सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 67

६६ अ० १ पा० २ ख० १ ।
रिव, इन्द्र इव"-इति । 'न'-इति प्रतिषेधार्थीयो
भाषायाम् । उभयमन्वध्यायम् । "नेन्द्रं देव
ममंसत"-इति प्रतिषेधार्थीयः । पुरस्तादुपचारस्त-
स्य, य-प्रतिषेधति । "दुर्मदासो न सुरायाम्"-
इत्युपमार्थीयः । उपरिष्टादुपचारस्तस्य, येनोप-
मिमोते ॥ १ ॥
अर्थ—अथ निपात । अनेक प्रकारके अर्थोंमें गिरनेवाले निपात
होते हैं। कोई उपमा अर्थमें। कोई अर्थोपसंग्रह अर्थमे ।
और कोई पद-पूरणके लिये होते है। उनमें ये चार [ इव, न, चित्,
नु ] उपमा अर्थमे होते है। 'इव' भाषा (लोक) और वेदमैं ।
(उदाहरण) "अग्निरिव" [ ऋ० सं० ८, ३, १६, २ ] अग्निके
समान । "इन्द्रइव" [ ऋ० मं० ८, ८, ३१, २ ] इन्द्रके समान ।
'न'-यह लोकमे निषेध अर्थमें और वेदमे निषेध और उपमा दोनों
अर्थोंमे होता हैं। (उदाहरण) "नेन्द्र देवममंसत" [ ८, ३, २६,
१ ] आदित्य रश्मियोने इन्द्रको अपना देव या प्रकाशक नहीं माना ।
यहां निषेध अर्थमे है। जब निषेध अर्थमें होता है, तब उसका उच्चा-
रण आदिमें आता है। "दुर्मदासो न सुरायाम्" [ऋ० मं० ५, ७, १६,
१ ] मदिराको पान किये हुये पुरुषोंके समान सोम दुर्मद है । यहां
'न' उपमा अर्थ म है। जिससे कि-नकार पीछे या अन्तमें दिया
है, इससे उपमार्थक है।
( ख०-२ )
'चित्'-इत्येषोऽनेकर्मा । "आचार्य्यश्चिदिदं
ब्रूयात्"-इति पूजायाम् । 'आचार्य' आचारं
ग्राहयति, आचिनोति अर्थान्, आचिनोति बुद्धि-