न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
मंगलाचरण, सप्त पदार्थ उद्देश एवं द्रव्य खण्ड (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश)
न्यायसिद्धांत मुक्तावली
भाषाटीकासमेता ।
Shastri or Honours in Sanskrit.
1927 - 1928.
(a) Veda. Selections from Rigveda
Mandala I, Suktas 1, 13, 22,
25, 32, 50, 110, 113, 118, 124, 125, 154,
165 with the introduction to Sayana's
commentary and his commentary on
the prescribed hymns. } I
(b) Vedanga. Yaska's Niruktam I–IV & VII
Niruktālochanam by Satyavrata
Samasrami is suggested for study
Drama (a) Mricchakatika }
(b) Poetry – Naishadha Charitam }
Sargas I to V } II
(c) Prose – Kadambari first half }
(d) One or two questions on the History }
of Sanskrit Literature }
One of the following
(a) Nyaya Shastra – Gautama Nyayadarshana
with Vatsyayana's Bhashya.
or
(b) Vedanta Shastra – Shankaracharya's
Shariraka Bhashya.
(c) Dharma Shastra – Mitakshara
or
(d) Vyakarna Shastra – Laghushabdendushekhara upto Karakanta
or
(e) Alankarashastra – Kavya Prakash
(f) Sankhya Tattva Kaumudi with the
Commentary of Balaram Udasin Guru-
mandala Hardwar. } III
or
(g) Yoga Darshana with Vyasa's Bhashya.
or
(h) Mimamsa Darshana with Sabara Bhashya 1st six
Chapters and Tantravartika on the first adhyaya.
Translation – Sanskrit to Hindi & vice versa. } IV
Grammar – Siddhanta Kaumudi portions }
(Maha) not included in Visharada Paper I } V
Also Bhashya Bhumika I & II
Composition in Sanskrit } VI
Margin Notes (Left Column)
and selection from Atharva Veda I, 32; III, 15, 30; IV, 16; XII, 1; XIII, 3
Paper B: 1. Premashram by Prem Chand, 2. Essay in Hindi
Additional Hindi Paper: Poetry & Drama
Paper A { V. Bhashana & Param Tattva (V.S.L.) by Shyam Bihari Mishra & Shukdeo Bihari Mishra B. Nagari Pracharini Sabha Kashi }
2) Malati Madhava Bhavabhuti
Visharada Examination for
1927 & 1928.
Drama - Kalidasa. Abhignana Sakuntala
Poetry 1 { Prahelika Sangrah in two parts edited
with commentary by Giridhar Sharma
M. A. Price Rs 2/8
Prose 2 { Sivarajvijaya by Ambika Dutt Vyasa
Man mandir mohalla Benares.
Philosophy 3 { Nyaya Siddhanta muktavali by
Vishwanath.
Rhetoric 4 { Kavyadarsa of Dandin edited by Nrisimh
Dev Shastri (Mehr Chand Lakhman Das
Booksellers Lahore
Vidagdhamukhamandana.
Nirnaya Sagar Press Bombay.
Grammar 5 { Siddhanta Kaumudi first half upto
the end of Samasa and second half
Saralakaumudi
Part I By Sadashiv upto the end of Churadi
Datt M.A. Dayanand Press Lahore
Phakkikas excluded
Translation 6 { Sanskrit to Hindi & vice versa.
Composition
in Sanskrit.
Additional Hindi Paper.
Paper A 1. Poetry & Drama.
Tulsi Ramayana Ayodhya kanda.
Ratna Ashrama Agra.
2. Satya Harishchandra By Bharatendu
Harishchandra.
Paper B. Prose & Composition
- Theth Hindi ka Thath By }
Ayodhya Singh Upadhyaya. }
Khadgavilas Press } 25
Bankipur } marks - Navanidhi By Premchand }
- An essay in Hindi , 25 marks
Vrittiratnakara (Chhand)
Sankhya Tattva Kaumudi (Sankhya)
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SUNDAR LAL ADVOCATE
Supreme Court & High Court
ॐ
श्रीविश्वनाथपञ्चाननभट्टाचार्येणविरचिता ।
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली ।
भाषाटीकासमेता ।
काशीनिवासिनिर्मल पं० स्वामिगोविन्दसिंहसाधुकृता-
र्थभाषाटीकोपेतातनैवसंशोधिता ।
सेयं
क्षेमराज श्रीकृष्णदासश्रेष्ठिना
मुम्बापुर्य्यां
स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर" नाम्निमुद्रणयन्त्रे
मुद्रयित्वाप्रकाशिता ।
संवत् १९५७, शके १८२२.
रजिस्ट्री हक़ "श्रीवेङ्कटेश्वर" यन्त्रालयाध्यक्षने स्वाधीन रक्खा है ।
M. A. Exam
-X- For General Phonetics & the general principles
of Comparative Philology especially of the
Indo-European family, no books are recommended
Paper VI Unseen Translation from & into
Sanskrit; Essay on a subject connected
with the History of Sanskrit Literature
⊗ In the M. A. 1928 every candidate will be
required to take -
- Special portion of History of Literature
and any two of the following - Critical Vedic studies
- Vedānta or Nyāya with a
general knowledge of other systems
of Philosophy or Dharmashāstra
and Arthaśāstra - Epigraphy & History of India
- Philology.
⊗ Intended for those who have passed
the Honours school in Sanskrit after
a three years course in school.
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काशीनिवासी निर्मलपं० स्वामिगोविन्दसिंह साधुः
॥ श्रीः ॥
बंबई “श्रीवेङ्कटेश्वर” यन्त्रालयमें छपेहुये
☛ वेदान्तग्रन्थ. ☚
ना. की.रु.आ.
शारीरक ( शांकरभाष्य ) रत्नप्रभाटीका व्यासाधिकरणमाला और
भक्तिसूत्र सभाष्य अक्षर बड़ा .... .... .... .... १०--०
ब्रह्मसूत्र ( शारीरक ) भाषाटीका .... .... .... १--८
वेदांतसार संस्कृतमूल और संस्कृतटीका तथा भाषाटीकासहित ०--१२
पंचदशीसटीक .... .... .... .... २--८
पंचदशी पं० मिहिरचंद्रकृत अत्युत्तम भाषाटीका सहित .... ४--०
पंचदशी भाषा--आत्मस्वरूपजीकृत .... .... .... ४--०
गीता चिद्धनानंदस्वामिकृत गूढार्थदीपिका मूल अन्वय पदच्छेदके
सहित भाषाटीका .... .... .... .... ७--०
गीता आनंदगिरिकृतभाषाटीका ... ... ... .... ३--०
श्रीमद्भगवद्गीता सान्वयब्रजभाषा दोहासहित... ... .... १--४
गीतामृततरंगिणी भाषाटीका ( रघुनाथप्रसादकृत ) अक्षरबड़ा १--४
गीतामृततरंगिणी भाषाटीका पाकिटबुक ... .... ०--१२
श्रीरामगीता मूल ... ... ... .... ०--२
श्रीरामगीता भाषाटीका--पदप्रकाशिका अनुवाद समुच्चय और
विषमपदीके सहित ... ... ... .... ०--८
श्रीमद्भगवद्गीतापंचरत्नअक्षरमोटागुटकोरेशमी ... .... १-०
पंचरत्न अक्षरबड़ा खुलापत्रा छोटीसंची ... .. .... १-८
पंचरत्न अक्षरबड़ा लंबीसंची खुला .... .... .... .... १-०
पंचरत्न भाषाटीका .... .... .... .... .... .... २-०
गीता श्रीधरीटीका सहित .... .... .... .... १-०
जाहिरात ।
गीता बडेअक्षरकी १६ पेजी गुटका .... .... .... .... ०-१२
गीता बडेअक्षरकी खुली १२ पेजी .... .... .... .... ०-१०
गीता गुटका विष्णुसहस्रनाम सहित .... .... .... .... ०-८
गीता पंचरत्न और एकादशरत्न .... .... .... .... ०-१२
पंचरत्न द्वादशरत्न .... .... .... .... .... ०-१०
गीतापंचरत्न नवरत्न पाकिट बुक् .... .... .... .... ०-७
गीता गुटका पाकिट बुक् .... .... .... .... ०-५
अष्टावक्रगीता अत्युत्तम सान्वय भाषाटीका .... .... .... १-०
शिवगीता भाषाटीकासहित .... .... .... .... ०--१२
गणेशगीता भाषाटीकासहित .... .... .... .... ०-६
गीतापंचदश भाषाटीका [ काश्यपगीता, शौनकगीता, अष्टावक्र-
गीता, नहुषगीता, सरस्वतीगीता, युधिष्ठिरगीता, बकगीता,
धर्मव्याधगीता, श्रीकृष्णगीतादि .... .... ०-१२
पाण्डवगीता भाषाटीकासह .... .... .... ०-३
तथा मूल४ रत्न बडा अक्षर .... .... .... .... ०-२
अपरोक्षानुभूति संस्कृत टीका भाषाटीका सहित ... ... ०--१०
आत्मबोध भाषाटीका .... ... ... ... ०-३
तत्त्वबोध भाषाटीका .... ... ... .... ०--२
वेदांतग्रंथपंचकम् (वाक्यप्रदीपः वाक्यसुधारसः हस्तामलकः
निर्वाणपंचकं मनीषापंचकं ) स० .... .... ... ०--६
वेदस्तुति भाषाटीका सह ... .... .... ... ०--८
गीता रामानुजभाष्य ... ... ... ... २-०
वेदांतडिम्डिम् .... .... .... .... ०--२॥
वैराग्यभास्कर भाषाटीका ... .... .... ... ०-८
सिद्धांतचंद्रिका सटीक (वेदांत) .... .... .... ०-८
संपूर्ण पुस्तकोँका “बडासूचीपत्र” अलगहै देखनाहोतो मँगालीजिये.
पुस्तक मिलनेका पता—खेमराज श्रीकृष्णदास,
“श्रीवेङ्कटेश्वर” छापाखाना, खेतवाडी-बंबई.
अथ न्यायतत्त्वसमीक्षाख्यभूमिका ।
इस सर्वथा इत्थंभावेन अचिन्तनीय तथा अनवद्य वैशद्य विपुल संसारमें प्राणीमात्रको
प्रतिक्षण समूल दुःखनिर्मूलपूर्वक परमोत्कृष्टाप्रतिहत सुखसंतानविषयिणी लिप्सा तथा
एकान्तात्यन्त समूल दुःखविषयिणी जिहासा सामान्यरूपेण स्वान्तमें सर्वदा एकरस
बनी रहती है; परन्तु यावत् प्राणी हेय हेयहेतु तथा हान हानोपायको सम्यक्रूपसे
न जानते हुए संसारचक्रमें प्राप्त होय सुखके बदले विपरीत अनेकविध जन्ममरणादि
दुःखहीको अनुभव करतेहैं. वर्तमान प्रचलित संसारचक्रमें प्रायः सामान्यरूपेण यों देख-
नेमें आता है कि-प्रादुर्भूत हुआ प्राणीमात्र प्रथम अबुद्धावस्थामें अपने मातापितृद्वारा
या किसी दूसरे सजाति विजातिसम्बंधिद्वारा पालनपोषणादि सहकारिताको पायकर समया-
नुसार स्वयं सुबोध हुआ विशेषरूपसे निरवच्छिन्न सुखसम्पादनमें प्रयत्नशील होताहै;
उसमेंभी सामान्यरूपसे इन प्राणियोंके दो भेद देखनेमें आतेहैं. एक तो ऐसा प्राणीदल
देखनेमें आता है कि, जिसमें विचारशक्तिका बहुतही ह्रास प्रतीत होताहै; जैसे कि, पशु
पक्षि कृमि-दंशादि हैं. ऐसा प्राणीदल अहोरात्र केवल काय पालन पोषणादिमें प्रयत्नशील
हुआ इसीको परम पुरुषार्थ तथा सुखसीमा मानकर अपनी आयुको व्यतीत करता
हुआ स्वस्वान्तमें परम सन्तुष्ट होताहै; और दूसरा विचारशील प्राणीवर्ग देवमनुष्यादिहैं.
इस प्राणीवर्गको जब अनेकविध भोगोंसे शरीर पालन पोषण कर कदाचित् दैवात् अव-
काश मिलता है तो समय २ पर ऐसे विचार उत्पन्न होतेहैं कि मैं कौनहूं? कैसाहूं? कहांसे
आया और कहाँजाऊंगा? इत्यादि । एवं यह संसार क्या है? कैसा है ? किसका है? इत्या-
दि । एवं मेरा तथा इस संसारका कोई अधिपति है या नहीं? यदि है तो कैसा है? कौन
है ? कहां है ? इत्यादि अनेक प्रकारके विकल्पयुक्त विचार उद्बुद्ध होते हैं. बस, इनही
विचारोंको दार्शनिक विचार कहतेहैं. वह दार्शनिक विचार इस देशमें प्रायः ‘ अस्ति
नास्ति ’ कोटिके भेदसे प्राचीन कालसे दोप्रकारका चला आता है. इन विचारोंपर
सिद्धान्त करनेवाले महापुरुषोंको ऋषि महर्षि मुनि महामुनि इत्यादि प्रतिष्ठित शब्दोंसे
इतरलोग स्मरण करते हैं और परमोत्कट जिज्ञासावस्थामें इतर लोग उनही महर्षियों-
के सिद्धान्तोंको स्वान्तारूढ कर अपनेको कृतकृत्य तथा परमपुरुषार्थके भागी मानतेहैं.
( २ ) भूमिका ।
वह दार्शनिक विद्या संसारके अनादि होनेसे समय २ पर यद्यपि अनेक प्रकारसे परि-
णत होती चली आती है तथा समय २ पर इस विद्याके प्रचारक ऋषि महर्षिभी अने-
कों होचुकेहैं; तथापि वर्तमान कालमें इस भारतभूमिमें प्रख्यात अस्तिकोटीकी दर्श-
निकविद्या षट्भेदसे विभक्त हुई विराजमान है, तथा इसके प्रचारक परमपूज्य प्रति-
ष्ठित इस भारतसन्तानके हितपूर्वक एकमात्र शासक महर्षिभी षट्ही हुएहैं,
जिनके सदुपदेशोंसे उपदिष्ट तथा अनुगृहीत हुई भारतीय संतान अद्यावधि
महर्षि कपिल, महर्षि कणाद, महर्षि गौतम, महर्षि पतंजलि, महर्षि व्यास,
तथा महर्षि जैमिनि, इन सुशोभित नामोंसे तथा अपने पवित्र हृदयके भावोंसे समय २
पर स्मरण करती है. यद्यपि चार्वाक बृहस्पति बुद्धादि विद्वान् लोग नास्तिको-
टीके दर्शनोंके प्रवर्त्तकभी अनेक हुएहैं तथापि इस भारतीय प्रजामें उन दर्शनोंका
सम्मान तथा प्रचार वर्तमानकालमें बहुतही न्यून दीख पड़ताहै; परन्तु कपिल
कणादादि महर्षियोंके मुखारविन्दनिःसृत तथा सद्विद्वद्वायुद्वारा इतस्ततः प्राप्त सदुपदे-
शरूपाऽऽमोदको किसी एक हतभाग्यके सिवाय ऐसा कोईभी भारतोद्बुद्ध प्रबुद्ध मधुप
न होगा जो कि सत्कार तथा परमप्रेमपूर्वक श्रवणद्वारा आघ्रात न करे. भाव यह कि-इन
महर्षियोंके सदुपदेशात्मक ज्ञानमयी पताका आसमुद्र भारतमात्रमें तो क्या बलके
पारके देशोंमेंभी एकरस सत्कारपूर्वक फहराती दीख पड़ती है; कारण यह कि-इन
महात्माओंने अतिसंक्षिप्त सूत्रभूत शब्दोंसे जिज्ञासुलोगोंको ऐसा सारभूत तथा पक्ष-
पातरहित सदुपदेश कियाहै कि, विज्ञ अधिकारी यदि संतोषपूर्वक श्रद्धासे सांगोपांग
देखे या सुने तो अवश्य उसके चित्तमें आर्षसिद्धान्तका आभास पड़ही जावे और
इन छहों महर्षियोंके सूत्रोंमें यह एक भारी उत्तमता है कि, सिवाय स्वसिद्धान्तप्रति-
पादनके परस्पर रागद्वेषसे एक दूसरेका खण्डन मण्डन या कटाक्ष वचनोंसे परस्पर
तिरस्कारका लेशभी दृष्टिगोचर नहीं होता. प्रत्युत सबसे प्रथम दर्शनकार महर्षि कपि-
लदेव (कि, जिनके विषयमें श्रीमद्भागवतादि महापुराणोंमें भगवदवतारत्वेन गणना करीहै
उन)के दर्शनके उपयुक्त तथा सहकारक योगसूत्र निर्माण कर महर्षि पतंजलिने पाणिनि
कात्यायनकी तरह एकार्थ प्रतिपादकत्वेन परस्पर सख्य सूचन कियाहै. एवं कणाद-
महर्षिके दर्शनके उपयुक्त तथा सहकारक सूत्रोंको निर्माण कर गौतम महर्षिनेभी
परम सख्य दिखलायाहै. एवं ब्रह्मसूत्रोंके सहकारक धर्मसूत्रोंको निर्माण कर जैमिनि
महर्षिनेभी अपने गुरु व्यासदेवके साथ सम्मतिही सूचन करीहै; इसीहीसे सांख्य
योग दोनों केवल एकही 'सांख्य' शब्दसे प्रख्यात हैं और न्याय वैशेषिक दोनों एकही
'न्याय' शब्दसे प्रख्यातहैं. तथा ब्रह्मसूत्र और धर्मसूत्र दोनों केवल एकही 'मीमांसा'
शब्दसे प्रख्यात हैं. भाव यह कि-यह महर्षिलोग अपने आपको एक वैदिकसिद्धान्तानु-
भूमिका । ( ३ )
यायी समझते हुए एक दूसरेकी जहाँतक बन पड़े सहायताही करतेथे किन्तु स्वकीय
पाण्डित्य प्रख्यापनार्थ स्वेतरसिद्धांतको दूषित कदापि नहीं करतेथे. कपिल महर्षिने
तत्त्वप्रसंख्यानको मुक्तिमार्ग मानाहै; उसीका सहकारी चित्तशोधक तथा जीवन्मुक्तिका
सम्पादक योगशास्त्र है. इसी भावसे “ सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डि-
ताः ” ऐसा भगवान्नेभी कहाहै. एवं पदार्थतत्त्वज्ञानको कणादमहर्षिने मुक्तिमार्ग
मानाहै; उसीके उपयोगी वादविजयाद्यर्थ निग्रहस्थान हेत्वाभासादिका प्रदर्शक न्याय-
शास्त्र है. एवं ब्रह्मज्ञानको मुक्तिमार्ग वेदव्यासने माना है उसीका उपयोगी अन्तःक-
रणशुद्धिद्वारा जैमिनिमहर्षिका धर्ममीमांसाशास्त्र है. एवं मूलसूत्रकारोंमें परस्पर
विरोधका लेशभी नहीं है. यद्यपि कहीं २ मूलसूत्रोंमें नास्तिकमत खण्डनका
आभास दीखपड़ता है. तथापि हमारा इस कथनमें तात्पर्य है कि-वैदिक मतावलम्बी
इन छहोंका किसी अंशमेंभी विरोध नहीं है. एवं शंकरस्वामीके समयसे प्रथम होनेवाले
इन षट्दर्शनसूत्रोंके व्याख्यानोंमेंभी कहीं परस्पर विरोध देखनेमें नहीं आता. यद्यपि
सांख्यसूत्रोंपर विज्ञानभिक्षुके व्याख्यानमें आद्यहीमें-
मयैव कथितं देवि कलौ ब्राह्मणरूपिणा ।
आर्थं च श्रुतिवाक्यानां दर्शयँल्लोकगर्हितम् ॥ १ ॥
कर्मस्वरूपत्याज्यत्वमत्र च प्रतिपाद्यते ।
सर्वकर्मपरिभ्रंशान्नैष्कर्म्यं तत्र चोच्यते ॥ २ ॥
परात्मजीवयोरैक्यं मयाऽत्र प्रतिपाद्यते ॥
ब्रह्मणो ऽस्य परं रूपं निर्गुणं दर्शितं मया ॥ ३ ॥
सर्वस्य जगतोऽप्यस्य नाशनार्थं कलौ युगे ॥
वेदार्थवन्महाशास्त्रं मायावादमवैदिकम् ॥ ४ ॥
मयैव कथितं देवि जगतां नाशकारणम् ॥
इत्यादि पद्मपुराणके वचनोंसे वेदांतियोंपर कटाक्षयुक्त लेख दीख पड़ताहै तथापि वह
अत्यन्ताधुनिक होनेसे विज्ञश्रेणीमें कदाचित् श्रद्धेय नहींहै.अब हमसे कोई यदि यह पूछे कि
यदि सूत्रकारोंका तथा भाष्यकारोंका परस्पर विरोध नहीं तो वर्तमान कालमें तो दर्शन
सम्बन्धी कोई ग्रन्थ या लेख ऐसा लिखाही नहीं जाता कि,जिसमें सांख्यी नैयायिकोंका
तथा नैयायिक बिना अपने वेदान्तादिपांचोंका तथा वेदान्ती बिना अपने न्यायादि पांचों
का इत्यादि परस्पर खण्डन या मण्डन न लिखाजावे; यदि यह खण्डन मण्डन सूत्रों-
में या उनके भाष्योंमें नहीं तो आया कहासे तथा किमूलक है ? तो इसकाउत्तर हमको
जिह्वा संकुचित कर यही कहना पड़ताहै कि-इस दर्शनकारोंके परस्पर विरोधका
मूलभूत भगवान् भाष्यकार भगवत्पाद श्री १०८ शंकराचार्य्यही हैं. इनसे प्रथम सांख्य
योगादि उत्तमसिद्धान्तोंके निराकरण करनेमें किसी आस्तिक विद्वान्का साहस न हुआथा।
किन्तु सांख्यसिद्धान्तको सहित उसके कर्ताके अप्रमाणित ठहरानेमें तथा गौतम
कणादको वैनाशिक तुल्य बतलाकर उनके सिद्धान्तोंको धूलीमें मिलानेमें एवं धर्म
मीमांसाके मूलोच्छेदनेमें यह प्रथम २ भगवती भगवत्पादहीकी लेखनी प्रवृत्त हुईहै.
इसमें यदि कोई ऐसा कहे कि--शंकरस्वामी महाप्रमित लेखकहैं; इसलिये अत्यन्त
निर्मूल लेख कदापि नहीं लिख सकते, कहींभी मूलसूत्रोंमें या उनके प्राचीन भाष्योंमें
खण्डन मण्डनविषयक लेख अवश्य होगा उसीके आश्रयसे भाष्यकारकी लेखनीभी उधर ही
प्रवृत्त हुई तो इसमें हम यह कहतेहैं कि--इसका मूल “एतेन योगाः प्रत्युक्ताः” यह
द्वितीयाध्यायके प्रथम पादका तृतीय वेदान्तसूत्र है, बस, इसी एकभावी सूत्रके आधारसे
प्रथमाध्यायके चारों पादोंकी जहां तक बनपड़ा कपिल महर्षिके सिद्धान्त निराकरणमें
ही व्याख्या करी, अन्तमें फिरभी संतोष नहीं हुआ तो दूसरे अध्यायके आद्यमें “स्मृ-
त्यनवकाशदोषप्रसंगः इति चेत्, न, अन्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसंगात् ॥ १॥” इस सूत्रकी
व्याख्यामें फिर बिचारे कपिलको लथेडना आरम्भ किया और यहां तक लथेडा कि
श्रुतिस्मृतिप्रतिपाद्य सर्वज्ञ कपिलदेव वासुदेवांश रूपसे अवतीर्ण औरही हुआ है और
यह द्वैतवादी सांख्यशास्त्रका कर्ता कोई अवैदिक कपिल है इत्यादि सभी कुछ कहा. यद्यपि
“ऋषिं प्रसूतं कपिलं यः” इत्यादि श्रुतिस्मृतीतिहासप्रसिद्ध वह एकही महर्षि कपि-
ल है जो कि देवहूति माताके गर्भसे कर्दम महर्षिके वीर्यसे हुआहै; उसीको
श्रीमद्भागवतके तृतीयस्कन्धमें “अयं सिद्धगणाधीशः सांख्याचार्यैः सुसम्मतः ॥ लोके
कपिल इत्याख्यां गन्ता ते कीर्तिवर्द्धनः ॥१९॥ अ० २४॥” इत्यादि वचनोंसे ब्रह्माने
सिद्धोंका स्वामी भगवदवतार तथा सांख्यशास्त्रका कर्ता कहा है, एवं इसीही कपिलने
अपनी माताको प्रसिद्ध सांख्यशास्त्रके अनुसारही उपदेश कियाहै; तथापि सांख्यशा-
स्त्रका कर्ता अवैदिक था किन्तु श्रुतिप्रतिपाद्य कपिल दूसरा हुआहै, ऐसा कहतेहुए स्वामीको
रोकनेका किसका सामर्थ्य है? आप साक्षात् शंकरहैं अतएव स्वतन्त्र होनेसे नियोग पर्यनु
योगानर्ह हैं जो चाहें सो लिखें, हम लोगों आस्तिकोंको बीचमें किन्तु करनेका अधि-
कार नहीं है किन्तु केवल राजशासनवत् इनका जो कुछ लेख होय वह हम लोगों
अनुचरोंको सन्मानपूर्वक शिरोधार्य तथा मान्य है.
एवं आपने मन्वादिस्मृतियोंको वर्णाश्रमधर्म बोधनमें सावकाश तथा कापिलशास्त्र-
को विना अध्यात्मविचारके निरवकाश, एवं “अस्मत्कृते च व्याख्याने जना न
विश्वस्युर्बहुमानात्स्मृतीनां प्रणेतृषु” इत्यादि वचनोंसे कपिलादिमहर्षियोंके वचनोंमें
लोगोंकी अधिक श्रद्धा तथा स्ववचनोंमें विश्वासका संदेह इत्यादि बहुत कुछ कहा परन्तु शेषमें
इसकी व्यवस्था कुछभी न करी, ठीक २ अब मुझे स्मरण हुआ आपने अग्रिमभाष्यमें कपिलको
द्वैतवादी होनेसे अवैदिक तथा कणाद गौतमको परमाणुवादी होनेसे वैनाशिक लिखही
दिया है. गुरुका कहा सभी चेला लोग मानेहींगे फिर पृथक् व्यवस्था करनेका कौन
प्रयोजन रहा? कपिल, कणाद, गौतम, पतंजलि, तथा जैमिनि, ये पांचों दर्शनकार
तो नानात्मवादी होनेसे अवैदिकही हैं. शेष रहे व्यासदेव सो इन्होंकाभी योगसूत्रोंके
भाष्यमें तो नाना चिदात्मवादही सिद्धान्त है इनकोभी चाहे आप वैदिक मानें या अवै-
दिक. हां, इनके ब्रह्मसूत्रोंमें स्पष्टरूपसे चाहो कहींभी नहींमिलता परन्तु भगवत्पाद
निर्मित उनके भाष्यमें एकात्मवाद अतिसमारोहसे निरूपण किया है.
अब हमको यहां सन्देह उत्पन्न होता है कि कपिलादि षट्महर्षि अवैदिक हैं या एक
भगवत्पाद श्री १०८ शंकर स्वामीही अवैदिकहैं ? परस्पर विरुद्ध लेख है; इसलिये
दोनोंमें एक कोटि अवश्य निर्बल होनी चाहिये. ‘कौन होनी चाहिये?’ इसको विद्वान्
लोग स्वयं सोचें. मेरी अल्पबुद्धि इसपर सिद्धान्त नहीं करसकती और न मैं श्रद्धा-
शून्य होकर किसी अपने पूज्य पूर्वज वृद्धको न्यूनकोटीका कहनाही चाहताह
( ६ ) भूमिका ।
निवेदन श्रीचरणोंमें कुछ दोषतात्पर्यसे नहींहै किन्तु प्रार्थनारूपसे है; क्योंकि मिथ्या
परदोषोद्भावन करना महाराजप्रासाद गिरानेकी तरह एक साधारण निर्बुद्धिपुरुषोंका
काम है, परन्तु उसी राजभवनके यदि पुनः निर्माणकी अपेक्षा होय तो बहुतसे उत्तम
शिल्पशास्त्रवेत्ताओंकी पेक्षा होती है इसलिये परके उसमेंभी अपने पूर्वजोंके दोष-
उद्भावन करनेको मैं बहुतही बुरा समझताहूं; तथापि गौतम कणादसिद्धान्तपर
जो आपने मिथ्या आक्षेप कियेंहैं वे हमको सर्वथा असह्यहैं. यों तो यही
सच्च है कि--निर्दोष एक परमात्मा है, जावका निर्दोष होना दुर्घट है; परन्तु इतना
कहना किसी विद्वान्को अस्वीकृत न होगा कि--यदि महर्षि पाणिनि पतंजलि
पदनियामकशास्त्रको निर्माण न करते तथा महर्षिगौतम कणाद पदार्थनियामकशास्त्र
को निर्माण न करते तो इतर जीवोंको शास्त्रके विद्वान् बनकर बोलनाभी कठिन पड़ता.
धनीका धन वर्तनेसे लोगोंको मुनीमभी धनीसा दीख पड़ताहै परन्तु वस्तुतः वह धनी नहीं
होता. आपने गौतम कणाद सिद्धांतके यद्यपि मुख्य २ कईएक पदार्थोंको दूषित किया है
तथापि नानात्मवाद उन सबमें मुख्य है. इसलिये इसमें किंचिद् हमकोभी वक्तव्य है.
प्रथम नानात्मवादम यह दोष हैं कि--जब एक आत्माके साथ मनका संयोग होताहै तो उसी
कालमें उसी मनका दूसरे आत्माओंके साथ संयोगभी नियमसे होगा क्योंकि आत्माओं-
को व्यापक होनेसे मनकी सन्निधि सबके साथ समान है. एवं सन्निधिरूप हेतुके समान
होनेसे सबका सुख दुःख समानही होना चाहिये १ । नानात्मवादीको अदृष्टोंसे
व्यवस्था माननीभी कठिन है, क्योंकि अदृष्टभी तो आत्ममनःसंयोगहीसे बने हैं; उनका
भी यह इसी आत्माके हैं, दूसरेके नहीं; यह निर्द्धार होना कठिन है २। यदि नानात्म-
वादी कहें कि जिस आत्माने जैसे तात्पर्यसे जो क्रिया करी है वह उसीके अदृष्टोंकी
जनक होसकती है, दूसरेके नहीं; तो यहभी सम्यग् नहीं क्योंकि तात्पर्यभी तो आत्ममनः-
संयोगहीसे उत्पन्न होताहै जो कि सर्वत्र तुल्यही है ३ । यदि प्रदेशकृता व्यवस्था
कहो अर्थात् शरीरावच्छेदेन आत्ममनःसंयोगको रागादि तथा अदृष्ट सुखादिजनकता
मानो तो यहभी ठीक नहीं; क्योंकि सभी आत्मा सभी शरीरोंमें समान विद्यमानहैं.
शरीरके सम्बन्धसे कोई आत्मा प्रदेशवाला नहीं होसकता और शरीरकाभी सब व्या-
पक आत्माओंके साथ सम सम्बन्ध होनेसे 'यह अमुक आत्माका शरीर है' ऐसा निर्धार
होना कठिन है ४ । यदि आत्माका प्रदेश मानभी लियाजाय तो जिन दो जीवा-
त्माओंको समान सुख दुःख होना है उनको एकही शरीरसे होजाना चाहिये; क्योंकि
दोनों जीवात्माओंके अदृष्टका कदाचित् समान प्रदेशभी होसकता है. जैसे जिस प्रदे-
शमें चैत्रको जैसा सुख या दुःख अनुभव हुआहै यदि वहां उसके स्थानापन्न मैत्र
नियत किया जावे तो उसकोभी वैसाही सुखदुःख देखनेमें आता है; इसलिये दो जीवा-
त्माओंका समान प्रदेशादृष्टका सम्भव होसकता है ५ । एवं प्रदेशवादीको स्वर्गादि
उपभोगभी नहीं होना चाहिये; क्योंकि ब्राह्मणादि शरीर प्रदेशेन उत्पन्न
हुए अदृष्ट अतिदूर प्रदेशांतरवर्त्ति स्वर्गके जनक नहीं बन सकते ६ । नाना आत्मा
व्यापकभी नहीं होसकते; क्योंकि ऐसा कोई दृष्टान्त नहीं है ७ । यदि आकाशादिका-
लादि दृष्टान्त कहो तो वेभी उत्पत्तिवाले होनेसे हमारे मतमें व्यापक नहीं हैं इत्यादि
८ । यह सब २ अ०, ३ पादकी समाप्तिमें भाष्यकारने दोष दियेहैं; इनमें प्रथम
के चार तो पूर्व पूर्वउत्तर २से दूषित हैं और पंचममें यह वक्तव्य है कि,दो जीवात्माके या
अधिकके परस्पर अदृष्टोंका या भोगका या उनके प्रदेशका समान होनाही असम्भव है;
क्योंकि हमारे मतमें आत्मसमवायि अदृष्ट प्रत्यात्म असाधारण हैं और उन
अदृष्टोंके भेदको अनादि होनेसे उनका किया मनके साथ आत्माका स्वस्वामिभाव
लक्षण सम्बन्धभी अनादि है. एवं आत्ममनःसंयोगके सर्वात्मसाधारण होनेसेभी
स्वस्वामिभावलक्षणसबन्धको सर्वथा असाधारण होनेसे पूर्वोक्त अभिसंध्यादि व्यवस्था
सर्वथा उपपन्न होसकतीहै और वास्तवविचार करें तो मनका संयोगभी प्रत्यात्मसाधारण
नहींहै; क्योंकि आत्मसंयोगका प्रतिसंयोग भेदसे भेद है. इसलिये मनका आत्मान्तरोंके
साथ जो जो संयोग है वह स्वस्वामिआत्माके साथ नहीं किंतु दूसरा है,इति५। एवं तत्त-
दात्माके तत्तद्विचित्र अनाद्यदृष्टसे प्रेरित हुए तत्तत् मन-स्वस्वामि आत्माके प्रति स्वर्ग
नरकादि तत्तत्प्रदेशावच्छेदेन सुखदुःखादि भोगका हेतु होसकतेहैं. प्रदेशभेद होनेसेभी अदृष्ट
तथा भोगका एकात्मवृत्तित्वेन परस्पर समानाधिकरण होनेसे कार्यकारणभाव निर्वाह है.
अन्यथा मनको मध्यमपरिमाण मानकर उसमें अदृष्ट सुखादिभोगके माननेवाले वेदा-
न्तीकोभी व्यवस्था लगानी कठिन होगी; क्योंकि उसकोभी यह पूछ सकतेहैं कि अन्तःकर-
णम अदृष्टव्याप्यवृत्ति उत्पन्न होतेहैं या अव्याप्यवृत्ति?यदि व्याप्यवृत्ति कहो तो "शिरसि मे
वेदना पादे मे सुखं" इत्यादि प्रतीतिकी अनुपपत्तिहोगी; क्योंकि व्याप्यवृत्तिअदृष्ट व्याप्य-
वृत्ति सुखादिके जनकही होने चाहिये. एवं यदि द्वितीयपक्ष कहो तो क्रिया तथा अदृष्टकी
अदृष्ट तथा भोगकी समानाधिकरणानुपपत्ति होगी-इत्यादि ६ । जैसे आपके एकात्मवादमें
आकाश दृष्टान्त है वैसेही हमारे नानात्मवादमेंभी आकाशादि दृष्टान्त होसकतेहैं ७ ।
यदि आकाश उत्पत्तिवालाहै तो "आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः"ऐसा आपभी नहीं कहसकते
और"आत्मनआकाशः सम्भूतः"इत्यादि वचनोंको देखकर बुद्धिविरुद्धअर्थको श्रौत मान-
नाभी बुद्धिमत्ता नहीं है. आकाशादि विभुहैं,अस्पर्श द्रव्य हैं तथा निरवयव हैं इसलिये उनकी
उत्पत्ति माननी अयुक्त है इत्यादि ८ । यद्यपि वेदान्ती केसुषुप्ति अवस्थाके तथा नैयायिक
के मनःसंयोगाभावावस्थाके जीवात्मामें किञ्चिदपि विशेष नहीं तथापि दूषित करणार्थ गौतम-
कणाद सिद्धान्तका अनुवाद करते हुए भाष्यकार उनके आत्माको घट कुड्यादिवत् लि-
( ८ ) भूमिका ।
खतेहैं. क्या जाने यह कौनसे ऋषि वचनोंका अनुवाद कर खण्डन कर रहेहैं? गौतमकणाद
सिद्धान्तमें तो कहीं आत्माको घटकुड्यादिवत् कहानहीं.प्रत्युत “बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव”
इत्यादि श्रुतिसिद्धज्ञानादिगुणाधिकरण कहाहै. पुरीततीबाह्यदेशावच्छेदेनात्ममनःसंयोगसे
ज्ञानका प्रादुर्भाव होना अनुभवसिद्धहै.इस विलक्षणसंयोगसे विनामुक्तिमेंभी कुछ विशेष नहीं
अर्थात् सुषुप्ति एकमुक्ति अवस्थाका उदाहरणरूप है. सबीजनिर्बीज समाधि तो अन्तःकरण-
की अवस्था हैं इसलिये मुक्तिका उदाहरण नहींबनसकतीं, एवं इसके सिवाय अन्तःकरण
में या अविद्यामें आभास मानकर जीवकी सुषुप्ति या जाग्रत्की व्यवस्थाके लिये प्रतिदिन
अंतःकरणका कारणरूपेणावस्थान तथा अविद्याका वृद्धिरूपेण परिणाम माननाभी बुद्धि
तथा शास्त्रविरुद्ध है. विना विशेष सामग्रीके कार्य्यकी कारणरूपेण परिणति या कारण
की कार्य्यरूपेण परिणतिमें संसारमात्रमें कोई उदाहरण नहीं है. उदाहरणरूपेण गृहीतदधि-
दुग्धादिपदार्थ स्वविकृत्यर्थ तिक्तादि विशेषपदार्थोंकी अपेक्षा रखतेहैं- इति ।
एवं संस्कृतके पूर्ण विद्वान् लोग तो यद्यपि अच्छीतरहसे इस वार्त्ताको जानतेहैं कि-शं-
करस्वामीने सांख्यादि सर्वदर्शनोंसे विरुद्ध एक अपनी ठाईपा जुदाही पकाई है तथा सुयो-
ग्यशिष्यमण्डलीने उसकी सुगन्धि पूर्णरूपसे सर्वत्र फैलाई है तथापि आर्य्यभाषाले-
खसे उसी मतको मण्डन करतेहुए निश्चलादिविद्वानोंने जिन सरल पुरुषोंको महर्षि-
सिद्धान्तोंसे वंचित किया है उनके बोधका उपाय वर्तमानकालमें सर्वथा अचिन्तनीय है.
शंकरमतको पुष्ट करतेहुए निश्चल कहतेहैं कि-शंकरस्वामी महादेवका अवतारहैं इसमें
व्यासोक्त “कलिमें वेद अर्थ बहु करिहैं । श्रीशंकर शिव तब अवतरिहैं ।
जैन बुद्धमतमूल उखारैं । गंगाते प्रभुमूर्ति निकारैं । ” इत्यादि पुराण वचन
प्रमाणहैं १ । एवं परमपूज्य महर्षि वाल्मीकिने जिस अर्थका सविस्तर निरूपण
किया है वही शंकरस्वामीभी उत्तम रीतिसे लिखतेहैं २ । एवं युक्तिसेभी
भेदवाद विरुद्ध है. वह युक्ति खण्डनादि ग्रन्थोंमें लिखी है; कठिनहैं, इसलिये यहां नहीं
लिखते ३ । “एवं मृत्योः स मृत्युमाप्नोति, य इह नानेव पश्यति, द्वितीयाद्वै
भयं भवति, अथ योऽन्यां देवतामुपासते, अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद, यथा
पशुरेव स देवानाम्” इत्यादि श्रुतिविरुद्ध होनेसेभी द्वैतवाद अप्रमाणिक है ४।
बस, इन चार हेतुओंसे निश्चलने शंकरमतको प्रमाणित किया है. प्रथममें यह
वक्तव्य है कि विज्ञानभिक्षुने इससे विपरीतार्थ बोधक पद्मपुराणके पूर्वोक्त वचन लिखेहैं.
सभी पुराणोंके कर्त्ता व्यासही हैं. दोनोंमें कौन वचन सच्चेहैं? सो आपही कहदीजिये.
और आप कौनसे पुराणके गीत गातेहैं?यदि नाम लिखते तो देखभी लेते; परन्तु आप तो
श्रद्धाके उमँगमें नाम लिखनाभी भूलगए. यदि आप कहें कि व्यासभी अनेक हुएहैं तो,
हमभी मानतेहैं परन्तु आपकी आख्यायिकाका मूलकारक तो कोई शंकरस्वामी क
भूमिका । ( ९
शिष्यही व्यासदेव होगा ऐसा जानिये १। और जिस वासिष्ठ के पोथेको आप
महर्षिवाल्मीकिकृत मानतेहैं वह तो शंकरस्वामीकीही शिष्यमण्डलीमेंसे किसी शंक-
रानन्दादि विद्वान्का लेख है. आप सोचें तो सही कि यदि यह ग्रन्थ शंकर स्वामीसे
प्रथम होता तो जैसे मनु गीता महाभारत विष्णुपुराणादिके वचन जगह२ पर भाष्यमें आते
हैं. कोई इसका वचन या प्रकरणभी न आता? परन्तु शारीरक मात्रमें योगवासिष्ठका नाम
तक नहीं है; इसलिये यह ग्रन्थ सर्वथा आधुनिक है २। खण्डन मण्डनकी युक्ति तो खड्गकी
तरह वादी प्रतिवादी दोनोंको समान है वह जिसके पास दृढ होगी उसीका विजय होगा.
केवल अद्वैत वादको युक्तिप्रधान मानना भ्रम है ३। एवं श्रुतिविचारमें जैसे च्छा-
न्दोग्यमें “तद्धैके आहुरसदेवेदमग्र आसीत्” इत्यादि वचनोंसे चार्वाक सिद्धान्त
का निरास कियाहै. वैसेही “मृत्यौः स मृत्युमाप्नोति” इत्यादि कठ या वाजस-
नेयि वचनोंसे बौद्धोंका क्षणिक विज्ञान वाद निरास कियाहै अर्थात् जो इस आत्मामें
क्षणिक विज्ञानरूपेण नानापना देखता है वह वारंवार यमयातना सहनपूर्वक जन्मम-
रणको प्राप्तहोता है. एवं “द्वितीयाद्वै” इत्यादि श्रुति अनुवादक अर्थवादरूपा है. भय
दूसरेहीसे हुआ करताहै, इसमें किसीको सन्देह ही नहीं; परन्तु दूसरे विद्यमानकोभी भयकी
भीतिसे उसको न मानना मूर्खता है. कपोत नेत्र निमीलनसे बिडालाऽभाव वस्तुतो नहीं होता
एवं “अथ योऽन्यां देवतामुपासते” इत्यादि वाजसनेयि वचनकाभी अभेद भावनासे
उपासनामें तात्पर्य्य है. भाव यह कि भेद भावना रखने से यदि लोक में मित्र का चित्तभी
स्वच्छ नहीं रहता तो सर्वज्ञ देवतासे भेदभावना रखनेसे उपासनाका क्या फल होगा? इसीलि-
ये भेद भावना से उपासना करने वालेको अर्थात् तन मन धन से विना देवता के नामसे केवल
घंटे बजानेवाले मूर्ख भक्त को श्रुति देवों का पशु कहतीहै अन्यथा एक आत्मा में उपास्य उपा-
सकभावादि विरुद्धधर्मोंका समावेशभी तो सर्वथा बुद्धिविरुद्ध कल्पनाहै-इत्यादि।
एवं स्वदेशीयोंका परस्पर खण्डन मण्डनावलोकनसे विदेशी विद्वानोंकोभी महर्षियों
के सिद्धान्त पर आक्षेप करनेका अवसर मिला है. वह यह कहतेहैं कि ' गुरुणी द्वे '
यह तथा ' द्वयोर्नैमितिको द्रवः ' यह इत्यादि कई एक स्थलोंमें महर्षि कणाद
का सिद्धान्त अज्ञात पूर्वक है क्योंकि हम ( Baroscope, ) वायु मापक यंत्रसे वायुमें
बोझ का अनुभव करा सकतेहैं. एवं हिम करकादिजलमें भी नैमित्तिक द्रवण अनुभव
सिद्ध है इत्यादि २ इसका उत्तर हम संक्षेपसे यह कहते हैं कि यह विदेशियोंके-
आक्षेप महर्षि सिद्धान्त मर्माज्ञात पूर्वकहैं; क्योंकि कणाद महर्षिने पदार्थोंके स्वरूप
प्रायः दो तरहके निरूपण किये हैं; एक तात्विक स्वरूप जैसे कि “शीतस्पर्शवत्य
आपः, उष्ण स्पर्शवत्तेज; रूपरहितस्पर्शवान् वायुः” इत्यादि। दूसरा
साधर्म्य वैधर्म्य निरू-पणप्रसङ्गमे पदार्थोंका लोकस्थितिके अनुरोधसे
( १० ) भूमिका ।
स्वरूप कहाहै. जैसे " गुरुणीद्वे, द्वयोर्नैमितिको द्रवः" इत्यादि ।
इनके तात्त्विक स्वरूपमें तो कदापि किसीको विपरीत ज्ञान नहीं होता
किन्तु जब जहां जिसको होताहै महर्षि सिद्धान्तके अनुकूलही होता है; परन्तु
लोकस्थित्यनुरोधसे कहे पदार्थोंमें अल्पश्रुत पुरुषोंको प्रायः विपरीत ज्ञान होही
जाताहै. जैसे वायुमें गुरुत्वका जलमें, नैमित्तिक द्रवणका इत्यादि. महर्षिने वायुमें
गुरुत्व नहीं माना परन्तु गुरुत्वकी भ्रान्तिकारक वेगाख्य संस्कार वायुमें मानाह
जैसे वेगापहत हुई वस्तुमें अल्पगुरुत्व वालिमेंभी अधिक गुरुत्वका भान होता है
वैसेही वस्तुतः गुरुत्वरहित वायुमेंभी गुरुत्वका स्थल विशेषमें भ्रमसे भान
होता है यदि वायुमें गुरुत्व होय तो यंत्र के सिवाय पात्रनिरुद्ध वायुकाभी पात्रसे
पृथक् गुरुत्व प्रतीत होना चाहीये; परन्तु होता तो नहीं यदि कुछभी होता है तो बलात्
प्रविष्ट हुए पार्थिव परमणुओंहीका होता है; वायुका नहीं. एवं जलकी लोकस्थितिभी
सरित् समुद्र वापि कूप तडागादि संसार मात्रमें स्वाभाविक द्रवणयुक्त ही प्रतीत होतीहै
किंतु जलमें द्रवण प्रतिरोध नैमित्तिक है अर्थात् जलमें द्रवण प्रतिरोधनाथं जहां तहां विल-
क्षण वायुसम्पर्क अपेक्षित है इति । कणादादि महर्षि कोई लौकिक विद्याके आचार्य्य न थे
किन्तु आध्यात्मक विद्याके प्रचारक थे परन्तु उस महाविद्याके प्रतियोगित्वेन उपयोगि
लौकिक पदार्थोंकाभी जिन २का निरूपण कियाहै वह सब योगबलसे अनायास कियाहै
याते सर्वथा भ्रांतिरहित है. उसी कणाद गौतम महाशास्त्रके संक्षिप्तसारभूत अर्थका
अवबोधक यह 'न्यायसिद्धान्त मुक्तावली' नामक ग्रन्थ यद्यपि स्वयं महा प्रख्यात तथा
परीक्षक मण्डलीमें देश देशान्तरोंमें सर्वत्र सत्कृतिपूर्वक पठन पाठनमें प्रत्यहं प्रचरित
है तथापि ततोऽप्यधिक प्रचारार्थ तथा वंगदेशीय विद्वद्वर्य्य श्रीविश्वनाथ पंचानन भट्टाचा-
र्य्य के वास्तविक हार्दको अत्यल्पश्रुत विद्यार्थी के सरल स्वान्तमें अनायास समारोहार्थ
विद्यानुरागी कतिपय सुचरित्र पवित्र मित्रमण्डलके अभ्यर्थनाने मैंने इसको प्रति पंक्ति
सरलदेशभाषामें भूषित कर समर्थन कियाहै; अत एव मुझे यह पूर्ण आशा है कि
श्रीकाशीजीके तथा देश दशान्तरोंके सुप्रतिष्ठित विद्वान् गुरुलोग स्वकीय शिष्य प्रशि-
ष्य श्रेणीमें शीघ्रबोधार्थ इसका प्रेमपूर्वक प्रचार कर मेरे यथाबुद्धि श्रमको सफल करते
हुए मुझे अवश्य अनुगृहीत करेंगे--इति शम् ।
निवेदक काशी निवासी--
निर्मल पं० स्वामी गोविन्दसिंह साधुः।