निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ५७
६ { निर् दुर् } निन्दा निर्धन दुष्टधन ।
दुर्ब्राह्मण=दुष्ट ब्राह्मण ।
७ { नि अव } विनिग्रह { निगृह्णाति=शासन करताहै
अवगृह्णाति=रोकता है ।
८ उद् इन दोनों (नि० अव) का प्रातिलोम्य उद्गृह्णाति=उद्धारकरताहै ।
९ सम् एकीभाव संगृह्णाति=संग्रह करताहै ।
१० { वि अप } प्रातिलोम्य विगृह्णाति अपगृह्णाति (विग्रह करताहै)
११ अनु { (१) सादृश्य (२) अपरभाव } { अनुरूपमस्येदम् अनुगच्छति
१२ अपि संसर्ग { सर्पिषोऽपि स्यात् मधुनोऽपि स्यात्
१३ उप उपजन उपजायते
१४ परि सर्वतोभाव परिधावति
१५ अधि { १-उपरिभाव २-ऐश्वर्य } { अधितिष्ठति अधिपतिः
पहिले कहा है कि—"उपसर्ग नाम और आख्यातके साथ
क्रियाके सम्बन्धके द्योतक हैं" यह ठीक नहीं है, क्योंकि—"उप-
सर्गाः क्रियायोगे" (अ०-१।४।५६) इस पाणिनीय अनुशासनमे
उपसर्गोंका क्रिया पदके साथ ही सम्बन्ध प्रसिद्ध है, किन्तु नामके
साथ नहीं, प्रत्युत क्रियाके अंगभाव हो नामोंको भी व्यापन
करते हैं ।
समाप्तः प्रथमः पादः ।