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मूलमध्यमककारिका (आचार्य नागार्जुन - चन्द्रकीर्ति प्रणीत प्रसन्नपदा व्याख्या सहित)

मूलमध्यमककारिका (आचार्य नागार्जुन - चन्द्रकीर्ति प्रणीत प्रसन्नपदा व्याख्या सहित)

Mulamadhyamakakarika of Nagarjuna with Prasannapada Commentary

आचार्य नागार्जुन (टीकाकार: आचार्य चन्द्रकीर्ति) द्वारा

DevanagariSanskritpublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 13

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xxviii मध्यमकशास्त्र
(५) महायानविंशिका ;
(६) अक्षरशतक और उसकी व्याख्या;
(७) प्रतीत्यसमुत्पादहृदय और उसकी टीका;
(८) चतुःस्तव;
(९) प्रज्ञापारमितास्तोत्र;
(१०) भावनाक्रम;
(११) सूत्र-समुच्चय यानी महायान सूत्रों का संग्रह;
(१२) सुहृल्लेख या आर्य नागार्जुनबोधिसत्त्व सुहृल्लेख ;
(१३) भवसंक्रान्ति;
(१४) रत्नावली; और
(१५) वैद्यल-प्रकरण
धर्मसंग्रह नामक रचना, जो बौद्ध पारिभाषिक शब्दों का संग्रह है (अॅनेक्डोटा
ऑक्सोनिऐंशिया जिल्द-१ भाग ५ में संपादित और जो पुस्तक के अंत के संकल्प में
नागार्जुन लिखित बतायी गयी है, इस तत्त्वज्ञ की असली कृति नहीं प्रतीत होती। उनके
बाद के किसी और नागार्जुन की हो सकती है, जो कि संभवतः हीनयानी हो।
उपर्निर्दिष्ट रचनाओं में से कतिपय मूल संस्कृत में उपलब्ध हैं, किन्तु बाकी
रचनाएँ तिब्बती और चीनी अनुवादों से ही ज्ञात हैं।
तारानाथ (Geschichte पृ. ७१) कहते हैं कि हीनयानियों ने शतसाहस्रिका
प्रज्ञापारमिता का कर्त्ता नागार्जुन को बताया है, लेकिन यह संभवनीय नहीं मालूम होता।
प्रज्ञापारमिता - वाङ्मय - पंचविंशति और अष्टसाहस्रिका जैसी रचनाएँ -- पहले ही से विद्य-
मान था । तिब्बती परंपरा में मध्यमकशास्त्रकारिका के वैकल्पिक नाम 'प्रज्ञा' तथा
'प्रज्ञापारमिता' में जो शब्दसादृश्य है उसीके कारण यह भ्रम संभव दीखता है। वास्तव में
नागार्जुनने प्रज्ञापारमिता वाङ्मय तथा अन्य महायानसूत्रों का संहितीकरण अपनी कारिकाओं
में किया है जिस प्रकार बादरायण ने उपनिषदों की शिक्षा का शारीरकसूत्रों में ।
नागार्जुन या (Klu-sgrub) नागार्जुनगर्भ के नाम पर तोहोकू सूची में
निर्दिष्ट १२२ रचनाओं में से महत्वपूर्ण और असली रचनाएँ ऊपर की सूची में समाविष्ट
हैं। अन्य रचनाएँ अप्रधान तथा अधिकांश तंत्रविषयक हैं।
५. नागार्जुन और उनकी शिष्यपरंपरा
आर्यदेव या देव नागार्जुन का खास व्यक्तिगत अंतेवासी बतलाया गया है। उसकी
रचनाएँ हैं चतुःशतक, हस्तवालप्रकरण, और कतिपय छोटी रचनाएँ। उनके उत्तराधिकारी
टीकाकारों में बुद्धपालित, भव्य या भावविवेक, तथा चंद्रकीर्ति के नाम बताये जा सकते
हैं। बुद्धपालित की एक ही रचना मध्यमकशास्त्र की टीका तिब्बती में प्राप्त है। उसकी
अपेक्षा भव्य या भावविवेक की रचना अधिक विपुल है । प्रज्ञाप्रदीप नामक मध्यमकशास्त्र


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प्रस्तावना । xxix
की टीका के अतिरिक्त उसकी माध्यमिक सिद्धान्त-विषयक कई रचनाएँ हैं, जिनके नाम ये
हैं; — १. मध्यमकरत्नप्रदीप २. मध्यमकहृदय -- तर्कज्वाला टीकासंबलित ३. मध्यमक build-अर्थ-
संग्रह (तीनों तिब्बती अनुवाद में प्राप्त); ४. करतलरत्न — चीनी अनुवादसे ज्ञात हाल में
संस्कृत में रूपान्तरित (Nanjio क्र-१२३७); ५. निकायभेदविभंगव्याख्या, बौद्ध धर्म
की १८ शाखाओं का विवरणः और ६ तत्त्वामृतावतार (ऊपर क्रमांक ४ में दो बार
निर्दिष्ट)।
तारानाथ और उनका अनुसरण करते हुए शिएफ्नर (पृ. १७४) कहते हैं कि
देवशमनिने मध्यमकशास्त्र पर सीताभ्युदय नामक टीका लिखी है, जिसमें चन्द्रकीर्ति के
मतों का खंडन किया है। मूल संस्कृत रचना अप्राप्य है, और उसका निर्देश तक 'तंजुर'
या 'कंजुर' में नहीं मिलता।
मध्यमकशास्त्र पर जो टीकाग्रंथ रचे गये हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण चंद्रकीर्ति-कृत
प्रसन्नपदा है। चंद्रकीर्ति माध्यमियों के 'प्रसंग संप्रदाय' का अनुयायी था। उसका दावा
है कि नागार्जुन की स्थापनाओं का आशय सच्चाई के साथ समझाने का सफल प्रयास
उसने कारिकाओं की टीका में किया है। बुद्धपालित और भव्य की टीकाओं का उल्लेख
उसने किया है, और कई स्थलों में भव्य की मान्यताओं का खंडन भी किया है। उसकी
टीका यथार्थ ही प्रसन्नपदा है, और शैली की प्रसन्नता की दृष्टि से वह शंकराचार्य के
ब्रह्मसूत्रभाष्य की पूर्ववर्ती पथ-निर्देशिका है। ऊपर इस टीकाके कई उद्धरण दिये गये हैं,
जिनसे पाठक उसकी विवेचनशैली की झांकी पा सकते हैं। अपनी स्थापनाओं के पुष्ट्यर्थ
उसने महायानसूत्रों से पर्याप्त उद्धरण लिये हैं। भव्य के समान ही उसने माध्यमिक संप्रदाय
पर छोटी छोटी पुस्तिकाएँ लिखी हैं: — (१) मध्यमावतार-पद्यमय षडध्यायी सटीक
रचना; (२) मध्यमक-प्रज्ञावतार; (३) पंचस्कंध प्रकरण। इनके अलावा उसने
नागार्जुन कृत युक्तिषष्टिका और शून्यतासप्तति पर तथा आर्यदेवविरचित चतुःशतक पर
टीकाएँ भी लिखी हैं। प्रसन्नपदा तथा चतुःशतक-टीका के कुछ खंडों को छोड़कर बाकी
सब रचनाएँ तिब्बती में सुरक्षित हैं।
चंद्रकीर्ति के बाद माध्यमिक संप्रदाय के लेखकों में दो ही नाम उल्लेखनीय हैं —
(१) शिक्षासमुच्चय तथा बोधिचर्यावतार का कर्ता शांतिदेव और (२) बोधिचर्यावतार
का टीकाकार प्रज्ञाकरमति।
पूना प. ल. वैद्य
१ जनवरी, १९५९