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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

४. चतुर्थ अङ्क: वधशिला पर जीमूतवाहन का आत्म-बलिदान

[Page 163]

( १६३ )

क्या उस की दो हज़ार जिह्वाओं मे से एक भी जिह्वा ऐसी
न थी जिस से वह कह सकता कि 'एक सांप की रक्षा के लिए
मैं अपने आप को गरुड़ के हवाले करता हूँ'?
मित्रावसु— गरुड़ ने इसे स्वीकार कर लिया।—
इस प्रकार वासुकि से व्यवस्था करके यह पक्षिराज गरुड़ जिन
बड़े बड़े सांपों को खाता रहा है उन के— बर्फ़ के पहाड़ की
शोभा को धारण करने वाले — ये हड्डियों के ढेर दिन प्रति दिन
वृद्धि को प्राप्त हुए हैं, हो रहे हैं और होते रहेंगे।
नायक —कितने आश्चर्य की बात है !!!
सब अपवित्रताओं के घर, कृतघ्न और नाशवान् इस निकम्मे
शरीर के लिए भी मूर्ख लोग पाप कमाते हैं ! आह ! दुःख की


  1. द्वितय = जोड़ा। जिह्वाओं के हज़ार जोड़े। सांप की जिह्वा
    बीच में से कटी होने के कारण दो जिह्वाएँ गिनी जाती हैं।
  2. व्यवस्था = इन्तज़ाम, प्रबन्ध, फ़ैसला; समझौता।
  3. शरीर को कृतघ्न इस लिए कहा है कि चाहे कितना ही सेवा
    करके बना कर उसे रखा जाए, फिर भी एक न एक दिन
    वह हमें धोखा देकर छोड़ जाता है।
  4. "क" अकिञ्चन, नाचीज़, निकम्मा के अर्थ में लगा है।
    'क' घृणा अथवा निन्दा के योग में।

( १६४ )
अहो ! कष्टमनवसानेयं$^1$ विपत्तिर्नागानाम् । (आत्मगतम्)
अपि शक्नुयामहं स्वशरीरसमर्पणेन एकस्यापि नागस्य
प्राणपरिरक्षां कर्तुम् ।
[ततः प्रविशति प्रतिहारः]
प्रतीहारः- आरूढोऽस्मि गिरिशिखरं, यावन्मित्रावसुमन्वि-
ष्यामि । (परिक्रम्य) अयं मित्रावसुर्जामातुः समीपे
तिष्ठति । (उपसृत्य) विजयेतां कुमारौ ।
मित्रावसुः- सुनन्द ! किं निमित्तमिहागमनम् ?
प्रतीहारः- (कर्णे कथयति)
मित्रावसुः- कुमार ! तातो मामाह्वयति ।
नायकः गम्यताम् ।
मित्रावसुः- कुमारेणापि बहुप्रत्यवायेऽस्मिन्$^2$ प्रदेशे न चिरं
स्थातव्यम् ! [इति निष्क्रान्तः]
नायकः- यावदहमप्यस्माद्गिरिशिखरादवतीर्य समुद्रतटम-
वलोकयामि । [परिक्रामति]
[नेपथ्ये]- हा पुत्तअ संखचूड ! कहं वावादिअमाणो अज्ज
हा पुत्रक$^3$ शङ्खचूड़ ! कथं व्यापायमानोऽद्य
किल तुमं मए पेक्खिदव्वो ?
किल त्वं मया प्रेक्षितव्यः ?
नायकः-(आकर्ण्य) अये योषित इवार्त्तप्रलापः । 'केयं !
कुतो वास्या भयमिति स्फुटीकरिष्ये । (परिक्रामति)

( १६५ )
बात तो यह है कि नागों की यह विपत्ति (कभी) समाप्त
होने वाली नहीं। (मन ही मन) कदाचित् मैं अपना शरीर
देकर एक भी सांप की प्राण रक्षा कर सकूँ !
[द्वारपाल का प्रवेश]
प्रतीहार— पर्वत की चोटी पर तो चढ़ आया हूँ। तब मित्रावसु को
ढूँढता हूँ। (घूमकर) यह मित्रावसु दामाद (जीमूतवाहन)
के समीप ठहरे हैं। (पास जाकर) राजकुमार की जय हो।
मित्रावसु— सुनन्द ! यहां किस कारण आना हुआ ?
प्रतीहार— (कान में कहता है)।
मित्रावसु— कुमार ! पिता जी मुझे बुला रहे हैं।
नायक— तो जाइए।
मित्रावसु— आप को भी बहुत से कष्टों से भरे हुए इस स्थान में देर
तक नहीं ठहरना चाहिए।
[प्रस्थान]
नायक— तो मैं भी इस पर्वत शिखर से उतर कर समुद्रतट को देखता
हूँ। [घूमता है]
[नेपथ्य में (पर्दे के पीछे से)] हाय बच्चे शङ्खचूड़ ! क्या आज मैं तुम्हें
मारे जाते हुए देखूँगी ?
नायक— (सुन कर) अरे, यह तो किसी स्त्री का करुण विलाप सा है।
यह कौन है ? या इसे कहां से डर है, यह स्पष्ट मालूम
करता हूँ। (घूमता है)

१. अनवसाना = जिस का अवसान (अन्त) ही न हो।
२. प्रत्यवाय = रुकावट; विघ्न; आपत्ति; कष्ट।
३. यह 'क' प्यार के अर्थ में प्रयुक्त है।

( १६६ )
[ततः प्रविशति रुदत्या वृद्धयानुगम्यमानः शङ्खचूड़ो
गोपायितवस्त्रयुगलश्च किङ्करः] .
वृद्धा-(सास्रम् ) हा पुत्तअ संखचूड़ ! कहं वावादिअमाणो अज्ज
हा पुत्रक शङ्खचूड़ ! कथं व्यापायमानोऽद्य
किल तुमं मए पेक्खिदव्वो ? (चिबुकं गृहीत्वा)
किल त्वं मया प्रेक्षितव्यः ?
इमिणा मुहचंद्रेण विरहिअं दाणीं अंधआरीभविस्सदि
अनेन मुखचन्द्रेण विरहितमिदानीमन्धकारीभविष्यति
पाआलं ।
पातालम् ।
शङ्खचूड़ः- अम्ब ! किमिति वैक्लव्येन सुतरां नः पीडयसि ?
वृद्धा-(निर्वर्ण्य पुत्रस्याङ्गानि स्पृशन्ती) हा पुत्तअ ! कहं दे अदिट्ठ-
हा पुत्रक ! कथं तेऽदृष्ट-
सूरकिरणं सुउमारं सरीरं णिग्घिणहिअओ गरुडो
सूर्यकिरणं सुकुमारं शरीरं ¹निर्घृणहृदयो गरुड
आहालिस्सदि ?
आहारयिष्यति ? [कण्ठे गृहीत्वा रोदिति]
शङ्खचूड़ः- अम्ब ! अलं² परिदेवितेन । पश्य-
1

( १६७ )
[ पीछे पीछे आ रही रोती हुई बुढ़िया के साथ शङ्खचूड़ और दो
वस्त्रों को छिपाए हुए नौकर का प्रवेश ]
वृद्धा — (आँसुओं के साथ) - हाय बच्चे शङ्खचूड़ ! क्या आज मुझे
तुम्हें मारे जाते हुए को देखना होगा ? (ठुड्डी पकड़ कर) इस
मुखचन्द्र के बिना आज पाताल लोक अन्धकारमय हो जाएगा ।
शङ्खचूड़— माता जी ! इस प्रकार की व्याकुलता से आप मुझे और
अधिक पीड़ा क्यों दे रही हैं ?
वृद्धा — (अच्छी तरह देखकर, पुत्र के अङ्गों को छूती हुई) हाय पुत्र !
जिसने कभी सूर्य की किरणों को नहीं देखा ऐसे तेरे इस
कोमल शरीर को क्रूर हृदय वाला गरुड़ कैसे खाएगा ?
[ गले लगाकर रोती है ]
शङ्खचूड़ — माता जी ! बस, (इस) विलाप को रहने दीजिए । देखिए —

  1. निर्घृण = दयाहीन, निर्दयी, क्रूर ।
  2. अलं = बस, बस । इस अर्थ में अलम् के साथ तृतीया आती है ।

°( १७० ).
मालापः। कदाचिदत एवास्याभिव्यक्तिर्भविष्यति।
तद्विटपान्तरितस्तावच्छृणोमि [ तथा करोति ]
किङ्करः-(सास्रम् कृताञ्जलिः) कुमाल संखचूड ! एसो
कुमार शङ्खचूड ! 'एष
सामिणो आदेशो त्ति करित्र ईरिसं णिट्ठुरं मन्तीयदि ।
स्वामिन आदेश' इति कृत्वा ईदृशं निष्ठुरं मन्त्र्यसे ।
शङ्खचूडः- भद्र ! कथय ।
किङ्करः- नागलाओ वासुई आणवेदि—
नागराजो वासुकिराज्ञापयति—
शङ्खचूडः-(शिरस्यञ्जलिं बद्ध्वा सादरम्) किमाज्ञापयति देवः?
किङ्करः- 'एदं लत्तंसुअजुअलं परिहित्र आलुह वज्झसिलं
इदं रक्तांशुकयुगलं परिधाय आरोह वध्यशिलां,
जेण लत्तंसुअं उवलक्खित्र गलुडो आहालइस्सदित्ति।
येन रक्तांशुकमुपलक्ष्य¹ गरुड़ आहारयिष्यति इति ।
नायकः — (श्रुत्वा) कथमसौ वासुकिना परित्यक्तः ?
किङ्करः— कुमाल ! गेण्ह एदं वसणजुअलं ।
कुमार ! गृहाणैतद्वसनयुगलम् । [ इत्यर्पयति ]
शङ्खचूडः-(सादरम्) उपनय । (गृहीत्वा) शिरसि स्वाम्यादेशः।
वृद्धा- (पुत्रस्य हस्ते वाससी दृष्ट्वा सोरस्ताडम्) हा वच्छ !
हा वत्स !
एदं क्खु वज्जपाडसणिहं संभावीयदि ।
इदं खलु वज्रपातसन्निभं सम्भाव्यते [मोहं गता]

( १७१ )
इस वृक्ष के पीछे छिप कर सुनता हूँ। [वैसा ही करता है]
सेवक— (आँसुओं के साथ, हाथ जोड़ कर) कुमार शङ्खचूड़ ! यह
स्वामी की आज्ञा है इसी लिए आप से यह कठोर वचन कह
रहा हूँ !
शङ्खचूड़— आर्य, कहिए ।
सेवक— नागों के राजा वासुकि ने आज्ञा दी है कि—
शङ्खचूड़— (सिर पर हाथ जोड़ कर, आदर पूर्वक) महाराज ने क्या
आज्ञा दी है ?
सेवक— "यह दोनों लाल वस्त्र पहिन कर वध्यशिला पर चढ़ जाओ
जिससे लाल वस्त्र को पहिचान कर गरुड़ तुम्हें खा लेगा।"
नायक — (सुनकर) क्या वासुकि ने इसे त्याग दिया ?
सेवक— कुमार ! लो यह दोनों वस्त्र । [यह कह कर देता है]
शङ्खचूड़— (आदर पूर्वक) लाओ । (लेकर) स्वामी की आज्ञा सिर
माथे पर (शिरोधार्य है) ।
वृद्धा — [पुत्र के हाथ में दोनों (लाल) वस्त्र देखकर, छाती पीटती हुई]—
हाय, बच्चे ! यह तो (मुझे) वज्रपात के समान मालूम पड़ता
है । [मूर्च्छित हो जाती है]

  1. देखकर, पहिचान कर ।

( १७२ )
किङ्करः— आसण्णा गळुडस्स आगमणवेला, ता लहुं
आसन्ना गरुडस्यागमनवेला, तल्लघु
गच्छामि ।
गच्छामि । [इति निष्क्रान्तः]
शङ्खचूडः— अम्ब ! समाश्वसिहि ।
वृद्धा— (समाश्वस्य, सास्रं) हा पुत्तअ ! हा मणोरहसदलद्ध !
हा पुत्रक ! हा मनोरथशतलब्ध !
कहिं पुण तुपं पेक्खिस्सं ?
क्व पुनस्त्वां प्रेक्षिष्ये ? [कण्ठे गृह्णाति]
नायकः— अहो नैर्घृण्यं¹ गरुडस्य ! अपि च—
मूढाया मुहुरश्रुसन्ततिमुचः कृत्वा प्रलापान्² बहून्
कस्त्राता³ तव पुत्रकेति, कृपणां दिक्षु क्षिपन्त्या दृशम् ।
अङ्के मातुरवस्थितं शिशुमिमं त्यक्त्वा घृणामश्नत-
श्चञ्चुनैव खगाधिपस्य, हृदयं वज्रेण मन्ये कृतम् ॥६॥
शङ्खचूडः— (मातुरश्रूणि निवारयन्) अम्ब ! किमतिवैकलव्येन ?
श्लोक नं० ६, अन्वयः—
मूढायाः, मुहुरश्रुसन्ततिमुचः, ‘कस्त्राता तव पुत्रक’ इति बहून्
प्रलापान् कृत्वा दिक्षु कृपणां दृशं क्षिपन्त्याः मातुः अङ्के अवस्थितं
इमं शिशुं घृणां त्यक्त्वा अश्नतः खगाधिपस्य नैव चञ्चुः हृदयम्
(अपि) मन्ये वज्रेण कृतम् ।

( १७३ )

सेवक — गरुड़ के आने का समय समीप ही है। अतः मैं शीघ्र ही
जाता हूँ। [प्रस्थान]
शङ्खचूड़ — माता जी, धीरज धरो ।
वृद्धा — (होश में आकर, आँसुओं के साथ) आह, पुत्र ! सैकड़ों
मनोरथों से प्राप्त (बच्चे) ! फिर मैं तुम्हें कहां देखूँगी ?
[गले लगाती है]
नायक — अहो गरुड़ की निर्दयता ! और भी—
शोक से विमोहित, बार बार आँसुओं की धारा बहाती हुई,
'हे पुत्र ! तुझे कौन बचाएगा' इस प्रकार बहुत से प्रलाप कर
के चारों ओर कातर दृष्टि दौड़ाती हुई माता की गोद में ठहरे
हुए इस बच्चे को दया छोड़ कर खाने वाले पक्षिराज गरुड़ की
केवल चोंच ही नहीं वरन् हृदय भी मेरे विचार में वज्र का
बना हुआ है ।
शङ्खचूड़ — (माता के आंसू पोंछता हुआ)— माता जी ! इतनी अधिक
व्याकुलता से क्या लाभ ?


  1. नैर्घृण्यं = दया से रहित होना; निर्दयता; क्रूरता ।
  2. प्रलाप = विलाप । चीख़ पुकार ।
  3. कृपणां दृशम् = कातर दृष्टि । करुणा उत्पन्न करने वाली ।

( १०४ )

यैरत्यन्तदयापरैर्न विहिता वन्ध्यार्थिनां प्रार्थना,
यैः कारुण्यपरिग्रहान्न गणितः स्वार्थः परार्थं प्रति ।
ये नित्यं परदुःखदुःखितधियस्ते साधवोऽस्तं गता,
मातः ! संहर बाष्पवेगमधुनो कस्याग्रतो रुद्यते ॥१०॥
ननु समाश्वसिहि समाश्वसिहि ।
वृद्धा—(सास्रम्) कहं समस्ससिस्सं ? किं एकपुत्तओ त्ति
कथं समाश्वसिष्यामि ? किमेकपुत्रक - इति
कदुअ साणुकंपेण णाअराएण पेसिदोसि ? हा कहं
कृत्वा सानुकम्पेन नागराजेन प्रेषितोऽसि ? हा ! कथम्
अविच्छिण्णे जीअलोए मम पुत्तओ सुमरिदो ?
विच्छिन्ने¹ जीवलोके मम पुत्रकः स्मृतः ?
सव्वधा अहं म्हि मंदभाग्गा ।
सर्वथाहमस्मि मन्दभाग्या । [मूर्च्छति]
नायकः-(सकरुणम्) आर्त्तं कण्ठगतप्राणं,² परित्यक्तं बन्धुभिः।
त्राये³ नैनं यदि ततः कः शरीरेण मे गुणः ? ॥ ११ ॥


श्लोक नं०: १०, अन्वयः—
यैः अत्यन्तदयापरैः अर्थिनां प्रार्थना वन्ध्या न विहिता, यैः कारुण्य-
परिग्रहात् परार्थं प्रति स्वार्थः न गणितः, ये नित्यं परदुःख-
दुःखितधियः, ते साधवः अस्तं गताः। मातः ! अधुना बाष्पवेगं संहर।
कस्य अग्रतो रुद्यते ?
श्लोक नं०: ११, अन्वयः —
यदि (अहं) बन्धुभिः परित्यक्तं कण्ठगतप्राणम्
एनम् आर्त्तं न त्राये, ततः मे शरीरेण कः गुणः ?

( १७५ )
जिन अत्यन्त दयालु पुरुषों ने याचकों की प्रार्थना को कभी
निष्फल नहीं जाने दिया, जिन्होंने करुणा को ग्रहण करने के
कारण परोपकार के आगे स्वार्थ को कुछ नहीं गिना, जो दूसरों
के दुःख से दुःखी होते थे वे सज्जन लोग अस्त हो गए (मर
गए) । (अतः) माता जी ! अब अपने आंसुओं के वेग को रोको ।
किस के आगे रो रही हो ? अतः धीरज धरो ।
वृद्धा — (आंसुओं के साथ) कैसे धीरज धरूँ ? क्या तुम इकलौते बेटे
हो इसी लिए कृपालु नागराज ने तुम्हें (बलि के लिए) भेजा है ?
हाय, समग्र जीवलोक के रहते हुए मेरा पुत्र ही क्यों याद किया
गया ? मैं सब प्रकार से अभागिन हूँ । [मूर्च्छित हो जाती है]
नायक—(दया पूर्वक) यदि मैं बन्धुओं से छोड़े गए, कंठगत प्राण वाले
इस दुःखी को नहीं बचाता तो मेरे शरीर का क्या लाभ ?

  1. अविच्छिन्न = अखण्डित । जिस का कुछ नहीं बिगड़ा । जो
    लगातार कायम है । अतः सम्पूर्ण, समग्र ।
  2. जिस के प्राण गले तक आ गए हैं । मृतप्राय । जो अभी मरने
    वाला है ।
  3. त्राये = त्रै (भ्वादिगण आत्मने पद) + लट् + उत्तमपुरुष + एक
    वचन । (बचाना) -बचाता हूँ ।

शङ्खचूड़ः—अम्ब ! ¹अलं त्रासेन । न खल्वयं नागशत्रुः । पश्य-
²
महाहिमस्तिष्कविभेदमुक्तरक्तच्छटाचर्चितचण्डचञ्चुः ।
क्वासौ गरुत्मान् ? क्व च नाम सौम्यस्वभावरूपाकृतिरेष साधुः ॥१३॥
वृद्धा - अह क्खु तुज्झ मरणभीआ सव्वं जेव्व लोअं गलुडमयं
अहं खलु तव मरणभीता सर्वमेव लोकं गरुड़मयं³
पेक्खामि ।
प्रेक्षे ।
नायकः—अम्ब ! मा भैषीः । नन्वयमहं विद्याधरस्त्वत्सुत-
संरक्षणार्थमेवायातः ।
वृद्धा—(सहर्षम्) पुत्तअ ! पुणो पुणो एव्वं भण ।
पुत्रक ! पुनः पुनरेवं भण । 4
नायकः—अम्ब ! किं पुनःपुनरभिहितेन ? ननु कर्मणैव सम्पादयामि
वृद्धा—(शिरस्यञ्जलिं बद्ध्वा) पुत्तअ ! चिरं जीव ।
पुत्रक ! चिरं जीव ।
नायकः—ममैतदर्पय वध्यचिह्नं प्रावृत्य यावद्विनतात्मजाय ।
पुत्रस्य ते जीवितरक्षणाय स्वदेहमाहारयितुं ददामि ॥१४॥
श्लोक नं०: १३, अन्वयः—
क्व महाहिमस्तिष्कविभेदमुक्तरक्तच्छटाचर्चितचण्डचञ्चुः
असौ गरुत्मान् ? क्व च नाम सौम्यस्वभावरूपाकृतिः एष साधुः ?
श्लोक नं०: १४, अन्वयः—
अम्ब ! एतद् वध्यचिह्नं मम अर्पय; यावद् (अनेन) प्रावृत्य,
ते पुत्रस्य जीवितरक्षणाय, विनतात्मजाय आहारयितुं स्वदेहं ददामिः

( १७६ )
शङ्खचूड़— माता जी डर को रहने दो। यह नागशत्रु गरुड़
नहीं है। देखिए— कहां तो बड़े बड़े सांपों के मस्तकों को
फाड़ने से निकले हुए ख़ून की धाराओं से लिप्त भयानक चोंच
वाला वह गरुड़, और कहां शान्त स्वभाव तथा सुन्दर रूप
और आकृति वाला यह साधु पुरुष ?
वृद्धा— मैं तो तुम्हारी मृत्यु से डरी हुई सारे संसार को गरुड़मय देख
रही हूँ।
नायक— माता ! मत डरो । यह मैं एक विद्याधर हूँ (जो) तुम्हारे पुत्र
की रक्षा करने के लिए ही आया हूँ।
वृद्धा— (हर्ष पूर्वक)— पुत्र ! बार बार ऐसा (ही) कहो ।
नायक—माता ! बार बार कहने से क्या ? मैं कार्य द्वारा ही सिद्ध करता
हूँ।
वृद्धा— (सिर पर हाथ जोड़ कर) पुत्र चिरंजीवी होवो ।
नायक— माता ! यह वध्यचिह्न (मरने का निशान-लाल वस्त्र) मुझे दो
जबतक इस से ढक कर, तुम्हारे पुत्र की जीवन रक्षा के लिए,
गरुड़ को खाने के लिए मैं अपना शरीर दे दूँ गा ।

  1. अलं = काफ़ी; बस; हटो; छोड़ो । इस अर्थ में 'अलं' के साथ
    तृतीया आती है ।
  2. छटा = लगातार लाइन-धारा ।
  3. सब को गरुड़ ही समझती हूँ ।
  4. काम से कर के दिखाऊँगा । 5. प्रावृत्य = ढक कर, लपेटकर ।

( १८० )
वृद्धा- (कर्णौ विधाय) पडिहदं अमंगलं । तुमं पि संखचूड-
प्रतिहतममङ्गलम् । त्वमपि शङ्खचूड-
णिव्विसेसो पुत्तो । अहवा संखचूड़ादो वि अहिअअरो,
निर्विशेषः^१ - पुत्रः । अथवा शङ्खचूड़ादप्यधिकतरः
जो एवं बंधुजणपरिच्चत्तं वि पुत्तअं मे सरीरपदाणेण
य एवं बन्धुजनपरित्यक्तमपि पुत्रकं मे शरीरप्रदानेन
रक्खिदुमिच्छसि ।
रक्षितुमिच्छसि ।
शङ्खचूडः -अहो ! जगद्विपरीतमस्य महासत्त्वस्य चरितम् । कुतः
विश्वामित्रः श्वमांसं श्वपच^२ इव पुराभक्षयद्यन्निमित्तं,
नाडीजङ्घो निजघ्ने^३ कृततदुपकृतिर्यत्कृते गौतमेन ।
पुत्रोऽयं काश्यपस्य प्रतिदिनमुरगानत्ति तार्क्यो यदर्थं,
प्राणांस्तानेष साधुस्तृणमिव कृपया यः परार्थं ददाति ॥१५
(नायकमुद्दिश्य) - भो महासत्त्व ! त्वया दर्शितेवात्मप्रदान-
व्यवसायान्निर्व्याजा मयि कृपालुता । तदलमनेन
निर्बन्धेन । पश्य-
श्लोक नं० १५, अन्वयः -
यन्निमित्तं विश्वामित्रः श्वपच इव पुरा श्वमांसं अभक्षयत् ,
यत्कृते गौतमेन कृततदुपकृतिः नाडीजङ्घो निजघ्ने,
यदर्थं काश्यपस्य अयं पुत्रः तार्क्ष्यः प्रतिदिनम् उरगान् अत्ति,
तान् प्राणान् यः एष साधुः कृपया परार्थं तृणमिव ददाति ।

( १८१ )

वृा— (दोनों कान बन्द करके) अमंगल नष्ट हो ! तुम भी शङ्खचूड़
के समान ही पुत्र हो। अथवा, शङ्खचूड़ से भी बढ़ कर जो
इस प्रकार बान्धवों से त्यागे गए भी मेरे पुत्र को अपना शरीर
दे कर बचाना चाहते हों।
शङ्खचूड़— अहो ! इस महात्मा का चरित्र संसार से विपरीत है :
क्योंकि— जिन (प्राणों) के लिए विश्वामित्र ने प्राचीन काल में
चाण्डाल की तरह कुत्ते का मांस खाया था, जिन (प्राणों) के
लिए गौतम ने अपने उपकारी नाड़ीजंघ को मार डाला था, जिन
के लिए कश्यप का यह पुत्र तार्क्ष्य (गरुड़) प्रति दिन सांपों को
(मार कर) खा जाता है, उन्हीं प्राणों को जो यह सज्जन पुरुष
दया से दूसरे के लिए तृण की तरह दे रहा है।
(नायक से) हे महात्मन् ! आप ने अपने शरीर के अर्पण
करने के निश्चय से मेरे प्रति निष्कपट दया दिखा दी। अतः
इस आग्रह को रहने दीजिए। देखिए—


१. निर्विशेष = अभिन्न; सदृश ।
२. श्वपचः = चांडाल, शूद्र।
३. मारा गया था।
ह।
कैचाहट ।
पुरुष + एक

( १८२ )
जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः ¹क्षुद्रजन्तवः ।
परार्थे ²बद्धकक्षाणां त्वादृशामुद्भवः कुतः³ ॥ १६ ॥
तत् किमनेन निर्बन्धेन ? मुच्यतामयमध्यवसायः⁴ ।
नायकः—शङ्खचूड ! न मे चिराल्लब्धावसरस्य परार्थसम्पाद-
नामनोरथस्यान्तरायं कर्तुमर्हसि । तदलं ⁵विकल्पेन ।
दीयतामेतद्वध्यचिह्नम् ।
शङ्खचूडः—भो महासत्त्व ! किमनेन वृथात्मायासेन ? न खलु
शङ्खधवलं शङ्खपालकुलं शङ्खचूडो मलिनीकरिष्यति ।
यदि ते वयमनुकम्पनीयास्तदियमस्मद्विपत्तिविक्लवा
न यथा जीवितं जहात्⁶, तथाभ्युपायश्चिन्त्यताम् ।
नायकः—किमत्र चिन्त्यते ? चिन्तित एवाभ्युपायः । स तु
त्वदायत्तः ।
शङ्खचूडः—कथमिव ?
नायकः—म्रियते म्रियमाणे या त्वयि, जीवति जीवति ।
तां यदिच्छसि जीवन्तीं, रक्षात्मानं ममासुभिः । १७।
श्लोक; नं १६, अन्वयः—
मादृशाः क्षुद्रजन्तवः जायन्ते च म्रियन्ते च ।
परार्थे बद्धकक्षाणां त्वादृशाम् उद्भवः कुतः ?
श्लोक नंः १७, अन्वयः—
या त्वयि म्रियमाणे म्रियते, (त्वयि) जीवति (च) जीवति,
तां यदि जीवन्तीम् इच्छसि, (तर्हि) मम असुभिः आत्मानं रक्ष ।

( १८३ )
मुझ जैसे क्षुद्र प्राणी (संसार में कई) पैदा होते हैं और मर
जाते हैं। (परन्तु) परोपकार के लिए कमर कस कर तैयार
रहने वाले आप जैसे महापुरुषों का जन्म कहां होता है ? अतः
इस हठ से क्या लाभ ? इस निश्चय को छोड़ दीजिए।
नायक- शङ्खचूड ! चिरकाल के पश्चात् प्राप्त हुए अवसर वाले,
परोपकार करने के मेरे मनोरथ में तुम्हें विघ्न नहीं डालना
चाहिए। अतः यह हिचकचाहट छोड़ो। यह वध्यचिह्न दे दो ?
शङ्खचूड-हे महात्मन् ! क्यों व्यर्थ ही अपने आप को कष्ट दे
रहे हो ? शङ्खचूड शङ्ख के समान उज्ज्वल शङ्खपाल के कुल
को कलंकित नहीं करेगा। यदि हम आप की दया के पात्र हैं
तो ऐसा उपाय सोचिए जिस से मेरी विपत्ति के कारण व्याकुल
हुई यह (मेरी माता) जीवन न त्याग दे।
नायक - इस में सोचना क्या है ? उपाय तो सोचा हुआ ही है। वह
तो तुम पर निर्भर है।
शङ्खचूड- कैसे ?
नायक - जो तुम्हारे मरने पर मर जाएगी और जीते रहने से जीती
रहेगी; उस (माता) को यदि तू जीवित रखना चाहता है तो
मेरे प्राणों से अपने को बचा।

  1. क्षुद्र = नाचीज़, निकम्मे, अकिंचन ।
  2. जिन्होंने कमर कसी हुई है; जो तैयार हैं।
  3. अर्थात् ऐसे महानुभावों का जन्म कभी कभी ही होता है।
  4. काम, निश्चय, फ़ैसला । 5. सोचविचार, हिचकचाहट ।
  5. हा (अदादिगण, परस्मैपद) + विधिलिङ् + प्रथम पुरुष + एक
    वचन।

( १८४ )
अयमभ्युपायः । तदर्पय त्वरितं वध्यचिह्नं, यावदने-
नात्मानं प्रच्छाद्य वध्यशिलामारोहामि । त्वमपि जननीं
पुरस्कृत्यास्माद्देशान्निवर्त्तस्व कदाचिदम्बावलोक्य सन्नि-
कृष्टं घातस्थानं स्त्रीस्वभावकातरत्वेन जीवितं जह्यात् ।
किं न पश्यति भवानिदं विपन्नपन्नगानेककङ्कालसङ्कुलं
महाश्मशानम् ? तथा हि, —
चञ्चच्चञ्चूद्धृतार्धच्युतपिशितलवग्राससंवृद्धगन्धै-
र्गृध्रैरारब्धपक्षद्वितयविधुतिभिर्बद्धसान्द्रान्धकारे ।
वक्त्रोद्धान्ताः पतन्त्यश्छमिति शिखिशिखाश्रेणयोऽस्मिञ्छिवाना-
मस्रस्रोतस्यजस्रस्रुतबहलवसावासविस्रे स्वनन्ति ॥ १८ ॥
शङ्खचूडः — कथं न पश्यामि ? —
प्रतिदिनमहिनाहारेण विनायकाहिप्रीति ।
शशिधवलास्थिकपालं वपुरिव रौद्रं श्मशानमिदम् ॥ १९ ॥
श्लोक नं०: १८, अन्वयः—
चञ्चच्चञ्चूद्धृतार्धच्युतपिशितलवग्रास संवृद्धगन्धैः गृध्रैः
व्याबद्धपक्षद्वितयविधूतिभिः बद्धसान्द्रान्धकारे अस्मिन् (श्मशाने)
अजस्रस्रुतबहलवसावासविस्रे अस्रस्रोतसि शिवानां
वक्त्रोद्धान्ताः शिखिशिखाश्रेणयः शमिति पतन्ति ।
श्लोक नं०: १९, अन्वयः —
प्रतिदिनमहिना आहारेण विनायकाहितप्रीति इदं श्मशानं
शशिधवलास्थिकपालं रौद्रम् वपुरिव ॥

( १८५ )
यही उपाय है। अतः शीघ्र ही वध्यचिह्न दे दो ताकि इस से
अपने आप को ढक कर वध्यशिला पर चढ़ जाऊँ ! तुम भी
माता को लेकर इस स्थान से लौट जाओ। कहीं (तुम्हारी)
माता समीप ही वध्यभूमि को देख कर स्त्रीजाति की
स्वाभाविक कायरता से प्राण ही त्याग दे। क्या आप मरे हुए
सांपों के अनेक अस्थिपञ्जरों से भरे हुए (इस) महाश्मशान
को नहीं देख रहे ? वैसे ही—
फड़कती हुई चोंचों से उठाए गए (परन्तु) आधे रास्ते में
ही गिरे हुए मांस के टुकड़ों को पकड़ने की प्रबल इच्छा
वाले, फैलाए हुए दोनों पंखों को लगातार फड़फड़ाने वाले
गीधों के द्वारा जहाँ घोर अन्धकार छा रहा है ऐसे इस
(श्मशान) में लगातार टपकती हुई घनी चर्बी से भीषण दुर्गन्ध
वाली खून की नदी में शृगालियों के मुख से निकलती हुई
अग्नि की लपटें गिरती हुई 'शम्' 'शम्' का शब्द कर रही हैं।
शङ्खचूड़—क्यों नहीं देखता ? (अर्थात् देख ही रहा हूँ)—
प्रतिदिन सांपों के आहार से पक्षिराज (गरुड़) को आनन्द देने
वाला यह श्मशान चन्द्रमा के समान सफेद हड्डियों तथा
खोपड़ियों से युक्त भगवान् रुद्र (शिव) के शरीर के समान
(दीख रहा है)। [वह भी प्रतिदिन सांपों के हार से सुशोभित
गणेश को आनन्द देने वाला है, तथा मस्तक पर स्थित चन्द्रमा
के कारण उजली हड्डियों तथा खोपड़ियों (की माला) से
शोभायमान रहता है।
१. गर्धः = इच्छा, लालच, लोभ । २. अस्र = रक्त खून।
३. वसा = चर्बी; वास = गन्ध; विस्रम् = दुर्गन्ध वाली।
४. तीनों विशेषणों के दो दो अर्थ—देखिए अनुवाद।

( १८६ )
नायकः- शङ्खचूड़ ! तद् गच्छ, किमेभिः सामोपन्यासैः ?
शङ्खचूड़ः- आसन्नः खलु गरुडस्यागमनसमयः । (मातुरग्रतो
जानुभ्यां स्थित्वा -) अम्ब ! त्वमपि निवर्त्तस्वेदानीम् ।
समुत्पस्यामहे मातर्यस्यां यस्यां ¹गतौ वयम् ।
तस्यां तस्यां प्रियस्रुते ! माता भूयास्त्वमेव नः ॥२०॥
[पादयोः पतति]
वृद्धा - (सास्रम्) कहं पच्छिमं से वअणं ? पुत्तअ ! ण क्खु
कथं पश्चिममस्य वचनम् ? पुत्रक ! न खलु
तुमं उज्झिअ मे पाआ अण्णदो वहंति । इह ज्जेव्व तुए
त्वामुज्झित्वा मे पादावन्यतो वहतः । इहैव त्वया
सह चिट्ठिसं ।
सह स्थास्यामि।
शङ्खचूड़ः- (उत्थाय) यावदहसध्यदूरे भगवन्तं दक्षिणा-
गोकर्णं प्रदक्षिणीकृत्य स्वाम्यादेशमनुतिष्ठामि ।
[उभौ निष्क्रान्तौ]
नायकः-कष्टम् । न सम्पन्न मभिलषितम् तत्कोऽत्राभ्युपायः ?
कञ्चुकी- (तरसा प्रविश्य ²- इदं वासोयुगम् ।
नायकः-[दृष्ट्वा सहर्षमात्मगतम्] दिष्ट्या सिद्धमभिवाञ्छित-
मनेनातर्कितोपनतेन ³ रक्तांशुकयुगलेन ।

श्लोक नं०: २०, अन्वयः -
मातः ! यस्यां यस्यां गतौ वयं समुत्पस्यामहे
तस्यां तस्यां प्रियस्रुते ! त्वम् एव नः माता भूयाः ॥