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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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( २ )
'अभिनेता' कहलाता है, क्योंकि नाट्य प्रयोग अभिनय के द्वारा सम्पन्न होता
है । अभिनय का ही यह प्रभाव है कि काव्य 'नाट्य' होकर रस की ओर
गतिशील बनकर अन्त में रस की सिद्धि सम्पन्न करता है । अतएव अभिनय,
नाट्य तथा रस एक विकासशील प्रक्रिया की धारावाहिकता से जुड़े हुए रहते
हैं । नाट्यार्थ को दर्शाने का रचनात्मक उद्योग भी 'अभिनय' कहा जा सकता
है, जो कि प्रेक्षकों के हृदय में रसानुभूति निष्पन्न करता है ।
मुनि ने इस अभिनय के चार प्रभेद किये—( १ ) आङ्गिक, ( २ )
वाचिक, ( ३ ) आहार्य तथा ( ४ ) सात्विक । इनमें सर्वप्रथम आङ्गिक
अभिनय पर विचार आवश्यक है । शरीर के अङ्ग, उपांग तथा प्रत्यंग की
विविध क्रियाओं ( या चेष्टाओं ) तथा मुद्राओं के द्वारा जिस सांकेतिक अर्थ
का प्रदर्शन होता है—वही आङ्गिक अभिनय कहलाता है । भरतमुनि ने
इसका सूक्ष्म तथा विस्तृत विवरण दिया है । उननेआंगिक अभिनय के
शारीर, मुखज तथा ( अथवा शाखा, अङ्ग तथा उपांग से युक्त ) चेष्टाकृत
भेद से तीन वर्ग किये । इनमें अंग की छः और उपांग की भी इतनी ही
संख्या रखी गयी है । यथा—अङ्ग—शिर, हस्त, . वक्षःस्थल, पार्श्व, कटि
तथा पाद ।
उपाङ्ग—नेत्र, भ्रू, नासा, अधर, कपोल तथा चिबुक ।
मुनि ने आरंभ में इनके आङ्गिक अभिनय के मुखज भेद में तथा शरीर
के प्रधान अङ्ग रहने से मस्तक के अभिनय का सर्व प्रथम विवरण दिया ।
इनमें प्रत्येक अंग तथा उपाङ्ग को अभिनय ( या प्रयोग ) की अपेक्षा से एक
दूसरे से संबद्ध किया गया तथा इन सभी का एक विशिष्ट विधि से परिचालन
विधान भी दिया गया है जो भावाभिव्यक्ति के लिये है । इस प्रकार उन
सभी मुद्राओं के नामकरण भी क्रियाओं के अनुरूप किये गये । आङ्गिक मुद्रा
तथा भङ्गिमाओं का विवरण अपेक्षित रूप में नाट्यशास्त्र में पूर्णव्यवस्थित
रूप में दिया गया है । जिसमें क्रम इस प्रकार है :—
नाट्यशास्त्र में शिर के तेरह भेद बतलाये गये हैं । यद्यपि शिर के द्वारा
की जानेवाली क्रियाओं को कोई अन्त नहीं है तथा इसी कारण उत्तरवर्ती
नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों में इसके अधिक प्रभेद तथा उनके वर्णनविवरण मिलते
भी हैं । जिनमें अभिनयदर्पण में आचार्य नन्दिकेश्वर ने मस्तक के स्वयं-
मुद्भावित नौ भेदों को बतलाकर भरतमुनि द्वारा निरूपित भेदों से मिलाकर
होनेवाली विशिष्ट संख्या की भी कल्पना की । भरतार्णव तथा नाट्यशास्त्र-
संग्रह जैसे ग्रन्थों में किसी अन्य शास्त्रीय स्रोत से मस्तक के छः अन्य प्रभेद