सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 10

प्रस्तावना

नाट्यशास्त्र के स्वरूप तथा ( पीठिका के साथ ) उसके विषयसंक्षेप को
प्रथम भाग में दिखलाया जा चुका है तथा यह भी कि प्रकृतग्रन्थ नाट्यविद्या
की आत्मा है, क्योंकि इस ग्रन्थ में नाट्य विषयों का जो मौलिक विवरण है
वही परवर्ती सभी क्षेत्रों में अपेक्षानुसार उपजीव्य हो गया था, यह सर्व विदित
है । भरत मुनि का यह महोद्योग नाट्यविद्या के इतिहास में ज्योतिस्तम्भ की
तरह प्रकाशित है तथा विराट् भी । नाट्यकला के सिद्धान्त तथा प्रयोग—
दोनों पक्षों—को नाट्यशास्त्र में जिस दक्षता से उपस्थापित किया गया है वह
अप्रतिम है । आज भी नाट्यशास्त्र का अध्ययन इसके स्थायी विषय विवरण
के कारण उतने ही मनोयोग से जारी है जैसा इसके व्याख्याकाल में चलता
था । प्रस्तुत द्वितीय खण्ड में नाट्यशास्त्र के आठ से उन्नीस अध्यायों का भाग
आता है जिसका प्रथम खण्ड में संक्षेप में विषय दिया गया था । अतः हम अब
क्रमशः उसी विवेचित विषयों के क्रम को इस भाग में भी आगे प्रस्तुत कर रहे
हैं। इसमें ( प्रस्तुत ) अष्टम अध्याय से लेकर उन्नीसवें अध्याय तक आङ्गिक
तथा वाचिकअभिनय का आदि विवरण दिया गया है। इस विषय का अष्टम
अध्याय से आरम्भ हुआ है जिसमें अभिनयादि के स्वरूप आदि विवरण भरत
मुनि ने विस्तार से दिये हैं ।
अभिनय : स्वरूपादि विचार :—
यह हम बतला आये हैं कि भरतमुनि ने ही सर्व प्रथम नाट्यकला के
सिद्धान्त तथा प्रयोग दोनों पक्षों को निरूपित किया था । इसका कारण यह
भी था कि वे शास्त्रप्रणेता के साथ-साथ नाट्यप्रयोक्ता भी रहे थे, जिसको
नाट्यशास्त्र में ही दिखलाया गया है । इस नाट्यप्रयोग के उपकरणों में
अभिनय एक सशक्त साधन माना जाता है तथा इसे 'अभिनय' ही सम्पन्न भी
करता है। इसी कारण नाट्यप्रयोग विषयक सिद्धान्तों के विवेचन को
'अभिनय' के बिना देखना सम्भव ही नहीं। नाट्यप्रयोग में अभिनय का
उपयोग अपेक्षित ( होता ) है । इसी कारण मुनि ने प्रयोगात्मा नाट्यविज्ञान
में 'अभिनय' का विधान अतिशय मनोयोग से दिखलाया भी है । 'अभिनय'
में पात्र अनुकार्य रामादि की अवस्थाओं का अनुकरण करने के कारण