निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 64, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीनिरुक्त। ६३
ग्रह यज्ञके समीप निष्केवल्यमें शस्त्र होता है, अर्थात् जहां
महेन्द्र देवताका यज्ञ हो रहा है, मन्युं देवताके मन्त्रका
पाठ होता है। जिस प्रकार लड़केके विवाहमें देवी भैरव
आदि देवताओंके गीत गाये जाते हैं, और उनमें विवाहके किसी
कार्यका स्मरण न हो कर केवल उन देवताओंकी स्तुति होती है,
तथा उनकी स्तुतिसे ही प्रस्तुत विवाहादि संस्कारोंमें उपकार
होता है, इसी प्रकार यहांपर मन्यु देवताकी स्तुतिसे महेन्द्र
देवताके यज्ञमें उपकार होता है, किन्तु वहांके अनुष्ठान व महेन्द्र
देवताका उनके मन्त्रोंमें स्मरण नहीं होता, यही अन्य देवताओंके
शस्त्र व स्तोत्र मन्त्रोंके पाठकी अन्य देवताओंके यज्ञमें सङ्गति
है। यही प्रकार अन्यत्र अन्यत्र भी ध्यानमें रखना चाहिये।
शस्त्र—अप्रगीतमन्त्रसाध्या स्तुतिः स्तोत्रम्। विना गाये हुए
मन्त्र से स्तुति, शस्त्र है।
स्तोत्र--प्रगीतमन्त्रसाध्य स्तुतिः स्तोत्रम्। गाये हुए मन्त्रसे
स्तुति, स्तोत्र कहलाती है।
पूर्ण तथा अपूर्ण उदाहरण—
मन्त्र।
भाष्यकार निरुक्तमें उदाहरण मन्त्रोंको कहीं पूर्ण तथा कहीं
अपूर्ण रूपमें पढ़ते हैं, इसका प्रयोजन यह है कि—जो सम्पूर्ण पढ़े
जाते हैं, और निर्वचन किये जाते है, वे व्याख्या-धर्मके उपदेशके
लिये हैं, अर्थात् उनसे छात्रोंको मन्त्रकी व्याख्याका प्रकार ज्ञात
होगा, व्याख्या-प्रकारको जान कर, वे अन्य मन्त्रोंकी व्याख्या
कर सकेंगे।
यदि सभी मन्त्र पूर्ण पढ़े जावें और निर्वचन किये जावें, तो
शास्त्र अतिविस्तृत होजावें। अथवा सभी मन्त्रोंके खण्ड पढ़े