नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
पृष्ठ 199, कुल 309 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 199
( १७३ )
सेवक — गरुड़ के आने का समय समीप ही है। अतः मैं शीघ्र ही
जाता हूँ। [प्रस्थान]
शङ्खचूड़ — माता जी, धीरज धरो ।
वृद्धा — (होश में आकर, आँसुओं के साथ) आह, पुत्र ! सैकड़ों
मनोरथों से प्राप्त (बच्चे) ! फिर मैं तुम्हें कहां देखूँगी ?
[गले लगाती है]
नायक — अहो गरुड़ की निर्दयता ! और भी—
शोक से विमोहित, बार बार आँसुओं की धारा बहाती हुई,
'हे पुत्र ! तुझे कौन बचाएगा' इस प्रकार बहुत से प्रलाप कर
के चारों ओर कातर दृष्टि दौड़ाती हुई माता की गोद में ठहरे
हुए इस बच्चे को दया छोड़ कर खाने वाले पक्षिराज गरुड़ की
केवल चोंच ही नहीं वरन् हृदय भी मेरे विचार में वज्र का
बना हुआ है ।
शङ्खचूड़ — (माता के आंसू पोंछता हुआ)— माता जी ! इतनी अधिक
व्याकुलता से क्या लाभ ?
- नैर्घृण्यं = दया से रहित होना; निर्दयता; क्रूरता ।
- प्रलाप = विलाप । चीख़ पुकार ।
- कृपणां दृशम् = कातर दृष्टि । करुणा उत्पन्न करने वाली ।