्ञानको
त्यागकर मूलमें ' निश्चय ' पदका निवेश किया है. एवं उपेक्षात्मक ज्ञानसे अन्य
जो निश्चयात्मक ज्ञान तादृश ज्ञानत्वेन संस्कारोंके प्रति कारणता है.

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता । ३१५
ननु स्मरणं प्रत्युपेक्षाऽन्यनिश्चयत्वेन हेतुत्वं तेनोपेक्षादिस्थले न
स्मरणमित्थं च संस्कारं प्रति ज्ञानत्वेनैव हेतुताऽस्त्विति चेत् ।
न । विनिगमनाविरहेण संस्कारं प्रत्यप्युपेक्षाऽन्यनिश्चयत्वेन हेतु-
तायाः सिद्धत्वात् ।
शंका-स्मरणात्मक ज्ञानके प्रति उपेक्षाऽन्य निश्चयत्वेन हेतुता है इसीलिये
उपेक्षात्मकज्ञानस्थलमें स्मरणात्मक ज्ञान नहीं होता. ( इत्थञ्च ) इस रीतिसे स्मृति
ज्ञानके प्रति उपेक्षानात्मक निश्चयत्वेन कारणता सिद्ध हुई तो संस्कारके प्रति
ज्ञानत्वरूप साधारण धर्मसेभी कारणता मान लीजाय तो हानि क्या है ?
समाधान--विनिगमनाविरहसे अर्थात् एकत्र पक्षपातिनी युक्तिके अभावसे
संस्कारोंके प्रतिभी उपेक्षानात्मक निश्चयत्वेन कारणता स्वयं सिद्ध है इसलिये
ज्ञानत्वेन कारणता माननी उचित नहीं;
किंचोपेक्षास्थले संस्कारकल्पनाया गुरुत्वात् संस्कारं प्रति
चोपेक्षान्यत्त्वेन हेतुतायाः सिद्धत्वात् ॥ १६० ॥
भाषा-(किञ्च) वस्तुतः विचार किया जाय तो संस्कारोंके प्रतिही उपेक्षाऽन्य-
निश्चयत्वेन कारणता माननेमें विनिगमक प्रतीत होता है; क्योंकि यदि ऐसा नहीं
माना जाय तो उपेक्षात्मक ज्ञानस्थलमें संस्कारोंकी एक अधिक गुरुभूत कल्पना
करनी होगी और संस्कारोंके प्रति तो उपेक्षाऽन्यनिश्चयत्वेन हेतुता अन्वयव्यतिरेकसे
सिद्धही है ॥ १६० ॥
तत्र प्रमाणं दर्शयति । स्मरण इति-
भाषा-'स्मरणे' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार ( तत्र ) संस्कारमें प्रमाण दिखलातेहैं--
स्मरणे प्रत्यभिज्ञायामप्यसौ हेतुरुच्यते ॥
भाषा-स्मरणात्मक ज्ञानमें तथा प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानमें यह संस्कार कारणीभूत है.
असौ संस्कारः। यतः स्मरणं प्रत्यभिज्ञानं च जनयत्यतः संस्कारः
कल्प्यते । विना व्यापारं पूर्वानुभवस्य स्मरणादिजननासा-
मर्थ्यात्, स्वस्वव्यापारान्यतराभावे कारणत्वासम्भवात् ।
भाषा-मूलगत 'असौ' पदसे संस्कारोंका ग्रहण है पूर्व दृष्टवस्तुविषयक अनुभव
कालान्तरमें उसी वस्तुके स्मरणका तथा प्रत्यभिज्ञानका जनक होता है; इसलिये
मध्यमें व्यापाररूपसे संस्कारोंकी कल्पना होतीहै संस्कारात्मकव्यापारसे विना पूर्वा-

३१६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
नुभवको स्मरणादिज्ञान जननमें सामर्थ्य नहींहै; क्योंकि कार्योत्पत्तिसे अव्यवहित
पूर्वक्षणमें ( स्व ) कारण ( स्वव्यापार ) कारणव्यापार अन्यतरके न होनेसे कारणमें
कारणत्व धर्मका होनाही असम्भव है. भाव यह कि-कार्याव्यवहितपूर्वक्षणवृत्ति कारण
कारणव्यापारान्यतरत्वहीका नाम ' कारणतापदार्थ 'है.
नच प्रत्यभिज्ञां प्रति तत्तत्संस्कारस्य हेतुत्वे प्रत्यभिज्ञायाः सं-
स्कारजन्यत्वेन स्मृतित्वापत्तिरिति वाच्यम्, अप्रयोजकत्वात् ।
परे त्वनुद्बुद्धसंस्कारात् प्रत्यभिज्ञानुदयादुद्बुद्धसंस्कारस्य हे-
तुत्वापेक्षया तत्तत्स्मरणस्यैव प्रत्यभिज्ञां प्रति हेतुत्वं कल्प्यत
इत्याहुः ।
शंका-संस्कारजन्य स्मृत्यात्मक ज्ञान होता है एवं तत्तदनुभवजन्य संस्कारोंको
यदि प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानके प्रतिभी कारणता है तो संस्कारजन्यत्वेन प्रत्यभिज्ञात्मक
ज्ञानकोभी स्मृतिरूपही होना चाहिये समाधान-यह कथन आपका अप्रयोजक है
अर्थात् संस्कारजन्यत्वका स्मृतित्वके साथ अन्वयव्यतिरेक कहनेके लिये आपके पास
कोई अनुकूलतर्क नहीं है; ( परंतु ) और चिन्तामणिकार तो यह कहतेहैं कि-अनुद्बु-
द्ध संस्कारोंसे प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानका उदय होना दुर्घट है; इसलिये उद्बुद्धसंस्कारोंही
को हेतुता कहनी होगी. एवं उद्बुद्ध संस्कारोंमें हेतुता माननेकी अपेक्षा तत्तद्वस्तु
विषयक स्मरणहीको प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानके प्रति हेतुता कल्पना करनेमें लाघव है.
अदृष्टं निरूपयति, धर्माधर्माविति-
भाषा- 'धर्माधर्म' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार अदृष्टका निरूपण करते हैं-
धर्माधर्मावदृष्टं स्याद्धर्मः स्वर्गादिसाधनम्॥१६१॥
गङ्गास्नानादियागादिव्यापारः स तु कीर्तितः ॥
कर्मनाशाजलस्पर्शादिना नाश्यस्त्वसौ मतः॥१६२॥
भाषा-धर्म अधर्म दोनोंका नाम ' अदृष्ट ' है. उनमें स्वर्गादिके साधनका नाम
' धर्म ' है ॥ १६१ ॥ वह धर्म :गङ्गास्नानादिका तथा यागादिका व्यापाररूप
कहा है. 'कर्मनाशा'नामक नदीके जलस्पर्शादिसे उस धर्मका नाश मानाहै॥१६२॥
स्वर्गादिसकलसुखानां स्वर्गसाधनीभूतशरीरादीनां च साधनं
धर्म इत्यर्थः । तत्र प्रमाणं दर्शयितुमाह । यागादीति । यागादि-
व्यापारतया हि धर्मः कल्प्यते । अन्यथा यागादीनां चिरविन-

परिच्छेदः ६ ] भाषाटीकासमेता. ३१७
ष्टतया निर्व्यापारतया च कालान्तरभाविस्वर्गजनकत्वं न स्या-
त् । तदुक्तमाचार्यैः । “ चिरध्वस्तं फलायालं न कर्मातिशयं
विना ” इति ।
भाषा-स्वर्गादि यावत् सुखोंका तथा स्वर्गके साधनीभूत शरीरादिका कारण एक
धर्मही है; उस धर्ममें “ यागादिकं धर्मादिव्यापारवत् वेदबोधितस्वर्गसाधनत्वात् ”
इत्यादि अनुमानप्रमाणप्रदर्शनार्थ मूलकार ‘ यागादि ’ इस ग्रन्थको कहते हैं अर्थात्
यागादिके व्यापाररूपसेही धर्मकी कल्पना होसकतीहै; अन्यथा मध्यमें व्यापाररू-
पेण धर्मस्वीकार न किया जाय तो चिरकाल विनष्ट हुए यागादि विना व्यापारके
कालान्तरमें होनेवाले स्वर्गके जनक कदापि नहीं होसकेंगे, इसी वार्त्ताको उदयना-
चार्यजीनेभी कहाहै कि-“चिरकाल विनष्ट हुआ कर्म विना अपूर्वसे फलजननमें समर्थ
नहीं होता”-इति ।
ननु यागध्वंस एव व्यापारः स्यात्, न च प्रतियोगिध्वंसयोरेकत्रा-
जनकत्वम्, सर्वत्र तथात्वे मानाभावात्, न च तन्मते फलानन्त्यं,
मन्मते चरमफलस्यापूर्वनाशकत्वान्न तथात्वमिति वाच्यम्, का-
लविशेषस्य सहकारित्वादित्यत आह । गङ्गास्नानेति । गङ्गास्ना-
नस्य हि स्वर्गजनकत्वेऽनन्तानां जलसंयोगध्वंसानां व्यापारत्व-
मपेक्ष्यैकमपूर्व कल्प्यते लाघवादिति भावः ।
शंका-मध्यमें धर्मको व्यापार माननेकी अपेक्षा यागके ध्वंसहीको व्यापार
मानलिया जाय तो हानि क्या है ? यदि कहो कि-‘प्रतियोगिको तथा प्रतियोगिके
ध्वंसको एकत्र जनकता अप्रसिद्ध है’ तो यह कथनभी युक्त नहीं क्योंकि सर्वत्र
( तथात्वे ) प्रतियोगि तथा प्रतियोगिके ध्वंसको एकत्र जनकत्वाभावमें कोई प्रमाण
नहीं है और यदि कहो कि-‘यागध्वंसको व्यापार माननेवालेको फल आनन्त्य मानना
होगा’ यह अनुचित है और धर्मको व्यापार माननेवालेको तो फलानन्त्यरूप
दोष नहींहै; क्योंकि उसने अन्तिम फलको धर्मरूप अपूर्वका नाशक मानाहै तो यह
कथनभी युक्त नहीं; क्योंकि कालविशेषको फलविशेषमें सहकारी मानकर फलान-
न्त्यरूप दोषका वारण होसकताहै ? समा०-इसका उत्तर ‘ गंगास्नान ’ इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार स्वयं देतेहैं. भाव यह कि-ध्वंसको व्यापार माननेवालेको गंगास्ना-
नको स्वर्गजनकता माननेमें मध्यमें अनन्तजलसंयोगोंकी ध्वंसको व्यापार मानना
होगा, उनकी अपेक्षा मध्यमें अपूर्वकी कल्पना करनेमें अतिलाघव है.

३१८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- गुण-
ननु ध्वंसोऽपि न व्यापारोऽस्तु, न च निर्व्यापारस्य चिरध्वस्त-
स्य कथं कारणत्वमिति वाच्यम्, अनन्यथासिद्धनियतपूर्ववर्ति-
त्वस्य तत्रापि सत्त्वात्, अव्यवहितपूर्ववर्तित्वं हि चक्षुःसंयोगा-
देः कारणत्वे न तु सर्वत्र कार्यकालवृत्तित्वमिव समवायिकार-
णस्य कारणत्व इत्यत आह, कर्मनाशेति ।
शंका-यदि ऐसाहै तो ध्वंसकोभी व्यापार मत मानो; एवं कारणके मध्यमें कहींभी
व्यापार माननेकी आवश्यकता नहींहै. यदि कहो कि-निर्व्यापार चिरविनष्ट यागादि
क्रियासे स्वर्गादिकारणता कैसे होगी ? तो कारणता नाम 'अनन्यथासिद्धत्वे
सति कार्यनियतपूर्ववर्तित्व ' मात्रका है; सो ऐसी कारणता यागादिमेंभी
विद्यमान है. अव्यवहित पूर्ववर्तित्वरूप धर्म चक्षुःसंयोगादिगत कारणताका घटक है
अर्थात् यदि रूपादि साक्षात्कारके प्रति चक्षुःसंयोगादिको कारणता कहनी होय तो
ऐसे स्थलमें अव्यवहित पूर्ववर्तित्वका निवेश करना उचित है. सर्वत्र उसका कुछ उप-
योग नहीं; जैसे समवायिकारणगत कारणताका कार्यकालवृत्तित्वघटक है, सर्वत्र नहीं.
समाधान-इसका उत्तर ' कर्मनाशा ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्वयं देतेहैं.
यदि ह्यपूर्वं न स्यात्तदा कर्मनाशाजलस्पर्शादिना नाश्यत्वं ध-
र्मस्य न स्यात् । न हि तेन यागादिनाशः प्रतिबन्धो वा कर्तुं-
शक्यते, तस्य पूर्वमेव वृत्तत्वादिति भावः ।
भाषा-यदि यागादिजन्य धर्मात्मक अपूर्व न होय तो कर्मनाशाजलस्पर्शादिसे उसका
नाशभी नहीं हुआचाहिये, परन्तु नाश होना तो शास्त्रसिद्धहै और कर्मनाशाजलके स्प-
र्शादिसे यागादिका नाश वा उसका प्रतिबन्ध तो कहही नहीं सकते;क्योंकि यागादिका
कर्मनाशा जलस्पर्शसे पूर्ववृत्तित्व है अर्थात् यागक्रिया बहुतकाल प्रथम होचुकी है;
इसलिये भिन्नकालीन पदार्थोंका परस्पर प्रतिबध्यप्रतिबन्धकभाव या नाश्यनाशक-
भाव कहना उचित नहीं.
एतेन देवताप्रीतिरेव फलमित्यपास्तम् । गङ्गास्नानादौ सर्वत्र
देवताप्रीतेरसम्भवात् देवतायाश्चेतनत्वेऽपि तत्प्रीतेरनुद्देश्य-
त्वात्, प्रीतेः सुखस्वरूपत्वेन विष्णुप्रत्यादौ तदसम्भवात् ।
जन्यसुखादेस्तत्राभावात् तेन, विष्णुप्रीतिजन्यत्वेन पराभिमत-
स्वर्गादिरेव विष्णुप्रीतिशब्देन लक्ष्यते ॥ १६१ ॥ १६२ ॥

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३१९
भाषा-कई विद्वान्‌लोग यागादि शुभक्रियाका देवताप्रीतिरूपही फल मानतेहैं.
इस पूर्वकथनसे उसकाभी खण्डन किया; क्योंकि गंगास्नानादि सर्वत्र
शुभकार्योंमें देवताप्रीतिका होना असम्भव है. यद्यपि देवता चेतन है इसलिये प्रीति
होनेका सम्भव होसकता है तथापि यागस्नानादिक्रिया कर्त्ताका देवताप्रीति
उद्देश्य नहीं है और ‘ प्रीति ’ नाम सुखविशेषका है, सो विष्णुप्रीतिआदिकोंमें उसका
होना असम्भव है; क्योंकि विष्णुआदिको ईश्वररूप होनेसे उनमें जन्यसुखका अभाव
है; इसलिये ‘विष्णुप्रीति’ शब्दसे विष्णुप्रीतिजन्यत्वेन मीमांसकोंके अभिमत स्वर्गादि-
काही लक्षणया बोध होता है ॥ ६१ ॥ ६२ ॥
अधर्मो नरकादीनां हेतुर्निन्दितकर्मजः ॥
प्रायश्चित्तादिनाश्योऽसौ जीववृत्ती त्विमौ गुणौ १६३
भाषा-नरकादि दुःखके साधनका नाम ‘अधर्म’ है और निषिध्यकर्मोंसे उसकी
उत्पत्ति होती है. प्रायश्चित्तादि आचरणसे उसका नाश होता है. यह धर्माधर्मरूप
दोनों गुण केवल जीवमात्रमें रहतेहैं ॥ ६३ ॥
अधर्मो नरकादीनामिति । नरकादिसकलदुःखानां नारकी-
यशरीरादीनां च साधनमधर्म इत्यर्थः । तत्र प्रमाणमाह, प्राय-
श्चित्तेति । यदि ह्यधर्मो न स्यात्तदा प्रायश्चित्तादिना नाश्यत्वं
न स्यात्।नहि तेन ब्रह्महननादीनां नाशः प्रतिबन्धो वा विधातुं
शक्यते तस्य पूर्वमेव विनष्टत्वादिति भावः । जीवेति । ईश्वरस्य
धर्माधर्माभावादिति भावः ॥ १६३ ॥
भाषा-नरकमें होनेवाले सम्पूर्ण दुःखोंका तथा नारकीय शरीरादिकोंका कारणी-
भूत अधर्म है. ‘ प्रायश्चित्त ’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार उसमें प्रमाण दिखलातेहैं.
यदि अधर्म कुछ वस्तु न होय तो प्रायश्चित्तादिद्वारा उसके नाशका विधानभी नहीं
हुआ चाहिये. उस प्रायश्चित्तादिसे ब्राह्मणवधादिका नाश अथवा प्रतिबन्ध तो विधान
करही नहीं सकते; क्योंकि ‘ तस्य ’ उस ब्रह्महननादि कर्मका तो पूर्वही विनाश हो
चुका है. मूलगत ‘जीववृत्ति’यह पद कहनेका भाव यह है कि-ईश्वरमें धर्माधर्मादिका
सर्वथा अभाव है ॥ १६३ ॥
इमौ तु वासनाजन्यौ ज्ञानादपि विनश्यतः ॥
भाषा-यह धर्माधर्म दोनों वासनासे उत्पन्न होतेहैं और इन दोनोंका आत्मज्ञान
सेभी विनाश होता है.

३२० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
इमौ धर्माधर्मौ । वासनेति । अतो ज्ञानिना कृते सुकृतदुष्कृतक-
र्मणी न फलायालमिति भावः । ज्ञानादपीति, अपिदिना भोग-
परिग्रहः ।
भाषा-मूलगत ' इमौ ' पदसे धर्माधर्मका ग्रहण है. ये दोनों वासनाजन्य हैं;
इसीलिये ज्ञानीपुरुषके किये पुण्यपापादि कर्मफल प्रदानके लिये समर्थ नहीं
होते, भाव यह कि-ज्ञानीपुरुषमें ज्ञानद्वारा वासनाका क्षय हुआ है, इसलिये
उसकी शुभाशुभरूपा क्रिया केवल प्रतीतिमात्र है,भोगोपयोगिनी नहीं है.“ज्ञानादपि”
यहां 'अपि' शब्दसे भोगका परिग्रहण करना.
ननु तत्त्वज्ञानस्य कथं धर्माधर्मनाशकत्वं“नाभुक्तं क्षीयते कर्म
कल्पकोटिशतैरपि ” इति वचनाविरोधात्, इत्थंच तत्त्वज्ञानिनां
झटिति कायव्यूहेन सकलकर्मणां भोगेन क्षय इति चेत् । न ।
तत्र भोगस्य वेदबोधितनाशकोपलक्षकत्वात् ।
शंका-“भोगे विना कर्मोंका शतकोटिकल्पोंसेभी क्षय होना असम्भव है” इत्यर्थक
स्मृतिवचनके साथ विरोध होनेसे तत्त्वज्ञानको धर्माधर्मनाशकता कैसे होसकती है?
अर्थात् नहीं होसकती इसलिये तत्त्वज्ञानी लोगोंको एककालावच्छेदेन शीघ्रही काय-
व्यूहसे अर्थात् यावत् कर्मभोगार्थ कायकदम्बके निर्माणसे सम्पूर्णकर्मोंका भोगहीसे
नाश मानना उचित है. “समाधान-” नाभुक्तं इत्यादि वाक्यगत ' भोग ' पद
वेदबोधित नाशकमात्रका उपलक्षक है अर्थात् जैसे भोगसे विना कर्मोंका क्षय नहीं
होता वैसेही आत्मज्ञानसे विना या प्रायश्चित्तादिसे विनाभी नहीं होता.
कथमन्यथा प्रायश्चित्तादिना कर्मणां नाशः।तदुक्तम् “ ज्ञानाग्निः
सर्वकर्माणि ” इत्यादिना । श्रूयते च “ क्षीयन्ते चास्य कर्माणि
तस्मिन् दृष्टे परावरे” इति ।
भाषा-अन्यथा यदि भोगपदको आत्मज्ञानादिका उपलक्षक नहीं मानों तो
प्रायश्चित्तादिसेभी कर्मोंका नाश नहीं हुआ चाहिये. ( तदुक्तं) इसी वार्ताको भगवान्-
ने अर्जुनकोभी कहा है कि-“ हे अर्जुन!जैसे दीप्त हुआ अग्नि काष्ठको सर्वरूपसे दग्ध
करता है वैसेही ज्ञानरूप अग्निभी यावत् कर्मको सर्वरूपसे दग्ध करता है.” श्रुतिमेंभी
कहा है कि-“ उस परावरपरमात्माके दर्शनमात्रसे इस अधिकारी पुरुषके कर्मोंका
क्षय होता है.

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३२१
ननु तत्त्वज्ञाननस्ताह शरीरावस्थानं सुखदुःखादि च न स्यात्।
ज्ञानेन सर्वेषां कर्मणां नाशादिति चेत् । न । प्रारब्धेतरकर्म-
णामेव नाशात् । तत्तच्छरीरभोगजनकं हि यत्कर्म तत्प्रार-
ब्धम् । तदभिप्रायमेवं नाभुक्तमिति वचनमिति ।
शंका-यदि ऐसा है तो आत्मज्ञानी पुरुषके शरीरकी स्थिति तथा उसको सुखदुःखा-
दिका अनुभव नहीं हुआ चाहिये;क्योंकि शरीरावस्थानादिके कारणीभूत कर्मोंका सर्व
रूपसे नाश होचुका है. समाधान-प्रारब्धकर्मोंसे अन्यकर्मोंहीका आत्मज्ञानादिद्वारा
नाश होताहै, तत्तन्नरदेवा दिशरीरावच्छेदेन भोगके जनक कर्मविशेषका नाम 'प्रारब्ध-
कर्म' है. उसी प्रारब्धकर्मके अभिप्रायसेही 'नाभुक्तं' इत्यादि स्मृतिवचन है-इति
शब्दं निरूपयति, शब्दो ध्वनिश्चेति-
भाषा-'शब्दो ध्वनिश्च' इत्यादिग्रन्थसे मूलकार शब्दका निरूपण करतेहैं-
शब्दो ध्वनिश्च वर्णश्च मृदङ्गादिभवो ध्वनिः॥१६४॥
कण्ठसंयोगादिजन्या वर्णास्त कादयो मताः ॥
सर्वः शब्दो नभोवृत्तिः-
भाषा-ध्वन्यात्मक तथा वर्णात्मक भेदसे शब्द दोप्रकारका है. मृदङ्गादिसे
उत्पन्न हुएका नाम 'ध्वन्यात्मक' शब्द है ॥ १६४॥कण्ठतालवादि संयोगसे उत्पन्न
हुएका नाम 'वर्णात्मक'शब्दहै. वह वर्ण'क' 'ख' आदिभेदसे अनेक हैं; सम्पूर्णशब्द
समवायसम्बन्धसे आकाशमें रहतेहैं.
नभोवृत्तिराकाशसमवेतः।
भाषा-मूलगत 'नभोवृत्ति' शब्दका विवरणही आकाशसमवेत है.
दूरस्थशब्दस्याग्रहणादाह, श्रोत्र इति-
भाषा-दूरदेशमें उत्पन्न हुए शब्दका ग्रहण नहीं होसकता; इसलिये'श्रोत्र'इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार उसकी रीति कहतेहैं-
-श्रोत्रोत्पन्नस्तु गृह्यते ॥ १६५ ॥
भाषा-वह मृदङ्गाद्यवच्छेदेन उत्पन्न हुआ शब्द श्रोत्रदेशमें उत्पन्न हुआ ग्रहण
होताहै ॥ १६५ ॥
ननु मृदङ्गाद्यवच्छेदेनोत्पन्ने शब्दे श्रोत्रे कथमुत्पत्तिरत आह,
वीचीति-
शंका-मृदङ्गादिदेशमें उत्पन्न हुआ शब्द श्रोत्रदेशमें कैसे उत्पन्न होगा?
२६

३२२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
समा०-इसका उत्तर मूलकार 'वीची' इत्यादि ग्रन्थसे स्वयं लिखतेहैं-
वीचीतरङ्गन्यायेन तदुत्पत्तिस्तु कीर्तिता ॥
भाषा-वीची तरङ्गन्यायसे अर्थात् जलऊर्मितरङ्गोंके सर्व ओर प्रसरणवत् शब्दकी
श्रोत्रावच्छेदेन उत्पत्ति कथन करीहै.
आद्यशब्देन बहिर्देशदिगवच्छिन्नोऽन्यः शब्दस्तेनैव शब्देन
जन्यते तेन चापरस्त्व्यापकः। एवंकमेण श्रोत्रोत्पन्नो गृह्यत इति ।
भाषा-प्रथमशब्दसे बाह्य दशादिगवच्छेदेन शब्दान्तरकी उत्पत्ति होतीहै अर्थात्
जैसे जलमें लोष्टादिके फेंकनेसे प्रथम एक तरङ्ग उत्पन्न होताहै, पश्चात् उसी प्रथम-
तरङ्गसे चारों ओर अनेक वीचीतरङ्ग उत्पन्न हुए कूलतक जातेहैं वैसेही मृदङ्गादिके
टंकारसेभी प्रथम एक शब्द उत्पन्न होताहै पश्चात् उसी शब्दसे दशोंदिशामें शब्दा-
न्तर उत्पन्न होतेहैं. उनसे पुनः शब्दान्तरोंकी उत्पत्ति होतीहै; इसी क्रमसे मृदङ्गदेशगत
शब्द श्रोत्रावच्छेदेन उत्पन्न हुआ ग्रहण होताहै.
कदम्बगोलकन्यायादुत्पत्तिः कस्यचिन्मते॥ १६६॥
भाषा-कदम्बगोलकन्यायसे अर्थात् जैसे कदम्बपुष्पमें गोलाकारता उत्पन्न
होतीहै वैसेही शब्दकी उत्पत्तिभी किसीएक विद्वान्ने मानीहै ॥ १६६ ॥
कदम्बेति । आद्यशब्दाद्दशसु दिक्षु दश शब्दा उत्पद्यन्ते, तत-
श्चान्ये दश शब्दा उत्पद्यन्त इति भावः।अस्मिन् कल्पे कल्प-
नागौरवादुक्तं कस्यचिन्मत इति ॥ १६६ ॥
भाषा-भाव यह कि-जैसे कदम्बपुष्पके मध्यमें एक कलिका पश्चात् चारोंओर
दश कलिका ऐसेही आगे चारोंओर लगनेसे एक गोल गुच्छ बनजाताहै वैसेही मृद-
ङ्गादिदेशगत आद्यशब्दसे दशोंदिशाओंमें दश शब्द उत्पन्न होतेहैं पश्चात् उस एक एकसे
पुनः दश दश शब्द उत्पन्न होतेहैं. इस रीतिसेभी शब्दकी उत्पत्ति श्रोत्रदेशमें होसक-
तीहै. मूलमें ' कस्यचिन्मते ' इस कहनेका भाव यह है कि-इस मतमें अनन्तशब्दों-
की कल्पना करनेमें कल्पना गौरव है ॥१६६॥
ननु शब्दस्य नित्यत्वादुत्पत्तिः कथमत आह, उत्पन्न इति-
शंका-शब्द तो नित्य है. आपने उसकी उत्पत्ति कैसे कही ? समाधान-इसका
उत्तर 'उत्पन्नः कः' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्वयं लिखतेहैं-
[L29

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३२३
शब्दानामुत्पादविनाशप्रत्ययशालित्वादनित्यत्वमित्यर्थः ।
भाषा- अर्थात् यावत् शब्दोंमें उत्पाद विनाश प्रत्यय विषयता है. इसलिये इनमें
अनित्यता माननी उचित है.
ननु स एवायं ककार इत्यादिप्रत्यभिज्ञानाच्छब्दानां नित्यत्वम्।
इत्थं चोत्पादविनाशबुद्धिर्भ्रमरूपैवेत्यत आह, सोऽयं क इति-
शंका-" स एवायं ककारः-अर्थात् यह वही ककार है" इत्यादि प्रत्यभिज्ञा-
त्मक ज्ञानसे शब्दोंमें नित्यता प्रतीत होती है, इसलिये उनमें उत्पादविनाशाव-
गाहिनी बुद्धि भ्रमरूपाही माननी उचित है. समाधान-इसका उत्तर 'सोऽयं कः '
इत्यादि ग्रन्थसे मूलकारस्वयं देतेहैं-
सोऽयं क इति बुद्धिस्तु साजात्यमवलम्बते ॥१६७ ॥
भाषा-"सोऽयं कः-अर्थात् यह वही ककार है" इत्याकारक बुद्धि ककारादि-
निष्ठ साजात्यका ग्रहण करतीहै ॥ १६७ ॥
साजात्यमिति।तत्र प्रत्यभिज्ञानस्य तत्सजातीयत्वं विषयो न तु
तद्व्यक्त्यभेदो विषयः, उक्तप्रतीतिविरोधात् । इत्थं द्वयोरपि प्रती-
त्योर्नभ्रमत्वमिति ॥ १६७ ॥
भाषा-ऐसे स्थलमें प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानका ककारादि सजातीयत्व विषय है,
किन्तु ककारादिव्यक्तिका अभेद विषय नहीं; क्योंकि ( उक्त ) उत्पादविनाशशाली
प्रत्ययके साथ विरोध है. ( इत्थञ्च ) इस रीतिसे प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानको साजात्याव-
गाहि माना तो उत्पादप्रतीति तथा प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञान इन दोनों बुद्धियोंको
भ्रमरूपता नहींहै ॥ १६७ ॥
ननु सजातीयत्वं सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञायां भासत इति कुत्र दृ-
ष्टमित्यत आह, तदेवेति-
शंका-'सोऽयं' इत्यादि प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानमें सजातीयत्वका भान आपने
कहां देखा है ? समाधान-इसका उत्तर 'तदेव' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार
स्वयं देतेहैं-
तदेवौषधमित्यादौ सजातीयेऽपि दर्शनात् ॥
तस्मादनित्या एवेति वर्णाः सर्वे मतं हि नः॥१६८ ॥
भाषा-"तदेवौषधं-अर्थात् यह वही औषध है" इत्यादिस्थलोंमें सजातीय

पदार्थोंमेंभी प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञान देखनेमें आता है. इसलिये सम्पूर्ण वर्ण अनित्यही
हैं. यह हमारा सिद्धान्त है ॥ १६८ ॥
यदौषधं मया कृतं तदेवान्येनापि कृतमित्यादिदर्शनादिति-
भावः ॥ १६८ ॥ ॥ इति सिद्धान्तमुक्तावल्यां गुणनिरूपणम् ॥
भाषा-‘जो औषधी मैंने करी थी वही औषधी दूसरे पुरुषनेभी करीहै’ इत्यादि
स्थलमें सजातीयत्वका भान होताहै. भाव यह कि-जो औषधी मैंने करी है
वस्तुतः वह औषधी वह नहींहै जो कि, दूसरेने करीहै; किन्तु उसी जातिकी दूसरी
औषधी है-इति ॥
इति श्रीमहामहोपाध्यायविद्यानिवासभट्टाचार्यपुत्रश्रीयुतवि-
श्वनाथपञ्चाननभट्टाचार्यविरचिता न्यायसिद्धान्तमु-
क्तावली संपूर्णा ।
कतार सर्वलोकानां भर्तारं सर्वप्राणिनाम् ॥
हर्तारं सर्वविघ्नानामाश्रये जानकीप्रियम् ॥ १ ॥
संसाराम्बुधितारणैकतरणी पूताप्रिया यस्य गीः
श्रेष्ठाचारविचारणैकजननी लोकोत्तरा यस्य धीः ॥
तुर्कव्यूहविनाशनेऽतिसबला तेजोमयी यस्य भी-
र्वन्द्योऽसौ गुरुनानको गुरुवरो गोविन्दसिंहस्तथा ॥ २ ॥
श्रीठाकुरपदबोध्यं स्वर्वाङ्किरणापहृतदासहृद्ध्वान्तम् ॥
त्रेधा नमामि सततं श्रीसद्गुरुनिहालसिंहार्कम् ॥ ३ ॥
: श्रीकाश्यां निवसन्तो विज्ञाः श्रीशिवकुमारमिश्राद्याः ॥
मूर्द्धा मे ते मान्या हृदा तु गुरुराममिश्रवराः ॥ ४ ॥
भूतबाणग्रहक्षौणी वैक्रमे वत्सरे वरे ॥
पौषशुल्कांद्वितीयायां ग्रन्थः पूर्तिमगादयम् ॥ ५ ॥
इति श्रीमद्दुःखभञ्जन्याश्रमाधिपतिनिर्मलोदग्रपूज्यपादश्रीठाकुरनिहालसिंहपादपाथो
जप्रैष्यगण्डासिंहपरनामक गोविन्दसिंहसाधुकृते आर्यभाषाविभूषितन्यायमु-
क्तावलीप्रकाशे गुणनिरूपणम् ॥ समाप्तश्चायं ग्रन्थः ॥ इतिशम् ॥
पुस्तक मिलनेका पता-खेमराज श्रीकृष्णदास,
“ श्रीवेङ्कटेश्वर ” छापाखाना, खेतवाड़ी--बम्बई.

or (d) Jain Philosophy & Literature
Syadvada Manjari
Sutra Kratanga I–VI
Uttaradhyayana I–X

  • The following books not to be regarded as text
    books are recommended for study.
  1. Mrs. Sinclair Stevenson, Heart of Jainism
  2. Dharma Bhushana Nyayadipika
  3. Jacobi Translation of the Jaina
    Sutras (Sacred Books of the East
    Series)
  4. Jacobi Articles in Hastings Encyclo-
    paedia of Religion & Ethics
    Paper IV History of Sanskrit Literature
    The following books not to be regarded as text
    books are recommended for study
    Macdonell A History of Sanskrit Literature
    Ghate Lectures in Rigveda
    Deussen Philosophy of Upanishads
    Deussen The Cambridge History of India
    Hopkins, The Great Epic of India
    Keith Indian Drama.
    Paper V General Principles of Comparative
    Philology with Illustrations from the
    development of the Indian Sanskrit
    Languages; Vedic Grammar.
    The following books not to be regarded as
    text books are recommended for study
    Macdonell – Vedic Grammar for Students
    Uhlenbeck – Manual of Sanskrit
    Phonetics
    Woolner – Introduction to Prakrit
    Bhandarkar – Wilson Philological Lectures
    Grierson – Articles in Encyclopaedia Britannica
    Gune – Introduction to Philology

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