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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

( १४२ )
चेटी- णं वञ्चिणादोसि ।
ननु वञ्चितोऽसि ।
विदूषकः- (हस्तेन मुखं प्रमृज्य हस्तं दृष्ट्वा सरोषं दण्डकाष्ठमुद्यम्य)
आः दासीए धीए ! राअउलं क्खु एदं । किं क्ख करिस्सं ?
आः दास्याः पुत्रि ! राजकुलं खल्वेतत् । किं तव करिष्यामि ?
(नायकमुद्दिश्य) भो ! तुम्हाणं पुरदो एव्व अहं दासीए-
भो ! युवयोः पुरत एवाहं दास्याः-
धीआए खलीकिदो । ता किं मम इध ट्ठिदेण ? अण्णदो
पुत्र्या खलीकृतः¹ । तत्किं ममेह स्थितेन ? अन्यतो
गमिस्सं ।
गमिष्यामि । [निष्क्रामति]
चेटी-कुविदो मे अज्जअत्तेओ, जाव णं गदुअ पसादइस्सं ।
कुपितो मे आर्यात्रेयः, यावदेनं गत्वा प्रसादयिष्यामि ।
[गन्तुमिच्छति]
नायिका-हञ्जे चदुरिए ! कहं मं एआइणीं उज्झिअ
हञ्जे चतुरिके ! कथं मामेकाकिनीमुज्झित्वा
गच्छसि ?
गच्छसि ?
चेटी-(नायकमुद्दिश्य सस्मितम् ) एव्वं एआइणी चिरं होहि ।
एवमेकाकिनी चिरं भव ।
[इति निष्क्रान्ता]

( १५३ )
चेटी - सचमुच तुम्हारा वर्णन (रंगन) किया है।
विदूषक- (हाथ से मुंह पोंछ कर, हाथ को देखकर; क्रोध से डण्डा
उठा कर) अरी दुष्टा ! यह राजकुल है। तुम्हारा क्या करूँ ?
(नायक से) आप लोगों के सम्मुख ही इस नीच ने मेरा
अपमान किया है। तो मेरे यहाँ ठहरने से क्या लाभ ? वहीं
और चला जाता हूँ। (निकल जाता है)
चेटी- आर्य आत्रेय मुझ से नाराज़ हो गए ? अतः जाकर उन्हें
मनाती हूँ। (जाना चाहती है)
नायक - सखी चतुरिका ! क्या मुझे अकेली छोड़ कर जा रही हो ?
चेटी- (नायक की ओर देखकर मुस्कराती हुई) ऐसी अकेली (तो)
तू चिरकाल तक रह। [यह कह कर प्रस्थान]

  1. खलीकृत = उल्लू बनाया गया हूँ। इस ने बुरा सलूक किया है।

( १४४ )

नायकः – (नायिकाया मुखं पश्यन् )–
दिनकरकरामृष्टं विभ्रद् द्युतिं परिपाटलां,
दशनकिरणैरुपसर्पद्भिः स्फुटीकृतकेसरम्।
अयि मुखमिदं मुग्धे¹ ! सत्यं समं कमलेन ते,
मधु मधुकरः किन्त्वेतस्मिन् पिबन्न² विभाव्यते ॥१३॥
नायिका-(विहस्य मुखमन्यतो नयति) [नायकः तदेव पठति]
चेटी-(पटाक्षेपेण प्रविश्य, उपसृत्य) एसो क्खु अज्ज मित्तावसु
एष खल्वार्यमित्रावसुः
कज्जेण केण वि कुमारं पेक्खिदुं आअदो।
कार्येण केनापि कुमारं प्रेक्षितुमागतः ।
नायकः-प्रिये ! गच्छ त्वमात्मनो गृहम् । अहमपि मित्रावसुं
दृष्ट्वा त्वरितमागत एव ।
नायिका – (चेट्या सह निष्क्रान्ता)
[ततः प्रविशति मित्रावसुः]


श्लोक नंः १३, अन्वयः—
अयि मुग्धे ! दिनकरकरामृष्टं परिपाटलां द्युतिं विभ्रत् उपसर्पद्भि
दशनकिरणैः स्फुटीकृतकेसरम् इदं ते मुखं सत्यं कमलेन समम् ;
किन्तु एतस्मिन् (मुखकमले) मधु पिबन् (कोऽपि) मधुकरः
न विभाव्यते ॥

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(१४६)
मित्रावसुः-अनिहत्य तं सपत्नं कथमिव जीमूतवाहनस्याहम् ।
कथयिष्यामि हतं तव राज्यं रिपुणेति निर्लज्जः ? ॥१४॥
अनिवेद्य च न युक्तं गन्तुमिति निवेद्य गच्छामि ।
(इत्युपसर्पति)
नायकः-(मित्रवसुं दृष्ट्वा) - मित्रावसो ! इत आस्यताम् ।
मित्रावसुः— (उपविशति )
नायकः — (निरूप्य)— मित्रावसो ! संरब्ध ¹ इव लक्ष्यसे
मित्रावसुः — कः खलु मतङ्गेहतके ² संरम्भः ?
नायक — किं कृतं मतङ्गेन ?
मित्रावसुः- स्वनाशाय किल युष्मदीयं राज्यमाक्रान्तम् ।
नायकः— (सहर्षमात्मगतम् ) अपि नाम सत्यमेतत्स्यात् !
मित्रावसुः — अतस्तदुच्छित्तये आज्ञां दातुमर्हति कुमारः ।
किं बहुना ?–

श्लोक नं० : १४, अन्वयः—
जीमूतवाहनस्य तं सपत्नम् अनिहत्य अहं निर्लज्जः कथं
कथयिष्यामि (यत् ) तव राज्यं रिपुणा हतम् इति ।

( १४७ )
मित्रावसु- जीमूतवाहन के उस शत्रु को मारे बिना मैं निर्लज्ज बन कर
(इसे) कैसे कहूँ कि आपका राज्य शत्रु ने हर लिया है ?
और इसे यह सूचना दिए बिना जाना भी उचित नहीं, अतः
कह कर (ही) जाता हूँ ।
नायक-(मित्रावसु को देखकर)- मित्रावसु ! इधर बैठिए !
मित्रावसु - (बैठ जाता है)
नायक - (अच्छी तरह देखकर) मित्रावसु ! कुछ घबराए हुए से
दीखते हो ?
मित्रावसु - दुष्ट मतङ्ग के विषय में क्या घबराहट (हो सकती है) ?
नायक - (क्यों) मतङ्ग ने क्या किया है ?
मित्रावसु-अपने नाश के लिए उसने आप के राज्य को हड़प लिया है ।
नायक - (प्रसन्नता पूर्वक, मन ही मन) काश कि यह सच हो !
मित्रावसु- अतः उसके विनाश के लिए कुमार आज्ञा दें । अधिक क्या ?--
१. क्रुद्ध; जोश में; आवेश में; घबराए हुए ।
२. 'हतक' समास के अन्त में आता है। अर्थ है 'दुष्ट', 'नीच' ।

( १४८ )
संसर्पद्भिः समन्तात्कृतसकलवियन्मार्गयानैर्विमानैः
कुर्वाणाः प्रावृषीव स्थगितरविरुचः श्यामतां वासरस्य
एते याताश्च सद्यस्तव वचनमितः प्राप्य युद्धाय सिद्धाः,
सिद्धश्वोद्वृत्तशत्रुक्षयभयविनमद्राजकं ते स्वराज्यम् ॥१५॥
अथवा किं बलौघैः —
एकाकिनाऽपि हि मया रभसाऽवकृष्ट-
निस्त्रिंशदीधितिसटाभरभासुरेण।
आरान्निपत्य हरिणेव मतङ्गजेंद्र-
माजौ मतङ्गहतकं हतमेव विद्धि ॥ १६ ॥
नायकः-(कर्णौ पिधाय आत्मगतम् ) अहह दारुणमभिहितम् ।
अथवा एवं तावत् । (प्रकाशम्) मित्रावसो कियदेतत् ?
बहुतरमतोपि बाहुशालिनि त्वयि सम्भाव्यते ।
श्लोक नं०: १५, अन्वयः —
समन्तात् संसर्पद्भिः कृतसकलवियन्मार्गयानैः विमानैः
प्रावृषीव स्थगितरविरुचः वासरस्य श्यामतां कुर्वाणाः
एते सिद्धाः तव वचनं प्राप्य इतः युद्धाय सद्यः याताश्च
उद्वृत्तशत्रुक्षयभयविनमद्राजकं ते स्वराज्यं सिद्धञ्च ॥
श्लोक नं०: १६, अन्वयः —
एकाकिनापि हि रभसावकृष्ट-निस्त्रिंशदीधितिसटाभरभासुरेण
मया आरात् निपत्य हरिणा इव मतङ्गजेंद्रम् आजौ मतङ्गहतकं
हतमेव विद्धि ।

( १४६ )
आप की आज्ञा प्राप्त करके शीघ्र ही ये सिद्ध लोग अपने
विमानों में चल पड़ेंगे जो आकाश में चारों तरफ़ उड़ते हुए
वर्षा ऋतु के (बादलों के) समान सूर्य की किरणों को छुपा कर
दिन को अन्धकारमय कर देंगे । (फिर) उद्दण्ड शत्रु (मतङ्ग)
के मारे जाने पर (शेष) राजागण डरके मारे झुक जायेंगे और
आप का राज्य सिद्ध (वश में) हो जाएगा ।
अथवा, सेना के समूह की भी क्या आवश्यकता है ?—
वेग के साथ निकाली हुई तलवार की किरणों रूपी (शेर की
गर्दन के) बालों से देदीप्यमान मुझ अकेले के द्वारा ही उस
दुष्ट मतङ्ग को युद्ध में उसी तरह मारा गया ही समझो जैसे
समीप से ही झपट कर शेर के द्वारा हाथियों का राजा ।
नायक—(कान बन्द कर, मन ही मन) आह, (इसने) बड़े कठोर शब्द
कहे हैं । अथवा, इस प्रकार कहता हूँ । (प्रकट) मित्रावसु !
(तुम्हारे आगे) यह (काम) कितना है ? तुम जैसे वीर से तो
इस से भी बहुत अधिक सम्भव है ।


  1. ढकना; छिपाना; रोकना ।
  2. उद्द्वृत्त = गर्वित; उद्दण्ड; उच्छृङ्खल ।
  3. राजकं = राजाओं का इकट्ठ; राजागण ।
    4: आजि = युद्ध ।
  4. बड़ी भुजाओं वाला । जिस में भुज-बल अधिक है । वीर ।

( १५० )
किन्तु—स्वशरीरमपि परार्थे यः खलु दद्यादयाचितः कृपया ।
राज्यस्य कृते¹ स कथं प्राणिवधक्रौर्यमनुमन्ये ? ॥१७॥
अपि च, क्लेशान्² विहाय मम शत्रुबुद्धिरेव नान्यत्र ।
यदि त्वमस्मत्प्रियं कर्तुमीहसे, तदनुकम्प्यतामसौ
राज्यस्य कृते क्लेशदासीकृत³स्तपस्वी ।
मित्रावसुः – (सामर्षं सहासञ्च) कथं नानुकम्पनीय ईदृशो-
ऽस्माकमुपकारी, कृपणश्च⁴ ।
नायकः- (स्वगतम् ) अनिवार्यसंरम्भः प्रत्यग्रकोपाक्षिप्तचेता
न तावदयं शक्यते निवर्तयितुम् । तदेवं तावत् ।
(प्रकाशम् ) मित्रावसो, उत्तिष्ठ, अभ्यन्तरमेव
प्रविशावः। तत्रैव त्वां बोधयिष्यामि । सम्प्रति
परिणतमहः। तथाहि—
श्लोक नं०: १७, अन्वयः
यः खलु अयाचितः (अपि) कृपया परार्थं स्वशरीरम् अपि दद्यात्
सः (अहं) राज्यस्य कृते कथं प्राणिवधक्रौर्यम् अनुमन्ये ?

( १५१ ) :
किन्तु—जो बिना मांगे ही कृपा से दूसरे के हित के लिए
अपना शरीर भी दे सकता है वह मैं राज्य के लिए कैसे जीवों
को मारने की क्रूरता की अनुमति दे सकता हूँ ?
और भी, क्लेशों को छोड़ मैं किसी और को शत्रु ही नहीं
मानता। यदि तुम मेरा हित करना चाहते हो तो राज्य के
लिए क्लेशों का दास बनने वाले उस बेचारे (मतङ्गदेव) पर
दया करो।
मित्रावसु— (क्रोध पूर्वक, हँसते हुए) (हाँ जी) हम पर उपकार करने
वाले, ऐसे बेचारे ग़रीब पर दया क्यों नहीं करनी चाहिए ?
नायक— (मन ही मन) (इस समय) यह बड़े जोश में हैं। ताज़ा गुस्से
से आक्रान्त चित्त वाले इस को रोकना सम्भव नहीं। तो इस
प्रकार (कहता हूँ)— (प्रकट) मित्रावसु ! उठो भीतर ही चलें।
वहीं तुम्हें समझाऊँगा ! अब तो दिन ढल गया है। क्योंकि—

  1. कृते = के लिए। इस के साथ षष्ठी का प्रयोग है।
  2. क्लेश = पीड़ा, कष्ट, दुःख। बौद्ध शास्त्रों के अनुसार 'क्लेश'
    पाप हैं जो पाञ्च हैं; यथा— अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष,
    अभिनिवेश।
  3. तपस्वी = दया का पात्र; बेचारा।
  4. दूसरा पाठ 'कृतज्ञः' है जिस का अर्थ है 'किए हुए उपकार को
    मानने वाला।'

( १५२ )
निद्रामुद्राऽवबन्धव्यतिकरमनिशं¹ पद्मकोशादपास्य-
न्नाशा²पूरैककर्मप्रवणनिजकरप्रीणिताशेषविश्वः ।
³दृष्टः सिद्धैः प्रसक्तस्तुतिमुखरमुखैरस्तमप्येष गच्छ-
न्नेकः श्लाघ्यो विवस्वान् परहितकरणायैव यस्य प्रयासः॥१८॥
[इति निष्क्रान्ताः सर्वे]
इति तृतीयोऽङ्कः ।
श्लोक नं० १८, अन्वयः —
पद्मकोशात् निद्रामुद्रावबन्धव्यतिकरम् अनिशम् अपास्यन् ,
आशापूरैककर्मप्रवणनिजकरप्रीणिताशेषविश्वः, अस्तमपि
गच्छन् प्रसक्तस्तुतिमुखरमुखैः सिद्धैः दृष्टः, एष एकः विवस्वान्
(एव) श्लाघ्यः, यस्य प्रयासः परहितकरणाय एव (भवति) ।

( १५३ )
कमल के कोश से निद्रा की मुद्रा के बन्धन को लगातार दूर
करने वाला (कमल को विकसित करके उसमें बन्द भौंरे को
स्वतन्त्र करने वाला), आशाओं (दिशाओं अथवा इच्छाओं) को
पूर्ण करने में लगी हुई अपनी किरणों से समग्र संसार को
प्रसन्न करने वाला, अस्त होते हुए भी स्तुति से मुखरित मुखों
वाले सिद्धों द्वारा दर्शन किए जाने वाला— यह एक सूर्य ही
प्रशंसा के योग्य है जिस का (सारा) प्रयत्न दूसरों का हित करने
के लिए ही (है) । [सब का प्रस्थान]
तीसरा अङ्क समाप्त

  1. अनिशं = रात दिन; लगातार; सदा ।
  2. आशा = (i) दिशा; (ii) इच्छा ।
  3. प्रायः लोग उसी को स्तुति करते हैं जो उदय हो रहा है—
    उन्नति कर रहा है। परन्तु सूर्य की अस्त होते समय भी
    स्तुति हो रही है, क्योंकि वह परोपकारी है।

अथ चतुर्थोऽङ्कः।
[ततः प्रविशति कञ्चुकी गृहीतरक्तवस्त्रयुगलः, प्रतीहारश्च]
कञ्चुकी —
अन्तःपुराणां विहितव्यवस्थः¹ पदे पदे ²संस्खलितानि रक्षन् ।
जरातुरः सम्प्रति दण्डनीत्या सर्व्वा नृपस्यानुकरोमि वृत्तिम् ॥१॥
प्रतिहारः-आर्य्य वसुभद्र ! क्वनु खलु भवान् प्रस्थितः ?
कञ्चुकी-आदिष्टोऽस्मि देव्या मित्रावसुजनन्या- ‘कञ्चुकिन् !
दशरात्रं त्वया यावन्मलयवत्या जामातुश्च रक्तवासांसि
नेतव्यानि’ इति । दुहिता च श्वशुरकुले वर्त्तते ।
जीमूतवाहनोऽपि युवराजेन सह समुद्रवेलां द्रष्टुमद्य
गत इति श्रूयते । तन्न जाने किं राजपुत्र्याः सकाशं
गच्छामि अथवा जामातुरिति ।
प्रतीहारः- आर्य्य ! वरं ! राजपुत्र्याः सकाशं गन्तव्यम् । तत्र
हि कदाचिदस्यां वेलायां जामाता स्वयमेवागतो
भविष्यति ।
कञ्चुकी- साधूक्तम् । अथ भवान् पुनः क्व प्रस्थितः ?
श्लोक नं०: १, अन्वयः—
अन्तः पुराणां विहितव्यवस्थः, पदे पदे संस्खलितानि रक्षन् ;
सम्प्रति जरातुरः दण्डनीत्या नृपस्य सर्वां वृत्तिम् अनुकरोमि।

चौथा अङ्क
[दो लाल वस्त्र लिए हुए कञ्चुकी और द्वारपाल का प्रवेश]
कञ्चुकी – अन्तःपुर (अथवा नगर के बीच) व्यवस्था करने वाला,
पग पग पर ठोकरों को बचाता हुआ (अथवा, त्रुटियों या
ग़लतियों का समाधान करता हुआ), एवं वृद्धावस्था से विह्वल
हुआ (हाथ में) डण्डा लेकर (अथवा दण्डनीति का आश्रय
लेकर) मैं राजा के सारे आचरण का अनुकरण कर
रहा हूँ।
प्रतीहार – आर्य वसुभद्र ! आप किधर चल पड़े हैं।
कञ्चुकी – मित्रावसु की माता, महारानी जी, ने मुझे आज्ञा दी है कि
“हे कञ्चुकी ! दस रात तक आप मलयवती और दामाद
(जीमूतवाहन) के पास (माङ्गलिक) लाल वस्त्र ले जाया करें”।
पुत्री (मलयवती) तो ससुराल में है। और जीमूतवाहन भी
सुना है कि युवराज (मित्रावसु) के साथ आज समुद्र-तट देखने
गए हैं। अतः मेरी समझ में नहीं आता कि राजकुमारी के
पास जाऊँ या दामाद के पास।
प्रतीहार – आर्य ! राजपुत्री के पास ही जाना ठीक होगा। सम्भवतः
दामाद स्वयं भी इस समय तक वहीं आ गए होंगे।
कञ्चुकी – तुमने ठीक कहा है। अच्छा, तो तुम किधर जा रहे हो ?

  1. व्यवस्था = इन्तज़ाम, प्रबन्ध, अनुशासन ।
  2. अन्तःपुर, सँस्खलितानि, दण्डनीत्या- के दो दो अर्थ हैं, एक
    कञ्चुकी के साथ दूसरा राजा के साथ। देखिए अनुवाद !
    ( १५५ )

( १४८ )
नायकः- (आकर्ण्य) सम्यगुपलक्षितम्-
उद्गर्जज्जलकुञ्जरेन्द्ररभसास्फालानुबन्धोद्धतः,
सर्वाः पर्वतकन्दरोदरभुवः कुर्वन् प्रतिध्वानिनीः।
उच्चैरुच्चरति ध्वनिः श्रुतिपथोन्माथी यथाऽयं तथा
प्रायः प्रेङ्खदसङ्ख्यशङ्खवलया वेलेयमागच्छति ॥३॥
मित्रावसुः- नन्वियमागर्तैव, पश्य-
कवलितलवङ्गपल्लवकरिमकरोद्गारिसुरभिणा पयसा।
एषा समुद्रवेला रत्नद्युतिरञ्जिता भाति ॥ ४ ॥
तदेतस्माज्जलप्रसरणमार्गादपक्रम्यानेनैव गिरिसानु-
समीपमार्गेण परिक्रमावः।
नायकः- मित्रावसो ! पश्य, पश्य, शरत्समयपाण्डुभिः
पयोदपटलैः प्रावृत्ताः प्रालेयाचलशिखरश्रियमुद्वहन्त्येते
मलयसानवः।
मित्रावसुः- नैवामी मलयसानवः, नागानामस्थिसङ्घाताः
खल्वमी।
श्लोक न० ३, अन्वयः-उन्मज्जत् जलकुञ्जरेन्द्र रभसास्फालानुबन्धोद्धत
सर्वाः पर्वतकन्दरोदरभुवः प्रतिध्वानिनी कुर्वन्
श्रुतिपथोन्माथी अयं ध्वनिः यथा उच्चैः उच्चरति
तथा प्रायः प्रेङ्खदसङ्ख्यशङ्खवलया इयं वेला आगच्छति ॥
श्लोक न० ४, अन्वयः-कवलितलवङ्गपल्लवकरिमकरोद्गारिसुरभिणा पयसा
रत्नद्युतिरञ्जिता एषा समुद्रवेला भाति ॥

( १५६ )
नायक (सुनकर) - आपने ठीक देखा है—
ज़ोर से गर्जने वाले जलहस्तियों के वेग से (किए गए) सूंड़ों के
आघातों से प्रचण्ड, पर्वत की समस्त कन्दराओं को गूँजाता
हुआ, कानों को बहरा करता हुआ यह शब्द जैसे ऊँचे स्वर में
उठ रहा है उस से (जान पड़ता है) कि बहुत उछलते हुए
असंख्य शंखों को धारण करने वाली यह समुद्रवेला (जल की
बाढ़। आ रही है।
मित्रावसु—यह तो सचमुच आ ही गई। देखिए—
लवङ्ग (लौंग) के कोमल पत्तों को खाने वाले जलहस्तियों तथा
मगरमछों के उद्गार से सुगन्धित जल के साथ, रत्नों की प्रभां
से देदीप्यमान यह समुद्रवेला (बाढ़) सुशोभित है।
अतः आइए पानी के फैलने के इस मार्ग से हट कर इस पहाड़
की चोटी के पास वाले रास्ते से चलें।
नायक - मित्रावसु ! देखों, देखो; शरत्काल के श्वेत बादलों के
समूह से ढकी हुई मलय पर्वत की चोटियां हिमालय की
चोटियों की शोभा को धारण कर रही हैं।
मित्रावसु — यह मलय पर्वत की चोटियां नहीं हैं। ये तो सांपों की
हड्डियों के ढेर हैं।

  1. प्रायः = सम्भवतः ; शायद । अथवा, बहुत. - 'प्रेङ्खत्' का क्रिया-
    विशेषण ।
  2. वेला = जल की बाढ़ । ज्वार भाटा ।
  3. कवलित = खाए हुए ।
  4. उद्गार = वमन । जो मुहँ से निकाला जाए। अथवा, श्वास, सांस ।
  5. प्रालेय = हिम; बर्फ़ । प्रालेयाचल = हिमाचल, हिमालय ।
  6. सङ्घात = समूह; इकट्ठ ।

( १६० )
नायकः- (सोद्वेगम्) कष्टम् ! किं निमित्तममी सङ्घात-
मृत्यवो जाताः ?
मित्रावसुः- कुमार ! नैवामी सङ्घातमृत्यवः । श्रूयतां यथैतत् ।
पुरा किल स्वपक्षपवनापास्तसमस्तसागरजलस्तरसा
रसातलादुद्धृत्य भुजङ्गमाननुदिनमाहारयति स्म
वैनतेयः ।
नायकः- (सोद्वेगम्) कष्टम् ! अतिदुष्करं करोति । ततस्ततः ।
मित्रावसुः- ततः सकलनागविनाशाशङ्किना ¹ वासुकिना
गरुत्मानभिहितः ।
नायकः- (²सादरम्) किं 'मां प्रथमं भक्षय' इति ?
मित्रावसुः - न हि, न हि ।
नायकः- किमन्यत् ?
मित्रावसुः - इदमुक्तम्- ³'त्वदभिसम्पातसन्त्रासात्सहस्रशः
स्रवन्ति ⁴भुजङ्गमाङ्गनानां गर्भाः, शिशवश्च पञ्चत्व⁵-
मुपयान्ति। एवञ्च सन्ततिविच्छेदादस्माकं तवैव स्वार्थ-
हानिर्भवेत् । यदर्थमभिपतति भवान्नागलोकं तमिह
नागमेकैकमनुदिनं प्रेषयामि ।'
नायकः- कष्टमेवं रक्षिता नागराजेन पन्नगाः ।

( १६१ )
नायक — (उद्वेग पूर्वक) आह ! बड़े दुःख की बात है। किस कारण
इन की एक साथ मृत्यु हुई है ?
मित्रावसु — कुमार ! यह एक साथ नहीं मरे। सुनिए, यह जैसे (हुआ) ।
प्राचीनकाल में, अपने पंखों की वायु से समुद्र के सम्पूर्ण जल
को हटा कर, गरुड़ वेग के साथ पाताल से सांपों को निकाल
कर प्रतिदिन खाया करता था।
नायक— (उद्वेग पूर्वक) हाय ! बहुत बुरा किया ! तो, फिर ?
मित्रावसु — तब सब सांपों के नाश की शङ्का करने वाले वासुकि ने
गरुड़ से कहा—
नायक — (आदर पूर्वक)— कि "(इन से) पहिले मुझे खाओ ?"
मित्रावसु — नहीं, नहीं ।
नायक — और क्या (कहा) ?
मित्रावसु— यह कहा कि हे गरुड़) ! आप की झपट के डर से हज़ारों
नागस्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं और बच्चे मर जाते हैं। इस
प्रकार हमारी सन्तान के नाश से आप के ही स्वार्थ की हानि
होगी । (अतः) जिस लिए आप नागलोक पर आक्रमण करते
हैं उस (उद्देश्य की पूर्ति) के लिए यहीं एक एक सांप प्रति
दिन मैं भेज दिया करूँगा ।"
नायक — आह ! इस प्रकार वासुकि ने सांपों की रक्षा की ?

  1. शङ्क=शक, डर, भय । 2.आदर=उत्कंठा के अर्थ में ।
  2. अभिसम्पात=आक्रमण, झपटा; किसी पर टूट पड़ना; ऊपर से
    ज़ोर से गिरना । 4. भुजगः भुजंगः, भुजंगमः तीनों का
    एक ही अर्थ है । इसी प्रकार तुरगः, तुरंगाः तुरंगमः का ।
  3. जिन पांच तत्वों से शरीर बना है, उन्हीं में मिल जाना, अर्थात्
    मर जाना ।

जिह्वासहस्रद्वितयस्य¹ मध्ये नैकापि सा तस्य किमस्ति जिह्वा।
एकाहिरक्षार्थमहिद्विषेऽद्य दत्तो मयात्मेति यया ब्रवीति ॥५॥
मित्रावसुः- प्रतिपन्नं तत् पक्षिराजेन —
इत्येष भोगिपतिना विहितव्यवस्थो²
यान् भक्षयत्यहिपतीन् पतगाधिराजः।
यास्यन्ति यान्ति च गताश्च दिनैर्विवृद्धिं,
तेषाममी तुहिनशैलरुचोऽस्थिकूटाः ॥६॥
नायकः- आश्चर्यम् !!!
सर्वाशुचिनिधानस्य कृतघ्नस्य³ विनाशिनः ।
शरीरकस्यापि⁴ कृते मूढाः पापानि कुर्वते ॥७॥
श्लोक नं०: ५, अन्वयः —
किं जिह्वासहस्रद्वितयस्य मध्ये तस्य एका अपि सा जिह्वा नास्ति, यया
(स) ब्रवीति — "एकाहिरक्षार्थम् , अहिद्विषे मया आत्मा दत्तः” इति।
श्लोक नं०: ६, अन्वयः—
इति भोगपतिना विहितव्यवस्थः एष पतगाधिराजः यान् अहिपतीन्
भक्षयति तेषां तुहिनशैलरुचः अमी अस्थिकूटाः दिनैः विवृद्धिं गताः,
यान्ति च, यास्यन्ति च"
श्लोक नं०: ७, अन्वयः—
सर्वाशुचिनिधानस्य कृतघ्नस्य विनाशिनः
शरीरकस्यापि कृते मूढाः पापानि कुर्वते :

४. चतुर्थ अङ्क: वधशिला पर जीमूतवाहन का आत्म-बलिदान

[Page 163]

( १६३ )

क्या उस की दो हज़ार जिह्वाओं मे से एक भी जिह्वा ऐसी
न थी जिस से वह कह सकता कि 'एक सांप की रक्षा के लिए
मैं अपने आप को गरुड़ के हवाले करता हूँ'?
मित्रावसु— गरुड़ ने इसे स्वीकार कर लिया।—
इस प्रकार वासुकि से व्यवस्था करके यह पक्षिराज गरुड़ जिन
बड़े बड़े सांपों को खाता रहा है उन के— बर्फ़ के पहाड़ की
शोभा को धारण करने वाले — ये हड्डियों के ढेर दिन प्रति दिन
वृद्धि को प्राप्त हुए हैं, हो रहे हैं और होते रहेंगे।
नायक —कितने आश्चर्य की बात है !!!
सब अपवित्रताओं के घर, कृतघ्न और नाशवान् इस निकम्मे
शरीर के लिए भी मूर्ख लोग पाप कमाते हैं ! आह ! दुःख की


  1. द्वितय = जोड़ा। जिह्वाओं के हज़ार जोड़े। सांप की जिह्वा
    बीच में से कटी होने के कारण दो जिह्वाएँ गिनी जाती हैं।
  2. व्यवस्था = इन्तज़ाम, प्रबन्ध, फ़ैसला; समझौता।
  3. शरीर को कृतघ्न इस लिए कहा है कि चाहे कितना ही सेवा
    करके बना कर उसे रखा जाए, फिर भी एक न एक दिन
    वह हमें धोखा देकर छोड़ जाता है।
  4. "क" अकिञ्चन, नाचीज़, निकम्मा के अर्थ में लगा है।
    'क' घृणा अथवा निन्दा के योग में।