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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त । ५५
होता । और उन अनर्थक पदोंसे रचित हुआ वाक्य भी अनर्थक ही
होता । एवम् अनर्थक वाक्योंसे बना हुआ शास्त्र भी अनर्थक हो
होता और इसीप्रकार अभ्युदय तथा मोक्षके लिये विद्वानोंका यह
उद्यम भी अनर्थक ही होता । किन्तु यह अनिष्ट है, इसलिए वर्ण
अर्थवान् हैं यह मानना होगा ।
प्रदीप भी अपने प्रकाशरूप अर्थसे अर्थवान्‌ही है और इस प्रकार-
से अर्थवान् होकर भी प्रकाश्य वस्तुको प्रकाशन करता हुआ अपनी
प्रकाशन शक्तिको प्रकट करता है । इसी प्रकार उपसर्ग अर्थवान्
होकर भी अपनी अनेककी विद्यमान अर्थाभिधान शक्तिको स्वार्था-
भिधान शक्तिके आधारभूत नाम और आख्यातको जना करके
अभिव्यक्त करेंगे । इसलिए प्रदीपकेसमान "उपसर्ग अनर्थक है"
यह कहना अयुक्त है ।
नाम और आख्यातका ही अर्थ उपसर्गके संयोग होनेपर,
प्रतीत होताहै, यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि—लोकमें जो, जिसमें
समर्थ है, वह उसमें अन्यकी अपेक्षा नहीं करता । जबकि—नाम
और आख्यात अपनी क्रियामें किसी अर्थ-विशेषको जनानेके लिये
उपसर्गके संयोगकी अपेक्षा करते हैं, तो अवश्यही क्रिया-विशेष
अर्थ उपसर्गका, और क्रियासामान्य अर्थ आख्यातका उपपन्न.
होताहै ।
पहिले यह जो कहा गयाहै कि—"नाम और आख्यातसे अलग
रहकर उपसर्ग अनर्थक हैं।" सो ठीक नहीं है । क्योंकि इनका जो
अनेक प्रकारका अर्थ है, उसको ये (पद-विशेष, उपसर्ग) अलग
होकर भी कहते ही हैं, अर्थात् नाम और आख्यातके अर्थमें जो
विकार या विशेष है, वही उपसर्गोंका अर्थ है, उसी अर्थसे ये
अर्थवान् हैं, किन्तु अनर्थक नहीं ।

५६ अ० १ पा० १ ख० २ ।
उपसर्गोंकी अर्थवत्ता जाननेके लिए, उदाहरणार्थ प्रत्येक
उपसर्गका एक एक अर्थ ।
(नि०) आ इत्यर्वागर्थे। प्र-परेत्येतस्य प्रातिलोम्यम् ।
अभीत्याभिमुख्यम् । प्रतीत्येतस्य प्रातिलो-
म्यम् । अति, सु-इत्यभिपूजितार्थे । निर्, दुर्-
इत्येतयोः प्रातिलोम्यम् । नि, अव-इतिविनि-
ग्रहार्थीयौ । उद्-इत्येतयोः प्रातिलोम्यम् ।
सम्-इत्येकीभावम् । वि, अप्-इत्येतस्य
प्रातिलोम्यम् । अनु-इति सादृश्यापरभावम् ।
अपि-इति संसर्गम् । उप-इति उपजनम् ।
परि-इति सर्वतोभावम् । अधि-इत्युपरिभा-
वम् । ऐश्वर्यं वा । एव मुच्चावचानर्थान् प्रा-
हुस्ते-उपेक्षितव्याः ॥ ५ ॥
प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ १
उपसर्ग- अर्थ- उदाहरण ।
१ आ अर्वाक् ( इधर ) आपर्वतात् (पर्वतसे इधर)
२ { प्र प्रातिलोम्य (आङ् का प्रगतः (उधर चला गया)
परा ' उल्टा) परागतः
३ अभि आभिमुख्य(सम्मुखता) अभिगतः ( सम्मुख गया )
४ प्रति प्रातिलोम्य प्रतिगतः ( विपरीत गया )
५ { अति अभिपूजित अतिधनः
सु सुब्राह्मणः

हिन्दी निरुक्त । ५७
६ { निर् दुर् } निन्दा निर्धन दुष्टधन ।
दुर्ब्राह्मण=दुष्ट ब्राह्मण ।
७ { नि अव } विनिग्रह { निगृह्णाति=शासन करताहै
अवगृह्णाति=रोकता है ।
८ उद् इन दोनों (नि० अव) का प्रातिलोम्य उद्गृह्णाति=उद्धारकरताहै ।
९ सम् एकीभाव संगृह्णाति=संग्रह करताहै ।
१० { वि अप } प्रातिलोम्य विगृह्णाति अपगृह्णाति (विग्रह करताहै)
११ अनु { (१) सादृश्य (२) अपरभाव } { अनुरूपमस्येदम् अनुगच्छति
१२ अपि संसर्ग { सर्पिषोऽपि स्यात् मधुनोऽपि स्यात्
१३ उप उपजन उपजायते
१४ परि सर्वतोभाव परिधावति
१५ अधि { १-उपरिभाव २-ऐश्वर्य } { अधितिष्ठति अधिपतिः
पहिले कहा है कि—"उपसर्ग नाम और आख्यातके साथ
क्रियाके सम्बन्धके द्योतक हैं" यह ठीक नहीं है, क्योंकि—"उप-
सर्गाः क्रियायोगे" (अ०-१।४।५६) इस पाणिनीय अनुशासनमे
उपसर्गोंका क्रिया पदके साथ ही सम्बन्ध प्रसिद्ध है, किन्तु नामके
साथ नहीं, प्रत्युत क्रियाके अंगभाव हो नामोंको भी व्यापन
करते हैं ।
समाप्तः प्रथमः पादः ।

५४ अ० १।पा० २। ख० १।
द्वितीय पाद ।
विशेष बातें ।
( १ )
( सब मन्त्रोंमें दो ऋषि )
(१) इस निरुक्त शास्त्रमें प्रायः हर एक शब्दके उदाहरण मन्त्र
दिये जाते हैं। उनमें ऋषिका चिन्तन आवश्यक होता है इस लिये
ऋषिके सम्बन्धमें जो विशेष बात है, उसे जान लेना आवश्यक है
बीचमें बतानेसे गौरव होनेके कारण आरम्भमें दिखाते हैं।
ऐतरेयकरहस्य-ब्राह्मणगे ऋक् यजुः साम एवम् अथर्वं संपूर्ण
ही वेदराशिका आदित्यान्तर-पुरुष भगवान् हिरण्यगर्भ ऋषि बताया
है। और शौनक ऋषिने प्रत्येक मन्त्रोंके पृथक् पृथक् वशिष्ठादि
ऋषि बताये हैं। इसलिये श्रुति और स्मृतिके विरोधस्थलमें श्रुति
ही बलवती होती है। ऐसा न्यायके जाननेवाले कहते हैं। एवम्
जैमिनी महर्षिने भी (विरोधे त्वनपेक्षं स्यात् [जै० सू० १, ३, ३])
इस सूत्रमें यही बात कही है कि श्रुति और स्मृतिका विरोध होने
पर स्मृतिका त्याग हो जाता है; सुतराम् "शौनकका विशेष
विधान अनर्थक ही है" यह आपत्ति उपस्थित होती है। इसके
समाधानार्थ यह है कि शौनक महर्षिने जो विशेष ऋषि बताये हैं।
उसका श्रुतिसे विरोध नहीं, प्रत्युत श्रुतिके अर्थको ही स्मरण
किया है। क्योंकि मन्त्रोंके द्रष्टा दोनो ही क्षेत्रज्ञ हैं। एक बुद्धिके
देवता रूपसे हिरण्यगर्भ क्षेत्रज्ञ है, जो सम्पूर्ण भूतोंके कर्मविपाक
(अदृष्ट)के अनुसार अर्थ व शब्दको दिखलानेवाला है। और उससे
दूसरा विशिष्ट कर्मका करनेवाला क्षेत्रज्ञ बुद्धिस्थ होकर देखता है।
ऐसी अवस्था में वशिष्ठादिक ऋषि जो मन्त्रोंके देखनेवाले क्षेत्रज्ञ
हैं, वे उसी हिरण्यगर्भके दिखाये हुए मन्त्रोंको देखते हैं। इस

हिन्दी निरुक्त । ५६
रीतिसे दोनोंका ही ऋषित्व उपपन्न होता है । अतः मन्त्रके
प्रयोगकालमें उक्त दोनों ही ऋषियोंका अनुसन्धान करना अर्थका
देनेवाला होता है । जबकि श्रुति और स्मृति दोनोंका सन्धान
हो सकता है तो उनके विरोधकी सम्भावना करना अयुक्त है ।
(२) अपिच—श्रुतिपूर्वक ही स्मरण होता है किन्तु स्वतन्त्र
नहीं अर्थात् ऋषियोंने जो श्रवण किया है, उसी को फिर स्मरण
किया है । इस लिये स्मृतिमें जो अर्थ आया हुआ है उसको
श्रुतिमूलक ही मानना चाहिये ।
ताण्डकमें रहस्य-ब्राह्मण भी दिखलाता है, कि—
“यत्साम्ना स्तोष्यन्स्यात् तत्सामोपधावेत् ।
यस्यामृचि तामृचम् । यदार्षं तमृषिम्” ।
अर्थ—जिस ऋचाको जहां सामरूपमें पठनीय कहा है, वहां
उस ऋचाको साम ही जानना , जहां ऋचाके रूपमें विनियोग है,
वहां उसको ऋचा ही जानना, तथा जहां जिस मन्त्रका जो ऋषि
बताया हो, वहां उसी ऋषिका मन्त्र समझकर उसका प्रयोग
करना । अर्थात् मन्त्रोंका सामभाव, ऋचाभाव तथा ऋषिका
सम्बन्ध परिवर्त्तन होता रहता है, किन्तु सब स्थलोंमें उनका
एक ही स्वभाव नियत नहीं है ।
इस प्रमाणके अनुसार शौनक स्मृतिके कहे हुए ऋषि श्रुति
विरुद्ध नहीं प्रत्युत वे श्रुतिमूलक हैं, इस लिये विशेष विशेष
ऋषियोंका कथन युक्त तथा आवश्यक है ।
( २ )
अन्य देवताके यजनमें अन्य देवताके
मन्त्रका विनियोग ।
सब मन्त्रोंके व्याख्यान करनेके समय उनका ऋषि, छन्द, देवता

१. नैघण्टुक काण्ड (अध्याय १-३): नाम, आख्यात, उपसर्ग, निपात लक्षण व पर्याय शब्द

६० अ० १ पा० २ ख० ११
तथा विनियोग कहा जाता है, ये चारों बातें मन्त्रके निदानस्वरूप
हैं, इनके जाननेसे मनुष्यको मन्त्रका व्याख्यान श्रवणसे पहिले
विदित हो जाता है कि—कौन वक्ता है कौन श्रोता है, और क्या
प्रसङ्ग है। अर्थात् ऋषि वक्ता, देवता श्रोता और जिस कर्ममें
विनियोग हो, वही कर्म प्रसङ्ग होता है। ऐसे ज्ञानके अनन्तर
मन्त्रका व्याख्यान किया हुआ अति स्पष्ट हो जाता है। इसी
लिये मन्त्रके व्याख्यान—कालमें उक्त चारों वस्तु सर्वत्र बताई
जाती हैं। यह मानों मन्त्रकी संक्षिप्त भूमिका ही होती है। इसी
लिये भाष्यकारके उद्धृत किये हुए मन्त्रकी व्याख्या करनेसे
पहिले भगवद्दुर्गाचार्य्य अपनी टीकामें उनके ऋष्यादिको सर्वत्र
बता देते हैं। किन्तु कहीं कही या अनेक स्थलोंमें अन्य देवता-
ओंके मन्त्र अन्यदेवताओंके यज्ञमें विनियुक्त हैं। जिसके जान-
नेसे श्रोताको सन्देह हो सकता है कि—'जिस मन्त्रमें अन्य
देवताकी स्तुति है, वह मन्त्र अन्य देवताके स्मरण करनेमें समर्थ
नहीं हो सकता इस लिये उस मन्त्रका वहां प्रयोग करना
उपयुक्त है ?
यद्यपि “पुरुष-विद्याऽनित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे” [नि० अ०
१ पा० १ खं० २] इस पूर्वोक्त, तथा “एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं, यत्-
कर्म क्रियमाणमृग्यजुर्वाभिवदति” [ नि० अ० १ पा० ५ ख० १ ]
इस आगे कहे जानेवाले निरुक्तके अनुसार सब मन्त्र अनुष्ठान
अथवा देवताके अनुस्मारक मात्र होते हैं, जिससे कि-उनका वहीं
पठन होना चाहिये जहां उनके देवताका यजन हो, किन्तु भिन्न
देवताके यजनके समीप नहीं। तथापि यह नियम शस्त्र तथा
स्तोत्र नामक मन्त्रोंमें नहीं लिया जाता, क्योंकि—ये मन्त्र प्रायः
अन्य देवताओंके यज्ञकी सन्निधिमें ही उपयुक्त होते हैं। इनमें
जिन देवताओकी स्तुति होती है, वे देवता हविर्भाक् नहीं होते,

या उनके लिये हविः नहीं दिया जाता, इस कारण उनके शस्त्र व
स्तोत्र अन्यदेवताओंके कर्ममें ही पढे जाते हैं, तथा इसीसे वे
प्रस्तुत अनुष्ठान या देवताके स्मारक नहीं हो सकते ।
॰ जिस प्रकार स्मार्त विवाह आदि संस्कारोमें अर्चनीय वरके
अतिरिक्त आचार्य आदि अर्चनीय पुरुषोंके अर्चनके माहात्म्यसे
उन संस्कारोंकी सुसम्पन्नता 'होती है, उसी प्रकार श्रौत कर्मोंमें
यजनीय देवताओंके सन्निधानमे विधिवशात् जिन देवताओंका
शस्त्र तथा स्तोत्र मन्त्रोंके द्वारा स्तवन होता है, उससे एक स्वतन्त्र
अतिशय या अदृष्ट उत्पन्न होता है, जिससे कि—प्रस्तुत यजनीय
देवताओंके यजनसे उत्पन्न होनेवाले अपूर्वका पोषण होता है,
अथवा वह अपने जननीय स्वर्गादिरूप फलके उत्पन्न करनेमे पूर्ण
रूपेण समर्थ होता है, उसी अपूर्वको अन्यापूर्व कहते हैं। जैसे—
बीजको अङ्कुर उत्पन्न करनेमें जल, खाद तथा क्षेत्र आदिकी
अपेक्षा होती है, या इन पूर्वोक्त वस्तुओंसे संयुक्त होकर ही बीज
पूर्णरूपसे अङ्कुरका उत्पादक अथवा सच्चा बीज बनता है, उसी
प्रकार प्रधान अपूर्वको अन्य अङ्गापूर्वों को अपने पूर्ण होनेमें
अपेक्षा रहती है। इसीसे यजनीय देवताओंके अतिरिक्त अन्य
स्तोतव्य देवताओंका स्तवन विहित समयमें अनावश्यक या व्यर्थ
न होकर अपनी पूरी सफलताके साथमें वहाँ रहता हैं।
स्तुति और अभिधान ।
स्तुतिके स्थलमें स्तोतव्य वस्तुमें गुणोंके सम्बन्धको दिखा-
कर ही वाक्यके यत्नका अन्त हो जाता है, फिर उसका कोई
कार्यान्तर नहीं देखा जाता, और स्मरण स्थलमें प्रयोजनान्तरके
लिये वस्तुके गुणोंका अभिधान या कथनमात्र होता है, अर्थात्
वहां वाक्य गुणोंके कथनके अनन्तर किसी इष्ट अर्थको प्रकाशित

६२ अ० १ पा० २ सू० २१
करके निवृत्त होता है। जैसे—'देवदत्तश्चतुर्वेदाभिज्ञः' देवदत्त
चतुर्वेदाभिज्ञ है, यह वाक्य देवदत्तको उद्देश्य करके उसमें चतु-
र्वेदाभिज्ञता-रूप गुणके सम्बन्धको कहकर फिर कुछ नहीं
करता तो यहां स्तुति ही सिद्ध होती है। तथा "यश्चतुर्वेदा-
भिज्ञस्तमानय" 'जो चतुर्वेदाभिज्ञ हो, उसको ला' इस वाक्यके
यत्नकी समाप्ति आनयन क्रियाके प्रैष पर होती हैं, किन्तु जिसका
आनयन इष्ट है, उसकी पहिचान चतुर्वेदाभिज्ञता गुणसे ही होतो
है, इस लिये उसको पहिले कहकर 'आनय' क्रियाका प्रयोग
किया जाता है, इस लिये यहां उस गुणयुक्त पुरुषका स्मरणमात्र
होता है, उससे उस पुरुषकी प्रशंसा नहीं होती, यही स्तुति और
अभिधानका भेद है।
“प्रउगं शंसति” “आज्यैः स्तुवते” इत्यादि श्रुति वाक्योंमें
स्तुत्यर्थक 'शंसति' आदि क्रियाओंसे जिन मन्त्रोंका विनियोग होता
है, वे मन्त्र अनुष्ठानस्मरण-रूप दृष्ट प्रयोजनके लिये नही होते,
'इसीसे उनकी प्रधानता रहती है, किन्तु गौणता नहीं, तथा वे
अन्य-देवताके स्तावक होकर भी अन्य-देवताके यजनके सन्निधानमें
पठनीय होते हैं, क्योकि—उनसे उस कर्मकी पुष्टि होती है।
इसीसे जैमिनीय मीमांसा [अ० २ पा० १ अ० ४] में "अपि वा
श्रुति-संयोगात् प्रकरणे स्तौति-शंसती क्रियोत्पत्तिं विदध्याताम्”
इस सूत्रसे स्तोत्र तथा शस्त्र मन्त्रोकी प्रधानता सिद्ध की है।
अर्थात् स्तौति और शंसति धातुओकी स्मरणार्थता मान ली
जावे तो उनके स्तुतिरूप श्रौत अर्थका बाध हो जायगा, इस
लिये अदृष्टकी कल्पना करके भी उनका प्राधान्य माना गया है।
जैसे कि—इसी द्वितीय पादमें उपमार्थक 'इव'का उदाहरण
“अग्निरिवमन्यो !” [ ऋ० सं० ८, ३, १६, २ ] यह मन्त्र
है 'इस मन्त्रका मन्यु देवता है। और यह महेन्द्र देवताओंके

हिन्दीनिरुक्त। ६३
ग्रह यज्ञके समीप निष्केवल्यमें शस्त्र होता है, अर्थात् जहां
महेन्द्र देवताका यज्ञ हो रहा है, मन्युं देवताके मन्त्रका
पाठ होता है। जिस प्रकार लड़केके विवाहमें देवी भैरव
आदि देवताओंके गीत गाये जाते हैं, और उनमें विवाहके किसी
कार्यका स्मरण न हो कर केवल उन देवताओंकी स्तुति होती है,
तथा उनकी स्तुतिसे ही प्रस्तुत विवाहादि संस्कारोंमें उपकार
होता है, इसी प्रकार यहांपर मन्यु देवताकी स्तुतिसे महेन्द्र
देवताके यज्ञमें उपकार होता है, किन्तु वहांके अनुष्ठान व महेन्द्र
देवताका उनके मन्त्रोंमें स्मरण नहीं होता, यही अन्य देवताओंके
शस्त्र व स्तोत्र मन्त्रोंके पाठकी अन्य देवताओंके यज्ञमें सङ्गति
है। यही प्रकार अन्यत्र अन्यत्र भी ध्यानमें रखना चाहिये।
शस्त्र—अप्रगीतमन्त्रसाध्या स्तुतिः स्तोत्रम्। विना गाये हुए
मन्त्र से स्तुति, शस्त्र है।
स्तोत्र--प्रगीतमन्त्रसाध्य स्तुतिः स्तोत्रम्। गाये हुए मन्त्रसे
स्तुति, स्तोत्र कहलाती है।
पूर्ण तथा अपूर्ण उदाहरण—
मन्त्र।
भाष्यकार निरुक्तमें उदाहरण मन्त्रोंको कहीं पूर्ण तथा कहीं
अपूर्ण रूपमें पढ़ते हैं, इसका प्रयोजन यह है कि—जो सम्पूर्ण पढ़े
जाते हैं, और निर्वचन किये जाते है, वे व्याख्या-धर्मके उपदेशके
लिये हैं, अर्थात् उनसे छात्रोंको मन्त्रकी व्याख्याका प्रकार ज्ञात
होगा, व्याख्या-प्रकारको जान कर, वे अन्य मन्त्रोंकी व्याख्या
कर सकेंगे।
यदि सभी मन्त्र पूर्ण पढ़े जावें और निर्वचन किये जावें, तो
शास्त्र अतिविस्तृत होजावें। अथवा सभी मन्त्रोंके खण्ड पढ़े

६४ अ० १ पा० २ ख० १ ॥
जांय और निवचन किये जांय, तो व्याख्या-धर्म प्रदर्शित नहीं हो,
इस कारण व्याख्या-धर्मके उपदेशार्थ कोई सम्पूर्ण पढ़े जाते हैं
तथा निर्वचन किये जाते हैं, और शास्त्रके अति गौरवके भयसे
कोई असंपूर्ण ही पढ़े जाते हैं ।
प्रत्येक मन्त्रमें ही जिस प्रकार सकल, आधा अथवा चौथाई
पढ़नेसे प्रयोजन जाना जा सकता है, वह संक्षेपसे यह प्रकार
है, कि—
“जिस जिस मन्त्रमें जिस जिस एकार्थ, अनेकार्थ, तथा
अनवगतसंस्कार पदको निर्वचन करता है, अथवा किसी शब्दान्तर
का अध्याहार करता है, यद्वा किसी विशेष अर्थको दिखाता है,
तथा कोई विपरिणाम करता है, या किसो सन्दिग्ध अर्थका निर्णय
करता है, ऐसे प्रयोजनोंके लिये सकल मन्त्रका अध्ययन करता है,
एवम् जिस मन्त्रमें आधे या चोथाई भागहीमे वैसा पद है, जिसका
कि—आचार्यको निर्वचन करना अभीष्ट है, तो उतना ही पढ़
देता है, यह उक्त प्रकारसे निपुणताके साथ सर्वत्र अन्वेषण
करना चाहिए ।
स्तुति वाक्य और स्मारक वाक्य ।
स्तुतिके लिये जिन वाक्योंका प्रयोग होता है, वे स्तुति-वाक्य
कहलाते हैं, तथा स्मरणमात्रके लिये उपयोगी होनेवाले वाक्य
स्मृतिवाक्य या स्मारक होते हैं । अर्थात् जिस वस्तुकी स्तुति करना
हो, उसमें गुणोंका बखान करना, स्तुति वाक्यका प्रयोजन है, एवम्
गुणोंके द्वारा अनुस्मरणीय वस्तुके स्वरूपका प्रकाश करना, स्मारक
वाक्यका प्रयोजन होता है । या यो समझिए कि—स्तुति-वाक्य
में विशेष्यके द्वारा बिशेषणोंका और स्मारक-वाक्यमें विशेषणोंके
द्वारा विशेष्यका ज्ञान होता है । जैसे—"देवदत्तश्चतुर्वेदाऽभिज्ञः"
‘देवदत्त चारों वेदोंका जाननेवाला है’ यहां पहिले देवदत्तका ज्ञान

हिन्दी निरुक्त । ६५
होता है, और पीछे उसके गुणोंका, एवम् "यश्चतुर्वेदाभिज्ञस्तमानय"
जो चारों वेदोंका जाननेवाला है, उसे ला, यहां पर पहिले विशेषण-
का और पीछे विशेष्यका ज्ञान होता है। यही दो प्रकार मन्त्रोंके हैं,
उनमें जो स्तुत्यर्थ होते हैं, वे शस्त्र तथा स्तोत्र नामसे बोले जाते हैं,
और जो केवल अनुष्ठान या देवताका स्मरणमात्र कराते हैं, वे
अन्य अन्य मन्त्र हैं। इसी लिये स्तोत्र व शस्त्र नामवाले मन्त्र
स्तोतव्य देवताकी स्तुतिमात्र करते हैं, किन्तु किसी प्रस्तुत वस्तु-
की स्मृति नहीं कराते ।
शस्त्र व स्तोत्र ।
“प्रउगं शंसति” “निष्केवल्यं शंसति” इत्यादि वाक्योंसे
'शंसति' क्रियाके द्वारा जिनका विनियोग होता है, वे शस्त्र कहाते
हैं, और “आज्यैःस्तुवते” “पृष्ठैः स्तुवते” इत्यादि वाक्योंसे स्तुवते
या स्तौति क्रियाके द्वारा जिन मन्त्रोंका विनियोग होता है, वे
स्तोत्र कहाते हैं। एवम् स्तोत्र मन्त्र गाये जाते हैं और शस्त्र गाये
नहीं जाने। यही इनका परस्पर भेद है, किन्तु देवताकी स्तुतिमें
दोनोंका प्रयोजन समान है। इनकी सार्थकता देवताकी स्तुतिमें
ही होती है, गुणोंके अनुवाद-मात्रसे नहीं, इसी कारण स्तोत्र व
शस्त्ररूप कर्मकी मुख्यताः ही है गौणता नहीं होती ।
द्वितीय पाद ।
( खं-१ )
अथ निपाता उच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्ति ।
अप्युपमार्थे । अपि कर्मोपसंग्रहार्थे । अपि पद-
पूरणाः । तेषामेते चत्वार उपमार्थे भवन्ति ।
'इव'-इति भाषायांच । अन्वध्यायंच । “अग्नि-

६६ अ० १ पा० २ ख० १ ।
रिव, इन्द्र इव"-इति । 'न'-इति प्रतिषेधार्थीयो
भाषायाम् । उभयमन्वध्यायम् । "नेन्द्रं देव
ममंसत"-इति प्रतिषेधार्थीयः । पुरस्तादुपचारस्त-
स्य, य-प्रतिषेधति । "दुर्मदासो न सुरायाम्"-
इत्युपमार्थीयः । उपरिष्टादुपचारस्तस्य, येनोप-
मिमोते ॥ १ ॥
अर्थ—अथ निपात । अनेक प्रकारके अर्थोंमें गिरनेवाले निपात
होते हैं। कोई उपमा अर्थमें। कोई अर्थोपसंग्रह अर्थमे ।
और कोई पद-पूरणके लिये होते है। उनमें ये चार [ इव, न, चित्,
नु ] उपमा अर्थमे होते है। 'इव' भाषा (लोक) और वेदमैं ।
(उदाहरण) "अग्निरिव" [ ऋ० सं० ८, ३, १६, २ ] अग्निके
समान । "इन्द्रइव" [ ऋ० मं० ८, ८, ३१, २ ] इन्द्रके समान ।
'न'-यह लोकमे निषेध अर्थमें और वेदमे निषेध और उपमा दोनों
अर्थोंमे होता हैं। (उदाहरण) "नेन्द्र देवममंसत" [ ८, ३, २६,
१ ] आदित्य रश्मियोने इन्द्रको अपना देव या प्रकाशक नहीं माना ।
यहां निषेध अर्थमे है। जब निषेध अर्थमें होता है, तब उसका उच्चा-
रण आदिमें आता है। "दुर्मदासो न सुरायाम्" [ऋ० मं० ५, ७, १६,
१ ] मदिराको पान किये हुये पुरुषोंके समान सोम दुर्मद है । यहां
'न' उपमा अर्थ म है। जिससे कि-नकार पीछे या अन्तमें दिया
है, इससे उपमार्थक है।
( ख०-२ )
'चित्'-इत्येषोऽनेकर्मा । "आचार्य्यश्चिदिदं
ब्रूयात्"-इति पूजायाम् । 'आचार्य' आचारं
ग्राहयति, आचिनोति अर्थान्, आचिनोति बुद्धि-

' हिन्दी निरुक्त । ६७
मिति वा । “दधिचित्” इत्युपमार्थे । “कुल्माषां-
श्चित् आहर”—इत्यवकुत्सिते । कुल्माषाः = कुलेषु
सीदन्ति । 'नु' इत्येषोऽनेककर्मा । “इदं नु करि-
ष्यति”—इति हेत्वपदेशे । 'कथं नु करिष्यति"
इत्यनुपृष्टे । “ननु एतदकार्षीत्” इति च ।
अथापि उपमार्थे भवति ॥ २ ॥
अर्थ—'चित्' यह अनेकार्थ है । (उदाहरण) “आचार्य्यश्चिदिदं
ब्रूयात्” आचार्य ही ऐसा कह सकता है, और कौन कहेगा ? यह
पूजा अर्थमें है । आचार्य,—जो आचार सिखावे, या अर्थोंको
संग्रह करे या बुद्धिको संग्रह करे । “दधि चित्” दधिके समान ।
यह उपमा अर्थमें है । “कुल्माषांश्चित् आहर,” कुल्माषोको
तो तू ले आ, और क्या लावेगा ? यह निन्दा अर्थमें है ।
कुल्माष—जो कुलोंमें रहे । 'नु' यह अनेकार्थ है । “इदं नु
करिष्यति” कैसे करेगा, यह हेतुके न माननेमें है । कथं नु करि-
ष्यति” कैसे करेगा ? यह दुबारा प्रश्नमें है, और “ननु एतत्
अकार्षीत्” अवश्य इसने किया है, यह भी दुबारा प्रश्न ही में है।
और उपमा अर्थ में भी है ॥ २ ॥
“वृक्षस्य नु ते पुरुहूतवयाः” । वृक्षस्येव ते पुरुहूत
शाखाः । 'वयाः' शाखाः वेतेः । वातायना भवन्ति ।
“शाखाः” खशयाः । शक्नोतेर्वा । अथ यस्यांगमादर्थ
पृथक्त्वमह विजायते न त्वौद्देशिकमिव विग्रहेण
पृथक्त्वात् स कर्मोपसंग्रहः । 'च'-इति । समुच्चयार्थः

६८ अ० १ पा० २ ख० ३ ।
उभाभ्यां संयुज्यते “अहं च त्वं च वृत्रहन्” इति ।
एतस्मिन्नेवार्थे “देवेभ्यश्च पितृभ्यश्चा”—इत्याकारः ।
‘वा’—इति विचारणार्थे । “हन्ताहं पृथिवीमिमां
निदधानीहवेह वा” इति । अथापि समुच्चयार्थे
भवति । “वायुर्वा त्वा मनुर्वा त्वा”—इति ॥ ३ ॥
अर्थ—(उदाहरण)—“वृक्षस्य नु ते पुरुहूतवयाः” (ऋ० मं० ४,
६, १७, ३) हे पुरुहूत ! इन्द्र ! तेरे न आनेसे हमारे यज्ञके मार्ग
वृक्षकी शाखाओंके समान खाली हैं । वया नाम शाखा का है। ‘वी’
धातुसे होताहै। (क्योंकि-) वे वायुके स्थान हैं। शाखा = जो आ-
काश मे शयन करें । अथवा ‘शक्लृ’ शक्तौ धातुसे है ॥ इति उप-
मार्था निपाताः ॥
अथ कर्मोपसंग्रहार्थक निपात । वाक्यमे उच्चारण किये हुयेके
समान समासमें जिसके अध्याहारसे अर्थका भेद जाना जावे वह
कर्मोपसंग्रह निपात होता है। जैसे-‘च’ । यही ‘च’ कभी कभी
समुच्चय अर्थमें अलग अलग दो अर्थोंके साथ संयुक्त हुआ बोला
जाता है। जैसे—“अहं च त्वंच वृत्रहन् ! [ ऋ० सं० ६, ४,
४१, ५] हे वृत्रहन् ! इन्द्र ! मैं और तू । इसी समुच्चय अर्थमें
[उदाहरण] “देवेभ्यश्च पितृभ्य आ” [ ऋ० सं० ७, ६, २२, १ ]
देवोके लिये और पितरोंके लिये । यहां ‘आ’ निपात, आता है।
‘वा’ यह संशय अर्थमें है। [जैसे-] हन्ताहं पृथिवीमिमां निद-
धानीहवेह वा” [ ऋ० सं० ८, ६, २७, ३] इसी समय मैं इस
पृथिवीको यहां रखूं या यहां ! इसके अतिरिक्त समुच्चय अर्थमें
भी है। [जैसे] “वायुर्वा त्वा मनुर्वा त्वा” [य-सं० ६, ७] हे अश्व !
वायुं तुझे और तुझे मनु ॥ ३ ॥

हिन्दी निरुक्त। ६६

'अह' इति च, 'ह' इति च, विनिग्रहार्थीयौ ।
पूर्वेण संप्रयुज्येते । 'अयमहेदं करोतु,' 'अयसिदम्' ।
'इदं ह करिष्यति, इदं न करिष्यति, इति । अथापि
'उकार' एतस्मिन्नेवार्थे। उत्तरेण । 'मृषा इमे वदन्ति,
'सत्यमु ते वदन्ति, इति । अथापि पद-पूरणः ।
'इदमु' 'तदु' । 'हि' इत्येषः अनेक-कर्मा । 'इदं
हि करिष्यति'—इति हेत्वपदेशे । 'कथं हि
करिष्यति' इति अनुपृष्टे । 'कथं हि व्याकरिष्यति'
इति असूयायाम् । 'किल' इति विद्या-प्रकर्षे ।
'एवं किल' इति । अथापि 'न' 'ननु' इत्येताभ्यां
संप्रयुज्यते । अनुपृष्टे—'न किल एवम्' । 'ननु किल
एवम्' 'मा' इति प्रतिषेधे । 'मा कार्षीः ।' 'मा-
हार्षीः'—इति च । 'खलुक्त्वा' । 'खलुकृतम्' ।
अथापि पदपूरणे । 'एवं खलु तद् बभूव' इति ।
'शश्वत्' इति विचिकित्सार्थीयो भाषायाम् ।
'शश्वदेवम्' इति अनुपृष्टे । 'एवं शश्वत्, इति
अस्वयं पृष्टे । 'नूनम्' इति विचिकित्सार्थीयो
भाषायाम् । उभयमन्वध्यायम् । विचिकित्सार्थी
यश्च पदपूरणश्च । 'अगस्त्य इन्द्राय हविर्निरूप्य

७० अ० १ पा० २ ख० ४ ।
मरुद्भ्यः संप्रदित्सांचक्रे-कार स इन्द्र एत्य
परिदेवयाञ्चक्रे ॥ ४ ॥
अर्थ—'अह' और 'ह' विनिग्रह अर्थ में हैं [स्वभाव] [प्रस्तुत दो
वाक्योंमें] पूर्व [वाक्यगत अर्थ] के साथ संयुक्त होकर बोले जाते हैं।
[जैसे] 'अयमह इदं करोतु' = यह १ यह २ करे । 'अयमिदम्' =
यह ३ यह ४ करे। 'इदं ह करिष्यति,' 'इदं न करिष्यति' । [यज्ञ-
दत्त ] यह करेगा, यह न करेगा [ओदन न पकावेगा] । और
उकार भी इसी [विनिग्रह] अर्थ में हैं। [स्वभाव] दूसरे वाक्य-
गत अर्थके साथ संयुक्त होकर बोला जाता है। [जैसे-] 'मृषा
इमे वदन्ति' = ये झूठ बोलते है। 'सत्यमु ते वदन्ति' = वे सच
बोलते हैं। और पद-पूरण अर्थमें भी है। 'इदमु' [ऋ० सं०
३, ८, २, १] = यह। 'तदु' [ऋ० सं० १, ५, २, १] =
वह। 'हि' यह अनेकार्थ है। [जैसे] 'इदं हि करिष्यति' =
'यह करेगा ? । यह हेतुके अस्वीकारमें। 'कथ हि करिष्यति' =
कैसे करेगा ? । यह दुबारा प्रश्नमे । 'कथं हि व्याक-
रिष्यति' = कैसे व्याख्या करेगा ? । यह निन्दामें। 'किल'
यह विज्ञानके आधिक्यमें । [जैसे—कोई दूसरेसे सुनकर उसे
बहुत निश्चय कर दूसरेसे कहता है-] "एवं किल" = ऐसे ही
[यह युद्ध हुआ]। और 'न' 'ननु' इन दोनोंके साथ संयुक्त
होकर भी बोला जाता है। दुबारा प्रश्नमें। [किसी बातको
दूसरेसे सुनकर, कि—'यह ऐसा नहीं', फिर दूसरेसे पूछता है,
और उसपर भी श्रद्धा न करके फिर प्रथम पुरुषसे ही पूछता है।-]
'न किल एवम्' = ऐसा नहीं है ? 'ननु किल एवम्' = ऐसा नहीं
है। 'मा' यह प्रतिषेध अर्थमें है। [जैसे-] 'मा कार्षीः' = मत
० १—यज्ञदत्त। २—गौओको पिलावे। ३—देवदत्त। ४—भोजन करे।

हिन्दी निरुक्त । ७१
कर । और 'माहार्षीः' = मत लेजा । और 'खलु' यह [ प्रतिषेध
अर्थमें ] । [ जैसे-] 'खलु कृत्वा' = न करके । 'खलु कृतम्' = नहीं
किया । और पद-पूरण अर्थमे भी । 'एवं खलु तद् बभूव' = ऐसे
वह हुआ । 'शश्वत्'—यह संशय अर्थमें लोकमे आता है ।
[ वेदमे अन्य अन्य अर्थोमे भी यथा-संभव देखना चाहिये-]
'शश्वदेवम् = ऐसे ? । यह दोबारा प्रश्नमें । 'एवं शश्वत् ? = यह
विना अपने पूछे । 'नूनम्'—यह संशय अर्थमें लोकमें । वेदमें
दोनो अर्थोमें । संशय अर्थमें, और पदपूरण अर्थमें । [ उदाहरण
की भूमिका ] अगस्त्यने इन्द्रके लिये हवि निर्वाप या घाल कर
दूसरे देवताको देना विचारा, उस इन्द्रने आकर क्रोधपूर्वक
विलाप किया ।
इति द्वितीयः पादः ।
――――
तृतीय पाद ।
( खं०-१ )
“न नूनमस्ति नो श्वः कस्तद्वेद यदद्भुतम् ।
अन्यस्य चित्तमभि संचरेण्यमुताधीतं विनश्यति ॥
न नूनमस्ति अद्यतनम्, नो एव श्वस्तनम् । 'अद्य'
अस्मिन्द्यवि । 'द्युः' इति अन्हो नामधेयम्, द्योतते
इति सत्ः । 'श्वः' उपाशंसनीयः कालः । 'ह्य'
हीनः कालः । “कस्तद्वेद यदद्भुतम्” । कस्तद्वेद
यदभूतम् । इदमपि इतरत् 'अद्भुतम्'—अभूतमिव ।

भवति । जरिता गरिता । दक्षिणा मघोनो = मघवती ।
‘मघम्’ इति धन नामधेयम् । मंहतेर्दानकर्मणः ।
‘दक्षिणा’ दक्षतेः समर्द्धयति कर्मणः । व्यृद्धं समर्द्ध-
यति,-इति । अपिवा प्रदक्षिणा गमनात् । दिशमभि
प्रेत्य,-दिक् । हस्तप्रकृतिः । दक्षिणोहस्तो दक्षतेरुत्साह
कर्मणः, दाशतेर्वा स्याद्दानकर्मणः । हस्तो हन्तेः । प्राशु
ईं नने । देहि स्तोतृभ्यः कामान् माऽस्मानविदोंहो,
माऽस्मानतिहायदाः । भगो नो अस्तु । बृहद् वदेम स्वे
वेदने । भगो भजतेः । ‘बृहत्’ इति महतो नामधेयम् ।
परिवृढं भवति । वीरवन्तः, कल्याणवीरा वा । वीरः =
वीरयति अमित्रान् । वेतेर्वा स्याद् गति-कर्मणः । वीरयते
र्वा । ‘सीम्’ इति परिग्रहार्थीयो वा पदपूरणो वा ।
“प्रसीमादित्यो असृजत्” । प्रासृजत्-इतिवा । प्रासृजत्
सर्वतः,-इति वा । “विसीमेतः सुरुचो वेन आवः इति
च । व्यवृणोत् सर्वतः आदित्यः । सुरुचः आदित्यरश्मयः
सुरोचनात् । अपि वा ‘सीम’ [ सीमा ] इत्ये-
तदर्थकसमुपदस्माद्दृश्येत पञ्चमीकर्माणम् । सीम्नः,
सीमतः, सीमातः मर्यादतः । सीमा मर्यादा । विसौ-
व्यतिदेशौ-इति । ‘त्व’ इति विनिग्रहार्थीयं सर्वनाम,
अनुदात्तम् । अर्द्धनाम-इत्येके ॥ २ ॥
१०

७४ अ० १ पा० ३ ख० २ ।
अर्थ—“नूनं सा०” [ ऋ० सं० २, ६, ६, ६ ] ‘नूनम्’ पदपूरण
या अनर्थक है। हे इन्द्र ! वह दक्षिणा, जो तेरे पुत्रके उत्पन्न करने
वाले कर्ममें हिरण्य आदि धन युक्त है, स्तुति करनेवाले [ यजमान ]
के लिये वर दे, स्तोताओ [ ऋत्विजों ] के लिये कामनाओंको दे,
हमें छोड़कर औरोंको न दे, हमारे पास धन हो, हम यज्ञ और
घरमें बडे वचन बोलें, हम अपुत्रताकी अवस्था में पुत्रवाले हों और
पुत्रवत्ताकी अवस्था मे वीर पुत्रवाले हों । [ खण्डार्थ ] वह तेरे
यजमानके लिये वर दुहे । [ प्रतिपदार्थ ] ‘वर’ नाम चाहने योग्य
वस्तुका है । ‘जरितृ’ नाम स्तुति करनेवालेका है । दक्षिणा जो
धन संयुक्त हो । मघोनी नाम मघवती और मघवती नाम धनवती
का है । ‘मघ’ नाम धनका है। दानार्थक ‘मंह’ धातुसे होता है ।
‘दक्षिणा’ समृद्धि अर्थवाले ‘दक्ष’ धातु से होता है । वह द्रव्य हीनको
आढ्य या समृद्ध बना देती है । अथवा दाहिनी ओरसे आनेके कारण
दक्षिणा है । दिशाके अभिप्रायसे दिशा दक्षिणा है । वह हस्तसे
उत्पन्न हुई है। [ पूर्वको मुख किये हुये प्रजापतिका जो दाहिना हाथ
हुआ वही दक्षिण दिशा होगई ] ‘दक्षिण’ जो हस्तका नामहै उत्सा-
हार्थक ‘दक्ष’ धातुसे या दान अर्थ मे ‘दाश’ धातुसे बनता है । ‘हस्त’
‘हन्’ धातुसे बनता है । वह हनन या मारने में शीघ्र है । [खण्डार्थ]
“देहि स्तोतृभ्यः कामान्” स्तुति करनेवालोंको उनके कामोंको दे ।
“मा अस्मान् अतिदंहीः” हमें छोड़कर मत दे । हमको धन मिले ।
हम अपने घर और यज्ञमें बडे वचन कहें । ‘भग’ ‘भज’ धातुसे
होता है । ‘बृहत्’ यह बड़े का नामहै । वह सब ओर बढ़ा हुआ होता
है । वीरवाले अथवा अच्छे वीरवाले । ‘वीर’ जो शत्रुओंको बहुत
प्रकारसे मारता है । अथवा गति अर्थवाले ‘वी’ धातुसे बनता है ।
[ क्योंकि-वह शत्रुओंके साम्हने जाता है ] अथवा ‘वीर’ धातुसे
बनता है । ‘सोम्’ यह परिग्रह अर्थमें है, अथवा पदपूरण है । [जैसे]

हिन्दी निरुक्त। ७५
“प्रसीमादित्यो असृजत्” [ऋ० सं० २, ७, ६, ४] [‘सीम’ के
अनर्थक पक्षमें-] सूर्यने अपनी किरणोंको फैलाया। [परिग्रह अर्थमे]
सब ओरसे फैलाया। [और जैसे] “विसीमतः सुरुचो वेन आवः”
[य० वा० सं० १३, ३] [सा० सं० ४, ३, ६] मेधावी [आदित्यने]
अच्छे प्रकाशवाली किरणोंको सब ओर फैलाया। फैलाया सब
ओरसे आदित्यने] 'सुरुच्' नाम आदित्यकी किरणोंका है, क्योंकि
वे अच्छा प्रकाश फैलाती है। अथवा जो अनर्थक लगा हुआ
'सीम्' के रूपमे कहा गया है, वह सन्धिके भेदसे 'सीम'
शब्द मानना चाहिये और उसके आगे 'तः' यह प्रत्यय
पंचमी विभक्तिका अर्थ देता है। [जिससे] सीमसे, सीमासे,
मर्यादासे [अर्थ होता है] 'सीमा' नाम मर्यादाका है। क्योंकि
वह दो देशोंको अलग करती है। 'त्व' यह विनिग्रह अर्थ मे सर्व-
नाम और अनुदात्त। आधेका नाम है,—ऐसा कोई मानते
हैं॥२॥
“ऋचामुत्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रन्त्वो
गायति शक्वरीषु । ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां
यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उत त्वः” ॥ इति ऋत्वि-
क्कर्मणां विनियोगमाचष्टे । ऋचामेकः पोषमास्ते
पुपुष्वान् होता । ऋक् = अर्चनी । गायत्रमेको
गायति शक्वरोषु उद्गाता । गायत्रं गायतै स्तुति-
कर्मणः । “शक्वर्यः ऋचः शक्नोतेः । तद् यदाभि
वृत्रमशकदद्धन्तुं तत् शक्करीणां शक्करीत्वम्”