निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ अ० १ पा० २ ख० ३ ।
उभाभ्यां संयुज्यते “अहं च त्वं च वृत्रहन्” इति ।
एतस्मिन्नेवार्थे “देवेभ्यश्च पितृभ्यश्चा”—इत्याकारः ।
‘वा’—इति विचारणार्थे । “हन्ताहं पृथिवीमिमां
निदधानीहवेह वा” इति । अथापि समुच्चयार्थे
भवति । “वायुर्वा त्वा मनुर्वा त्वा”—इति ॥ ३ ॥
अर्थ—(उदाहरण)—“वृक्षस्य नु ते पुरुहूतवयाः” (ऋ० मं० ४,
६, १७, ३) हे पुरुहूत ! इन्द्र ! तेरे न आनेसे हमारे यज्ञके मार्ग
वृक्षकी शाखाओंके समान खाली हैं । वया नाम शाखा का है। ‘वी’
धातुसे होताहै। (क्योंकि-) वे वायुके स्थान हैं। शाखा = जो आ-
काश मे शयन करें । अथवा ‘शक्लृ’ शक्तौ धातुसे है ॥ इति उप-
मार्था निपाताः ॥
अथ कर्मोपसंग्रहार्थक निपात । वाक्यमे उच्चारण किये हुयेके
समान समासमें जिसके अध्याहारसे अर्थका भेद जाना जावे वह
कर्मोपसंग्रह निपात होता है। जैसे-‘च’ । यही ‘च’ कभी कभी
समुच्चय अर्थमें अलग अलग दो अर्थोंके साथ संयुक्त हुआ बोला
जाता है। जैसे—“अहं च त्वंच वृत्रहन् ! [ ऋ० सं० ६, ४,
४१, ५] हे वृत्रहन् ! इन्द्र ! मैं और तू । इसी समुच्चय अर्थमें
[उदाहरण] “देवेभ्यश्च पितृभ्य आ” [ ऋ० सं० ७, ६, २२, १ ]
देवोके लिये और पितरोंके लिये । यहां ‘आ’ निपात, आता है।
‘वा’ यह संशय अर्थमें है। [जैसे-] हन्ताहं पृथिवीमिमां निद-
धानीहवेह वा” [ ऋ० सं० ८, ६, २७, ३] इसी समय मैं इस
पृथिवीको यहां रखूं या यहां ! इसके अतिरिक्त समुच्चय अर्थमें
भी है। [जैसे] “वायुर्वा त्वा मनुर्वा त्वा” [य-सं० ६, ७] हे अश्व !
वायुं तुझे और तुझे मनु ॥ ३ ॥