नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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बतला कर भरतमुनि द्वारा निर्देशित प्रभेदों को मिलाकर उन्नीस भेद होने
की बात भी कही गयी। इस प्रकार मस्तक के विवरण में एक दूसरे के
निकटवर्ती स्वरूप मिलने पर भी विभेदगत विलक्षणता से पार्थक्य भी
विद्यमान है ही।
इन तेरह तथा अन्य मस्तक प्रकारों के स्वरूप के अतिरिक्त
अभिनयगत विनियोग भी मुनि ने दिखलाये हैं। इसी प्रकार दृष्टि का भी
(अङ्गोपाङ्ग विवरण में) अधिक महत्त्व होता है, जिसका स्वाभाविक
भङ्गिमाओं के अतिरिक्त अर्थाभिव्यक्ति भी एक पक्ष है। भरतमुनि ने इसकी
विस्तृत पर्यालोचना की, क्योंकि दृष्टि मनुष्य की आन्तरिक भाषा और
भावभङ्गिमा का द्वार होती है। अतएव मुनि ने आठ रस-दृष्टियाँ, आठ
स्थायीभाव-दृष्टियाँ तथा बीस सञ्चारीभाव दृष्टियों को बतलाया जिनसे
विभिन्न रसों की अभिनय द्वारा अभिव्यक्ति की जाती है। अभिनयदर्पण
में दृष्टियों के आठ ही प्रभेद दिये गये हैं। दृष्टिभेद से संबद्ध भौंह, तारा
तथा पुट के भी भरतमुनि ने पृथक् रूप से भेद दिखलाये हैं। इनमें तारा
के नौ प्रभेद, पुट कर्म के नौ प्रभेद तथा भौंहों के सात प्रभेद बतला कर
उनकी रस तथा भाव के अनुरूप योजना दिखलाई है। अङ्गों के ये प्रत्येक
प्रभेद अपनी विशिष्ट अर्थबोधकता तो रखते ही है साथ ही परंपरा का
भी दिग्दर्शन करवाते है, जो विवेचन की व्यापकता एवं समग्रता के कारण
(होती) है। इनकी प्रत्येक भङ्गिमा मानव जीवन की दशा को प्रस्तुत
करने की विलक्षण क्षमता रखती है तथा इसी कारण यह अभिनय-प्रकार
सदा के लिये महत्त्वपूर्ण बना हुआ है।
मानवीय अङ्गों के अन्तर्गत नासिका, कपोल, अधर तथा चिबुक का
भी अभिनय के प्रकाशन में योग रहता है। इसी कारण इन अंगों की (भी)
भङ्गिमाओं का विवरण इसमें दिया गया है। इसी प्रकार इसमें नासिका के
छः कर्म दिखलाये गये। ये हैं—नता, मन्दा, विकृष्टा, उच्छ्वासा, विकूणिता
और स्वाभाविका। इनके कर्म भी यथा योग्य नियोजित किये गये हैं।
कपोल के भी छः कर्म हैं—क्षाम, फुल्ल, पूर्ण, कम्पित, कुञ्चित तथा सम।
इसी प्रकार यहाँ अधर के भी—विकर्त्तन, कंपन, विसर्ग, विनिगूहन, सन्दष्टक
और समुद्ग कर्म दिखलाये हैं। इसके अतिरिक्त चबुक के सात तथा ग्रीवा के
नौ कर्म हैं। चिबुक के कर्म को शास्त्र में दन्तकर्म भी कहते हैं। ये हैं—
कुट्टन, खण्डन, छिन्न, चिक्रित, लेहन तथा सम। इसी प्रकार ग्रीवा के भी नौ