निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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होता है, और पीछे उसके गुणोंका, एवम् "यश्चतुर्वेदाभिज्ञस्तमानय"
जो चारों वेदोंका जाननेवाला है, उसे ला, यहां पर पहिले विशेषण-
का और पीछे विशेष्यका ज्ञान होता है। यही दो प्रकार मन्त्रोंके हैं,
उनमें जो स्तुत्यर्थ होते हैं, वे शस्त्र तथा स्तोत्र नामसे बोले जाते हैं,
और जो केवल अनुष्ठान या देवताका स्मरणमात्र कराते हैं, वे
अन्य अन्य मन्त्र हैं। इसी लिये स्तोत्र व शस्त्र नामवाले मन्त्र
स्तोतव्य देवताकी स्तुतिमात्र करते हैं, किन्तु किसी प्रस्तुत वस्तु-
की स्मृति नहीं कराते ।
शस्त्र व स्तोत्र ।
“प्रउगं शंसति” “निष्केवल्यं शंसति” इत्यादि वाक्योंसे
'शंसति' क्रियाके द्वारा जिनका विनियोग होता है, वे शस्त्र कहाते
हैं, और “आज्यैःस्तुवते” “पृष्ठैः स्तुवते” इत्यादि वाक्योंसे स्तुवते
या स्तौति क्रियाके द्वारा जिन मन्त्रोंका विनियोग होता है, वे
स्तोत्र कहाते हैं। एवम् स्तोत्र मन्त्र गाये जाते हैं और शस्त्र गाये
नहीं जाने। यही इनका परस्पर भेद है, किन्तु देवताकी स्तुतिमें
दोनोंका प्रयोजन समान है। इनकी सार्थकता देवताकी स्तुतिमें
ही होती है, गुणोंके अनुवाद-मात्रसे नहीं, इसी कारण स्तोत्र व
शस्त्ररूप कर्मकी मुख्यताः ही है गौणता नहीं होती ।
द्वितीय पाद ।
( खं-१ )
अथ निपाता उच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्ति ।
अप्युपमार्थे । अपि कर्मोपसंग्रहार्थे । अपि पद-
पूरणाः । तेषामेते चत्वार उपमार्थे भवन्ति ।
'इव'-इति भाषायांच । अन्वध्यायंच । “अग्नि-