निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० अ० १ पा० २ ख० ४ ।
मरुद्भ्यः संप्रदित्सांचक्रे-कार स इन्द्र एत्य
परिदेवयाञ्चक्रे ॥ ४ ॥
अर्थ—'अह' और 'ह' विनिग्रह अर्थ में हैं [स्वभाव] [प्रस्तुत दो
वाक्योंमें] पूर्व [वाक्यगत अर्थ] के साथ संयुक्त होकर बोले जाते हैं।
[जैसे] 'अयमह इदं करोतु' = यह १ यह २ करे । 'अयमिदम्' =
यह ३ यह ४ करे। 'इदं ह करिष्यति,' 'इदं न करिष्यति' । [यज्ञ-
दत्त ] यह करेगा, यह न करेगा [ओदन न पकावेगा] । और
उकार भी इसी [विनिग्रह] अर्थ में हैं। [स्वभाव] दूसरे वाक्य-
गत अर्थके साथ संयुक्त होकर बोला जाता है। [जैसे-] 'मृषा
इमे वदन्ति' = ये झूठ बोलते है। 'सत्यमु ते वदन्ति' = वे सच
बोलते हैं। और पद-पूरण अर्थमें भी है। 'इदमु' [ऋ० सं०
३, ८, २, १] = यह। 'तदु' [ऋ० सं० १, ५, २, १] =
वह। 'हि' यह अनेकार्थ है। [जैसे] 'इदं हि करिष्यति' =
'यह करेगा ? । यह हेतुके अस्वीकारमें। 'कथ हि करिष्यति' =
कैसे करेगा ? । यह दुबारा प्रश्नमे । 'कथं हि व्याक-
रिष्यति' = कैसे व्याख्या करेगा ? । यह निन्दामें। 'किल'
यह विज्ञानके आधिक्यमें । [जैसे—कोई दूसरेसे सुनकर उसे
बहुत निश्चय कर दूसरेसे कहता है-] "एवं किल" = ऐसे ही
[यह युद्ध हुआ]। और 'न' 'ननु' इन दोनोंके साथ संयुक्त
होकर भी बोला जाता है। दुबारा प्रश्नमें। [किसी बातको
दूसरेसे सुनकर, कि—'यह ऐसा नहीं', फिर दूसरेसे पूछता है,
और उसपर भी श्रद्धा न करके फिर प्रथम पुरुषसे ही पूछता है।-]
'न किल एवम्' = ऐसा नहीं है ? 'ननु किल एवम्' = ऐसा नहीं
है। 'मा' यह प्रतिषेध अर्थमें है। [जैसे-] 'मा कार्षीः' = मत
० १—यज्ञदत्त। २—गौओको पिलावे। ३—देवदत्त। ४—भोजन करे।