नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ एवं संगीत-शास्त्र मंगलाचरण
श्री काशी संस्कृत ग्रन्थमाला २१५
श्रीभरतमुनिप्रणीतं सचित्रम्
नाट्यशास्त्रम्
'प्रदीप' हिन्दीव्याख्या-टिप्पणी-परिशिष्ट-प्रस्ता-
वनादिभिर्विभूषितम्
श्री बाबूलाल शुक्ल शास्त्री
(सप्तमाध्यायान्तः प्रथमो भागः)
२रा
चौखम्बा संस्कृत संस्थान
भारतीय सांस्कृतिक साहित्य के प्रकाशक तथा विक्रेता
पो० आ० चौखम्बा, पो० बा० नं० १३९
जड़ाव भवन के. ३७/११६, गोपाल मन्दिर लेन
वाराणसी (भारत)
श्रीभरतमुनिप्रणीतं सचित्रम्
नाट्यशास्त्रम्
( अष्टमाध्यायादारभ्य एकोनविंशत्यध्यायान्तो द्वितीयो भागः )
इस पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ उपलब्ध नहीं है (यह एक रिक्त पृष्ठ/फ्लाईलीफ है)।
॥ श्रीः ॥
काशी संस्कृत ग्रन्थमाला
२१५
श्रीभरतमुनिप्रणीतं सचित्रम्
नाट्यशास्त्रम्
'प्रदीप' हिन्दीव्याख्या-टिप्पणी-परिशिष्ट-
प्रस्तावनादिभिर्विभूषितम्
( अष्टमाध्यायादारभ्य एकोनविंशत्यध्यायान्तो द्वितीयो भागः )
सम्पादक एवं व्याख्याकार
श्री बाबूलाल शुक्ल शास्त्री
एम० ए०, साहित्याचार्य प्रभृति
प्राध्यापक-स्नातकोत्तर संस्कृत-अध्यापन एवं शोध
शासकीय कला एवं वाणिज्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय
इन्दौर ( म० प्र० )
चौखम्बा संस्कृत संस्थान
भारतीय सांस्कृतिक साहित्य के प्रकाशक तथा विक्रेता
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वाराणसी ( भारत )
प्रकाशक : चौखम्भा संस्कृत संस्थान, वाराणसी
मुद्रक : विद्याविलास प्रेस, वाराणसी
संस्करण : प्रथम, वि० संवत् २०३५
मूल्य : रु० ४०-००
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THE
KASHI SANSKRIT SERIES
215
NĀṬYA ŚĀSTRA
OF
BHARAT MUNI
Critically edited with Pradīpa Hindi Commentary,
Various readings, Introduction, Preface, Index
and Critical notes
By
Prof. BĀBŪ LĀLA ŚUKLA, ŚĀSTRĪ
M. A., Sāhityācārya
Professor, Postgraduate Teaching and Research in Sanskrit,
Government Arts and Commerce Postgraduate
College, Indore ( M. P. )
CHAUKHAMBHA SANSKRIT SANSTHAN
Publisher and Seller of Oriental Cultural Literature
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Jadau Bhawan K. 37/116, Gopal Mandir Lane
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First Edition 1978
Price : Rs. 40-00
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पुरोवाक्
“नाट्यशास्त्र” के प्रदीपव्याख्यादि के साथ मण्डित द्वितीय भाग को
प्रस्तुत क्रम में प्रकाशित कर सुधीजन के सम्मुख रखते हुए आज प्रसन्नता
और सन्तोष है। यह द्वितीय भाग भी प्रथम भाग के प्रकाशित होने के
पाँच वर्ष पश्चात् प्रस्तुत हो सका। इन पाँच वर्षों के अन्तराल में परि-
स्थितिवश अनेक ऐसे परिवर्तन लेखक तथा प्रकाशक के यहाँ घटित हुए
जिनने इस ग्रन्थ को यथासमय प्रस्तुत न होने दिया। इतना प्रत्यूहव्यूह
भेदन होने पर यह द्वितीय भाग अब सुधीजन की सेवा में प्रस्तुत हो रहा
है। अतः इसका भी प्रथम भाग की तरह ही स्वागत होगा, यह पूर्ण विश्वास
है। इसी के साथ यह भी आशा है कि अब तृतीय तथा चतुर्थ भाग में
प्रकाशनगत विलम्ब अधिक मात्रा में नहीं होगा तथा इसमें शेष भाग
यथासमय प्रकाशित हो जाएँगे (क्योंकि इनका मुद्रण भी प्रगति पर है तथा
शीघ्र ही पूर्ण हो जायगा)।
नाट्यशास्त्र के इस भाग में भी प्रथमखण्ड की तरह प्रस्तावना में
इसी भाग से सम्बद्ध विषयों की विवेचना रखी गयी है जिससे नाट्य जैसे
विस्तीर्ण एवं व्यापक शास्त्र के अध्ययन में सहायता मिलेगी। परिशिष्ट
१ में विस्तीर्ण व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ पूर्व खण्ड की तरह रखी गयी हैं
तथा छन्दों के एक प्रक्षिप्त भाग को भी सानुवाद रखा गया है। लक्षणों तथा
हस्तमुद्राओं का विवेचनात्मक विवरण परिशिष्ट तथा प्रस्तावना में है जिसे
उपयोग की दृष्टि से दोनों स्थानों पर रखा गया है। नाट्यशास्त्र के नवम
अध्याय के अन्तर्गत हस्तमुद्राओं की उत्पत्तिकथा भी यथास्थान लगायी
( ८ )
गयी है जो अपना मौलिक महत्व रखती है साथ ही अपेक्षित रेखाचित्र
भी इस भाग में लगा दिये गये हैं जिनसे इस भाग का भी प्रथमभाग की
तरह ही अधिक उपयोग होगा ।
नाट्यशास्त्र के प्रथमभाग के प्रकाशन के बाद से ही इस कार्य को कुछ
सफलताएँ भी मिली हैं तथा अनेक विश्वविद्यालयों में यह अनुमोदित एवं
पाठ्य ग्रन्थ का गौरव प्राप्त कर रहा है जो अगले सभी भागों को भी प्राप्त
होगा, यही आशा है। इस कार्य में सहृदय सुधीजन एवं संशोधक छात्रों एवं
गुणग्राही विद्वानों का जो सहयोग रहा उसके प्रति मैं अतिशय कृतज्ञता
व्यक्त करता हूँ ।
प्रकाशन कार्य के सन्दर्भ में एक निवेदन और करना है। यह ग्रन्थ
अब वाराणसी की प्रसिद्ध संस्कृत ग्रन्थों की प्रकाशन संस्था—‘चौखम्भा
संस्कृत संस्थान’ से प्रकाशित हो रहा है तथा आगे के सभी भाग इसी
क्रम में प्रकाशित हो रहे हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि इस गौरवशाली
ग्रन्थ को पूरी तत्परता एवं तन्मयता से प्रकाशित करने की इनकी निष्ठा को
सहृदय पाठक स्वागतार्ह मानेंगे तथा इन्हें प्रोत्साहन देंगे । मैं इस ग्रन्थ
के मुद्रणादि में होने वाली त्रुटियों के लिए सहृदय सुधीजन से क्षमाप्रार्थी
हूँ तथा विलम्ब के लिये भी ।
विजया दशमी } सुधीजनकृपाकाङ्क्षी
वि० सं० २०३५ } बाबूलाल शुक्ल, शास्त्री
प्रस्तावना
नाट्यशास्त्र के स्वरूप तथा ( पीठिका के साथ ) उसके विषयसंक्षेप को
प्रथम भाग में दिखलाया जा चुका है तथा यह भी कि प्रकृतग्रन्थ नाट्यविद्या
की आत्मा है, क्योंकि इस ग्रन्थ में नाट्य विषयों का जो मौलिक विवरण है
वही परवर्ती सभी क्षेत्रों में अपेक्षानुसार उपजीव्य हो गया था, यह सर्व विदित
है । भरत मुनि का यह महोद्योग नाट्यविद्या के इतिहास में ज्योतिस्तम्भ की
तरह प्रकाशित है तथा विराट् भी । नाट्यकला के सिद्धान्त तथा प्रयोग—
दोनों पक्षों—को नाट्यशास्त्र में जिस दक्षता से उपस्थापित किया गया है वह
अप्रतिम है । आज भी नाट्यशास्त्र का अध्ययन इसके स्थायी विषय विवरण
के कारण उतने ही मनोयोग से जारी है जैसा इसके व्याख्याकाल में चलता
था । प्रस्तुत द्वितीय खण्ड में नाट्यशास्त्र के आठ से उन्नीस अध्यायों का भाग
आता है जिसका प्रथम खण्ड में संक्षेप में विषय दिया गया था । अतः हम अब
क्रमशः उसी विवेचित विषयों के क्रम को इस भाग में भी आगे प्रस्तुत कर रहे
हैं। इसमें ( प्रस्तुत ) अष्टम अध्याय से लेकर उन्नीसवें अध्याय तक आङ्गिक
तथा वाचिकअभिनय का आदि विवरण दिया गया है। इस विषय का अष्टम
अध्याय से आरम्भ हुआ है जिसमें अभिनयादि के स्वरूप आदि विवरण भरत
मुनि ने विस्तार से दिये हैं ।
अभिनय : स्वरूपादि विचार :—
यह हम बतला आये हैं कि भरतमुनि ने ही सर्व प्रथम नाट्यकला के
सिद्धान्त तथा प्रयोग दोनों पक्षों को निरूपित किया था । इसका कारण यह
भी था कि वे शास्त्रप्रणेता के साथ-साथ नाट्यप्रयोक्ता भी रहे थे, जिसको
नाट्यशास्त्र में ही दिखलाया गया है । इस नाट्यप्रयोग के उपकरणों में
अभिनय एक सशक्त साधन माना जाता है तथा इसे 'अभिनय' ही सम्पन्न भी
करता है। इसी कारण नाट्यप्रयोग विषयक सिद्धान्तों के विवेचन को
'अभिनय' के बिना देखना सम्भव ही नहीं। नाट्यप्रयोग में अभिनय का
उपयोग अपेक्षित ( होता ) है । इसी कारण मुनि ने प्रयोगात्मा नाट्यविज्ञान
में 'अभिनय' का विधान अतिशय मनोयोग से दिखलाया भी है । 'अभिनय'
में पात्र अनुकार्य रामादि की अवस्थाओं का अनुकरण करने के कारण
( २ )
'अभिनेता' कहलाता है, क्योंकि नाट्य प्रयोग अभिनय के द्वारा सम्पन्न होता
है । अभिनय का ही यह प्रभाव है कि काव्य 'नाट्य' होकर रस की ओर
गतिशील बनकर अन्त में रस की सिद्धि सम्पन्न करता है । अतएव अभिनय,
नाट्य तथा रस एक विकासशील प्रक्रिया की धारावाहिकता से जुड़े हुए रहते
हैं । नाट्यार्थ को दर्शाने का रचनात्मक उद्योग भी 'अभिनय' कहा जा सकता
है, जो कि प्रेक्षकों के हृदय में रसानुभूति निष्पन्न करता है ।
मुनि ने इस अभिनय के चार प्रभेद किये—( १ ) आङ्गिक, ( २ )
वाचिक, ( ३ ) आहार्य तथा ( ४ ) सात्विक । इनमें सर्वप्रथम आङ्गिक
अभिनय पर विचार आवश्यक है । शरीर के अङ्ग, उपांग तथा प्रत्यंग की
विविध क्रियाओं ( या चेष्टाओं ) तथा मुद्राओं के द्वारा जिस सांकेतिक अर्थ
का प्रदर्शन होता है—वही आङ्गिक अभिनय कहलाता है । भरतमुनि ने
इसका सूक्ष्म तथा विस्तृत विवरण दिया है । उननेआंगिक अभिनय के
शारीर, मुखज तथा ( अथवा शाखा, अङ्ग तथा उपांग से युक्त ) चेष्टाकृत
भेद से तीन वर्ग किये । इनमें अंग की छः और उपांग की भी इतनी ही
संख्या रखी गयी है । यथा—अङ्ग—शिर, हस्त, . वक्षःस्थल, पार्श्व, कटि
तथा पाद ।
उपाङ्ग—नेत्र, भ्रू, नासा, अधर, कपोल तथा चिबुक ।
मुनि ने आरंभ में इनके आङ्गिक अभिनय के मुखज भेद में तथा शरीर
के प्रधान अङ्ग रहने से मस्तक के अभिनय का सर्व प्रथम विवरण दिया ।
इनमें प्रत्येक अंग तथा उपाङ्ग को अभिनय ( या प्रयोग ) की अपेक्षा से एक
दूसरे से संबद्ध किया गया तथा इन सभी का एक विशिष्ट विधि से परिचालन
विधान भी दिया गया है जो भावाभिव्यक्ति के लिये है । इस प्रकार उन
सभी मुद्राओं के नामकरण भी क्रियाओं के अनुरूप किये गये । आङ्गिक मुद्रा
तथा भङ्गिमाओं का विवरण अपेक्षित रूप में नाट्यशास्त्र में पूर्णव्यवस्थित
रूप में दिया गया है । जिसमें क्रम इस प्रकार है :—
नाट्यशास्त्र में शिर के तेरह भेद बतलाये गये हैं । यद्यपि शिर के द्वारा
की जानेवाली क्रियाओं को कोई अन्त नहीं है तथा इसी कारण उत्तरवर्ती
नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों में इसके अधिक प्रभेद तथा उनके वर्णनविवरण मिलते
भी हैं । जिनमें अभिनयदर्पण में आचार्य नन्दिकेश्वर ने मस्तक के स्वयं-
मुद्भावित नौ भेदों को बतलाकर भरतमुनि द्वारा निरूपित भेदों से मिलाकर
होनेवाली विशिष्ट संख्या की भी कल्पना की । भरतार्णव तथा नाट्यशास्त्र-
संग्रह जैसे ग्रन्थों में किसी अन्य शास्त्रीय स्रोत से मस्तक के छः अन्य प्रभेद
( ३ )
बतला कर भरतमुनि द्वारा निर्देशित प्रभेदों को मिलाकर उन्नीस भेद होने
की बात भी कही गयी। इस प्रकार मस्तक के विवरण में एक दूसरे के
निकटवर्ती स्वरूप मिलने पर भी विभेदगत विलक्षणता से पार्थक्य भी
विद्यमान है ही।
इन तेरह तथा अन्य मस्तक प्रकारों के स्वरूप के अतिरिक्त
अभिनयगत विनियोग भी मुनि ने दिखलाये हैं। इसी प्रकार दृष्टि का भी
(अङ्गोपाङ्ग विवरण में) अधिक महत्त्व होता है, जिसका स्वाभाविक
भङ्गिमाओं के अतिरिक्त अर्थाभिव्यक्ति भी एक पक्ष है। भरतमुनि ने इसकी
विस्तृत पर्यालोचना की, क्योंकि दृष्टि मनुष्य की आन्तरिक भाषा और
भावभङ्गिमा का द्वार होती है। अतएव मुनि ने आठ रस-दृष्टियाँ, आठ
स्थायीभाव-दृष्टियाँ तथा बीस सञ्चारीभाव दृष्टियों को बतलाया जिनसे
विभिन्न रसों की अभिनय द्वारा अभिव्यक्ति की जाती है। अभिनयदर्पण
में दृष्टियों के आठ ही प्रभेद दिये गये हैं। दृष्टिभेद से संबद्ध भौंह, तारा
तथा पुट के भी भरतमुनि ने पृथक् रूप से भेद दिखलाये हैं। इनमें तारा
के नौ प्रभेद, पुट कर्म के नौ प्रभेद तथा भौंहों के सात प्रभेद बतला कर
उनकी रस तथा भाव के अनुरूप योजना दिखलाई है। अङ्गों के ये प्रत्येक
प्रभेद अपनी विशिष्ट अर्थबोधकता तो रखते ही है साथ ही परंपरा का
भी दिग्दर्शन करवाते है, जो विवेचन की व्यापकता एवं समग्रता के कारण
(होती) है। इनकी प्रत्येक भङ्गिमा मानव जीवन की दशा को प्रस्तुत
करने की विलक्षण क्षमता रखती है तथा इसी कारण यह अभिनय-प्रकार
सदा के लिये महत्त्वपूर्ण बना हुआ है।
मानवीय अङ्गों के अन्तर्गत नासिका, कपोल, अधर तथा चिबुक का
भी अभिनय के प्रकाशन में योग रहता है। इसी कारण इन अंगों की (भी)
भङ्गिमाओं का विवरण इसमें दिया गया है। इसी प्रकार इसमें नासिका के
छः कर्म दिखलाये गये। ये हैं—नता, मन्दा, विकृष्टा, उच्छ्वासा, विकूणिता
और स्वाभाविका। इनके कर्म भी यथा योग्य नियोजित किये गये हैं।
कपोल के भी छः कर्म हैं—क्षाम, फुल्ल, पूर्ण, कम्पित, कुञ्चित तथा सम।
इसी प्रकार यहाँ अधर के भी—विकर्त्तन, कंपन, विसर्ग, विनिगूहन, सन्दष्टक
और समुद्ग कर्म दिखलाये हैं। इसके अतिरिक्त चबुक के सात तथा ग्रीवा के
नौ कर्म हैं। चिबुक के कर्म को शास्त्र में दन्तकर्म भी कहते हैं। ये हैं—
कुट्टन, खण्डन, छिन्न, चिक्रित, लेहन तथा सम। इसी प्रकार ग्रीवा के भी नौ
( ४ )
कर्म होते हैं यथा—समा, नता, उन्नता, व्यस्ता, रेचिता, कुञ्चिता, अञ्चिता,
वलिता तथा विकृता ।
मुखराग—अभिनय में मुखराग का विशिष्ट योग रहने से इसका अतिशय
महत्त्व है । कपोल तथा नयनों में जो एक विशेष राग चित्तवृत्तियों के आवेग
प्रवाह में परिलक्षित होता है उसका प्रदर्शन कार्य सूक्ष्ममतिजन से ही संवेद्य
माना जाता है। भाव तथा रस के सन्दर्भ में मुखराग का प्रस्तुतीकरण
अभिनेता के लिये महत्त्वपूर्ण तथा आवश्यक माना जाता है। इसके महत्त्व
को मुनि ने स्वयं ही—"शाखा, अंग तथा उपांग से युक्त अभिनय के मुखराग
से हीन होने पर शोभा नहीं" कहकर बतलाया है। मुखराग आङ्गिक अभिनय
की अभिव्यक्ति का प्रवेश द्वार है जिससे दर्शक को तुरन्त आन्तरिक सुख-
दुःखमयी दशा का प्रत्यक्ष हो जाता है।
मुखराग के चार प्रभेद हैं—स्वाभाविक, प्रसन्न, रक्त तथा श्याम । तटस्थ
स्थिति एवं सहज दशा में 'स्वाभाविक' की, शृङ्गार-हास्य तथा अद्भुतरस
में 'प्रसन्न' की, वीर, रौद्र तथा करुण रस एवं मत्त तथा रुग्ण दशा में 'रक्त'
की तथा भयानक और वीभत्सरस में 'श्याम' की योजना की जाती है। इस
प्रकार यह स्पष्ट है कि रसात्मकबोध में मुखराग का अतिशय योगदान
रहता है। वेमभूपाल ने मुखराग के इन प्रभेदों के अतिरिक्त विकस्वर,
अरुण, मलिन तथा पाण्डु नामक चार अतिरिक्त प्रभेद भी माने हैं। नेत्रों के
अभिनय के साथ-साथ मुखराग का संयोजन नाट्यप्रयोग की सिद्धि के मूल
में अवश्य विद्यमान रहता है। अंग तथा उपाङ्ग का यही विवरण लक्षणादि
सहित नाट्यशास्त्र के अष्टम अध्याय में दिया गया है ।
हस्ताभिनय—नवम अध्याय में हस्ताभिनय को दिखलाया है, जिसका
आङ्गिक अभिनय में अतिशय महत्त्व ( माना जाता ) है। मानव चेष्टाओं
से उसके अंग उपांगों की दशाओं को जो तत्व आलोक सम्पन्न रूपवान् तथा
अभिव्यक्ति सम्पन्न बनाता है। यह एक ऐसा माध्यम है जो आन्तर-भावों को
स्वरूप देकर रसभूमि पर ले जाता है। हस्ताभिनय द्वारा ही नाट्यार्थ को
रूप प्रदान किया जाता है तथा वे भावद्वन्द्वों को बोधगम्य बनाते हैं।
प्रत्येक हस्तमुद्रा अपने मूल में भाव एवं रस की आन्तरिक प्रेरणा रखती
है। भरतमुनि ने इसी कारण हस्ताभिनय का विशिष्टता से विवरण देते
हुए इनके स्वरूप को प्रस्तुत करते समय देश, काल, कर्म, स्थान तथा
प्रचार के अतिरिक्त करणों तथा अर्थयुक्ति को ध्यान में रखने का स्पष्ट
निर्देश ( भी ) दिया है। हस्तमुद्रा से प्रयोगगत सुकुमार तथा उद्धत स्थिति
( ५ )
का अन्तर तुरन्त प्रकट हो जाता है । इसी कारण यहाँ अर्थयुक्ति का महत्त्व
सर्वोपरि होता है तथा वाचिक अभिनय में भी हस्तस्थिति का संयोग अपेक्षित
रस में रखा ही जाता है ।
पात्रानुसारी हस्ताभिनय
हस्ताभिनय में पात्रों की श्रेणी या स्तर के अनुरूप स्थान की भी योजना
रखी जाती है । अभिनय की दशा में उत्तमपात्र ललाट आदि उन्नत ( उत्तम )
स्थानों पर अपने हस्तों को ले जाते हैं, मध्यमपात्र उन्हें वक्षःस्थल के बराबर
रखते हैं तथा अधमपात्र कटि या उससे निचले शरीर के प्रदेश पर स्पर्श
करते हुए हाथों को रखते हैं । स्थानविभाजन की इसी प्रणाली का अभिनव-
गुप्तपाद के उपाध्याय श्रीभट्टतौत ने समर्थन करते हुए बतलाया कि यही
स्थानविधान पात्रों की ( उत्तमादि ) स्थिति तथा मानसीदशा का आधार बन
इनका वर्गीकरण करता है । हम भी देखते हैं कि उत्तमपात्र के हृदय में स्थित
बात रहने पर उनका हस्त उत्तम अंगों का ( ही ) स्पर्श करता है, जब कि
हीनभावों के समय निम्न अंगों का । इस प्रकार पात्रों की उत्तम, मध्यम तथा
अधमस्थिति के आधार पर हस्तप्रचार ( या गति ) की अल्पता या आधिक्य
रखा जाता है । नाटकादि में उत्तमपात्रों के हस्तप्रचार अल्पतायुक्त,
मध्यम तथा अधमश्रेणी के नाट्यप्रयोगों में पात्रों के हस्तप्रचार मध्यम तथा
नृत्तादि प्रयोगों में हस्तप्रचार की बहुलता या आधिक्य रखा जाता है,
क्योंकि यहाँ हस्तप्रचार भावाभिव्यक्ति का साधन होता है । इसके अतिरिक्त
बाह्यशोभा तथा आकर्षण भी हस्तप्रचार से दिखलाया जाता है तथा नाटकीय
पात्रों का श्रेणी स्तर भी हस्तमुद्राओं से ही जाना जाता है ।
शास्त्रानुमोदिता
हस्तमुद्राओं के द्वारा अभिनय को व्यापक एवं लोकानुमोदित भावभूमि
के परिवेश में विवेचित कर भरतमुनि ने स्पष्टतः यही बतलाया कि नाट्यार्थ
के अनुरूप लोकव्यवहार एवं लोकस्वभाव को ध्यान में रख कर हस्तमुद्राओं
का प्रस्तुतीकरण होना चाहिए । क्योंकि इस प्रकार किये गये अभिनय से
उस 'सौष्ठव' को साधा जाता है जहाँ अंगों में सौन्दर्य तथा प्रसार हो ।
अतः अभीष्ट सौष्ठव का हस्ताभिनय से गहरा सम्बन्ध है तथा सौष्ठवविहीन
हस्ताभिनय का इसी कारण निषेध भी किया गया है । इसलिये उत्तम तथा
मध्यम श्रेणी के पात्र शास्त्रानुमोदित हस्तमुद्राओं के साथ ही अपना
अभिनय प्रस्तुत करते हैं ।
( ६ )
कालानुकूलता एवं अनुगमन
इसी प्रकार हस्ताभिनय का कालानुसारी होना भी आवश्यक है, जिससे
'सौष्ठव' बराबर बना रहे । भरतमुनि ने प्रयोग की दृष्टि से कभी या किसी
समय विहस्त - ( हस्त चेष्टाओं से रहित ) स्थिति तथा कभी हस्तमुद्राओं के
अल्पप्रयोग का भी जहाँ निर्देश किया है वहाँ शास्त्रानुमोदित हस्त वाञ्छित
नहीं होता । उदाहरण के लिये—प्रमत्त, रोगग्रस्त तथा भयार्त्त व्यक्ति की
स्थिति में विहस्त ( हस्तमुद्राओं का प्रयोग न रहना ) ही उचित होता है ।
इसके अतिरिक्त मूर्च्छा, जुगुप्सा, हिम या आतप की पीड़ा जैसी अवस्था हो
तो वहाँ हस्ताभिनय नहीं होता, प्रत्युत भाव की अभिव्यक्ति में अक्षमता
लाना होता है क्योंकि ऐसे प्रसंग में हस्ताभिनय के न रखने में ही सौष्ठव
है । इसी कारण ऐसे अवसर पर मुनि ने सात्विकअभिनय के द्वारा सौष्ठव
की व्यञ्जना का निर्देश किया भी है । इसी विषय पर आचार्य अभिनव-
गुप्तपाद ने बतलाया कि¹ अभिनय के समय आन्तरिक चित्तवृत्तियों के
प्रकाशन में सक्षम हस्तमुद्राओं का ही प्रयोग उचित रहता है । जैसे भय
की दशा में कपोत हस्तों का, तन्द्रा तथा आलस्य में कर्कट हस्त का
शोकसन्तप्त स्थिति में दोलाहस्त का प्रयोग तथा ईर्ष्या आदि भावों के
अनुभावन में सात्त्विकअभिनय ही प्रस्तुत किया जाता है । परन्तु ऐसे समय
जो बाह्यगुण या द्रव्य के प्रकाशन हो उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए ।
इसी प्रकार पात्र की व्यग्र या व्यस्त स्थिति में भी हस्ताभिनय प्रस्तुत नहीं
किया जाता है, किन्तु यहाँ मुखराग या अर्थ प्रकाशक तथा विराम आदि से
युक्त वाचिकाभिनय की योजना रखी जाती है ।
मुखराग से अङ्गाभिनय की अनुगतता
यह कहा जा चुका है कि हस्ताभिनय द्वारा भावों का प्रकाशन किया
जाता है, परन्तु इसी के साथ-साथ मुख, नेत्र, भ्रू, कपोल आदि के यथोचित
सन्निवेश के साथ मुखराग की योजना भी होना आवश्यक है, अन्यथा
केवल हस्त प्रचार मात्र से नाट्यार्थ की अभिव्यक्ति नहीं होगी । इसी कारण
मुनि ने मुखराग को अभिनय का प्राणतत्त्व प्रतिपादित किया, क्योंकि इसके
बिना आन्तर चित्तवृत्तियों तथा रागात्मक अनुभूतियों का प्रकाशन सम्भव
नहीं है । अतः स्पष्ट है कि नेत्र, भ्रू एवं अङ्गों की तथा मुखराग की
पारस्परिक अनुगत वृत्ति के द्वारा ही हस्तप्रचारों की अभिव्यञ्जना सौष्ठव-
शालिनी हो सकती है । इसलिए जिन जिन हस्तमुद्राओं के द्वारा आन्तर-
१. द्रष्ट० अभि० भा० पृ० ६८, ६६. बड़ौदा संस्करण ।
वृत्तियों की अभिव्यक्ति हो उनका अवश्य प्रयोग किया जाए। इन
हस्तमुद्राओं का नृत्य या नृत्त में प्रचुर प्रयोग रखा जाता है, परन्तु सात्त्विक
भावादि के अभिनय में अल्प प्रयोग होता है ।
हस्ताभिनय के विभेद
हस्ताभिनय के प्रभेदों की परिकल्पना विविध मुद्राओं के आधार पर
मुनि ने की तथा इनके तीन वर्ग बनाए। ये वर्ग हैं—(१) असंयुतहस्त,
(२) संयुतहस्त तथा (३) नृत्तहस्त । इनमें संयुतहस्त तेरह, असंयुतहस्त
चौबीस तथा नृत्तहस्त के तीस प्रभेद किये । मुद्राओं को भी मूल या
आधारमुद्रा तथा नृत्तहस्त में विभाजित किया जा सकता है। इनमें
मूलमुद्रा के अन्तर्गत संयुक्त तथा असंयुत हस्तों को रखा जाता है। मूलमुद्रायें
नृत्य की भाषा के मूलाक्षर समझी जाती है। अतः जैसे किसी एक वर्ण या
अक्षर का अलग या स्वतन्त्ररूप में भी अर्थ रहता है तथा मिल कर वही वर्ण
दूसरे अनेक शब्दों का निर्माण करते हुए अन्य अर्थाभिव्यक्तियाँ करता है, यही
स्थिति इन मुद्राओं की भी है। ये अलग-अलग भी अपना अर्थ रखती हैं तथा
सम्मिलित होकर भी। इसके अतिरिक्त कालान्तर में विभिन्न नृत्य परम्पराओं
तथा पद्धतियों के उद्भव के साथ-साथ अपनी परम्परागत हस्तमुद्राओं का
भी प्रचार देखने में आता है, किन्तु इन सभी का मूल एवं आधार ग्रन्थ
यही नाट्यशास्त्र है तथा इसी का विवरण इन सभी की अपेक्षा मुख्यता लिये
हुए है भी ।
असंयुतमुद्राएँ—एक हाथ से दर्शायी या की जाने वाली हस्तमुद्रा
या हस्त को 'असंयुतहस्त' कहा जाता है, जिनकी भरतमुनि ने चौबीस
स्थितियाँ या भेद दिखलाते हैं। इनके नाम हैं—(१) पताक, (२) त्रिपताक,
(३) कर्तरीमुख, (४) अर्धचन्द्र, (५) अराल, (६) शुकतुण्ड, (७) मुष्टि,
(८) शिखर, (६) कपित्थ, (१०) कटकामुख, (११) सूचीमुख, (१२) पद्म-
कोश, (१३) सर्पशीर्ष, (१४) मृगशीर्ष, (१५) कंगुल, (१६) अलपद्म,
(१७) चतुर, (१८) भ्रमर, (१६) हंसास्य, (२०) हंसपक्ष, (२१) सन्दंश,
(२२) मुकुल, (२३) ऊर्णनाभ तथा (२४) ताम्रचूड़ ।
अभिनयदर्पण के अनुसार असंयुतमुद्राओं की संख्या अट्ठाईस है तथा
चार पूरक मुद्राओं के साथ इनकी संख्या बत्तीस हो जाती है। इन अतिरिक्त
मुद्राओं के नाम हैं—अर्धपताक, मयूर, चन्द्रकला, सिंहमुख, त्रिशूल, व्याघ्र,
अर्धसूची, कटक तथा पल्ली । इनमें ( भरतोक्त ) ऊर्णनाभ को छोड़ कर
शेष सभी हस्तमुद्राओं के नाम नाट्यशास्त्र के अनुसार ही है । इनमें सोलह
मुद्राओं का स्वरूप भी नाट्यशास्त्र के अनुसार ही है । किन्तु नाट्यशास्त्र गत
नाम रहने पर भी स्वरूप भिन्न है । इनके नाम हैं :— कर्तरीमुख, कटकामुख,
सूचीमुख, मृगशीर्ष, हंसास्य, संदंश तथा ताम्रचूड । ये हस्तमुद्राएँ
हस्ताङ्गुलियों की विविध रचनाओं के द्वारा निर्मित की जाती हैं। इनके
स्वरूप तथा योजना का विवरण नाट्यशास्त्र में विस्तार से मिलता है ।
असंयुतहस्त की सारी क्रियायें एक हाथ से सम्पन्न होती हैं तथा ये ही
संयुतहस्त तथा नृत्तहस्तों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हैं ।
संयुतहस्तमुद्राएँ—दोनों हाथों के परस्पर संश्लेष या योग से निर्मित
हस्तमुद्रा को 'संयुतहस्त' कहते हैं । जैसे असंयुतहस्तमुद्रा को वर्णमाला
का एक अक्षर माना जाता है तो संयुतहस्त को संयुक्ताक्षर समझा जाता है ।
नाट्यशास्त्र में संयुतहस्त के तेरह भेद कहे गये हैं। ये हैं :—( १ ) अञ्जलि,
( २ ) कपोत, ( ३ ) कर्कट, ( ४ ) स्वस्तिक, ( ५ ) कटकावर्धमान,
( ६ ) उत्सङ्ग, ( ७ ) निषध, ( ८ ) दोला, ( ६ ) पुष्पपुट, ( १० ) मकर,
( ११ ) गजदन्त, ( १२ ) अवहित्थ तथा ( १४ ) वर्धमान ।
अभिनयदर्पण में संयुतहस्तों की संख्या तेईस मिलती है, जिनमें नाट्य-
शास्त्र के अञ्जलि, कपोत, कर्कट, स्वस्तिक, कटकावर्धमान, उत्सङ्ग दोला
तथा पुष्पपुट के अतिरिक्त शिवलिङ्ग, कर्तरीस्वस्तिक, शकट, शङ्ख, चक्र,
सम्पुट, पाश, कीलक, मत्स्य, कूर्म, वराह, गरुड़, नागबन्ध, खट्वा तथा
भेरुण्ड हैं । नाट्यशास्त्र का मकरहस्त अभिनयदर्पण में मत्स्य है। इस प्रसंग में
आचार्य अभिनवगुप्त¹ ने भी बतलाया कि भरतमुनि के द्वारा निर्दिष्ट हस्तमुद्राओं
के अतिरिक्त भी हस्तमुद्राओं की परिकल्पना की जा सकती है तथा इसी
कारण कोहल आदि अन्य नाट्याचार्यों ( नन्दिकेश्वर ) ने भी हस्तमुद्राओं के
इनके अतिरिक्त अन्यप्रभेद भी दिखलाये हैं । इन मुद्राओं के द्वारा जिन-जिन
अर्थों को संकेतित किया गया उनके अतिरिक्त भावों के अभिनय भी प्रस्तुत
किये जा सकते हैं, यदि वे लोकप्रचलित स्थिति या भावगम्यता को लिये हों
तो । उदाहरणार्थ एक ही केशाकर्षण के व्यापार का अभिनय पात्रों के द्वारा
विभिन्न हस्तमुद्राओं के द्वारा हो सकता है । जैसे विदूषक द्वारा केशाकर्षण
'कटकामुख' हस्तों से तथा ( नायक द्वारा ) प्रिया का केशाकर्षण अरालहस्त'
से तथा रतिक्रीड़ा का केशाकर्षण 'मुष्टि' हस्त के द्वारा किया जाता है । इसी
१. द्रष्ट ना० शा० अभिनवभारती खण्ड-२ GOS पृष्ठ ५७ ।
( ६ )
प्रकार एक ही केशाकर्षण क्रिया की स्थिति को मनोभावों तथा पात्रों की
भिन्नता रहने पर भिन्न-भिन्न स्वरूप की रचना करते हुए रखना तथा
सम्पन्न करना उचित माना गया । कथकलि के परम्परागत आधार ग्रन्थ
'हस्तलक्षण-दीपिका' में इन हस्तों के स्वरूप तथा योजना का विवरण
है परन्तु इस ग्रन्थ में असंयुक्त हस्तों का विवरण मात्र है, संयुक्तहस्तों का
नहीं । इसका कारण यही प्रतीत होता है कि हस्तमुद्राओं में असंयुक्तहस्तों
का ही अधिक महत्त्व है, क्योंकि इन्हीं को मिला कर संयुक्तहस्तों का निर्माण
किया जा सकता है । इससे यह भी संकेतित हो सकता है कि असंयुक्तहस्तों
में संयुक्तहस्तों की मुद्राएँ समाविष्ट हो सकती हैं तथा जो अर्थ दोनों हाथों
को मिला कर दर्शाया जाता है उसे अलग रहने वाले असंयुक्तहस्त से अधिक
भिन्न नहीं किया जा सकता है । उदाहरणार्थ अञ्जलि नामक संयुक्त हस्त
के द्वारा जो नमस्कार करने का अर्थ ( भाव ) दिखलाया जाता है वही दो
पताक हस्तों को मिलाने के सीधे उल्लेख से भी संभव है । इतना होने पर
भी जब प्रयोगदशा में दोनों हाथों का मिलाना ही अभीष्ट हो तो संयुक्त
हस्तमुद्राओं का प्रतिषेध सम्भव भी नहीं है तथा न ही उचित भी । इसी
कारण संयुत हस्तमुद्राओं का स्वरूप तथा उनसे दिखलाये जाने वाले भावों
का विवरण भरतमुनि ने अपने ग्रन्थ में विशेष मनोयोग से दिया भी है क्योंकि
संयुक्तमुद्राओं का नाट्यादि में प्रयोग असंयुक्त मुद्राओं की अपेक्षा भिन्न रूप में
अपेक्षित है ।
मुद्राओं के अतिरिक्त भी हस्त के अनेक कार्य होते हैं जिनका मुनि ने निर्देश
किया । उदाहरणार्थ हाथ से विकर्षण, उत्कर्ष, व्याकर्षण, परिग्रह, निग्रह,
आह्वान, ताडन, छेदन, भेदन, संश्लेष, विश्लेष, रक्षण, मोक्षण, विक्षेप तथा
तर्जन आदि अनेक कार्य सम्पन्न किये जाते हैं जिनका विवरण नाट्यशास्त्र
में विद्यमान है भी तथा जो अपने हस्तरूपों से अभिनव भावों की सृष्टि कर
प्रयोग को उज्ज्वलता देता है । इन हस्तों का स्वरूप मानव की भावसम्पदा के
प्रकाशन में महत्त्व का होकर सदा शास्त्रीय अध्ययन का विषय बन कर अपने
विषय का महत्त्व दिखलाता रहेगा यह निर्विवाद है ।
नृत्तहस्त— भरतमुनि ने इन हस्तों के अतिरिक्त तीस नृत्तहस्तों का
भी विवरण दिया है । हस्ताभिनय के आकर्षक विविध रूपों से शोभा लाने
के लिये जिन हस्त स्थितियों की रचना विभिन्न अवस्थाओं में की जाती
( १० )
है वे 'नृत्तहस्त' हैं। यद्यपि ये हाथों की विभिन्न स्थितियाँ या रचना
मात्र होती हैं किन्तु इनके द्वारा अर्थ या भाव का प्रदर्शन नहीं होता, ये
केवल अङ्गभङ्ग या लावण्य दर्शने के लिये ( ही ) प्रयोग में रखे जाते हैं।
इनकी रचना भी वास्तव में ध्यान से देखें तो वह समुतुलन ( balance ) के
आधार पर की गई प्रतीत होती है। ये नृत्तहस्त हाथ, पैर तथा शरीर के
सामञ्जस्यपूर्ण सन्तुलन के द्वारा अलौकिक आभा के सर्जन से लावण्य को
साधते हैं। इसी कारण नाट्यचार्य इन्हें शोभाधायिता के कारण नाट्य
प्रयोग अलंकरण मानते हैं।
नृत्तहस्तों की भी रचना यद्यपि संयुत तथा असंयुत हस्तों के द्वारा ही होती
है तथा कहीं कभी मिश्र भी; फिर भी ये उन हस्तमुद्राओं से भिन्न ही माने
जाते हैं। अभिनयदर्पण में कुछेक नृत्तहस्तों की वही नामावलि है जो भरत
के नाट्यशास्त्र में है तथा इनकी रचना के विवरण भी प्रायः समान है किन्तु
इनकी योजना तथा संख्या के विवरण भिन्न है। अभिनयदर्पण में नृत्तहस्तों की
संख्या तेरह ही रखी है जब कि नाट्यशास्त्र में नृत्तहस्तों की संख्या तीस हैं।
नाट्यशास्त्र में निर्देशित नृत्तहस्तों का क्रमिक विवरण इस प्रकार है:—
(१) चतुरस्र, (२) उद्वृत्त या तालवृत्त, (३) ततमुख, (४) स्वस्तिक,
(५) विप्रकीर्ण, (६) अरालकटकामुख, (७) आविद्धवक्त्र, (८) सूचीमुख,
(६) रेचित, (१०) अर्धरेचित, (११) उत्तानवञ्चित, (१२) पल्लव,
(१३) नितम्ब, (१४) केशबन्ध, (१५) लता, (१६) करिहस्त,
(१७) पक्षवञ्चित, (१८) पक्षप्रद्योतक, (१६) गरुडपक्ष, (२०) हंसपक्ष,
(२१) ऊर्ध्वमण्डल, (२२) पार्श्वमण्डल, (२३) उरोमंडल, (२४) पार्श्वार्वितं
या पार्श्वार्धमण्डल, (२५) मुष्टिक स्वस्तिक, (२६) नलिनी पद्मकोष,
(२७) अलपल्लव, (२८) उल्बण, (२६) ललित तथा (३०) वलित ।
अभिनय-दर्पण में नृत्तहस्तों की संख्या तेरह ही है। जिनके नाम इस प्रकार
हैं :—(१) स्वस्तिक, (२) दोला, (३) अंजलि, (४) कटकावर्धमानक,
(५) शकट, (६) पाश, (७) कीलक, (८) पाश, (६) शिखर, (१०) कूर्म,
(११) हंसास्य, (१२) अलपल्लव तथा (१३) पताक । इनमें पताक,
त्रिपताक, शिखर, कपित्थ, अलपद्म तथा हंसास्य ये असंयुत हस्तमुद्रायें हैं
तथा अंजलि, स्वस्तिक, दोला, कटकांवर्धमानक आदि शेष संयुतहस्त हैं तथा
ये विशिष्ट या भिन्नरूप में केवल शोभा के लिये बिना भाव प्रदर्शन के रखने
पर 'नृत्तहस्त' हो जाते हैं।
( ११ )
नाट्यशास्त्र में नृत्तहस्तों के जो लक्षण दिये गये हैं उनसे भी नृत्य के
अर्थों की सूचना मात्र दर्शाना ही संभव है। इसी कारण पूर्ण विवरण से
इनकी रचना दिखलाने पर भी इनकी स्थिति का स्थिरीकरण संभव नहीं
है तथा इसी कारण इनका जितना वर्णन शब्दों से संभव था वह किया
गया परन्तु ये हैं हाथों की चलितस्थितियाँ। इसीलिये यह भी हमें दिखलाई
देता है कि पताक जैसे अभिनयहस्तों के योग के साथ अभिनय तथा
नृत्तहस्तों का मिश्रण होगा तथा ऐसे स्थानों पर नाट्य की प्रधान स्थिति
रहने पर ऐसे हस्त को अभिनयहस्त तथा नृत्त की प्रमुखता रहने पर 'नृत्तहस्त'
समझना पड़ेगा । जैसे उदाहरण के लिये नृत्ताभिनय की स्थिति में लताहस्त का
प्रयोग या नृत्य की स्थिति में 'करिहस्त' का प्रयोग करना । इसी प्रकार
चतुरस्र हस्तादि का प्रयोग भी। नाट्यगत विशुद्ध हस्तमुद्राओं के या
नृत्तहस्तों के सम्पादन में करणों का योग तथा उनका प्रयोग नितान्त
वाञ्छनीय है । हस्तकरण के द्वारा हाथ की मुद्राएँ अपना स्वरूप लेती हैं ।
ये करण भी चार प्रकार का होता है :—(१) आवेष्टित, (२) उद्वेष्टित,
(३) व्यावर्तित, तथा (४) परावर्तित । करणों का प्रयोग विशुद्ध नाट्य तथा
नृत्त दोनों ही दशाओं में किया जाता है। इन करणों का प्रयोग भी मुख, नेत्र,
भ्रू तथा मुखराग आदि के अनुगत या साथ रखते हुए किया जाता है जिससे
अपेक्षित भावाभिव्यक्ति हो सके । क्योंकि ये नृत्तहस्त उपाङ्ग के अभिनय के
साथ जब प्रस्तुत होंगे तथा भाव एवं रस के आश्रित होकर संचालित होंगे
तो उससे प्रयोग या नाट्यार्थ की पूर्ति या सफलता होती है ।
नृत्तहस्तों की एक ( मुख्य ) विधि यह है कि इनका संचलन शरीर की
क्रिया तथा पैर को उठाने और रखने के साथ रखा जाता है। अतः यह
संचलन की स्थिति पाँच प्रकार से होती है। ये हैं, ऊपर, नीचे, दाहिने,
बायें तथा सामने की ओर संचलन होना ।
आधुनिक प्रचलित नृत्यों में नृत्तप्रधान शैली में परिगणनीय भरतनाट्य
में नृत्यहस्तों की विविधता देखने में आती है जब कि दक्षिणभारत के
मलावार में लोकप्रिय एवं परम्परागत 'कथकलि' ( नृत्य ) में नृत्तहस्तों
का प्रयोग अल्प रखा जाता है, क्योंकि यह अभिनयप्रधान नृत्य होता है तथा
इसी कारण इसमें अर्थदर्शक हस्तमुद्राओं का ही प्रयोग इष्ट होता है। यदि
प्रयोग के उपयोग को देखते हुए विचार करें तो नृत्तहस्तों में भी पताक,
त्रिपताक, मुद्रा तथा अर्धचन्द्र जैसे नृत्तहस्तों का प्रचुर प्रयोग दृष्टिगत हो
जाता है । कथकली की परम्परा में नृत्तहस्तों को ऐसे भिन्नतायुक्त नामकरण