नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
पृष्ठ 209, कुल 309 में से
संदर्भ में पढ़ें( १८५ )
यही उपाय है। अतः शीघ्र ही वध्यचिह्न दे दो ताकि इस से
अपने आप को ढक कर वध्यशिला पर चढ़ जाऊँ ! तुम भी
माता को लेकर इस स्थान से लौट जाओ। कहीं (तुम्हारी)
माता समीप ही वध्यभूमि को देख कर स्त्रीजाति की
स्वाभाविक कायरता से प्राण ही त्याग दे। क्या आप मरे हुए
सांपों के अनेक अस्थिपञ्जरों से भरे हुए (इस) महाश्मशान
को नहीं देख रहे ? वैसे ही—
फड़कती हुई चोंचों से उठाए गए (परन्तु) आधे रास्ते में
ही गिरे हुए मांस के टुकड़ों को पकड़ने की प्रबल इच्छा
वाले, फैलाए हुए दोनों पंखों को लगातार फड़फड़ाने वाले
गीधों के द्वारा जहाँ घोर अन्धकार छा रहा है ऐसे इस
(श्मशान) में लगातार टपकती हुई घनी चर्बी से भीषण दुर्गन्ध
वाली खून की नदी में शृगालियों के मुख से निकलती हुई
अग्नि की लपटें गिरती हुई 'शम्' 'शम्' का शब्द कर रही हैं।
शङ्खचूड़—क्यों नहीं देखता ? (अर्थात् देख ही रहा हूँ)—
प्रतिदिन सांपों के आहार से पक्षिराज (गरुड़) को आनन्द देने
वाला यह श्मशान चन्द्रमा के समान सफेद हड्डियों तथा
खोपड़ियों से युक्त भगवान् रुद्र (शिव) के शरीर के समान
(दीख रहा है)। [वह भी प्रतिदिन सांपों के हार से सुशोभित
गणेश को आनन्द देने वाला है, तथा मस्तक पर स्थित चन्द्रमा
के कारण उजली हड्डियों तथा खोपड़ियों (की माला) से
शोभायमान रहता है।
१. गर्धः = इच्छा, लालच, लोभ । २. अस्र = रक्त खून।
३. वसा = चर्बी; वास = गन्ध; विस्रम् = दुर्गन्ध वाली।
४. तीनों विशेषणों के दो दो अर्थ—देखिए अनुवाद।