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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 350 में से

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पृष्ठ 347

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३२३
शब्दानामुत्पादविनाशप्रत्ययशालित्वादनित्यत्वमित्यर्थः ।
भाषा- अर्थात् यावत् शब्दोंमें उत्पाद विनाश प्रत्यय विषयता है. इसलिये इनमें
अनित्यता माननी उचित है.
ननु स एवायं ककार इत्यादिप्रत्यभिज्ञानाच्छब्दानां नित्यत्वम्।
इत्थं चोत्पादविनाशबुद्धिर्भ्रमरूपैवेत्यत आह, सोऽयं क इति-
शंका-" स एवायं ककारः-अर्थात् यह वही ककार है" इत्यादि प्रत्यभिज्ञा-
त्मक ज्ञानसे शब्दोंमें नित्यता प्रतीत होती है, इसलिये उनमें उत्पादविनाशाव-
गाहिनी बुद्धि भ्रमरूपाही माननी उचित है. समाधान-इसका उत्तर 'सोऽयं कः '
इत्यादि ग्रन्थसे मूलकारस्वयं देतेहैं-
सोऽयं क इति बुद्धिस्तु साजात्यमवलम्बते ॥१६७ ॥
भाषा-"सोऽयं कः-अर्थात् यह वही ककार है" इत्याकारक बुद्धि ककारादि-
निष्ठ साजात्यका ग्रहण करतीहै ॥ १६७ ॥
साजात्यमिति।तत्र प्रत्यभिज्ञानस्य तत्सजातीयत्वं विषयो न तु
तद्व्यक्त्यभेदो विषयः, उक्तप्रतीतिविरोधात् । इत्थं द्वयोरपि प्रती-
त्योर्नभ्रमत्वमिति ॥ १६७ ॥
भाषा-ऐसे स्थलमें प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानका ककारादि सजातीयत्व विषय है,
किन्तु ककारादिव्यक्तिका अभेद विषय नहीं; क्योंकि ( उक्त ) उत्पादविनाशशाली
प्रत्ययके साथ विरोध है. ( इत्थञ्च ) इस रीतिसे प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानको साजात्याव-
गाहि माना तो उत्पादप्रतीति तथा प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञान इन दोनों बुद्धियोंको
भ्रमरूपता नहींहै ॥ १६७ ॥
ननु सजातीयत्वं सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञायां भासत इति कुत्र दृ-
ष्टमित्यत आह, तदेवेति-
शंका-'सोऽयं' इत्यादि प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानमें सजातीयत्वका भान आपने
कहां देखा है ? समाधान-इसका उत्तर 'तदेव' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार
स्वयं देतेहैं-
तदेवौषधमित्यादौ सजातीयेऽपि दर्शनात् ॥
तस्मादनित्या एवेति वर्णाः सर्वे मतं हि नः॥१६८ ॥
भाषा-"तदेवौषधं-अर्थात् यह वही औषध है" इत्यादिस्थलोंमें सजातीय