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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 309 में से

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पृष्ठ 177

( १४७ )
मित्रावसु- जीमूतवाहन के उस शत्रु को मारे बिना मैं निर्लज्ज बन कर
(इसे) कैसे कहूँ कि आपका राज्य शत्रु ने हर लिया है ?
और इसे यह सूचना दिए बिना जाना भी उचित नहीं, अतः
कह कर (ही) जाता हूँ ।
नायक-(मित्रावसु को देखकर)- मित्रावसु ! इधर बैठिए !
मित्रावसु - (बैठ जाता है)
नायक - (अच्छी तरह देखकर) मित्रावसु ! कुछ घबराए हुए से
दीखते हो ?
मित्रावसु - दुष्ट मतङ्ग के विषय में क्या घबराहट (हो सकती है) ?
नायक - (क्यों) मतङ्ग ने क्या किया है ?
मित्रावसु-अपने नाश के लिए उसने आप के राज्य को हड़प लिया है ।
नायक - (प्रसन्नता पूर्वक, मन ही मन) काश कि यह सच हो !
मित्रावसु- अतः उसके विनाश के लिए कुमार आज्ञा दें । अधिक क्या ?--
१. क्रुद्ध; जोश में; आवेश में; घबराए हुए ।
२. 'हतक' समास के अन्त में आता है। अर्थ है 'दुष्ट', 'नीच' ।