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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

नायक—शङ्खचूड़ ! तो जाओ, इन कोमल बातों से क्या लाभ ?
शङ्खचूड़—गरुड़ के आने का समय समीप ही है। (माता के आगे
घुटने टेक कर) माता जी ! आप भी अब लौट जाइए।
हे माता ! जिस जिस योनि में हम उत्पन्न हों, उस उस
(योनि) में हे पुत्रवत्सले ! तू ही हमारी माता हो।
वृद्धा—(आंसुओं के साथ) क्या यह इस का अन्तिम वचन है ? हे पुत्र,
तुम्हें छोड़ कर मेरे पैर कहीं और नहीं चलते। यहीं तेरे साथ
ही ठहरूँगी।
शङ्खचूड़—(उठकर) मैं भी तब तक समीप ही भगवान् दक्षिण गोकर्ण
की प्रदक्षिणा कर के स्वामी की आज्ञा का पालन करता हूँ।
[दोनों का प्रस्थान]
नायक—आह ! मेरी इच्छा पूर्ण नहीं हुई। (अब) यहां कौनसा उपाय
है ?
कञ्चुकी—(वेग के साथ प्रवेश करके) यह (लाल) वस्त्रों का जोड़ा।
नायक—(देख कर, हर्षपूर्वक, मन ही मन) भाग्यवश अचानक लाए
गए इन दोनों लाल वस्त्रों से मेरा मनोरथ सिद्ध हो गया !

  1. दशा, हालत, योनि। 2. पताकास्थानम्।
  2. जिस के बारे में सोचा नहीं था, सहसा, अचानक।

( १८८ )
कञ्चुकी—इदं वासोयुगं देव्या मित्रवसुजनन्या कुमाराय
प्रेषितम् । तदेतत् परिधत्तां कुमारः ।
नायकः-(सादरम् ) उपनय ।
कञ्चुकी—(उपनयति)
नायकः-(गृहीत्वात्मगतम्) सफलीभूतो मे मलयवत्याः
पाणिग्रहः । (प्रकाशम्) कञ्चुकिन् ! गम्यतां,
मद्वचनादभिवादनीया देवी ।
कञ्चुकी—यदाज्ञापयति कुमारः । [इति निष्क्रान्तः]
नायकः-वासोयुगमिदं रक्तं प्राप्ते काले समागतम् ।
महतीं प्रीतिमाधत्ते परार्थे देहमुज्झतः ॥२१॥
(दिशोऽवलोक्य) यथायं चलितमलयाचलशिखरशिला-
सञ्चयः प्रचण्डो ¹ नभस्वाँस्तथो तर्कयाम्यासन्नीभूतः
खलु पत्तिगज इति । तथा हि—
श्लोक नं० : २१, अन्वयः—
प्राप्ते काले समागतम् इदं रक्तम् वासोयुगं
परार्थे देहमुज्झतः (मम) महतीं प्रीतिम् आधत्ते ।

( १८६ )
कञ्चुकी— यह वस्त्रों का जोड़ा मित्रावसु की माता महारानी ने आप-
के लिए भेजा है। अतः आप इन्हें पहिन लें।
नायक—(आदरपूर्वक) लाओ।
कञ्चुकी— (पास ले आता हैं)
नायक— (लेकर, मन ही मन) मेरा मलयवती के साथ विवाह करना
(अद्य) सफल हो गया। (प्रकट) कञ्चुकी ! जाओ महारानी को
मेरी ओर से प्रणाम कर देना।
कञ्चुकी— जो कुमार की आज्ञा। [प्रस्थान]
नायक—उचित समय पर आए हुए ये दो लाल वस्त्र परोपकार के लिए
शरीर त्यागने वाले मुझे अत्यन्त प्रसन्नता दे रहे हैं। (चारों
दिशाओं में देखकर) जिस प्रकार मलयपर्वत की चोटी के पत्थरों
के ढेरों को हिलाता हुआ पवन प्रचण्ड (हो रहा) है, उस से
मेरा विचार है कि निश्चय ही पक्षिराज गरुड़ समीप ही आ
पहुँचा है। क्योंकि—
१. नभस्वान् = हवा !

( १६० )
तुल्या संवर्त्तकाभ्रैः$^1$ पिद्धति गगनं पङ्क्तयः पक्षतीनां,
तीरे वेगानिलोऽम्भः क्षिपति भुव इव प्लावनायाम्बुराशेः ।
कुर्वन् कल्पान्तशङ्कां सपदि च सभयं वीक्षितो दिग्द्विपेन्द्रै
र्देहोद्योतैर्र्दशाशाः कपिशयति मुहुर्द्वादशादित्यदीप्तिः ॥२२॥
तद्यावदसौ नागच्छेच्छङ्खचूडस्तावत्त्वरिततरमिमां वध्यशिला-
मारोहामि । (तथा कृत्वा, उपविश्य स्पर्शं नाटयति)—
अहो स्पर्शोस्याः !
न तथा $^2$सुखयति मन्ये मलयवती मलयचन्दनरसार्द्रा
अभिवाञ्छितार्थसिद्धयै वध्यशिलेयं यथाश्लिष्टा ॥२३॥
अथवा किं मलयवत्या ?
नं० : २२, अन्वयः—
संवर्त्तकाभ्रैः तुल्याः पक्षतीनां पङ्क्तयः गगनं पिदधति । वेगानिलः
भुवः इव प्लावनाय अम्बुराशेः अम्भः तीरे क्षिपति । सपदि च
कल्पान्तशङ्कां कुर्वन् दिग्द्विपेन्द्रैः सभयं वीक्षितः द्वादशा-
दित्यदीप्तिः (अयं गरुडः) देहोद्योतैः दशाशाः मुहुः कपिशयति
लोक नं०: २३: अन्वयः—
मन्ये (यत् ) मलयचन्दनरसार्द्रा मलयवती आश्लिष्टा (मां) तथा न
सुखयति यथा अभिवाञ्छितार्थसिद्धयै (आश्लिष्टा) इयं वध्यशिला ।

( १६१ )
प्रलयकाल के मेघों के समान पँखों की कतारें (समूह)
आकाश को ढक रही हैं। वेग से चलने वाली हवा
मानों पृथ्वी को (ही) डुबा देने के लिए समुद्र का पानी
तट पर फेंक रही है। और झटपट प्रलयकाल की शङ्का उत्पन्न
करता हुआ, दिशाओं से डर के साथ देखा गया, बारह सूर्यों
की कान्ति वाला (यह गरुड़) अपने शरीर की प्रभा से दसों
दिशाओं को बार बार कपिश (लाल भूरा) सा कर रहा है।
अतः जब तक यह शङ्खचूड़ आ नहीं जाता तब तक जल्दी से
इस वध्यशिला पर चढ़ता हूँ। [वैसा ही करके, बैठकर, उस के
स्पर्श का अभिनय करता है]– आह ! इस का स्पर्श (कैसा
अच्छा है) ! मैं मानता हूँ कि मलयचन्दन के रस से सिक्त
(शीतलाङ्गी) मलयवती भी आलिङ्गन की गई मुझे इतना सुख
नहीं देती जितना कि अभीष्ट अर्थ की सिद्धि के लिए स्पर्श की
गई यह वध्यशिला (देती है)। अथवा, मलयवती से क्या ?
(उस की बात छोड़ो)–


१. प्रलयकाल के समय प्रकट होने वाले बादल ।
२. 'सुखयति' और "आश्लिष्टा"–मलयवती तथा शिला–दोनों के
साथ लगते हैं।

( १६२ )
शयितेन मातुरङ्के विस्रब्धं¹ शैशवे न तत्प्राप्तम्।
लब्धं सुखं मयास्या वध्यशिलाया यदुत्सङ्गे ॥ २४॥
तदयमागतो गरुत्मान् , यावदात्मानमाच्छादयामि।
[तथा करोति]
[ततः प्रविशति गरुडः]
गरुडः- क्षिप्त्वा बिम्बं हिमांशोर्भयकृतवलयां संस्मरन् शेषमूर्तिं
सानन्दं स्यन्दनाश्वत्रसनविचलिते पूष्णि² दृष्टोऽग्रजेन ।
एष प्रान्तावसज्जज्जलधरपटलात्यायतीभूतपक्षः,
प्राप्तो वेलामहीध्रं मलयमहमिहग्रासगृध्नुः क्षणेन ॥२५॥
नायकः- (सपरितोषम्) -
संरक्षता पन्नगमद्य पुण्यं मयार्जितं यत्स्वशरीरदानात् ।
भवे भवे³ तेन ममैवमेवं भूयात्परोपकाराय शरीरलाभः ॥२६॥
श्लोक नं० : २४, अन्वयः-
शैशवे मातुः अङ्के विस्रब्धं शयितेन मया तत् सुखं न प्राप्तं
यत् (सुखं) अस्याः वध्यशिलायाः उत्सङ्गे लब्धम् ।
श्लोक नं० : २५, अन्वयः -
हिमांशोः बिम्बं क्षिप्त्वा, भयकृतवलयां शेषमूर्तिं संस्मरन् ,
स्यन्दनाश्वत्रसनविचलिते पूष्णि अग्रजेन सानन्दं दृष्टः,
प्रान्तावसज्जज्जलधरपटलात्यायतीभूतपक्षः एषोऽहम्
अहिग्रासगृध्नुः क्षणेन इह वेलामहीध्रं मलयं प्राप्तः ।
श्लोक नं० : २६, अन्वयः -
अद्य स्वशरीरदानात् पन्नगं संरक्षता मया यत् पुण्यम् अर्जितं,
तेन भवे भवे मम एवमेवं परोपकाराय शरीरलाभः भूयात् ।

( १६३ )
बचपन से माता का गोद में निःशङ्क सोने से भी मुझे वह सुख
प्राप्त नहीं हुआ था जो (सुख) इस वध्यशिला की गोद में
मिला है ।
तो यह गरुड़ आ गया । अतः अपने शरीर को (इन लाल वस्त्रों
से) ढकता हूँ । [वैसा ही करता है]
[गरुड़ का प्रवेश]
गरुड़ — चन्द्रमण्डल को हिलाता-डुलाता हुआ, भय से कुण्डलिनी
मारे शेषनाग की मूर्ति को याद करता हुआ, रथ के घोड़ों के
डर से सूर्य के विचलित होने पर अपने बड़े भाई (अरुण) के
द्वारा आनन्द पूर्वक देखा गया, किनारों पर लिपटे हुए बादलों
के समूह से अत्यन्त विस्तृत हुए पँखों वाला यह मैं साँपों को
खाने की इच्छा वाला क्षण में वहां (समुद्र के) किनारे पर
विद्यमान मलयपर्वत पर पहुँच गया हूँ ।
नायक — (सन्तोषपूर्वक) आज अपने शरीर के दान से नाग की रक्षा
करते हुए मैं ने जो पुण्य प्राप्त किया है उससे प्रत्येक जन्म
में मुझे इसी प्रकार ही परोपकार के लिए शरीर लाभ हो ।


  1. भय अथवा शङ्का से रहित हो कर—; क्रियाविशेषण ।
  2. सति सप्तमि — सूर्य के विचलित होने पर !
  3. भव = जन्म ।

( १६४ )
गरुड़ः— (नायकं निर्वर्ण्य)—
अस्मिन्वध्यशिलातले निपतितं शेषानहीन् रक्षितुं
निर्भिद्याशनिदण्डचण्डतरया चञ्च्वाधुना वक्षसि ।
भोक्तुं भोगिनमुद्धरामि तरसा रक्ताम्बरप्रावृतं
दिग्धं सद्यविदीर्यमाणहृदयप्रस्यन्दिनेवासृजा ॥ २७ ॥
[इत्यभिपत्य नायकं गृह्णाति ।]
[नेपथ्ये पुष्पाणि पतन्ति । दुन्दुभयश्च स्वनन्ति]
गरुड़ः— (ऊर्ध्वं दृष्ट्वाकर्ण्य च)
अये पुष्पवृष्टिर्दुन्दुभिध्वनिश्च ! (सविस्मयं) अये !
आमोदानन्दितालिनिर्पतति किमियं पुष्पवृष्टिर्नभस्तः ?
स्वर्गे किं वैष चक्रं मुखरयति दिशां दुन्दुभीनां निनादः
(विहस्य) आं ज्ञातं सोऽपि मन्ये मम जवमरुताकम्पितः पारिजातः
सर्वैः संवर्त्तकाभ्रैरिदमपि रसितं जातसंहारशङ्कैः ॥२८॥
श्लोक नं० २७, अन्वयः—
शेषान् अहीन् रक्षितुम् अस्मिन् वध्यशिलातले निपतितं रक्ताम्बर-
प्रावृतं मद्यविदीर्यमाणहृदयप्रस्यन्दिना इवासृजा दिग्धं भोगिनम्
अधुना (अहं) अशनिदण्डचण्डतरया चञ्च्वा वक्षसि निर्भिद्य तरसा
भोक्तुम् उद्धरामि ।
श्लोक नं०: २८, अन्वयः—
आमोदानन्दितालिः इयं पुष्पवृष्टिः नभस्तः किं निपतति ? स्वर्गे वा
दुन्दुभीनां एष निनादः दिशां चक्रं किं मुखरयति ? आं ज्ञातम् ;
मन्ये मम जवमरुता कम्पितः सोऽपि पारिजातः, जातसंहारशङ्कैः
सर्वैः संवर्त्तकाभ्रैः अपि इदं रसितम् ।

( १४५ )
गरुड़— (नायक को देखकर) अन्य नागों की रक्षा के लिए इस
वध्यशिला पर पड़े हुए लाल वस्त्र से ढके हुए, मेरे डर से फटे
हुए हृदय से बहते हुए रक्त से मानों लिप्त (इस) सांप को
अब (मैं) वज्र के समान कठोर चोंच से इस की छाती फाड़ कर,
वेग से, खाने के लिए उठा ले जाता हूँ।
[झपट कर नायक को पकड़ता है]
[नेपथ्य में फूलों की वर्षा होती है और नगाड़ों का शब्द सुनाई देता है]
गरुड़— (ऊपर देखकर और सुनकर) अरे ! फूलों की वर्षा और नगाड़ों
का शब्द !! (आश्चर्य पूर्वक) अरे ! सुगन्ध से भौंरों को
आनन्दित करने वाली यह फूलों की वर्षा आकाश से क्यों हो
रही है ? अथवा स्वर्ग में नगाड़ों का यह शब्द सब दिशाओं को
क्यों मुखरित कर रहा है ? (हँसकर) ओह, मैं समझ गया। मेरा
विचार है कि मेरे वेग से चलने से उत्पन्न हुई वायु से कम्पित
यह पारिजात वृक्ष (फूलों की वर्षा कर रहा है) और (संसार का)
संहार होने के डर से सब प्रलयकाल के बादल यह गरज रहे
हैं।

  1. केवल उसी दिन के लिए।
  2. दिग्घं = लिप्त।
  3. असृजा = खून ३या एक वचन
  4. मुखरित करना; गुँजाना।

( १६६ )
नायकः—(आत्मगतम् ) दिष्ट्या कृतार्थोऽस्मि !
गरुडः—(नायकं कलयन् )
नागानां रक्षिता भाति गुरुरेष¹ यथा मम ।
तथा सर्पाशनाकाङ्क्षां व्यक्तमद्यापनेष्यति² ॥२६॥
तद्यावदेनं गृहीत्वा मलयपर्वतमारुह्य यथेष्टमाहारयामि ।
[इति निष्क्रान्तः]
इति चतुर्थोऽङ्कः ।
श्लोक नं०: २६, अन्वयः —
यथा एष नागानां रक्षिता मम गुरुः भाति तथा व्यक्तम् अद्य (मम)
सर्पाशनाकाङ्क्षाम् अपनेष्यति ।

( १६७ )
नायक- (मन ही मन) सौभाग्य वश, मैं कृतार्थ हो गया ।
गरुड़- (नायक को देखते हुए)- जिस प्रकार से यह नागों की रक्षा
करने वाला मुझे भारी (अथवा श्रेष्ठ) लगता है उस से स्पष्ट
रूप से (जान पड़ता है कि) आज (यह मेरी) साँपों को
खाने की इच्छा को बुझा देगा । अतः इसे लेकर मलयपर्वत पर
चढ कर यथेष्ट (पेट भर) भोजन करता हूँ । [प्रस्थान]
चतुर्थ अङ्क समाप्त ।

  1. गुरु = भारी; आचार्य; श्रेष्ठ।
  2. दूर कर देगा; बुझा देगा । पताका स्थान ।

अथ पञ्चमोऽङ्कः ।
[ततः प्रविशति प्रतीहारः]
प्रतीहारः-स्वगृहोद्यानगतोऽपि स्निग्धे पापं विशङ्क्यते¹ स्नेहात्।
किमु दृष्टबह्वपायप्रतिभयकान्तारमध्ये ॥ १ ॥
तथाहि, — जीमूतवाहनो जलनिधिवेलावलोकनकुतूहली
निष्क्रान्तश्चिरयतीति दुःखमास्ते महाराजविश्वावसुः ।
समादिष्टश्चास्मि तेन, यथा—‘सुनन्द ! श्रुतं मया² सन्नि-
हितगरुडप्रतिभयमुद्देशं जामाता जीमूतवाहनो गत इति ।
शङ्कित एवास्म्यनेन वृत्तान्तेन । तत्त्वरितं विज्ञायागच्छ
‘किमसौ स्वगृहमागतो न वा’ इति । यावत्तत्र गच्छामि ।
(परिक्रामन्नग्रे दृष्ट्वा) अयमसौ राजर्षिर्जीमूतवाहनस्य
पिता जीमूतकेतुरुटजाङ्गणे सह स्वधर्मचारिण्या राज-
पुत्र्या वध्वा च पर्युपास्यमानस्तिष्ठति । तथाहि—
श्लोक नं०: १, अन्वयः —
स्निग्धे स्वगृहोद्यानगतेऽपि स्नेहात् पापं विशङ्क्यते; दृष्टबह्वपाय-
प्रतिभयकान्तारमध्ये किमु ?
( १६८ )

पाँचवां अङ्क।
[ प्रतीहार (द्वारपाल) का प्रवेश ]
प्रतीहार — प्रिय जन के अपने घर के बग़ीचे में जाने पर भी, प्रेम के
कारण, अनिष्ट की आशङ्का होने लगती है; (फिर) वन के बीच
जाने पर तो कहना ही क्या जहां बहुत से विघ्न और डर देखे
गए हों। वैसे ही, समुद्रतट को देखने की उत्कण्ठा से गया
हुआ जीमूतवाहन देर कर रहा है इस विचार से महाराज
विश्वावसु दुःखी हो रहे हैं। और उन्होंने मुझे आज्ञा दी है
कि 'हे सुनन्द ! मैंने सुना है कि दामाद जीमूतवाहन उस
स्थान को गए हैं जहां गरुड़ का डर हमेशा बना रहता है।
इस समाचार से मुझे आशङ्का हो रही है। अतः तुम जल्दी
से पता लगा कर आओ कि वह अपने घर (लौट) आए हैं कि
नहीं। तो मैं वहां जाता हूँ। (घूमते हुए, आगे देख कर) यह
जीमूतवाहन के पिता राजर्षि जीमूतकेतु कुटिया के आंगन में
अपनी पत्नी तथा पुत्रवधू राजकुमारी (मलयवती) से सेवा किए
जा रहे हुए बैठे हैं। और भी —

  1. 'अति स्नेहः पापशङ्की' —शकुन्तला ।
  2. सन्निहित —समीप स्थित। सदा उपस्थित।
    ( ५६६ )

क्षौमे भङ्गवती¹ तरङ्गतरेले फेनाम्बुतुल्ये वहन् ,
जाह्नव्येव² विराजितः सवयसा देव्या महापुण्यया ।
धत्ते तोयनिधेरयं सुसदृशीं जीमूतकेतुः श्रियं,
यस्यैषाऽन्तिकवर्तिनी मलयवत्याभाति वेला यथा ॥२॥
तद्यावदुपसर्पामि ।
[ततः प्रविशति पत्नीवधूसमेतो जीमूतकेतुः]
जीमूतकेतुः- भुक्तानि यौवन सुखानि यशोऽवकीर्णं,
राज्ये स्थितं³ स्थिरधिया चरितं तपोऽपि ।
श्लाघ्यः सुतः सुसदृशान्वयजा स्नुषेयं
चिन्त्यो मया ननु कृतार्थतयाद्य मृत्युः ॥ ३ ॥
सुनन्दः - (सहसोत्सृत्य)- जीमूतवाहनस्य⁴--
जीमूतकेतुः -(कर्णौ पिधाय)- शान्तं पापं, शान्तं पापम् ।
श्लोक नं०: २, अन्वयः-
भङ्गवती तरङ्गतरेले फेनाम्बुतुल्ये क्षौमे वहन्, जाह्नव्या एव
सवयसा महापुण्यया देव्या विराजितः, अयं जीमूतकेतुः तोयनिधेः
सुसदृशीं श्रियं धत्ते, यस्य अन्तिकवर्तिनी एषा मलयवती वेला
यथा आभाति ।
श्लोक नं०: ३, अन्वयः-
(मया) यौवनसुखानि भुक्तानि, यशोऽवकीर्णं, स्थिरधिया
राज्ये स्थितं, तपोऽपि चरितम् ; सुतः श्लाघ्यः, इयं स्नुषा
सुसदृशान्वयजा, ननु मया कृतार्थतया अद्य मृत्युः चिन्त्यः ।

(२०१)
तह वाले, तरंग की तरह लहराते हुए, झाग वाले पानी की
तरह सफेद, दो रेशमी वस्त्र-धारण किए हुए, जल जन्तुओं से
युक्त अति पुण्यवती गङ्गा के समान अपनी समान-अवस्था वाली
पुण्याह्ला महारानी के साथ शोभायमान, यह जीमूतकेतु समुद्र
की लक्ष्मी के समान शोभा को धारण कर रह रहा है जिस के
समीप बैठी हुई यह मलयवती मलयपर्वत से युक्त समुद्रतट के
समान लग रही है। तो मै समीप जाता हूँ।
[ पत्नी तथा पुत्रवधू के साथ जीमूतकेतु का प्रवेश ]
जीमूतकेतु- मैने यौवन के सुख भोग लिए, यश भी फैल गया है,
स्थिर बुद्धि से राज्य कर लिया, तप भी किया, पुत्र श्लाघा योग्य
है, यह बहू भी अपने समान कुल में उत्पन्न हुई है, अब तो
निश्चय ही कृतकृत्य हुए मुझे मृत्यु की (ही) चिन्ता करनी
चाहिए।
सुनन्द- (अचानक पास जा कर) - जीमूतवाहन की......
जीमूतकेतु- (कान बन्द करके) अनिष्ट नाश हो, अनिष्ट नाश हो !
१. भङ्ग = तह अथवा लहर ।
२. सवयसा = हम-उम्र, समान आयु वाली; अथवा, पक्षियों, हंसों
या जल-जन्तुओं से युक्त ।
३. राज्ये स्थितम् = राज्य में ठहरा । राज्य किया ।
४. मानों जीमूतकेतु के अन्तिम वाक्य को इस प्रकार से समाप्त किया
है कि 'अब मुझे जीमूतवाहन की मृत्यु की चिन्ता करनी
चाहिए' जो कि अनिष्टसूचक है, अपशकुन है । पताकास्थान ।

( २०२ )
वृद्धा — पडिहदं क्खु एदं अमंगलं ।
प्रतिहतं खल्विदममङ्गलम् ।
मलयवती — वेवदि मे हिअअं इमिणा दुण्णिमित्तेण ।
वेपते मे हृदयमनेन दुर्निमित्तेन ।
जीमूतकेतुः—(वामाक्षिस्पन्दनं सूचयित्वा) भद्र किं जीमूतवाहनस्य ?
सुनन्दः—जीमूतवाहनस्य वार्त्तामन्वेष्टुं महाराजविश्वावसुना
युष्मदन्तिकं प्रेषितोऽस्मि ।
1
जीमूतकेतुः — किमसन्निहितस्तत्र मे वत्सः ?
वृद्धा —(सविषादम्) महाराअ ! जइ तहिं ण सण्णिहिदो,
महाराज ! यदि तत्र न सन्निहितः,
ता कहिं गदो मे पुत्तओ भविस्सदि ?
तत् क्व गतो मे पुत्रको भविष्यति ?
2
जीमूतकेतुः — नूनमस्मत्प्राणयात्रार्थं नितान्तं दूरं गतो
भविष्यति ।
मलयवती —(सविषादमात्मगतम्) अहं उण अज्जउत्तं
अहं पुनरार्यपुत्रम्
अपेक्खन्ती अण्णं जेव्व किंपि आसंकामि ।
अप्रेक्षमाणा अन्यदेव किमप्याशङ्के ।
सुनन्दः—आज्ञापयतु महाराजः किं मया स्वामिने निवेदनीयम् ।

(२०३)
वृद्धा— यह अमंगल नष्ट हो ! !
मलयवती— इस अपशकुन से मेरा दिल कांप रहा है।
जीमूतकेतु— (बाईं आँख का फड़कना सूचित करके)— भले आदमी,
जीमूतवाहन की क्या ?
सुनन्द — जीमूतवाहन की कुशलवार्ता जानने के लिए महाराज
विश्वावसु ने मुझे आप के पास भेजा है।
जीमूतकेतु— क्या मेरा बच्चा वहाँ नहीं है ?
वृद्धा— (दुःखपूर्वक) महाराज ! यदि मेरा बच्चा वहां नहीं है तो कहाँ
गया होगा ?
जीमूतकेतु— अवश्य ही हमारे लिए भोजन सामग्री लाने के लिए बहुत
दूर चला गया होगा ।
मलयवती— (दुःख पूर्वक, मन ही मन) — आर्यपुत्र को न देखती हुई
मुझे तो कुछ और ही आशंका हो रही है।
सुनन्द— महाराज आज्ञा दें मैं स्वामी को क्या कहूँ ?


  1. जो समीप नहीं; अनुपस्थित ।
  2. हमारे प्राण धारण करने के लिए । खाने के लिए (सामग्री लाने
    के लिए)।

( २०४ )
जीमूतकेतुः — (वामाक्षिरुस्पन्दनं सूचयन्)— जीमूतवाहन-
श्चिरयतीति पर्याकुलोऽस्मि हृदयेन ।—
स्फुरसि किमु दक्षिणेतर ! मुहुर्मुहुः सूचयन्ममानिष्टम् ।
हतचक्षुरपहतं ते स्फुरितं, मम पुत्रकः कुशली ॥ ४ ॥
(ऊर्ध्वमवलोक्य) अयमसौ त्रिभुवनैकचक्षुर्भगवान्
सहस्रदीधितिः स्फुटं जीमूतवाहनस्य श्रेयः करिष्यति ।
(अवलोक्य सविस्मयम्)—
आलोक्यमानमतिलोचनदुःखदायि,
रक्तच्छटा निजमरीचिरुचो¹ विमुञ्चत् ।
उत्पातवाततरलीकृततारकाभ-
मेतत्पुरः पतति किं सहसा नभस्तः ? ॥ ५ ॥
कथं चरणयोरेव पतितम् ? [सर्वे सविस्मयं निरूपयन्ति]
जीमूतकेतुः— अये ! कथं लग्नसरसमांसकेशचूडामणिः² !
कस्य पुनरयं स्यात् ?
श्लोकः नं०: ४, अन्वयः —
हतचक्षुः दक्षिणेतर ! मुहुः मुहुः मम अनिष्टं सूचयन् किमु
स्फुरसि ! ते स्फुरितम् अपहतम् ! मम पुत्रकः कुशली !!
श्लोक नं०: ५, अन्वयः —
आलोक्यमानम् अतिलोचनदुःखदायि, निजमरीचिरुचः रक्त-
च्छटाः विमुञ्चत् , उत्पातवाततरलीकृततारकाभम् एतत् नभस्तः
पुरः सहसा किं पतति ?

( २०५ )
जीमूतकेतु—(बाईं आंख का फड़कना सूचित करके) —जीमूतवाहन देर
कर रहा है, इस विचार से मैं मन में व्याकुल हो रहा हूँ।—
हे दुष्ट बाईं आंख ! बार बार मेरे अनिष्ट की सूचना देती हुई
तू क्यों फड़क रही है ? तेरा फड़कना दूर हो ! (और) मेरा
बच्चा सकुशल हो !!
(ऊपर देखकर) यही त्रिलोकी के नेत्रस्वरूप, सहस्र किरणों
वाले भगवान् सूर्य अवश्य ही जीमूतवाहन का कल्याण करेंगे ।
(देखकर, विस्मयपूर्वक)— देखने से आंखों को अति दुःख देने
वाला, अपनी किरणों की शोभा के समान खून की धाराएँ
टपकाता हुआ, उत्पातकारी वायु से हिलाए गए तारे की
कान्ति वाला यह आकाश से (हमारे) सामने एकाएक क्या
गिर रहा है ?
क्या, (मेरे) चरणों पर ही गिर पड़ा ? (सब हैरानी से देखते हैं)
जीमूतकेतु — अरे ! (यह तो) खून से गीले माँस तथा बालों से
लिपटा हुआ चूड़ामणि है । यह किस का हो सकता है ?

  1. जो रस की धाराएँ बहा रही है जी उसकी किरणों के समान
    लग रही हैं ।
  2. सरस=रस वाला; गीला; ताज़ा । (जिस के साथ ख़ून से युक्त
    माँस लगा हुआ है)

( २०६ )

वृद्धा-(सविषादम्) महाराज ! पुत्तअस्स विअ मे एदं चूडारअणं।
                                    महाराज ! पुत्रकस्येव          मे एतच्चूडारत्नम् ।
मलयवती- अम्ब ! मा एवं भण ।
                    अम्ब ! मैवं          भण ।
सुनन्दः- महाराज ! मैवमविज्ञाय विकलवीभूः । अत्र हि-
तार्क्ष्येण भक्ष्यमाणानां पन्नगानामनेककः ।
उल्कारूपाः पतन्त्येते शिरोमणय ईदृशाः ॥ ६ ॥
जीमूतकेतुः-देवि ! सोपपत्तिकमभिहितं सुनन्देन । कदाचि-
देवमपि स्यात् ।
वृद्धा-सुणंदअ ! जाव इमाए वेलाए ससुरसदणं जेव्व
            सुनन्दक ! यावदनया       वेलया       श्वसुरसदनमे-
आअदो मे पुत्तओ भविस्सदि । ता गच्छ, जाणिअ
वागतो मे पुत्रको   भविष्यति । तद्गच्छ     , ज्ञात्वा
लहुं संपादेहि ।
लघु सम्पादय⁴ ।
सुनन्दः — यदाज्ञापयति देवी । [इति निष्क्रान्तः]
जीमूतकेतुः- देवि ! अपि नागचूडामणिः स्यात् ।


श्लोक नं०: ६, अन्वयः—
तार्क्ष्येण भक्ष्यमाणानां पन्नगानाम् एते ईदृशाः उल्कारूपाः शिरो-
मणयः अनेकशः पतन्ति ।