निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ अ० १ पा० ३ ख० २ ।
अर्थ—“नूनं सा०” [ ऋ० सं० २, ६, ६, ६ ] ‘नूनम्’ पदपूरण
या अनर्थक है। हे इन्द्र ! वह दक्षिणा, जो तेरे पुत्रके उत्पन्न करने
वाले कर्ममें हिरण्य आदि धन युक्त है, स्तुति करनेवाले [ यजमान ]
के लिये वर दे, स्तोताओ [ ऋत्विजों ] के लिये कामनाओंको दे,
हमें छोड़कर औरोंको न दे, हमारे पास धन हो, हम यज्ञ और
घरमें बडे वचन बोलें, हम अपुत्रताकी अवस्था में पुत्रवाले हों और
पुत्रवत्ताकी अवस्था मे वीर पुत्रवाले हों । [ खण्डार्थ ] वह तेरे
यजमानके लिये वर दुहे । [ प्रतिपदार्थ ] ‘वर’ नाम चाहने योग्य
वस्तुका है । ‘जरितृ’ नाम स्तुति करनेवालेका है । दक्षिणा जो
धन संयुक्त हो । मघोनी नाम मघवती और मघवती नाम धनवती
का है । ‘मघ’ नाम धनका है। दानार्थक ‘मंह’ धातुसे होता है ।
‘दक्षिणा’ समृद्धि अर्थवाले ‘दक्ष’ धातु से होता है । वह द्रव्य हीनको
आढ्य या समृद्ध बना देती है । अथवा दाहिनी ओरसे आनेके कारण
दक्षिणा है । दिशाके अभिप्रायसे दिशा दक्षिणा है । वह हस्तसे
उत्पन्न हुई है। [ पूर्वको मुख किये हुये प्रजापतिका जो दाहिना हाथ
हुआ वही दक्षिण दिशा होगई ] ‘दक्षिण’ जो हस्तका नामहै उत्सा-
हार्थक ‘दक्ष’ धातुसे या दान अर्थ मे ‘दाश’ धातुसे बनता है । ‘हस्त’
‘हन्’ धातुसे बनता है । वह हनन या मारने में शीघ्र है । [खण्डार्थ]
“देहि स्तोतृभ्यः कामान्” स्तुति करनेवालोंको उनके कामोंको दे ।
“मा अस्मान् अतिदंहीः” हमें छोड़कर मत दे । हमको धन मिले ।
हम अपने घर और यज्ञमें बडे वचन कहें । ‘भग’ ‘भज’ धातुसे
होता है । ‘बृहत्’ यह बड़े का नामहै । वह सब ओर बढ़ा हुआ होता
है । वीरवाले अथवा अच्छे वीरवाले । ‘वीर’ जो शत्रुओंको बहुत
प्रकारसे मारता है । अथवा गति अर्थवाले ‘वी’ धातुसे बनता है ।
[ क्योंकि-वह शत्रुओंके साम्हने जाता है ] अथवा ‘वीर’ धातुसे
बनता है । ‘सोम्’ यह परिग्रह अर्थमें है, अथवा पदपूरण है । [जैसे]