मूलमध्यमककारिका (आचार्य नागार्जुन - चन्द्रकीर्ति प्रणीत प्रसन्नपदा व्याख्या सहित)
Mulamadhyamakakarika of Nagarjuna with Prasannapada Commentary
आचार्य नागार्जुन (टीकाकार: आचार्य चन्द्रकीर्ति) द्वारा
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xxviii मध्यमकशास्त्र
(५) महायानविंशिका ;
(६) अक्षरशतक और उसकी व्याख्या;
(७) प्रतीत्यसमुत्पादहृदय और उसकी टीका;
(८) चतुःस्तव;
(९) प्रज्ञापारमितास्तोत्र;
(१०) भावनाक्रम;
(११) सूत्र-समुच्चय यानी महायान सूत्रों का संग्रह;
(१२) सुहृल्लेख या आर्य नागार्जुनबोधिसत्त्व सुहृल्लेख ;
(१३) भवसंक्रान्ति;
(१४) रत्नावली; और
(१५) वैद्यल-प्रकरण
धर्मसंग्रह नामक रचना, जो बौद्ध पारिभाषिक शब्दों का संग्रह है (अॅनेक्डोटा
ऑक्सोनिऐंशिया जिल्द-१ भाग ५ में संपादित और जो पुस्तक के अंत के संकल्प में
नागार्जुन लिखित बतायी गयी है, इस तत्त्वज्ञ की असली कृति नहीं प्रतीत होती। उनके
बाद के किसी और नागार्जुन की हो सकती है, जो कि संभवतः हीनयानी हो।
उपर्निर्दिष्ट रचनाओं में से कतिपय मूल संस्कृत में उपलब्ध हैं, किन्तु बाकी
रचनाएँ तिब्बती और चीनी अनुवादों से ही ज्ञात हैं।
तारानाथ (Geschichte पृ. ७१) कहते हैं कि हीनयानियों ने शतसाहस्रिका
प्रज्ञापारमिता का कर्त्ता नागार्जुन को बताया है, लेकिन यह संभवनीय नहीं मालूम होता।
प्रज्ञापारमिता - वाङ्मय - पंचविंशति और अष्टसाहस्रिका जैसी रचनाएँ -- पहले ही से विद्य-
मान था । तिब्बती परंपरा में मध्यमकशास्त्रकारिका के वैकल्पिक नाम 'प्रज्ञा' तथा
'प्रज्ञापारमिता' में जो शब्दसादृश्य है उसीके कारण यह भ्रम संभव दीखता है। वास्तव में
नागार्जुनने प्रज्ञापारमिता वाङ्मय तथा अन्य महायानसूत्रों का संहितीकरण अपनी कारिकाओं
में किया है जिस प्रकार बादरायण ने उपनिषदों की शिक्षा का शारीरकसूत्रों में ।
नागार्जुन या (Klu-sgrub) नागार्जुनगर्भ के नाम पर तोहोकू सूची में
निर्दिष्ट १२२ रचनाओं में से महत्वपूर्ण और असली रचनाएँ ऊपर की सूची में समाविष्ट
हैं। अन्य रचनाएँ अप्रधान तथा अधिकांश तंत्रविषयक हैं।
५. नागार्जुन और उनकी शिष्यपरंपरा
आर्यदेव या देव नागार्जुन का खास व्यक्तिगत अंतेवासी बतलाया गया है। उसकी
रचनाएँ हैं चतुःशतक, हस्तवालप्रकरण, और कतिपय छोटी रचनाएँ। उनके उत्तराधिकारी
टीकाकारों में बुद्धपालित, भव्य या भावविवेक, तथा चंद्रकीर्ति के नाम बताये जा सकते
हैं। बुद्धपालित की एक ही रचना मध्यमकशास्त्र की टीका तिब्बती में प्राप्त है। उसकी
अपेक्षा भव्य या भावविवेक की रचना अधिक विपुल है । प्रज्ञाप्रदीप नामक मध्यमकशास्त्र
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प्रस्तावना । xxix
की टीका के अतिरिक्त उसकी माध्यमिक सिद्धान्त-विषयक कई रचनाएँ हैं, जिनके नाम ये
हैं; — १. मध्यमकरत्नप्रदीप २. मध्यमकहृदय -- तर्कज्वाला टीकासंबलित ३. मध्यमक build-अर्थ-
संग्रह (तीनों तिब्बती अनुवाद में प्राप्त); ४. करतलरत्न — चीनी अनुवादसे ज्ञात हाल में
संस्कृत में रूपान्तरित (Nanjio क्र-१२३७); ५. निकायभेदविभंगव्याख्या, बौद्ध धर्म
की १८ शाखाओं का विवरणः और ६ तत्त्वामृतावतार (ऊपर क्रमांक ४ में दो बार
निर्दिष्ट)।
तारानाथ और उनका अनुसरण करते हुए शिएफ्नर (पृ. १७४) कहते हैं कि
देवशमनिने मध्यमकशास्त्र पर सीताभ्युदय नामक टीका लिखी है, जिसमें चन्द्रकीर्ति के
मतों का खंडन किया है। मूल संस्कृत रचना अप्राप्य है, और उसका निर्देश तक 'तंजुर'
या 'कंजुर' में नहीं मिलता।
मध्यमकशास्त्र पर जो टीकाग्रंथ रचे गये हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण चंद्रकीर्ति-कृत
प्रसन्नपदा है। चंद्रकीर्ति माध्यमियों के 'प्रसंग संप्रदाय' का अनुयायी था। उसका दावा
है कि नागार्जुन की स्थापनाओं का आशय सच्चाई के साथ समझाने का सफल प्रयास
उसने कारिकाओं की टीका में किया है। बुद्धपालित और भव्य की टीकाओं का उल्लेख
उसने किया है, और कई स्थलों में भव्य की मान्यताओं का खंडन भी किया है। उसकी
टीका यथार्थ ही प्रसन्नपदा है, और शैली की प्रसन्नता की दृष्टि से वह शंकराचार्य के
ब्रह्मसूत्रभाष्य की पूर्ववर्ती पथ-निर्देशिका है। ऊपर इस टीकाके कई उद्धरण दिये गये हैं,
जिनसे पाठक उसकी विवेचनशैली की झांकी पा सकते हैं। अपनी स्थापनाओं के पुष्ट्यर्थ
उसने महायानसूत्रों से पर्याप्त उद्धरण लिये हैं। भव्य के समान ही उसने माध्यमिक संप्रदाय
पर छोटी छोटी पुस्तिकाएँ लिखी हैं: — (१) मध्यमावतार-पद्यमय षडध्यायी सटीक
रचना; (२) मध्यमक-प्रज्ञावतार; (३) पंचस्कंध प्रकरण। इनके अलावा उसने
नागार्जुन कृत युक्तिषष्टिका और शून्यतासप्तति पर तथा आर्यदेवविरचित चतुःशतक पर
टीकाएँ भी लिखी हैं। प्रसन्नपदा तथा चतुःशतक-टीका के कुछ खंडों को छोड़कर बाकी
सब रचनाएँ तिब्बती में सुरक्षित हैं।
चंद्रकीर्ति के बाद माध्यमिक संप्रदाय के लेखकों में दो ही नाम उल्लेखनीय हैं —
(१) शिक्षासमुच्चय तथा बोधिचर्यावतार का कर्ता शांतिदेव और (२) बोधिचर्यावतार
का टीकाकार प्रज्ञाकरमति।
पूना प. ल. वैद्य
१ जनवरी, १९५९
ABBREVIATIONS
AK (अ०क०)—Avadāna-kalpalatā of Kṣemendra, Bibliotheca Indica
edition; our edition in BST Nos. 22-23.
AŚ (अ० श०)—Avadāna-Śataka by J. S. Speyer, Bibliotheca Buddhica
edition; our edition is BST No. 19.
Aṣṭa (अष्ट०)—Aṣṭasāhasrikā Prajñāpāramitā, ed. by Rajendralal Mitra.
BC—Buddhacarita of Aśvaghoṣa, edns. by Cowell and Johnstone;.
BCA—Bodhicaryāvatāra of Śāntideva, with Pañjikā of Prajñākaramati,
ed. by Poussin; bare text in Zapiski.
BCP—Bodhicaryāvatārapañjikā of Prajñākaramati, ed. by Poussin.
CP—Cariyāpiṭaka, PTS edition; also by B. C. Law.
CS—Catuhstava of Nāgārjuna (I. Nirupama, II. Lokātīta, III.
Acintya, and IV. Paramārtha).
DA (दिव्या०) Divyāvadāna, our edition in BST No. 20; also Cowell
and Neil's edition.
DBh (द० भ०)—Daśabhūmikasūtra ed. by Rahder.
GM—Gilgit Mss. ed. by N. Dutt.
GV (गण्ड०)—Gaṇḍavyūhasūtra, ed. by Suzuki and Idzumi, Kyoto,
Japan, 1949.
J (जा०)—Jātaka, ed. by Fausböl.
JM (जा०मा०) Jātakamālā of Ārya Śūra, ed. by H. Kern, HOS.; our
edition in BST No. 21.
KV (कारण्ड°)—Kāraṇḍavyūha, BTS edition.
(लङ्का०)—Laṅkāvatārasūtra, ed. by B. Nanjio, Kyoto, Japan, 1923;
reprint 1956.
LV (ललित०)—Lalita-Vistara, our edition in BST No. 1.
MŚ (म०शा०)—Madhyamakaśāstra of Nāgārjuna, our edition in BST
No. 10.
MV (म०वृ०)—Madhyamakavṛtti called Prasannapadā of Candrakīrti, our
edition in BST No. 10.
MVastu (म० व०)—Mahāvastu, ed. by E. Senart.
MVy (म०व्यु०)—Mahāvyutpatti ed. by I. P. Minayeff, Bibliotheca
Buddhica.
RP(राष्ट्र०)—Rāṣṭrapālaparipṛcchā, ed. by L. Feer, Bibliotheca Buddhica.
ŚS (शिक्षा०)—Śikṣāsamuccaya of Śāntideva, ed. by Bendall in Bibliotheca
Buddhica; our edition in BST No. 11.
SA (सूत्राल०) Sūtrālaṁkāra of Asaṅga, ed. by S. Lévi.
SN—Saundarananda of Aśvaghoṣa, edns. by H. P. Shastri and Johnstone.
SR (समाधि)—Samādhirājasūtra ed. by N. Dutt, in GM; our edition in
BST No. 2.
xxxi Abbreviations
SDP (सद्धर्म०)—Saddharmapuṇḍarīkasūtra, ed. by N. Dutt; also by Kern
and Nanjio.
SP (सुवर्ण०)—Suvarṇaprabhāsasūtra. ed. by B. Nanjio and H. Idzumi,
Kyoto, Japan, 1931; also by J. Nobel.
SV (सुखा०)—Sukhāvatīvyūha, ed. by Max Müller.
T—Tibetan translation.
T—(followed by number)—Tohoku Catalogue.
TG (तथा०)—Tathāgataguhyasūtra or Guhyasamāja, GOS edn.
TS (तत्त्वसं०)—Tattvasaṁgraha of Śāntarakṣita, GOS edition.
TTP—Taisho Tripiṭaka, Tokyo, 1924-1934.
VCh (वज्र०)—Vajracchedikā, ed. by Max Müller.
(N.B.—Most of the works mentioned above are planned to be
included in the BUDDHIST SANSKRIT TEXTS Series. The list will
be found at the end of the Volume.)
नागार्जुनीयं
मध्यमकशास्त्रम् ।
आचार्यचन्द्रकीर्तिविरचितया प्रसन्नपदाख्यव्याख्यया
संवलितम् ।
१
प्रत्ययपरीक्षा नाम प्रथमं प्रकरणम् । B 1
आर्यमञ्जुश्रिये कुमारभूताय नमः ।
योऽन्तर्द्वयावास¹विधूतवासः संबुद्धधीसागरलब्धजन्मा ।
सद्धर्मतोयस्य गभीरभावं यथानुबुद्धं कृपया जगाद ॥ १ ॥
यस्य दर्शनतेजांसि परवादिमतेन्धनम् ।
दहन्त्यद्यापि लोकस्य मानसानि तमांसि च ॥ २ ॥ 5
यस्यासमज्ञानवचःशरौघा निघ्नन्ति निःशेषभवारिसेनाम् । B 2
त्रिधातुरराज्यश्रियमार्दधाना विनेयलोकस्य सदेवकस्य ॥ ३ ॥
नागार्जुनाय प्रणिपत्य तस्मै तत्कारिकाणां विवृतिं करिष्ये ।
उत्तानसत्प्रक्रियवाक्यनद्धां तर्कानिलाव्याकुलितां प्रसन्नाम् ॥ ४ ॥
तत्र 'न स्वतो नापि परतो न द्वाभ्याम्' (१.३) इत्यादि वक्ष्यमाणं शास्त्रम् । तस्य 10
कानि संबन्धाभिधानप्रयोजनानि इति प्रश्ने, मध्यमकावतारविहितविधिना अद्वयज्ञानालंकृतं
महाकरुणोपाय³पुरःसरं प्रथमचित्तोत्पादं तथागतज्ञानोत्पत्तिहेतुमार्दिं कृत्वा यावदाचार्यनागार्जुनस्य B 3
विदिताविपरीतप्रज्ञापारमितानीतेः करुणया परावबोधार्थं शास्त्रप्रणयनम्, इत्येष तावच्छास्त्रस्य
संबन्धः —
यैञ्छास्ति वः क्लेशरिपूनशेषांस्त्रायते दुर्गतिंतो भवाच्च । 15
तच्छासनात्त्राणगुणाच्च शास्त्रमेतद्द्वयं⁴ चान्यमतेषु नास्ति ॥
इति । स्वयमेव चाचार्यो वक्ष्यमाणसकलशास्त्राभिधेयार्थं सप्रयोजनमुपदर्शयन्, तद्विपरीत-
संप्रकाशत्वेन माहात्म्यमुद्भाव्य तत्स्वभावाव्यतिरिक्तवर्तिने परमगुरवे तथागताय शास्त्रप्रणयन-
निमित्तकं प्रणामं कर्तुकाम आह —
१. Mss. योऽन्तर्द्वयावास० for योऽन्तद्वयावास० which is confirmed by T. २. T
सद्धर्मकोषस्य for सद्धर्मतोयस्य. ३. T om. उपाय०. ४. T om. this stanza.
पृष्ठम् २ [१.१-]
२ मध्यमकशास्त्रे [१.१-
अनिरोधमनुत्पादमनुच्छेदमशाश्वतम् ।
अनेकार्थमनानार्थमनागममनिर्गमम् ॥
यः प्रतीत्यसमुत्पादम्
[B 4] इत्यादि । तदत्रानिरोधाद्यष्टविशेषणविशिष्टः प्रतीत्यसमुत्पादः शास्त्राभिधेयार्थः । सर्वप्रपञ्चोपशम-
५ लक्षणं निर्वाणं शास्त्रस्य प्रयोजनं निर्दिष्टम् ।
तं वन्दे वदतां वरम् ।
इत्यनेन प्रणामः । इत्येष तावच्छ्लोकद्वयस्य समुदायार्थः ॥
अवयवार्थस्तु विभज्यते । तत्र निरुद्धिर्निरोधः । क्षणभङ्गो निरोध इत्युच्यते । उत्पाद-
मुत्पादः । आत्मभावोन्मज्जनमित्यर्थः । उच्छित्तिरुच्छेदः । प्रबन्धविच्छित्तिरित्यर्थः । शाश्वतो नित्यः ।
१० सर्वकाले स्थाणुरित्यर्थः । एकश्चासावर्थश्चेत्येकार्थोऽभिन्नार्थः । न पृथगित्यर्थः । नानार्थो भिन्नार्थः ।
पृथगित्यर्थः । आगतिरागमः, विप्रकृष्टदेशावस्थितानां संनिकृष्टदेशागमनम् । निर्गतिर्निर्गमः,
[B 5] संनिकृष्टदेशावस्थितानां विप्रकृष्टदेशगमनम् । एतिर्गम्यर्थः, प्रतिः प्राप्यर्थः । उपसर्गवशेन
धात्वर्थविपरिणामात् —
उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते ।
१५ गङ्गासलिलमाधुर्यं सागरेण यथाऽम्भसा ॥
प्रतीत्यशब्दोऽत्र ल्यबन्तः प्राप्तावपेक्षायां वर्तते । समुत्पूर्वः पदिः प्रादुर्भावार्थ इति समुत्पादशब्दः
प्रादुर्भावे वर्तते । ततश्च हेतुप्रत्ययापेक्षो भावानामुत्पादः प्रतीत्यसमुत्पादार्थः ॥
अपरे तु ब्रुवते—इतिर्गमनं विनाशः । इतौ साधव इत्याः । प्रतिर्वीप्सार्थः । इत्येवं
तद्धितान्तमित्यशब्दं व्युत्पाद्य प्रति प्रति इत्यानां विनाशिनां समुत्पाद इति वर्णयन्ति । तेषां
[B 6] २० “प्रतीत्यसमुत्पादं वो भिक्षवो देशयिष्यामि”, “यः प्रतीत्यसमुत्पादं पश्यति स धर्मं
पश्यति” इत्येवमादौ विषये वीप्सार्थस्य संभवात् समाससद्भावाच्च स्याज्ज्यायसी व्युत्पत्तिः । इह
तु “चक्षुः प्रतीत्य रूपाणि च उत्पद्यते चक्षुर्विज्ञानम्” इत्येवमादौ विषये साक्षादङ्गीकृतार्थ-
विशेषे चक्षुः प्रतीत्येति प्रतीत्यशब्दः एकचक्षुरिन्द्रियहेतुकायामप्येकविज्ञानोत्पत्तावभीष्टायां
[B 7] कुतो वीप्सार्थता ? प्राप्यर्थस्त्वनङ्गीकृतार्थविशेषेऽपि प्रतीत्यशब्दे संभवति—प्राप्य संभवः, प्रतीत्य
२५ समुत्पाद इति । अङ्गीकृतार्थविशेषेऽपि संभवति—चक्षुः प्रतीत्य, चक्षुः प्राप्य, चक्षू रूपं चापेक्ष्येति
व्याख्यानात् । तद्धितान्ते चेत्यशब्दे “चक्षुः प्रतीत्य रूपाणि च उत्पद्यते चक्षुर्विज्ञानम्”
इत्यत्र प्रतीत्यशब्दस्याव्ययत्वाभावात् समासासद्भावाच्च विभक्तितौ सत्यां चक्षुः प्रतीत्य विज्ञानं
रूपाणि च इति निपातः स्यात् । न चैतदेवम् । इत्यव्ययस्यैव ल्यबन्तस्य व्युत्पत्तिरभ्युपेया ॥
१. Mss. स्थाणुः for स्यास्नुः (?) २. Mss. बोधि for वो which is confirmed by T.
३. Mss. P चक्षुः प्रेक्ष्येति for चक्षू रूपं चापेक्ष्य which is confirmed by T.
पृष्ठम् ३ [१.१]
१.१] प्रत्ययपरीक्षा प्रथमं प्रकरणम् । ३
[B 8] यस्तु,—“वीप्सार्थत्वात्प्रत्युपसर्गस्य, एतेः प्राप्यर्थत्वात्, समुत्पादशब्दस्य च संभवार्थ-
त्वात्, तांस्तान् प्रत्ययान् प्रतीत्य समुत्पादः प्राप्य संभव इत्येके । प्रति प्रति विनाशिनामुत्पादः
प्रतीत्यसमुत्पाद इत्यन्ये ”—इति परव्याख्यानमनूद्य दूषणमभिधत्ते, तस्य परपक्षानुवादकौशलत्व-
मेव तावत्संभाव्यते । किं कारणम् ? यो हि प्राप्यर्थं प्रतीत्यशब्दं व्याचष्टे, नासौ प्रतिं वीप्सार्थं
५ व्याचष्टे, नान्येति प्राप्यर्थम्, किं तर्हि प्रतिं प्राप्यर्थम्, समुदितं च प्रतीत्यशब्दं प्राप्तावेव वर्णयति ॥ ५
तेन इदानीं प्राप्य संभवः प्रतीत्यसमुत्पाद इत्येवं व्युत्पादितेन प्रतीत्यसमुत्पादशब्देन
यदि निरवशेषसंभविपदार्थपरामर्शो विवक्षितः, तदा तां तां हेतुप्रत्ययसामग्रीं प्राप्य संभव
प्रतीत्य समुत्पाद इति वीप्सासंबंधः क्रियते । अथ विशेषपरामर्शः, तदा चक्षुः प्राप्य रूपाणि
चेति न वीप्सायाः संबन्ध इति ॥ एवं तावदनुवादकौशलमाचार्यस्य ॥
१० एतद्वा अयुक्तम् । किं च । अयुक्तमेतत् “चक्षुः प्रतीत्य रूपाणि च उत्पद्यते चक्षु-
र्विज्ञानम्” इति, अत्रार्थद्वयासंभवात् इति यदुक्तं दूषणम्, तदपि नोपपद्यते । किं कारणम् ?
[B 9] कथमनेनैव तत्राप्तेः संभव इति युक्त्यनुपादानेन प्रतिज्ञामात्रत्वात् । अथायमभिप्रायः स्यात्—
अरूपित्वाद्धिविज्ञानस्य चक्षुषा प्राप्तिर्नास्ति, रूपिणामेव तत्राप्तिदर्शनादिति, एतदपि न युक्तम्,
‘प्राप्तफलोऽयं भिक्षुः’ इत्यत्रापि प्राप्यर्थाभ्युपगमात् । प्राप्यशब्दस्य च अपेक्ष्यशब्दपर्यायत्वात् ।
१५ प्राप्यर्थस्यैव आचार्येणार्यनागार्जुनेन प्रतीत्यशब्दस्य
तत्प्राप्य यदुत्पन्नं नोत्पन्नं तत्स्वभावतः ।
इत्यभ्युपगमात् । ततो दूषणमपि नोपपद्यते इत्यपरे ॥
यच्चापि स्वमतं व्यवस्थापितम्—“किं तर्हि, अस्मिन् सति इदं भवति, अस्योत्पादादिद-
[B 10] मुत्पद्यते, इति इदंप्रत्ययतायाः प्रतीत्यसमुत्पादार्थ इति”, तदपि नोपपद्यते, प्रतीत्यसमुत्पाद-
२० शब्दयोः प्रत्येकमेकविशेषानभिधानात्, तद्व्युत्पादस्य च विवक्षितत्वात् ॥
अथापि रूढिशब्दं प्रतीत्यसमुत्पादशब्दमभ्युपेत्य अरण्येतिलकादिवदेवमुच्यते, तदपि
नोपपन्नम्, अवयवार्थानुगतस्यैव प्रतीत्यसमुत्पादस्य आचार्येण
तत्प्राप्य यदुत्पन्नं नोत्पन्नं तत्स्वभावतः ।
इत्यभ्युपगमात् । अथ
२५ अस्मिन्सतीदं भवति ह्रस्वे दीर्घं यथा सति ।
इति व्याख्यायमानेन ननु तदेवाभ्युपगतं भवति, ह्रस्वं प्रतीत्य, ह्रस्वं प्राप्य, ह्रस्वमपेक्ष्य
दीर्घं भवतीति । ततश्च यदेव दूष्यते तदेवाभ्युपगम्यते इति न युज्यते । इत्यलं प्रसङ्गेन ॥
१. T प्रतीत्यसमुत्पादशब्दं for प्रतीत्यशब्दं. २. T om. एतद्वा अयुक्तम् । किं च. ३. P विज्ञान-
मित्यत्राह यार्थाभिसंभवादिति येति यदुक्तम्; C यार्थाभिसंबन्धादिति for विज्ञानमिति अत्रार्थद्वयासंभवात्
which is confirmed by T. ४. Mss. विवर्जितत्वात् for विवक्षितत्वात् which is based
on T. ५. T प्रतीत्य for अपेक्ष्य,
[पृष्ठम् ४]
४ | मध्यमकशास्त्रे | [ १.१-
तदेवं हेतुप्रत्ययापेक्षं भावानामुत्पादं परिदीपयता भगवता अहेत्वेकहेतुविषमहेतुसंभूतत्वं
स्वपरोभयकृतत्वं च भावानां निषिद्धं भवति, तन्निषेधाच्च सांवृतानां पदार्थानां यथावस्थितं
सांवृतं स्वरूपमुद्भावितं भवति । स एवेदानीं सांवृतः प्रतीत्यसमुत्पादः स्वभावेनानुत्पन्नत्वाद्
B 11 आर्यज्ञानापेक्षया नास्मिन्निरोधो विद्यते यावन्नास्मिन्निर्गमो विद्यते इत्यनिरोधादिभिरष्टाभिर्विशे-
षणैर्विशिष्यते । यथा च निरोधादयो न सन्ति प्रतीत्यसमुत्पादस्य तथा सकलशास्त्रेण
प्रतिपादयिष्यति ॥
अनन्तविशेषणसंभवेऽपि प्रतीत्यसमुत्पादस्य अष्टानामेवोपादानमेषां प्राधान्येन विवादाङ्ग-
भूतत्वात् । यथावस्थितप्रतीत्यसमुत्पाददर्शने सति आर्यागार्मेभिधेयादिलक्षणस्य प्रपञ्चस्य
सर्वथोपरमात्, प्रपञ्चानामुपशमोऽस्मिन्निति स एव प्रतीत्यसमुत्पादः प्रपञ्चोपशम इत्युच्यते ।
चित्तचैत्तानां च तस्मिन्नप्रवृत्तौ ज्ञानज्ञेयव्यवहारनिवृत्तौ जातिजरामरणादिनिरवशेषोपद्रवरहितत्वात्
शिवः । यथामिहितविशेषणस्य प्रतीत्यसमुत्पादस्य देशनाक्रिया ईप्सिततमत्वात् कर्मणा
निर्देशः ॥
अनिरोधमनुत्पादमनुच्छेदमशाश्वतम् ।
अनेकार्थमनानार्थमनागममनिर्गमम् ॥ १ ॥
यः प्रतीत्यसमुत्पादं प्रपञ्चोपशमं शिवम् ।
देशयामास संबुद्धस्तं वन्दे वदतां वरम् ॥ २ ॥
[ मङ्गलश्लोकौ ]
यथोपरिवर्णितप्रतीत्यसमुत्पादावगमाच्च तथागतस्यैवैकस्याविपरीतार्थवादित्वं पश्यन् सर्वपर-
B 12 प्रवादांश्च बालप्रलापानिवावेत्य अतीव प्रसादानुगत आचार्यो भूयो भगवन्तं विशिष्यति-वदतां
वरमिति ॥
अत्र च निरोधस्य पूर्वं प्रतिषेधः उत्पादनिरोधयोः पौर्वापर्यावस्थायाः सिद्धयभावं
द्योतयितुम् । वक्ष्यति हि-
पूर्वं जातिर्यदि भवेज्जरामरणमुत्तरम् ।
निर्जरामरणा जातिर्भवेज्जायेत चामृतः ॥ [ म० शा० ११.३ ]
इति । तस्मान्नायं नियमो यत् पूर्वमुत्पादेन भवितव्यं पश्चान्निरोधेनेति ॥
इदानीमनिरोधादिविशिष्टप्रतीत्यसमुत्पादप्रतिपिपादयिषया उत्पादप्रतिषेधेन निरोधादि-
प्रतिषेधसौकर्यं मन्यमान आचार्यः प्रथममेवोत्पादप्रतिषेधमारभते । उत्पादो हि परैः परिकल्प्य-
मानः स्वतो वा परिकल्प्येत, परतः, उभयतः, अहेतुतो वा परिकल्प्येत । सर्वथा च नोपपद्यत
इति निश्चिंत्याह-
न स्वतो नापि परतो न द्वाभ्यां नाप्यहेतुतः ।
उत्पन्ना जातु विद्यन्ते भावाः क्वचन केचन ॥ ३ ॥
१. T अभिधेयाभिधानलक्षणस्यादिप्रपञ्चानां for अभिधेयादिलक्षणस्य प्रपञ्चस्य. २. T यज्जन्म पूर्वं
भवति जरामरणं पश्चात् for यत्पूर्वं... निरोधेनेति,
[पृष्ठम् ५]
-१.३ ] | प्रत्ययपरीक्षा प्रथमं प्रकरणम् । | ५
तत्र जातिरिति कदाचिदित्यर्थः । क्वचनशब्द आधारवचनः कचिच्छब्दपर्यायः । केचन- B 13
शब्द आधेयवचनः केचिच्छब्दपर्यायः । ततश्चैवं संबन्धः - नैव स्वत उत्पन्ना जातु विद्यन्ते
भावाः, क्वचन, केचन । एवं प्रतिज्ञात्रयमपि योज्यम् ॥
ननु च-नैव स्वत उत्पन्ना इत्यवधार्यमाणे परत उत्पन्ना इत्यनिष्टं प्राप्नोति । न
प्राप्नोति । प्रसज्यप्रतिषेधस्य विवक्षितत्वात्, परतोऽप्युत्पादस्य प्रतिषेत्स्यमानत्वात् । यया चोप-
पत्त्या स्वत उत्पादो न संभवति, सा-
तस्माद्धि तस्य भवने न गुणोऽस्ति कश्चि-
ञ्जातस्य जन्म पुनरेव च नैव युक्तम् ।
[ मध्यमावतार-६.८ ]
इत्यादिना मध्यमावतारादिद्वारेणावसेया ॥
आचार्यबुद्धपालितस्त्वाह-न स्वत उत्पद्यन्ते भावाः, तदुत्पादवैयर्थ्यात्, अतिप्रसङ्ग- B 14
दोषोच्च । न हि स्वात्मना विद्यमानानां पदार्थानां पुनरुत्पादे प्रयोजनमस्ति । अथ सन्नपि
जायेत, न कदाचिन्न जायेत इति ॥
अत्रैके दूषणमाहुः- तदयुक्तम्, हेतुदृष्टान्तानभिधानात्परोक्तदोषापरिहाराच्चै । प्रसङ्ग- B 15
वाक्यत्वाच्चै प्रकृतार्थविपर्ययेण विपरीताद्यसाध्यतद्धर्मव्यक्तौ परस्मादुत्पन्नाभावाजन्मसाफल्यात्
जन्मविरो(बो ?) धाच्चेति कृतान्तविरोधः स्यात् ॥
सर्वमेतद्दूषणमयुज्यमानं वयं पश्यामः । कथं कृत्वा ? तत्र यत्तावदुक्तं हेतुदृष्टान्तानभि-
धानादिति, तदयुक्तम् । किं कारणम् ? यस्मात्परः स्वत उत्पत्तिमभ्युपगच्छंश्च पृच्छयते-
स्वत इति हेतुत्वेन तदेव चोत्पद्यते इति ? न च विद्यमानस्य पुनरुत्पत्तौ प्रयोजनं
पश्यामः, अनवस्थां च पश्यामः । न च त्वया उत्पन्नस्य पुनरुत्पाद इष्यतेऽनवस्था
चाभ्युपेहिते । तस्मान्निरुपपक्तिक एव त्वद्वादः स्वाभ्युपगमविरोधश्चेति । किमिति चोदिते परो
नाभ्युपैति यतो हेतुदृष्टान्तोपादानसाफल्यं स्यात् ? अथ स्वभ्युपगमविरोधंचोदनायापि परो न
निवर्तते, तदा निर्लज्जतया हेतुदृष्टान्तान्यामपि नैव निवर्तेत । न चोन्मत्तकेन सहास्माकं विवाद
इति । तस्मात्सर्वथा प्रियानुमानतामेवात्मनः आचार्यः प्रकटयति अस्थानेऽनुमानं प्रवेशयन् । B 16
न च माध्यमिकस्य सतः स्वतन्त्रमनुमानं कर्तुं युक्तं पक्षान्तराभ्युपगमाभावात् । तथोक्तमार्यदेवेन -
सदसत्सदसच्चेति यस्य पक्षो न विद्यते ।
उपालम्भश्चिरेणापि तस्य वक्तुं न शक्यते ॥
( चतुःशतक - १६.२५ )
१. T om. दोष. २. Mss. om. च. ३. T om. च. ४. After 'गच्छन् Mss. and P add:
विद्यमानस्य पुनरुत्पादे which T om. ५. Mss. • विरुद्धचोदनयापि for • विरोध०. ६. T om. सर्वथा.
७. Mss. प्रवेशयेत् for प्रवेशयन्. ८. P स्वतः for सतः which is not rendered in T,
यहाँ दोनों पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:
[पृष्ठ ६]
६ मध्यमकशास्त्रे [ १.३-
विग्रहव्यावर्त्तन्यां चोक्तम्—
यदि काचन प्रतिज्ञा स्यान्मे तत एव मे भवेद्दोषः।
नास्ति च मम प्रतिज्ञा तस्मान्नैवास्ति मे दोषः॥
यदि किंचिदुपलभयेयं प्रवर्तयेयं निवर्त्तयेयं वा।
5 प्रत्यक्षादिभिरर्थैस्तदभावान्मेऽनुपालम्भः॥
[ विग्रहव्यावर्
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Page 1 (८)
८ मध्यमकशास्त्रे [ १.३-
परप्रतिज्ञाप्रतिषेधमात्रफलत्वात्प्रसङ्गापादनस्य नास्ति प्रसङ्गविपरीताथर्पत्तिः । तथा च आचार्यो
भूयसा प्रसङ्गापत्तिमुखेनैव परपक्षं निराकरोति स्म । तथा —
नाकाशं विद्यते किंचित्पूर्वमाकाशलक्षणात् ।
अलक्षणं प्रसज्येत स्यात्पूर्वं यदि लक्षणात् ॥
[ म० शा० - ५.१ ]
रूपकारणनिर्मुक्ते रूपे रूपं प्रसज्यते ।
आहेतुकं न चास्त्यर्थः कश्चिदहेतुकः क्वचित् ॥
[ म० शा० - ४.२ ]
भावस्तावन्न निर्वाणं जरामरणलक्षणम् ।
प्रसज्येतास्ति भावो हि न जरामरणं विना ॥
[ म० शा० - २४.४ ]
इत्यादिना । अथ अर्थैक्यत्वादाचार्यवाक्यानां महार्थत्वे सति अनेकप्रयोगनिष्पत्तिहेतुत्वं
१० मध्यमशास्त्रे [ १. ३-
निदर्शनस्यापि नास्ति साध्यम् । तत्र हि शब्दसामान्यमनित्यतासामान्यं च अविवक्षित-
विशेषं द्वयोरपि संविद्यते । न त्वेवं चक्षुःसामान्यं शून्यताशून्यतावादिभ्यां संवृत्या अङ्गीकृतं नापि
परमार्थतः । इति नास्ति निदर्शनस्य साध्यम् ॥
यश्चायमसिद्धाधारपक्षदोषोद्भावने विधिः, एष एव सत्त्वादित्यस्य हेतोरसिद्धार्थतोद्भावनेऽ-
पि योज्यः ॥
इत्थं चैतदेवम्, यत्स्वयमप्यनेनायं यथोक्तोऽर्थोऽभ्युपगतस्तार्किकेन । सन्त्येवाध्यात्मिका-
यतनोत्पादका हेत्वादयः, तथा तथागतेन निर्देशाद् । यद्धि यथा तथागतेनास्ति निर्दिष्टं तत्तथा,
तद्यथा शान्तं निर्वाणमिति ॥
अस्य परोपक्षिस्य साधनस्येदं दूषणमभिहितमनेन—को हि भवतामभिप्रेतोऽत्र हेत्वर्थः ?
संवृत्या तथा तथागतेन निर्देशाद्, उत परमार्थत इति ? संवृत्या चेत्, स्वतो हेतोरसिद्धार्थता ।
परमार्थतश्चेत्,
न सन्नासन्न सदसद्धर्मो निर्वर्तते यदा ।
सदसदुभयात्मककार्यप्रत्ययत्वनिराकरणात्, तदा —
कथं निर्वर्तको हेतुरेवं सति हि युज्यते ॥
[ म० शा० – १.७ ]
नैवासौ निर्वर्तको हेतुरिति वाक्यार्थः । ततश्च परमार्थतो निर्वर्त्यनिर्वर्तकत्वासिद्धेः असिद्धार्थता
विरुद्धार्थता वा हेतोरिति ॥
यतश्चैवं स्वयमेवामुना न्यायेन हेतोरासिद्धिराङ्गीकृतानेन, तस्मात्सर्वेष्वेवानुमानेषु वस्तु-
धर्मोपन्यस्तहेतुकेषु स्वत एव हेत्वादीनामसिद्धत्वात् सर्वाण्येव साधनानि व्याहन्यन्ते । तद्यथा — न
परमार्थतः परेभ्यस्तत्प्रत्ययेभ्यः आध्यात्मिकायतनजन्म, परत्वात्, तद्यथा घटस्य । अथवा—न परे
परमार्थेन विवक्षिताः चक्षुराध्यात्मिकायतननिर्वर्तकाः प्रत्यया इति प्रतीयन्ते, परत्वात्, तद्यथा
तन्त्वादय इति । परत्वादिकमत्र स्वत एवासिद्धम् ॥
यथा चानेन — उत्पन्ना एव आध्यात्मिका भावाः, तद्विषयविशिष्टव्यवहारकरणात् – इत्यस्य
परामोहितस्य हेतोरसिद्धौर्यतामुद्भावयितुणा इदमुक्तम्, अथ समाहितस्य योगिनः प्रज्ञाचक्षुषा
भावयाथात्म्यं पश्यतः उत्पादगतादयः सन्ति परमार्थत इति साध्यते, तदा तद्विषयविशिष्टव्यवहार-
करणादिति हेतोरसिद्धार्थता, गतेरप्युत्पादनषेधादेव निषेधादिति । एवं स्वकृतसाधनेऽपि —
परमार्थतोऽगतं नैव गम्यते, अध्वत्वात्, गतावद्वदिति अध्वैत्वहेतोः स्वत एवासिद्धार्थता योज्या ॥
न परमार्थतः सभागं चक्षू रूपं पश्यति, चक्षुरिन्द्रियत्वात्, तद्यथा तत्सभागम् । तथा —
न चक्षुः प्रेक्षते रूपम्, भौतिकत्वात्, रूपवत् । खरस्वभावा न मही, भूतत्वात्, तद्यथानिलः,
इत्यादिषु हेत्वाचासिद्धिः स्वत एव योज्या ॥
१. Mss. सत्त्वादिभ्यः स्वहेतोः for सत्त्वादित्यस्य हेतोः which is confirmed T. २. T घटस्य
for पटस्य. ३. T आध्यात्मिकातयना for आध्यात्मिका. ४. T असिद्धि for असिद्धार्थतां. ५. After इति,
T adds उक्तम्. ६. Mss. अथ हेतोः for अध्वत्वहेतोः which is confirmed by T. ७. Mss.
स्वरूपवत् for रूपवत्. ८. Mss. नलिन for अनिलः.
-१. ३] प्रत्ययपरीक्षा प्रथमं प्रकरणम्। ११
सत्त्वादिति चायं हेतुः परतोऽनैकान्तिकः । किं सत्त्वात् चैतन्यवन्नाध्यात्मिकान्यायवत्नानि
स्वत उत्पद्यन्ताम्, उताहो घटादिवत् स्वत उत्पन्नन्तामिति घटादीनां साध्यसमत्वान्नानकान्ति-
कतेति चेत्, नैतदेवम्, तथानभिधानात् ॥
ननु च यथा परकीयेष्वनुमानेषु दूषणमुक्तम्, एवं स्वानुमानेष्वपि यथोक्तदूषणप्रसङ्गे
सति स एव असिद्धाधारासिद्धहेत्वादिदोषः प्राप्नोति, ततश्च यः उभयोर्दोषः, न तेनैकश्चोद्यो
भवतीति सर्वमेतद्भूषणमयुक्तं जायत इति । उच्यते । स्वतन्त्रमनुमानं ब्रुवतामयं दोषो जायते ।
न वयं स्वतन्त्रमनुमानं प्रयुंङ्गमहे परप्रतिज्ञातिषेधफलत्वादस्मदनुमानानाम् । तथा हि—परः चक्षुः
पश्यतीति प्रतिपन्नः । स तत्प्रसिद्धेनैवानुमानेन निराक्रियते — चक्षुषः स्वात्मादर्शनधर्ममिच्छसि,
परदर्शनधर्माविनाभावित्वं चाङ्गीकृतम्, तस्माद् यत्र यत्र स्वात्मादर्शनं तत्र तत्र परदर्शनमपि
नास्ति, तद्यथा घटे, अस्ति च चक्षुषः स्वात्मादर्शनम्, तस्मात् परदर्शनमप्यस्य नैवास्ति ।
ततश्च स्वात्मादर्शनविरुद्धं नीलादिपरदर्शनं स्वप्रसिद्धेनैवानुमानेन विरुध्यत इति एतावन्मात्रमस्म-
दनुमानेनोद्भाव्यत इति कुतोऽस्मत्पक्षे यथोक्तदोषावतारः, यतः समानदोषता स्यात् ?
किं पुनः—अन्यतरप्रसिद्धेनाप्यनुमानेनास्त्यनुमानबाधा । अस्ति, सा च स्वप्रसिद्धेनैव
हेतुना, न परप्रसिद्धेन, लोकत एवं दृष्टत्वात् । कदाचिद्धि लोके अर्थिप्रत्यर्थिभ्यां प्रमाणीकृतस्य
साक्षिणो वचनेन जयो भवति पराजयो वा, कदाचित् स्ववचनेन । परवचनेन तु न जयो
नापि पराजयः । यथा च लोके, तथा न्यायेऽपि । लौकिकस्यैव व्यवहारस्य न्यायशास्त्रे प्रस्तुतत्वात् ।
अत एव कैश्चिदुक्तम्-न परतः प्रसिद्धिवलादनुमानबाधा, परप्रसिद्धेरेव निराचिकीर्षितत्वादिति ।
यस्तु मन्यते—य एव उभयनिराश्चितवादी, स प्रमाणं दूषणं वा, नान्यतरप्रसिद्धसंदिग्धवाची इति,
तेनापि लौकिकीं व्यवस्थामनुरुध्यमानेन अनुमाने यथोक्त एव न्यायोऽभ्युपेयः ॥
तँथा हि नोभयप्रसिद्धेन वा आगमेन बाधा, किं तर्हि स्वप्रसिद्धेनापि ॥
स्वार्थानुमाने तु सर्वत्र स्वप्रसिद्धिश्चैव गरीयसी, नोभयप्रसिद्धिः । अत एव तर्कलक्षणा-
भिधानं निष्प्रयोजनम्, यथास्वप्रसिद्ध्या उपपत्त्या बुद्धैस्तदनभिज्ञाविनयोजनानुग्रहात् । इत्यलं
प्रसङ्गेन । प्रकृतमेव व्याख्यास्यामः ॥
परतोऽपि नोत्पद्यन्ते भावाः । पराभावादेव । एतच्च —
न हि स्वभावो भावानां प्रत्ययादिषु विद्यते ।
[ म० शा० – १.५ ]
इत्यत्र प्रतिपादयिष्यति । ततश्च पराभावादेव नापि परत उत्पद्यन्ते । अपि च —
अन्यत्वतीत्य यदि नाम परोऽभविष्य –
जायेत तर्हि बहुलः शिखिनोऽन्धकारः ।
१. Mss. प्रयुङ्जामहे for प्रयुङ्ग्महे. २. Mss. यथा for तथा.
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[Page 12]
१२ मध्यमकशास्त्रे [ १.३-
सर्वस्य जन्म च भवेत्खलु सर्वतश्च
तुल्यं परत्वमखिलेऽजनकेऽपि यस्मात् ॥
[ मध्यमावतार - ६०१४ ]
इत्यादिना [मध्यमकावतारात्] परत उत्पत्तिप्रतिषेधोऽवसेयः ॥
आचार्यबुद्धपालितस्तु व्याचष्टे - न परत उत्पद्यन्ते भावाः, सर्वतः सर्वसंभवप्रसङ्गात् ।
B 37 5 आचार्याभावविवेको दूषणमाह - तदत्र प्रसङ्गवाक्यत्वात् साध्यसाधनविपर्ययं कृत्वा, स्वतः
उभयतः अहेतुतो वा उत्पद्यन्ते भावाः, कुतश्चित्कस्यचिदुत्पत्तेः, इति प्राक्पक्षविरोधः । अन्यथा
सर्वतः सर्वसंभवप्रसङ्गात् इत्यस्य साधनदूषणानन्तःपातित्वादसंगतार्थमेतत् [ इति ] ।
एतदप्यसंगतार्थम् । पूर्वमेव प्रतिपादितत्वाद् दूषणान्तःपातित
१४ मध्यमकशास्त्रे [ १. ३-
B 43 कात्यायनाववादे च अस्ति नास्तीति चोभयम् ।
प्रतिषिद्धं भगवता भावाभावविभाविना ॥
[ म० शा० - १५.७ ]
इत्यादिना आगमो वर्णितः ॥
उक्तं च आर्यअक्षयमतिसूत्रे -
5 कतमे सूत्रान्ता नेयार्थाः कतमे नीतार्थाः ? ये सूत्रान्ता मार्गावताराय निर्दिष्टाः, इम उच्यन्ते
नेयार्थाः । ये सूत्रान्ताः फलावताराय निर्दिष्टाः, इम उच्यन्ते नेयार्थाः । यावद् ये सूत्रान्ताः शून्य-
तानिमित्ताप्रणिहितानभिसंस्काराजातानुत्पादाभावनिरात्मनिःसत्वनिर्जीव निःपुद्गलास्वामिकविमोक्षमुखा
निर्दिष्टाः त उच्यन्ते नीतार्थाः । इयमुच्यते भदन्त शारद्वतीपुत्र नीतार्थसूत्रान्तप्रतिशरणता, न
नेयार्थसूत्रान्तप्रतिशरणता इति ॥
B 44 10 तथा च आर्यसमाधिराजसूत्रे -
नीतार्थसूत्रान्तविशेष जानति
यथोपदिष्टा सुगतेन शून्यता ।
यस्मिन् पुनः पुद्गलसत्त्वपूरुषो
नेयार्थतो जानति सर्वधर्मान् ॥
[ समाधिराज - ७.५ ]
15 तस्मादुत्पादादिदेशनां मृषार्थां प्रतिपादयितुं प्रतीत्यसमुत्पादानुदर्शनमारब्धवानाचार्यः ॥
ननु च-उत्पादादीनामभावे सति यदि सर्वधर्माणां मृषात्वप्रतिपादनार्थमिदमारब्धवानाचार्यः,
नन्वेवं सति यन्मृषा न तदस्तीति न सन्त्यकुशलानि कर्माणि, तदभावान्न सन्ति दुर्गतयः, न सन्ति
कुशलानि कर्माणि, तदभावान्न सन्ति सुगतयः, सुगतिदुर्गतिसंभवाच्च नास्ति संसारः, इति सर्वा-
रम्भवैयर्थ्यमेव स्यात् । उच्यते । संवृतिसत्यव्यपेक्षया लोकस्य इदंसत्याभिनिवेशस्य प्रतिपक्षभावेन
20 मृषार्थता भावानां प्रतिपाद्यतेऽस्माभिः । नैव त्वार्याः कृतकार्याः किंचिदुपलभन्ते यन्मृषा अमृषा वा
स्यादिति । अपि च । येन हि सर्वधर्माणां मृषात्वं परिज्ञातं किं तस्य कर्माणि सन्ति, संसारो वा अस्ति ?
B 45 न चाप्यसौ कस्यचिद्धर्मस्य अस्तित्वं नास्तित्वं वोपलभते । यथोक्तं भगवता आर्यरत्नकूटसूत्रे-
चित्तं हि काश्यप परिगवेष्यमाणं न लभ्यते । यन्न लभ्यते तन्नोपलभ्यते । यन्नोपलभ्यते
तन्नैव अतीतं न अनागतं न प्रत्युत्पन्नम् । यन्नैवातीतं नानागतं न प्रत्युत्पन्नम्, तस्य नास्ति स्वभावः ।
25 यस्य नास्ति स्वभावः, तस्य नास्त्युत्पादः । यस्य नास्त्युत्पादः, तस्य नास्ति निरोधः ॥
इति विस्तरः ॥
१. The copyist seems to have abridged the text which according to T
will be येषु सूत्रान्तेषु आत्मसत्त्वजीवपोषपुरुषपुद्गलमनुजमनुष्यकारकवेदका नानाशब्दैराख्यायन्ते, येषु
वास्वामिकं सस्वामिकत्वेन निर्दिष्टम्, ते नेयार्थाः. २. °पूरूषो for °पूरूषा. ३. नेयार्थतो जानति सर्वधर्मान्
for the line ४. T मृषार्थता for मृषात्वं.
-१. ३ ] प्रत्ययपरीक्षा प्रथमं प्रकरणम् । १५
यस्तु विपर्यासोत्तुगमान्मुषात्वं नावगच्छति, प्रैतीत्य भावानां स्वभावमभिनिविशते, स धर्मे-
ष्विदंसत्याभिनिवेशादभिनिविष्टः सन् कर्माप्यपि करोति, संसारेऽपि संसरति, विपर्यासावस्थितत्वात्र
भव्यो निर्वाणमधिगन्तुम् ॥
किं पुनः - मृषास्वभावा अपि पदार्थाः संक्लेशव्यवदाननिबन्धनं भवन्ति । तद्यथा
मायायुवतिस्तत्स्वभावानभिज्ञानाम्, तथागतनिर्मितश्च उपचितकुशलमूलानाम् । उक्तं हि दृढोध्याशय- 5 B 46
परिपृच्छासूत्रे -
तद्यथा कुलपुत्र मायाकारनाटके प्रत्युपस्थिते मायाकारनिर्मितां स्त्रियं दृष्ट्वा कश्चिद्रागपरीत-
चेताः पर्षच्छारद्यभयेन उत्थायासनादपक्रामेत्, सोऽपक्रम्य तामेव स्त्रियमशुभतो मनसिकुर्यात्,
अनित्यतो दुःखतः शून्यतोऽनात्मतो मनसिकुर्यात् । इति विस्तरः ॥
विनये च - 10
यन्त्रकारकारिता यन्त्रयुवतिः सङ्गतयुवतिशून्या सङ्गतयुवतिरूपेण प्रतिभासते, तस्य च
चित्रकारस्य कामरागास्पदीभूता । तथा मृषास्वभावा अपि भावा बालानां संक्लेशव्यवदाननिबन्धनं
भवन्ति ॥
तथा आर्यरत्नकूटसूत्रे - B 47
अथ खलु तानि पञ्चमात्राणि भिक्षुशतानि भगवतो धर्मदेशनामवतरन्त्यनवगाहमानान्यन- 15
धिमुच्यमानानि उत्थायासनेभ्यः प्रक्रान्तानि । अथ भगवान् [तस्यां वेलायां] येन मार्गेणैते
भिक्षवो गच्छन्ति स्म, तस्मिन् मार्गे द्वौ भिक्षू निर्मिमीते स्म ॥
अथ तानि पञ्च भिक्षुशतानि येन [मार्गेण] तौ द्वौ भिक्षू [निर्मितकौ ] तेनोपसंक्रामन्ति
स्म । उपसंक्रम्य ताववोचन् - कुत्रायुष्मन्तौ गमिष्यथः ? निर्मितकाववोचताम् - गमिष्याव आवा-
मरण्यायनेषु, तत्र ध्यानसुखस्पर्शविहारैर्विहरिष्यावः । यं हि भगवान् धर्मं देशयति, तमावां 20
नावतरावा नावगाहावहे नाधिमुच्यामहे उत्त्रस्यावः संत्रासमापद्यावहे । अथ तानि पञ्च भिक्षुशता-
न्येतदवोचन् - वयमप्यायुष्मन्तो भगवतो धर्मदेशनां नावतरामो नावगाहामहे नाधिमुच्यामहे
उत्त्रस्यामः संत्रस्यामः संत्रासमापद्यामहे । तेन वयमरण्यायनेषु ध्यानसुखस्पर्शविहारैर्विहरिष्यामः ।
निर्मितकाववोचताम् - तेन हि आयुष्मन्तः संगास्यामो न विवदिष्यामः । अविवादपरमा हि
श्रमणस्य धर्माः । .... कस्यायुष्मन्तः प्रहाणाय प्रतिपन्नाः ? तान्यवोचन् - रागद्वेषमोहानां प्रहाणाय 25
वयं प्रतिपन्नाः । निर्मितकाववोचताम् - किं पुनरायुष्मन्तः संविद्यन्ते रागद्वेषमोहा यान् क्षपयिष्यथ ? B 48
तान्यवोचन्- न तेऽध्यात्मं न बहिर्धा नोभयमन्तरेणोपलभ्यन्ते, नापि तेऽपरिकल्पिता उत्पद्यन्ते ।
निर्मितकाववोचताम् - तेन हि आयुष्मन्तो मा कल्पयत, [मा विकल्पयत ] । यदा चायुष्मन्तो न
कल्पयिष्यथ न विकल्पयिष्यथ, तदा न रंक्ष्यथ न विरंक्ष्यथ । यश्च न रक्तो न विरक्तः, स शान्त
इत्युच्यते । शीलमायुष्मन्तो न संसरति न परिनिर्वाति । समाधिः प्रज्ञा विमुक्तिर्विमुक्तिज्ञानदर्शन-
१. C विपर्यासाभ्युपगमात् for °त्तुगमान्मु°. २. T प्रतीत्य भावानां स्वभावं परिकल्प्य अभिनिविशते
for प्रतीत्य '...'निविशते. ३. T om. 'व्यवदान'.
Here is the complete and faithful transcription of the two pages:
[पृष्ठ १६]
मध्यमकशास्त्रे
[ १.३-
मायूष्मन्तो न संसरति न परिनिर्वाति । एभिश्चायुष्मन्तो धर्मैर्निर्वाणं सूच्यते । एते च धर्माः शून्याः
प्रकृतिविविक्ताः । प्रजहीतैतामायुष्मन्तः संज्ञां यदुत परिनिर्वाणमिति । मा च संज्ञायां संज्ञां कार्ष्ट,
मा च संज्ञायां संज्ञां परिज्ञासिष्ट । यो हि संज्ञायां संज्ञां परिजानाति, संज्ञा बन्धनमेवास्य तद्भवति ।
संज्ञावेदितनिरोधसमापत्तिमायुष्मन्तः समापद्यध्वम् । संज्ञावेदितनिरोधसमापत्तिसमापन्नस्य
भिक्षोर्नास्त्युत्तरीकरणीयमिति वदावः ॥
अथ तेषां पञ्चानां भिक्षुशतानामनुपादायाश्रवेभ्यश्चित्तानि विमुक्तान्यभूवन् । तानि विमुक्त-
चित्तानि येन भगवांस्तेनोपसंक्रान्तानि । उपसंक्रम्य भगवतः पादौ शिरसाभिवन्द्यैकान्ते न्यषीदन् ॥
[L
पृष्ठम् १८
उक्तं च आर्यौपालिपरिपृच्छायाम् —
भय दर्शित नैरयिकं मे
सत्त्वसहस्र संत्रेजित नैके ।
न च विद्यति कश्चिह सत्त्व
5 यो च्युतु गच्छति घोरमपायम् ॥
न च कारकु कारण सन्ति
येहि कृता असितोमरशस्त्राः ।
कल्पवशेन तु पश्यति तत्र
कायि पतन्ति अपायित शाखाः ॥
B 54 10 चित्रमनोरम सञ्जितपुष्पाः
स्वर्णविमान जलन्ति मनोज्ञाः ।
तेष्वपि कारकु नास्तिह कश्चि
तेऽपि च स्थापित कल्पवशेन ॥
कल्पवशेन विकल्पितु लोकः
15 संज्ञग्रहेण विकल्पितु बालः ।
सो च ग्रहो अग्रहो असमभूतो
मायमरीचिसमा हि विकल्पाः ॥
तदेवमेतेऽस्वभावा भावाः स्वविपर्यासाविष्ठापिता बालानां संक्लेशहेतवो भवन्ति संसारे
इति स्थितम् ॥
20 यथा च मृषास्वभावानां पदार्थानां संक्लेशव्यवदानहेतुत्वं तथा मध्यमकावताराद्विस्तरेणा-
वसेयम् ॥
अत्राह — यदि स्वतः परतः उभयतोऽहेतुतश्च नास्ति भावानामुत्पादः, तत्र कथमविद्या-
प्रत्ययाः संस्कारा इत्युक्तं भगवता ? उच्यते । संवृतिरेव न तत्त्वम् ॥
किं संवृतेर्व्यवस्थानं वक्तव्यम् ? इदंप्रत्ययतामात्रेण संवृतेः सिद्धिरभ्युपगम्यते । न तु
B 55 25 पक्षचतुष्टयाभ्युपगमेन सस्वभाववादप्रसङ्गात्, तस्य चायुक्तत्वात् । इदंप्रत्ययतामात्रामभ्युपगमे हि
सति हेतुफलयोरन्योन्यापेक्षत्वान्नास्ति स्वाभाविकी सिद्धिरिति नास्ति सस्वभाववादः । अत
एवोक्तम् —
स्वयं कृतं परकृतं द्वाभ्यां कृतमहेतुकम् ।
तार्किकैरिष्यते दुःखं त्वया तूक्तं प्रतीत्यजम् ॥
[ लोकातीतस्तव - ९ ]
१. Mss. वासः for बालः.
पृष्ठम् १९
इहापि वक्ष्यति—
प्रतीत्य कारकः कर्म तं प्रतीत्य च कारकम् ।
कर्म प्रवर्तते नान्यत्पश्यामः सिद्धिकारणम् ॥ इति ॥
[ म० शा० – ८. १२ ]
भगवताप्येतावन्मात्रमेवोक्तम् —
5 तत्रायं धर्मसंकेतो यदुतास्मिन् सतीदं भवति, अस्योत्पादादिदमुत्पद्यते, यदुत अविद्या-
प्रत्ययाः संस्काराः, संस्कारप्रत्ययं विज्ञानमित्यादि ॥
अत्र केचित्परिचोदयन्ति — अनुत्पन्ना भावा इति किमयं प्रमाणजो निश्चय उताप्रमाणजः ?
तत्र यदि प्रमाणज इष्यते, तदेदं वक्तव्यम् — कति प्रमाणानि किंलक्षणानि किंविषयाणि, किं
स्वत उत्पन्नानि किं परत उभयतोऽहेतुतो वेति । अथाप्रमाणजः, स न युक्तः, प्रमाणाधीनत्वा-
10 त्प्रमेयाधिगमस्य । अनधिगतो ह्यर्थो न विना प्रमाणैरधिगन्तुं शक्यत इति प्रमाणाभावादर्थाधिगमाभावे
सति कुतोऽयं सम्यङ्निश्चय इति न युक्तमेतदनुत्पन्ना भावा इति । यतो वायं निश्चयो भवतोऽ-
नुत्पन्ना भावा इति भविष्यति, तत एव ममापि सर्वभावाः सन्तीति । यथा चायं ते निश्चयः—
B 56 अनुत्पन्नाः सर्वधर्मा इति, तथैव ममापि सर्वभावोत्पत्तिर्भविष्यति । अथ ते नास्ति निश्चयोऽनुत्पन्नाः
15 सर्वभावा इति, तदा स्वयमनिश्चितस्य परप्रत्यायनासम्भवाच्छास्त्रारम्भवैयर्थ्यमेवेति सन्त्यप्रतिषिद्धाः
सर्वभावा इति ॥
उच्यते । यदि कश्चिन्निश्चयो नामास्माकं स्यात्, स प्रमाणजो वा स्यादप्रमाणजो वा । न
त्वस्ति । किं कारणम् ? इहानिश्चयसम्भवे सति स्यात्तत्प्रतिपक्षस्तदपेक्षो निश्चयः । यदा त्वनिश्चय
एव तावदस्माकं नास्ति, तदा कुतस्तद्विरुद्धाविरुद्धो निश्चयः स्यात् संबन्ध्यन्तरनिरपेक्षत्वात्, खर-
B 57 विषाणस्य ह्रस्वदीर्घतावत् । यदा चैवं निश्चयस्याभावः, तदा कस्य प्रसिद्धयर्थं प्रमाणानि
20 परिकल्पयिष्यामः ? कुतो वैषां संख्या लक्षणं विषयो वा भविष्यति—स्वतः परतः उभयतोऽहेतुतो
वा समुत्पत्तिरिति सर्वमेतन्न वक्तव्यमस्माभिः ॥
यद्येवं निश्चयो नास्ति सर्वतः, कथं पुनरिदं निश्चितरूपं वाक्यमुपलभ्यते भवताम्—न
स्वतो नापि परतो न द्वाभ्यां नाप्यहेतुतो भावा भवन्तीति ? उच्यते । निश्चितमिदं वाक्यं
25 लोकस्य स्वप्रसिद्धयैवोपपत्त्या, नार्याणाम् । किं खलु आर्याणामुपपत्तिर्नास्ति ? केनैतदुक्तमस्ति
वा नास्ति वेति । परमार्थो ह्यार्याणां तूष्णींभावः । ततः कुतस्तत्र प्रपञ्चसंभवो यदुपपत्तिरनुप-
पत्तिर्वा स्यात् ?
यदि ह्यार्या उपपत्तिं न वर्णयन्ति, केन खल्विदानीं परमार्थं लोकं बोधयिष्यन्ति ? न
खल्वार्या लोकसंव्यवहारेणोपपत्तिं वर्णयन्ति, किं तु लोकत एव या प्रसिद्धोपपत्तिः, तां पराव-
बोधार्थमभ्युपेत्य तयैव लोकं बोधयन्ति । यथैव हि विद्यमानामपि शरीराशुचितां विपर्यासानुगता
रागिणो नोपलभन्ते, शुभाकारं चाभूतमध्यारोप्य परिक्लिश्यन्ते, तेषां वैराग्यार्थं तथागतनिर्मितो
१. Mss. अप्रसिद्धाः for अप्रतिषिद्धाः २. T तद्विरुद्धो for तद्विरुद्धाविरुद्धो. ३ Mss, आर्यः for आर्याणां.
[पृष्ठम् २०]
देवो वा शुभसंज्ञाया प्राक् प्रच्छादितान् कायदोषानुपवर्णयेत् — सन्त्यस्मिन् काये केशा इत्यादिना ।
ते च तस्याः शुभसंज्ञाया विमुक्ता वैराग्यमासादयेयुः । एवमिहाप्यार्यैः सर्वथाप्यनुपलभ्यमानात्मकं
भावानामविद्यातिमिरोपहतमतिनयनतया विपरीतं स्वभावमध्यारोप्य क्वचिच्च कंचिद्विशेषमतितरां परि-
क्लिश्यन्ति पृथग्जनाः । तानिदानीमार्याः तत्प्रसिद्धयैवोपन्यस्य परिबोधयन्ति । यथा विद्यमानस्य
घटस्य न मृदादिभ्य उत्पाद इत्यभ्युपेतम्, एवमुत्पादात्पूर्वं विद्यमानस्य विद्यमानत्वान्नास्त्युत्पाद
इत्यवसीयताम् । यथा च परभूतेभ्यो ज्वालाङ्गारादिभ्योऽङ्कुरस्योत्पत्तिर्नास्ति इति अभ्युपेतम्, एवं
विवक्षितेभ्योऽपि बीजादिभ्यो नास्तीत्यवसीयताम् ॥
अथापि स्यात्—अनुभव एषोऽस्माकमिति, एतदप्युक्तम् । यस्मादनुभव एष मृषा,
अनुभवत्वा
[पृष्ठम् - २२]
२२ | मध्यमकशास्त्रे | [ १.३-
वृद्धिर्हीयते लक्ष्यस्य लक्ष्यता । लक्ष्याच्चाव्यतिरिक्तत्वालक्ष्यस्यात्मवल्लक्षणमपि न लक्षणस्वभावम् ।
यथा चोक्तम्-
लक्ष्यालक्षणमन्यच्चेत्स्याल्लक्ष्यमलक्षणम् ।
तयोरभावोऽनन्यत्वे विस्पष्टं कथितं त्वया ॥ इति ॥
[ लोकातीतस्तव - ११]
न च विना तत्त्वान्यत्वेन लक्ष्यलक्षणसिद्धौ अन्या गतिरस्ति । तथा च वक्ष्यति-
एकीभावेन वा सिद्धिर्नानाभावेन वा ययोः ।
न विद्यते, तयोः सिद्धिः कथं नु खलु विद्यते ॥ इति ॥
[ म० शा० - २.२१ ]
अथोच्यते - अवाच्यतया सिद्धिर्भविष्यतीति चेत्, नैतदेवम् । अवाच्यता हि नाम
परस्परविभागपरिज्ञानाभावे सति भवति । यत्र च विभागपरिज्ञानं नास्ति, तत्र इदं लक्षणम्,
इदं लक्ष्यम्, इति विशेषतः परिच्छेदासम्भवे सति द्वयोरप्यभाव एवेति । तस्मादवाच्यतापि
नास्ति सिद्धिः ॥
अपि च । यदि ज्ञानं करणं विषयस्य परिच्छेदे, कः कर्ता ? न च कर्तारमन्तरेणास्ति
करणादीनां संभवः छिदिक्रियायामिव । अथ चित्तस्य तत्र कर्तृत्वं परिकल्प्यते, तदपि न युक्तम्, (B 65)
यस्मादर्थमात्रदर्शनं चित्तस्य व्यापारः, अर्थविशेषदर्शनं चैतसानाम्,
तत्रार्थदृष्टिर्विज्ञानं तद्विशेषे तु चैतसाः ।
इत्यभ्युपगमात् । एकस्यां हि प्रधानक्रियायां साध्यायां यथास्वं गुणक्रियानिर्वृत्तिद्वारेणाङ्गीभावो-
पगमात् करणादीनां करणादित्वम् । न चेह ज्ञानविज्ञानयोरेका प्रधानक्रिया, किं तर्हि,
अर्थमात्रपरिच्छित्तिर्विज्ञानस्य प्रधानक्रिया, ज्ञानस्य तु अर्थविशेषपरिच्छेद इति नास्ति ज्ञानस्य
करणत्वं नापि चित्तस्य कर्तृत्वम् । ततश्च स एव दोषः ॥
अथ स्यात् - अनात्मानः सर्वधर्मा इत्यागमात् कर्तुः सर्वथाभावात् कर्तारमन्तरेणापि
विद्यत एव क्रियादिव्यवहार इति, एतदपि नास्ति । आगमस्य सम्यगर्थानवधारणात् । एतदेवोक्तं
मध्यकावतारे ॥
अथापि स्यात् - यथा शिलापुत्रकस्य शरीरम्, राहोः शिरः, इति शरीर- (B 66)
शिरोव्यतिरिक्तविशेपणासंभवेऽपि विशेषणविशेष्यभावोऽस्ति, एवं पृथिव्याः स्वलक्षणमिति
स्वलक्षणव्यतिरिक्तपृथिव्यसंभवेऽपि भविष्यतीति, नैतदेवम् । अतुल्यत्वात् । शरीरशिरःशब्दयोर्हि
बुद्ध्यादिपाण्यादिवत्सद्भाविपदार्थान्तरसापेक्षताप्रवृत्तौ शरीरशिरःशब्दमात्रालम्बनो बुद्ध्युपजननः
सहचारिपदार्थान्तरसकाङ्क्ष एव वर्तते, कस्य शरीरम्, कस्य शिर इति । इतरोऽपि विशेषणान्तर-
संबन्धनिरिचिकीर्षया शिलापुत्रकराहुविशेषणध्वनिना लौकिकसंकेतानुविधायिना प्रतिकर्तुः काङ्क्षा-
मपहन्तीति युक्तम् । इह तु काठिन्यादिव्यतिरिक्तपृथिव्यासम्भवे सति न युक्तो विशेषणविशेष्यभावः ।
पादटिप्पणी:
१ Mss. संभेदः for संभवः.
<br>
[पृष्ठम् - २३]
-१.३ ] | प्रत्ययपरीक्षा प्रथमं प्रकरणम् । | २३
तीर्थिकैर्व्यतिरिक्तलक्ष्याभ्युपगमात्तदनुरोधेन विशेषणाभिधानमदुष्टमिति चेत्, नैतदेवम् । न हि (B 67)
तीर्थिकपरिकल्पिता युक्तिविदुराः पदार्थाः स्वसमयेऽभ्युपगन्तुं न्याय्याः, प्रमाणान्तरादेरभ्युपगम-
प्रसङ्गात् । अपि च । पुद्गलादिप्रज्ञप्तिवत् सशरीरोपादानस्य शिलापुत्रकस्योपादातुर्लौकिकव्यव-
हाराङ्गभूतस्य विशेषणस्याविचारप्रसिद्धस्य सद्भावात्, शिरउपादानस्य च राहोरुपादातुः
सद्भावाद्युक्तमेतन्निदर्शनम् । शरीरशिरोव्यतिरिक्तस्यार्थान्तरस्यासिद्धेस्तन्मात्रस्योपलम्भात् सिद्धमेव
निदर्शनमिति चेत्, नैतदेवम् । लौकिके व्यवहारे इत्थं विचाराप्रवृत्तेरविचारतश्च लौकिकपदार्था-
नामस्तित्वात् । यथैव हि रूपाद्यव्यतिरेकेण विचार्यमाण आत्मा न संभवति, अपि च
लोकसंवृत्या स्कन्धानुपादाय अस्यास्तित्वम्, एवं राहुशिलापुत्रकयोरपीति नास्ति निदर्शनासिद्धिः ॥
एवं पृथिव्यादीनां यद्यपि काठिन्यादिव्यतिरिक्तं विचार्यमाणं लक्ष्यं नास्ति, लक्ष्यव्यति-
रेकेण च लक्षणं निराश्रयम्, तथापि संवृतिरेवेति परस्परापेक्षया तयोः सिद्ध्या सिद्धिं व्यव-
स्थापयांबभूवुराचार्याः । अवश्यं चैतदेवमभ्युपेयम् । अन्यथा हि संवृतिरुपपन्नैव न विद्यूयेत, (B 68)
तदेव तत्त्वमेव स्यान्न संवृतिः । न च उपपत्त्या विचार्यमाणानां शिलापुत्रकादीनामसंभवः,
किं तर्हि वक्ष्यमाणया युक्त्या रूपवेदनादीनामपि नास्ति संभव इति तेषामपि संवृत्या शिला-
पुत्रकादिवन्नास्तित्वमास्थेयं स्यात् । न चैतदेवमिष्यतेतत् ॥
अथ स्यात् - किमनया सूक्ष्मेक्षिकया ? नैव हि वयं सर्वप्रमाणप्रमेयव्यवहारं सत्यमित्या-
चक्ष्महे, किं तु लोकप्रसिद्धिरैषा अमुना न्यायेन व्यवस्थाप्यत इति । उच्यते । वयमप्येवं ब्रूमः -
किमनया सूक्ष्मेक्षिकया लौकिकव्यवहारेऽवतारिक(त ?)या ? तिष्ठतु तावदेषा विपर्यासमात्रासादि-
तात्मभावसत्ताका संवृतिः मुमुक्षूणां मोक्षावाहाककुशलमूलोपचयहेतुः, यावन्न तत्त्वाधिगम इति । (B 69)
भवांस्तु एतां संवृतिपरमार्थसत्यविभागदुविदग्धबुद्धितया काचिदुपपत्तिमवतार्य अन्यायतो नाशयति ।
सोऽहं संवृतिसत्यव्यवस्थावैचक्षण्यग्राहिकैक एव पक्षे स्थित्वा संवृत्येकदेशनिराकरणोपेक्षितोपपत्त्य-
न्तरमुपपत्त्यन्तरेण विनिवर्तयन् लोकवृद्ध इव लोकचारात्परिभ्रश्यमानं भवन्तमेव निवर्तयामि
न तु संवृतिम् । तस्माद् यदि लौकिको व्यवहारः, तदा अवश्यं लक्षणवल्लक्ष्येणापि भवितव्यम् ।
ततश्च स एव दोषः । अथ परमार्थः, तदा लक्ष्याभावालक्षणद्वयमपि नास्तीति कुतः प्रमाणद्वयम् ?
अथ शब्दानामेवं क्रियाकारकसंबंधपूर्विका व्युत्पत्तिर्नाङ्गीक्रियते, तदिदमतिकष्टम् । तैरेव
क्रियाकारक संबन्धप्रवृत्तः शब्दैर्भवान् व्यवहरति, शब्दार्थं क्रियाकरणादिकं च नेच्छतीति अहो
बत इच्छामात्रप्रतिबद्धप्रवृत्तितो ( वृत्तिः ? ) भवतः ।
यदा चैवं प्रमेयद्वयमव्यवस्थितं तदा स्वसामान्यलक्षणाविषयत्वेन आगमादीनां प्रमाणान्तर-
त्वम् । किं च घटः प्रत्यक्ष इत्येवमादिकस्य लौकिकव्यवहारस्यासंग्रहादनार्थव्यवहाराम्युपगमाच्च
अव्यापिता लक्षणस्येति न युक्तमेतत् ॥
पादटिप्पणी:
१. Mss. ॰पुत्रक इवास्तित्वं for ॰पुत्रकादिवन्नास्तित्वं which is confirmed by T.
२. After ॰देतत्, T adds : एतदप्युपादाय प्रज्ञप्तिव्यवस्थानं विस्तरेण मध्यकावतारे निर्दिष्टमिति तत एवावसेयम्.
३. T क्रियाकारकादिशब्दार्थं for क्रियाकरणादिकं.
An exact, line-by-line transcription of the Sanskrit text from both pages:
[Left Page]
अथ स्यात् — घटोपादाननीलादयः प्रत्यक्षाः प्रत्यक्षप्रमाणपरिच्छेद्यत्वात् । ततश्च
यथैव कारणे कार्योपचारं कृत्वा बुद्धानां सुख उत्पाद इति व्यपदिश्यते, एवं प्रत्यक्षनीलादि-
निमित्तकोऽपि घटः कार्ये कारणोपचारं कृत्वा प्रत्यक्ष इति व्यपदिश्यते। नैवंविषये उपचारो
युक्तः। उत्पादो हि लोके सुखव्यतिरेकेणोपलब्धः, स च संस्कृतलक्षणस्वभावत्वादनेकदुष्कर-
शतहेतुत्वात्सुख एव, स सुख इति व्यपदिश्यमानः असंबद्ध एवेत्येवंविषये युक्त उपचारः।
घटः प्रत्यक्ष इत्यत्र तु—न हि घटो नाम कश्चिच्चोऽप्रत्यक्षः पृथगुपलब्धो यस्योपचारात्प्रत्यक्षत्वं स्यात् ।
नीलादिव्यतिरिक्तस्य घटस्याभावादौपचारिकं प्रत्यक्षत्वमिति चेत्, एवमपि सुतरामुपचारो न
युक्तः, उपचर्यमाणास्याश्रयस्याभावात्। न हि खरविषाणे तैक्ष्ण्यमुपचर्यते। अप
[पृष्ठम् २६]
एकान्तिकनिकृष्ट इति तत्प्रतिषेधोऽपि युक्तः । यत्तु खल्विदमुच्यते नापि परत इति, तदयुक्तम्,
यस्मात्परभूता एव भगवता भावानामुत्पादका निर्दिष्टाः ।
चत्वारः प्रत्यया हेतुश्चालम्बनमनन्तरम् ।
तथैवाधिपतेयं च प्रत्ययो नास्ति पञ्चमः ॥ ४ ॥
तत्र निर्वर्तको हेतुरिति लक्षणात्, यो हि यस्य निर्वर्तको बीजभावेनावस्थितः, स तस्य हेतु-
प्रत्ययः । उत्पद्यमानो धर्मो येनालम्बनेनोत्पद्यते, स तस्यालम्बनप्रत्ययः । कारणस्यानन्तरो निरोधः
कार्यस्योत्पत्तिप्रत्ययः, तथथा बीजस्यानन्तरो निरोधोऽङ्कुरस्योत्पादप्रत्ययः । यस्मिन् सति यद्भवति
तत्तस्याधिपतेयमिति । त एते चत्वारः प्रत्ययाः । ये चान्ये पुरोजातसहजातपश्चाज्जातादयः, ते एतेष्वेव
अन्तर्भूताः । ईश्वरादयस्तु प्रत्यया एव न संभवन्तीति, अत एवावधारयति – प्रत्ययो नास्ति पञ्चम
इति । तस्मादेभ्यः परभूतेभ्यो भावानामुत्पत्तिरस्ति परत उत्पत्तिरिति ॥ ४ !
अत्रोच्यते – नैव हि भावानां परभूतेभ्यः प्रत्ययेभ्य उत्पत्तिरिति । यस्मात् –
न हि स्वभावो भावानां प्रत्ययादिषु विद्यते ।
अविद्यमाने स्वभावे परभावो न विद्यते ॥ ५ ॥
इति । यदि हि हेत्वादिषु परभूतेषु प्रत्ययेषु समस्तेषु व्यस्तेषु व्यस्तसमस्तेषु हेतुप्रत्यय-
सामग्र्या अन्यत्र वा क्वचिद् भावानां कार्याणामुत्पादात्पूर्वं सत्त्वं स्यात्, स्यात्तेभ्य उत्पादः । न चैवं
यदुत्पादात्पूर्वं संभवः स्यात् । यदि स्यात्, गृह्येत च, उत्पादवैयर्थ्यं च स्यात् । तस्मान्न
चास्ति भावानां प्रत्ययादिषु स्वभावः । अविद्यमाने च स्वभावे नास्ति परभावः । भवनं भाव
उत्पादः, परेष्य उत्पादः परभावः, स न विद्यते । तस्मादयुक्तमेतत् परभूतेभ्यो भावाना-
मुत्पत्तिरिति ॥
अथवा भावानां कार्याणामङ्कुरादीनां बीजादिषु प्रत्ययेषु सत्त्वविकल्परूपेषु नास्ति स्वभावो
निर्हेतुकत्वप्रसङ्गात् ॥
तत्किमपेक्षं परत्वं प्रत्ययादीनाम् ? विद्यमानयोरेव हि मैत्रोपग्राह्ययोरेव परस्परापेक्षं परत्वम् ?
न चैवं बीजाङ्कुरयोर्यौगपद्यम् । तस्मादविद्यमाने स्वभावे कार्याणां परभावः परत्वं बीजादीनां
नास्तीति परव्यपदेशाभावादेव न परत उत्पाद इति । तस्मादागमाभिप्रायस्यानभिज्ञतैव परस्य । न
हि तथागता युक्तिविरुद्धं वाक्यमुदाहरन्ति । आगमस्य चाभिप्रायः प्रागेवोपवर्णितः ॥ ५ ॥
तदेवं प्रत्ययेभ्य उत्पादवादिनि प्रतिषिद्धे क्रियात उत्पादवादी मन्यते – न चक्षूरूपादद्यः
प्रत्ययाः साक्षाद्विज्ञानं जनयन्ति । विज्ञानजनिक्रियानिष्पादकत्वात्तु प्रत्यया उच्यन्ते । सा च क्रिया
विज्ञानं जनयति । तस्मात्प्रत्ययवती विज्ञानजनिक्रिया विज्ञानजनिका, न प्रत्ययाः । यथा पचिक्रिया
ओदनस्येति । उच्यते –
क्रिया न प्रत्ययवती
यदि क्रिया काचित् स्यात्, सा चक्षुरादिभिः प्रत्ययैः प्रत्ययवती विज्ञानं जनयेत् । न
१. Mss. ॰सामग्य्रां for ॰सामग्र्या which is confirmed by T. २. Mss. भावक्रिया for क्रिया
which is comfirmed by T.
[पृष्ठम् २७]
त्वस्ति । कथं कृत्वा ? इह क्रियेयमभिष्यमाणा जाते वा विज्ञाने इष्यते, अजाते वा जायमाने वा ?
तत्र जाते न युक्ता । क्रिया हि भावनिष्पादिका । भावश्चेन्निष्पन्नः, किमस्य क्रियया ?
जातस्य जन्म पुनरेव च नैव युक्तम् ।
[मध्यमकावतार-६.८]
इत्यादिना च मध्यमकावतारे प्रतिपादितमेतत् । अजातेऽपि न युक्ता,
कर्त्रा विना जनिरियं न च युक्तरूपा ।
[मध्यमकावतार-६.११]
इत्यादिवचनात् । जायमानेऽपि भावे क्रिया न संभवति, जाताजातव्यतिरेकेण जायमानाभावात् ।
यथोक्तम् –
जायमानार्यजातत्वाज्जायमानो न जायते ।
अथ वा जायमानत्वं सर्वस्यैव प्रसज्यते ॥ इति ।
[चतुःशतक-१५.१६]
यतश्चैवं त्रिषु कालेषु जनिक्रियाया असंभवः, तस्मान्नास्ति सा । अत एवाह – क्रिया न
प्रत्ययवती इति ।
विशेषणं नास्ति विना विशेष्यम् ।
[मध्यमकावतार-६.५७]
इत्यादिना प्रतिपादितमेतन्मध्यमकावतारे । न हि वन्ध्यापुत्रो गोमानित्युच्यते ॥
यद्येवम्, अप्रत्ययवती तर्हि भविष्यतीति, एतदप्ययुक्तमित्याह –
नाप्रत्ययवती क्रिया ।
यदा प्रत्ययवती नास्ति, तदा कथमप्रत्ययवती निर्हेतुका स्यात् ? न हि तन्तुमयः पटो
न युक्त इति वीरणमयोऽभ्युपगम्यते । तस्मात्क्रिया न भावजनिका ॥
अत्राह – यद्येवं क्रियाया असंभवः, प्रत्ययास्तर्हि जनका भविष्यन्ति भावानामिति ।
उच्यते –
प्रत्यया नाक्रियावन्तः
यदा क्रिया नास्ति, तदा क्रियारहिता अक्रियावन्तो निर्हेतुकाः प्रत्ययाः कथं जनकाः ?
अथ क्रियावन्त एव जनका इति, उच्यते –
क्रियावन्तश्च सन्त्युत ॥ ६ ॥
नेति प्रकृतेनाभिसंबन्धः । उतशब्दोऽवधारणे । तत्र क्रियाया अभाव उक्तः, कथं
क्रियावत्त्वं प्रत्ययानामिति ? यथा च विज्ञानजनिक्रियोक्ता, एवं परिक्रियादयोऽपि भावा उक्ता
वेदितव्या इति नास्ति क्रियातोऽपि समुत्पत्तिर्भावानामिति भवत्युत्पादाभिधानमर्थशून्यम् ॥ ६ ॥
अत्राह – किं न एतेन क्रियावन्तः प्रत्यया इत्यादिप्रकारेण ? यस्माच्चक्षुरादीन् प्रतीत्य
प्रत्ययान् विज्ञानादयो भावा जायन्ते, तस्माच्चक्षुरादीनां प्रत्ययत्वं तेभ्यश्चोत्पादो विज्ञानादीनामिति ।
एतदप्ययुक्तमित्याह –
पृष्ठम् २८
उत्पद्यते प्रतीत्येमानितीमे प्रत्ययाः किल ।
यावन्नोत्पद्यत इमे तावन्नाप्रत्ययाः कथम् ॥ ७ ॥
यदि चक्षुरादीन् प्रत्ययान् प्रतीत्य विज्ञानमुत्पद्यते इति अस्य इमे प्रत्यया उच्यन्ते, ननु
यावत्तद्विज्ञानाख्यं कार्यं नोत्पद्यते तावदिमे चक्षुरादयः कथं नाप्रत्ययाः ? अप्रत्यया एवेत्यभिप्रायः ।
न चाप्रत्ययेभ्य उत्पत्तिः सिकताभ्य इव तैलस्य ।
अथ मतम्—पूर्वमप्रत्ययाः सन्तः किंचिदन्यं प्रत्ययमपेक्ष्य प्रत्ययत्वं प्रतिपद्यन्त इति,
एतदप्ययुक्तम् । यत् तत् प्रत्ययान्तरमप्रत्ययस्य तस्य प्रत्ययत्वेन कल्प्यते, तदपि प्रत्ययत्वे सति
अस्य प्रत्ययो भवति । तत्राप्येषैव चिन्तेनेति न युक्तमेतत् ॥ ७ ॥
किं च । इह इमे चक्षुरादयो विज्ञानस्य प्रत्ययाः कल्प्यमानाः सतो वा अस्य कल्प्येरन्,
असतो वा ? सर्वथा च न युज्यते इत्याह —
नैवासतो नैव सतः प्रत्ययोऽर्थस्य युज्यते ।
कस्मादित्याह—
असतः प्रत्ययः कस्य सतश्च प्रत्ययेन किम् ॥ ८ ॥
असतो ह्यर्थस्य अविद्यमानस्य कथं प्रत्ययः स्यात् ? भविष्यता व्यपदेशो भविष्यतीति चेत्,
नैवम् —
भविष्यता चेद्व्यपदेश इष्टः
शक्तिं विना नास्ति हि भावितास्य ।
[ मध्यमावतार — ६.५८ ]
इत्यादिनोक्तदोषत्वात् । सतोऽपि विद्यमानस्य लब्धजन्मनो निष्फलैव प्रत्ययकल्पना ॥ ॥
एवं समस्तानां प्रत्ययानां कार्योत्पादनासामर्थ्येन अप्रत्ययत्वमुद्भाव्य अतः परं व्यस्ताना-
मप्रत्ययत्वं प्रतिपाद्यते ॥
अत्राह — यद्यप्येवं प्रत्ययानामसंभवः, तथापि अस्त्येव लक्षणोपदेशात्प्रत्ययप्रसिद्धिः । तत्र
निर्वर्तको हेतुरिति लक्षणमुच्यते हेतुप्रत्ययस्य । न चाविद्यमानस्य लक्षणोपदेशो युक्तो
वन्ध्यासुतस्येवेति । उच्यते । स्याद्धेतुप्रत्ययो यदि तस्य लक्षणं स्यात् । यस्मात्—
न सन्नासन्न सदसन् धर्मो निर्वर्तते यदा ।
कथं निर्वर्तको हेतुरैवं सति हि युज्यते ॥ ९ ॥
त
३० मध्यमशास्त्रे [ १. १२
नानन्तरमतो युक्तम् इति ।
अपि च ।
निरुद्धे प्रत्ययश्च कः ॥
इत्यत्र पूर्वकमेव व्याख्यानम् ॥ ११ ॥
इदानीमधिपतिप्रत्ययस्वरूपनिषेधार्थमाह - बीजादीनां
भावानां निःस्वभावानां न सत्ता विद्यते यतः ।
सतीदमस्मिन् भवतीत्येतन्नैवोपपद्यते ॥ १२ ॥
इह यस्मिन् सति यद्भवति, तत्तस्य आधिपत्यमित्यधिपतिप्रत्ययलक्षणम् । भावानां च
प्रतीत्यसमुत्पन्नत्वात् स्वभावाभावे कुतस्तद् यदस्मिन्निति कारणत्वेन व्यपदिश्यते, कुतस्तद्
यदिदमिति कार्यत्वेन ? तस्मान्नास्ति लक्षणतोऽपि प्रत्ययसिद्धिः ॥ १२ ॥
अत्राह-तन्त्वादिभ्यः पटादिकमुपलभ्य पटादेस्तन्त्वादयः प्रत्यया इति । उच्यते ।
पटादिफलप्रवृत्तिरेव स्वरूपतो नास्ति, कुतः प्रत्ययानां प्रत्ययत्वं सेत्स्यति ? यथा च पटादिफल-
[३२] मध्यमशास्त्रे [ १.१६–
शैलपर्वत यथा अकम्पिया
एवं धर्म अविकम्पियाः सदा ।
नो च्यवति न पि चोपपद्ययु
एवं धर्मत जिनेन देशिता ॥ इत्यादि ।
तथा –
यो न पि जायति ना चुपपद्यी
नो च्यवते न पि जीर्यति धर्मः ।
तं जिनु देशयती नरसिंहः
तत्र निवेशयि सत्त्वशतानि ॥
यस्य सभागु न विद्यति कश्चि
नो परमावतु केनचि लब्धः ।
नान्तरतो न पि बाहिरतो वा
लभ्यति तत्र निवेशयि नाथः ॥
शान्त गती कथिता सुगतेन
नो च गति उपलभ्यति काचि ।
तत्र च बोहरसी गतिमुक्तो
मुक्तकु मोचयमी बहुसत्त्वान ॥ इति विस्तरः ॥ १६ ॥
इत्याचार्यचन्द्रकीर्तिपादोपरचितायां प्रसन्नपदायां मध्यमकवृत्तौ
प्रत्ययपरीक्षा नाम प्रथमं प्रकरणम् ॥
१. P धर्मेण for धर्मत.
२
गतागतपरीक्षा द्वितीयं प्रकरणम् ।
अत्राह—यद्यपि उत्पादप्रतिषेधात्प्रतीत्यसमुत्पादस्य अनिरोधादिविशेषणसिद्धिः, तथापि
अनागमानिर्गमप्रतीत्यसमुत्पादसिद्धये लोकप्रसिद्धागमनागमनक्रियाप्रतिषेधार्थं किंचिदुपन्यस्तव्य-
मुच्यतामिति । उच्यते । यदि गमनं नाम स्यात्क्रियेत तद्गते वा अध्वजाते परिकल्प्येत अगते
गम्यमाने वा । सर्वथा च न युज्यते इत्याह –
गतं न गम्यते तावदगतं नैव गम्यते ।
गतागतविनिर्मुक्तं गम्यमानं न गम्यते ॥ १ ॥
तत्र उपरतगमिक्रिय मध्वजातं गतमित्युच्यते । आविद्यमानं गमिक्रियया वर्तमानं गम्यत
इत्युच्यते । यद्गतमुपरतगमिक्रिये तद्वर्तमानगमिक्रियायोगावाचिना गम्यते इत्यनेन शब्देनोच्य-
मानमसंबद्धमिति कृत्वा गतं तावद् गम्यत इति न युज्यते । तावच्छब्देन च प्रतिषेधक्रमं
दर्शयति ॥
अगतमपि न गम्यते । अगतं हि अनुपजातगमिक्रियResource/मनागतमुच्यते, गम्यत इति च
वर्तमानम् । अतोऽनागतवर्तमानयोरत्यन्तभेदादगतमपि गम्यत इति न युज्यते । यदि अगतं कथं
गम्यते, अथ गम्यते न तदगतमिति ॥
गम्यमानेऽपि नास्ति गमनम्, यस्मात् –
गतागतविनिर्मुक्तं गम्यमानं न गम्यते ।
इह हि गन्ता यं देशमतिक्रान्तः स तस्य देशो गतः, यं च नातिक्रान्तः सोऽस्या-
नागतः । न च गतागतव्यतिरेकेण तृतीयमपरमध्वजातं पश्यामो गम्यमानं नाम । यतश्चैवं
गम्यमानं न गम्यते, गम्यत इति न प्रज्ञायते, तस्मान्नास्ति गम्यमानम् । अतो न तद्
गमिक्रियया आविष्टयते न गम्यत इति नास्ति गम्यमानेऽपि गमनम् ॥
अथ स्यात्—गन्तुर्गच्छतो यश्चरणारूक्रान्तो देशः, स गम्यमानः स्यादिति । नैवम्,
चरणयोरपि परमाणुसंघातत्वात् । अङ्गुल्यग्रावस्थितस्य परमाणोर्यः पूर्वो देशः, स तस्य
गतेऽन्तर्गतः । पाष्र्ण्यावस्थितस्य चरमपरमाणोर्य उत्तरो देशः, स तस्य अगतेऽन्तर्गतः । न
च परमाणुव्यतिरेकेण चरणमस्ति । तस्मान्नास्ति गतागतव्यतिरेकेण गम्यमानम्। यथा चैवं चरणे
विचारः, एवं परमाणूनामपि पूर्वापरदिग्भागसंबन्धेन विचारः कार्य इति । अथार्थगतं गम्यमानम्,
उक्तमुत्तरं जायमानविचारेण । तस्माद्गम्यमानं न गम्यते इति सिद्धम् ॥ १ ॥
तत्राह—गम्यत एव गम्यमानम् । इह हि –
चेष्टा यत्र गतिस्तत्र गम्यमाने च सा यतः ।
न गते नागते चेष्टा गम्यमाने गतिस्ततः ॥ २ ॥
१. P वर्तमानगमिक्रियया for गमिक्रियया वर्तमानं as in Mss. २. Mss. अगतमिति for अगतमपि.
म. ५
पृष्ठम् ३४
तत्र चेष्टा चरणोक्षेपपरिक्षेपलक्षणा। यतो व्रजतो गन्तुर्यत्र देशे चेष्टा गतिः तत्रैव
देशे। सा च चेष्टा न गतेऽध्वनि संभवति नाप्यगते, किं तु गम्यमान एव। ततश्च गम्यमाने
गतिः। यत्र हि गतिरुपलभ्यते तद्गम्यमानम्, तच्च गमिक्रियया आविष्ट्यते। तस्माद् गम्यमान-
मेव गम्यते इति। एकोऽत्र गमिर्ज्ञानार्थः, अपरश्च देशान्तरसंप्राप्त्यर्थ इति ॥ २ ॥
एवमपि परिकल्प्यमाने गम्यमानं न गम्यत इत्याह —
गम्यमानस्य गमनं कथं नामोपपत्स्यते।
गम्यमाने द्विगमनं यदा नैवोपपद्यते ॥ ३ ॥
इह हि गमिक्रियायोगादेव गम्यमानव्यपदेशमिच्छति भवान्, तच्च इति गम्यत ब्रवीति।
एका चात्र गमिक्रिया, तया गम्यमानव्यपदेशो भवतु काममन्वनः। गम्यत इति भूयः क्रियासंबन्धो
गम्यमानम्य न युज्यत इति
गम्यमानस्य गमनं कथं नामोपपत्स्यते।
कारणमाह —
गम्यमाने द्विगमनं यदा नैवोपपद्यते ॥ इति ॥
गम्यमानमिति गम्यत इत्यर्थः। द्विगतं गमनं द्विगमनम्। एकस्या गमिक्रियाया गम्यमान-
मित्यत्रोपयुक्तत्वाद् द्वितीयाया अभावाच्च, गम्यत इत्ययं व्यपदेशो विना गमनेन यदा नैवोपपद्यते,
तदा गम्यमानं गम्यत इति परिपूर्णो वाक्यार्थो नास्तीत्यभिप्रायः। गम्यमानमित्येतावन्मात्रमेव
संभवति द्वितीयक्रियाभावात्, न तु गम्यत इति ॥ ३ ॥
अथ गम्यते इत्यत्रैव गमिक्रियासंबन्ध इष्यते, एवं सति गम्यमानव्यपदेशे नास्ति क्रिया-
संबन्ध इति न परिपूर्णता वाक्यार्थस्येत्याह —
गम्यमानस्य गमनं यस्य तस्य प्रसज्यते।
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