नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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शङ्खचूड़— माता जी डर को रहने दो। यह नागशत्रु गरुड़
नहीं है। देखिए— कहां तो बड़े बड़े सांपों के मस्तकों को
फाड़ने से निकले हुए ख़ून की धाराओं से लिप्त भयानक चोंच
वाला वह गरुड़, और कहां शान्त स्वभाव तथा सुन्दर रूप
और आकृति वाला यह साधु पुरुष ?
वृद्धा— मैं तो तुम्हारी मृत्यु से डरी हुई सारे संसार को गरुड़मय देख
रही हूँ।
नायक— माता ! मत डरो । यह मैं एक विद्याधर हूँ (जो) तुम्हारे पुत्र
की रक्षा करने के लिए ही आया हूँ।
वृद्धा— (हर्ष पूर्वक)— पुत्र ! बार बार ऐसा (ही) कहो ।
नायक—माता ! बार बार कहने से क्या ? मैं कार्य द्वारा ही सिद्ध करता
हूँ।
वृद्धा— (सिर पर हाथ जोड़ कर) पुत्र चिरंजीवी होवो ।
नायक— माता ! यह वध्यचिह्न (मरने का निशान-लाल वस्त्र) मुझे दो
जबतक इस से ढक कर, तुम्हारे पुत्र की जीवन रक्षा के लिए,
गरुड़ को खाने के लिए मैं अपना शरीर दे दूँ गा ।
- अलं = काफ़ी; बस; हटो; छोड़ो । इस अर्थ में 'अलं' के साथ
तृतीया आती है । - छटा = लगातार लाइन-धारा ।
- सब को गरुड़ ही समझती हूँ ।
- काम से कर के दिखाऊँगा । 5. प्रावृत्य = ढक कर, लपेटकर ।